मोहन भागवत की अज्ञान चर्चा  

आरएसएस जुमलों का कारखाना है, भाजपाई और हिंदू दलों के नेता जितने भी जुमले बोलते हैं, वे सब इसी कारखाने में तैयार होते हैं। हाल ही में इलाहाबाद में आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने इसी तरह फिर झूठ बोला

01 फरवरी, 2019 के हिंदी दैनिक ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार, इलाहाबाद के कुम्भ नगर में आयोजित विश्व हिंदी परिषद की धर्म संसद में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि सियासी लाभ के लिए हिंदू समाज को बांटने की साजिश हो रही है। धर्म संसद का मंच आरएसएस का ही मंच है, जहां से कुछ भी बोला जा सकता है, क्या फर्क पड़ता है? वहां कोई पलटकर सवाल पूछने वाला नहीं है। अगर मोहन भागवत अपने मंच से हटकर आमने-सामने बात करें, तो उनसे सवाल भी पूछे जाएं। पर, आरएसएस के नेताओं की यही खासियत है कि वे अपने मंच से ही बोलते हैं, जनता से संवाद नहीं करते और किसी सवाल का जवाब तो देते ही नहीं हैं। इसलिए वे धर्म के नाम पर अधर्म, ज्ञान के नाम पर अज्ञान और सत्य के नाम पर झूठ का जो अनर्गल प्रलाप करते फिरते हैं, उसकी उन्हें चुनौती नहीं मिलती। ध्यान रहे कि आरएसएस जुमलों का कारखाना है, भाजपाई और हिंदू दलों के नेता जितने भी जुमले बोलते हैं, वे सब इसी कारखाने में तैयार होते हैं। आइए, अब हम मोहन भगवत के जुमलों का विश्लेषण करते हैं।

कौन कर रहा है साजिश?

मोहन भागवत कहते हैं, ‘‘सियासी लाभ के लिए हिंदू समाज को बांटने की साजिश हो रही है। इस साजिश के विरुद्ध हिंदुओं को एक जुट होने की जरूरत है।’’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि सियासी लाभ के लिए कौन हिंदू समाज को बांटने की साजिश कर रहा है? यह साजिश मुसलमान कर रहे हैं या ईसाई? अगर यह साजिश मुसलमान कर रहे हैं, तो वे किस तरह हिंदुओं को बाँट रहे हैं? और उन्होंने कितना हिंदुओं को बाँट दिया? अगर हिंदुओं को बांटने की साजिश ईसाई कर रहे हैं, तो उनकी शक्ति ही कितनी है देश में, जो वे हिंदुओं को बांट देंगे? इनमें से एक भी सवाल का जवाब मोहन भागवत के पास नहीं है। जवाब सत्य का होता है, झूठ का नहीं। मोहन भागवत झूठ गढ़ते हैं, और झूठ ही फैलाते हैं। आरएसएस के नेता झूठ गढ़कर इस सत्य को छिपाना चाहते हैं कि हिंदू समाज स्वयं में ही वर्णों और हजारों जातियों में बंटा हुआ समाज है। फिर पहले से खंड-खंड समाज को कौन खंडित कर सकता है? ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों के सामुदायिक हित एक नहीं हैं, अलग-अलग हैं। तीनों में कोई एकता नहीं है, बल्कि इनके बीच जबरदस्त संघर्ष है। ये तीनों अलग-अलग इकाइयां हैं, जिनके संस्कार और इतिहास सब अलग-अलग हैं। परन्तु ये तीनों इकाइयां दलित-पिछड़ी जातियों को दबाने के लिए हमेशा एक हो जाती हैं। ये दलित-पिछड़ी जातियों के शैक्षिक और आर्थिक विकास को रोकने के लिए ही भाजपा को वोट देकर आरएसएस को मजबूत करती हैं। ध्यान रहे कि आरएसएस मुस्लिम विरोधी है, पर द्विज वर्ण के लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि यह उसका दिखावा है, उसका असल काम दलित-पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व के उन्माद से जोड़कर उन्हें द्विजों के बराबर लाने से रोकना है। यही कारण है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आरएसएस के समर्थक हैं।

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत

हिंदुओं को किसके विरुद्ध एकजुट होना चाहिए?

इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि मोहन भागवत किन हिंदुओं को किसके विरुद्ध एकजुट होने के लिए कह रहे हैं? वह यह अपील न तो मुसलमानों के विरुद्ध कर रहे हैं और न ईसाइयों के विरुद्ध कर रहे हैं; बल्कि ब्राह्मण, ठाकुर और बनियों से वह यह अपील कर रहे हैं कि वे दलित-पिछड़ी जातियों के खिलाफ हमेशा एकजुट बने रहें। अब सवाल यह पैदा होता है कि जब ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य पहले से ही दलित-पिछड़ी जातियों के खिलाफ संगठित हैं, तो मोहन भागवत को धर्म-संसद में फिर से अपील करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका कारण है कि दलित-पिछड़ी जातियों में बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर के विचारों से हिंदुत्व के खिलाफ एक नई चेतना का उदय हो रहा है, जिसने आरएसएस के मनुवादी जाल को तार-तार कर दिया है और उसका असली चेहरा सामने ला दिया है। आरएसएस मुसलमानों और ईसाइयों से बिलकुल भी भयभीत नहीं है, क्योंकि उनसे उसको कोई चुनौती नहीं मिल रही है। उसको यदि चुनौती मिल रही है, तो वह दलित-पिछड़ी जातियों से मिल रही है, जो हिंदुत्व के फोल्ड से मुक्त होने लगी हैं। इसी को मोहन भागवत हिंदू समाज को बांटने की साजिश कहते हैं। जनता मंदिर मुद्दे में ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं ले रही है, जिससे अयोध्या और दिल्ली में किए गए उसके धर्म-सम्मेलन बुरी तरह फ्लॉप हो चुके हैं। इससे उन्हें लग रहा है कि हिंदू समाज को बांटा जा रहा है। इसीलिए उन्हें फिर से जोड़ने के लिए मोहन भागवत ने धर्म-संसद में कहा कि, ‘‘संतों को लोग ध्यान से सुनते हैं। इसलिए लोगों के जागरण का काम लगातार चलना चाहिए।’’ लेकिन, उन्हें यह नहीं मालूम कि काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है। अब जनता की प्राथमिकता मंदिर नहीं है, बल्कि रोजगार है। जनता यह भी जान रही है कि मंदिर कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भाजपा को सत्ता में लाने के लिए आरएसएस का राजनीतिक मुद्दा है। और इसके सहारे आरएसएस जनता का उनकी समस्याओं से ध्यान हटाना चाहती है।

कुंभ नगर, इलाहाबाद में आरएसएस द्बारा आयोजित धर्म संसद में उपस्थित बाबा और अन्य लोग

मोहन भागवत हिंदुत्व से मोह भंग को अंग्रेजी शिक्षा का दोष बताते हैं। वह कहते हैं, ‘‘अपने संस्कारों के प्रति ज्ञान न होना बड़ी परेशानी है।’’ वह किन संस्कारों की बात कर रहे हैं? जिन लोगों के दिमाग अंग्रेजी पढ़-लिखकर खुल जाते हैं और जो अंधविश्वासों में नहीं जीते हैं, उन्हें मोहन भागवत कहते हैं कि, ‘‘बच्चे एक, दो, तीन की बजाय वन, टू, थ्री बोलते हैं। इस पीढ़ी को बहकाना बेहद आसान है। हमें समाज के युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ना होगा।’’ अगर अंग्रेजी से पढ़ी-लिखी जनता को बहकाया जा सकता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि मोहन भागवत लोगों को अनपढ़ बनाकर रखना चाहते हैं, क्योंकि हिंदी और मातृभाषा पढ़कर तो नौकरी मिलनी नहीं है, उन्हें बेरोजगार ही बनकर रहना होगा। यहां फिर उनका निशाना दलित-पिछड़ी जातियों पर है, जिनके बच्चे अंग्रेजी पढ़ रहे हैं और उच्च जातीय हिंदुओं का मुकाबला कर रहे हैं। आरएसएस को सबसे ज्यादा मिर्ची इसी से लग रही है कि दलित-पिछड़ी जातियां शिक्षित क्यों हो रही हैं? वह (आरएसएस) दूर तक का देख रहा है कि दलित-ओबीसी जितने शिक्षित होते जाएंगे, उतने ही वे हिंदू फोल्ड से बाहर निकलते जाएंगे और उच्च जातीय हिंदुओं को चुनौती देते जाएंगे। इससे जाति-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी, जिसे आरएसएस हिंदू समाज की सबसे श्रेष्ठ व्यवस्था मानता है। इसलिए आरएसएस अपनी श्रेष्ठ जाति-व्यवस्था को बचाने के लिए जहां संतों से धर्म-प्रचार तेज करने और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों से एकजुट होने की अपील कर रहा है। वहीं उसने शिक्षा-क्षेत्र में दलित-पिछड़ी जातियों के प्रवेश को बाधित करने के लिए सरकार में आरक्षण को निष्प्रभावी करने वाली नीतियां लागू करवा दी हैं।

सुप्रीम कोर्ट पर प्रहार

मोहन भागवत ने केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जन-भावनाओं का खयाल नहीं रखा। लेकिन, किसी ने (पत्रकार ने भी) उनसे यह नहीं पूछा कि जन-भावनाओं से उनका मतलब क्या है? वह खुलेआम रूढ़िवादी हिंदुओं की भावनाओं की वकालत कर रहे हैं। संघ का जो मुखिया रूढ़िवाद और अंधविश्वास का पक्ष ले रहा हो और कह रहा हो कि, ‘सुप्रीम कोर्ट को रूढ़िवादियों के हित में फैसला करना चाहिए था’।

धर्म संसद में उपस्थित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (बाएं) तथा आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत

तो क्या वह (मोहन भागवत) दुनिया के सामने पिछड़े हुए भारत की छवि नहीं पेश कर रहा है? क्या ऐसे व्यक्ति को हिंदुओं का आदर्श माना जा सकता है?

वह बड़ी बेशर्मी से धर्म-संसद में बताते हैं कि केरल की ‘70 हजार स्थानीय महिलाओं ने व्हाट्स ऐप ग्रुप बनाकर मंदिर में जाने से इनकार कर दिया। पर उन्होंने यह नहीं बताया कि मन्दिर में जाने से इनकार करने वाली वे महिलाएं आरएसएस की ही सदस्य थीं, जो हिंदुत्व के रूढ़िवादी एजेंडे को चला रही हैं।

मोहन भागवत कहते हैं, ‘‘अयप्पा के भक्तों का संकट पूरे हिंदू समाज का संकट है। इसलिए देश के लोगों को जागृत करना है। पूरे देश में महिलाओं से भेदभाव करने का कुप्रचार हो रहा है। यह महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं, बल्कि कपट युद्ध है। वोटों की फसल काटने के लिए यह सारी कोशिश हो रही है।’’  

किन्तु, हकीकत यह है कि आरएसएस खुद भाजपा के पक्ष में राजनीतिक वातावरण बनाने के लिए अयप्पा के नाम पर रूढ़िवादी और अंधविश्वासी हिंदुओं का ध्रुवीकरण कर रहा है। हालांकि, दोनों ही रूढ़िवादी और अंधविश्वासी हैं; वे महिलाएं भी जो अयप्पा के मंदिर में जाना चाहती हैं, और वे भी, जो उन्हें मन्दिर में प्रवेश करने से रोकना चाहती हैं। मोहन भागवत अयप्पा मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के निषेध को महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं मानते हैं, बल्कि कपट युद्ध मानते हैं। अब यह एक नया शब्द है। इसका क्या अर्थ है? केरल सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कराना चाहती है, क्या यह कपट युद्ध है? या आरएसएस उस फैसले के विरोध में अपनी रूढ़िवादी मूर्ख जनता को सड़कों पर उतार रहा है, यह कपट युद्ध है? और ध्यान रहे, अयप्पा के भक्तों का संकट पूरे हिंदू समाज का संकट नहीं है, बल्कि यह आरएसएस का संकट है, जो इस बात से चिंतित है कि महिलाएं भी जागरूक हो रही हैं।

(कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी/एफपी डेस्क)


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