दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए बने महत्वपूर्ण कानूनों व योजनाओं में पी. एस. कृष्णन की भूमिका

जितने भी राजनेताओं से मेरा परिचय हुआ है उनमें से श्री कर्पूरी ठाकुर सबसे निष्ठावान और ईमानदार थे। उन्हें वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को याद रखना चाहिए। वंचित वर्गों की बेहतरी के लिए काम करने के प्रति श्री धनिक लाल मंडल भी उतने ही प्रतिबद्ध थे जितने कि श्री कर्पूरी ठाकुर

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 8

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन  भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं – संपादक )

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  • वासंती देवी

वासंती देवी : क्या सामाजिक न्याय और कमजोरों के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों के प्रति नौकरशाहों को संवेदनशील बनाने के लिए आप किन्हीं विशिष्ट उपायों को लागू करने का सुझाव देंगे? यह इसलिए क्योंकि आपकी यह मान्यता है कि केवल ऐसा करके ही हमारे देश में सच्चे प्रजातंत्र का आगाज हो सकता है?

पी.एस. कृष्णन : इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा देश सच्चे अर्थों में प्रजातंत्र तभी बन सकता है जब अधिकार-विहीन तबकों का सशक्तिकरण हो और वे सभी दृष्टियों से सामाजिक रूप से विकसित जातियों के समकक्ष आ सकें – फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, शैक्षणिक अथवा व्यावसायिक या उसका संबंध स्वास्थ्य व पोषण के स्तर से हो या आवास की सुविधा से। यही सामाजिक समानता के मानक हैं। इस सामाजिक समानता को हासिल करने के लिए और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए व्यापक और समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। मैंने पिछले कई वर्षों में सरकारों और विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक कानूनों और कार्यक्रमों का रोडमैप उपलब्ध करवाया है।

सत्ताधारी दल के राजनैतिक नेतृत्व पर निर्भर करते हैं नीतिगत फैसले

सामाजिक समानता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नौकरशाही एक प्रभावी उपकरण हो सकती है। मेरा यह मत है कि नौकरशाहों को इस काम को सबसे अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। परंतु अगर हम यह अपेक्षा करें कि नौकरशाही और नौकरशाह, इस कठिन और जोखिम भरे काम को करने के लिए स्वयं आगे आएंगे तो यह यथार्थपूर्ण नहीं होगा। अगर हम इसका निर्णय उन पर ही छोड़ देंगे तो केवल अपवाद स्वरूप, कुछ ही अधिकारी इस कार्य को करने में रूचि दिखाएंगे।

पी. एस. कृष्णन, भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह

नौकरशाही इस लक्ष्य को हासिल करने में क्या भूमिका निभा सकती है, वह मुख्यतः सत्ताधारी दल के राजनैतिक नेतृत्व पर निर्भर करेगा और इस पर भी कि महत्वपूर्ण राजनैतिक पदाधिकारी जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, अन्य महत्वपूर्ण मंत्री और सत्ताधारी व प्रमुख विपक्षी पार्टियों के अध्यक्ष व अन्य नेता किस हद तक सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध हैं और क्या वे एससी, एसटी व पिछड़े वर्गों को उनके अधिकार उपलब्ध करवाने के कार्य को पर्याप्त महत्व देते हैं। क्या वे देशभक्त हैं? हमारे देश के किसी भी राज्य में अब तक ऐसा राजनैतिक नेतृत्व सामने नहीं आया है। एक समस्या यह है कि राजनैतिक दलों का फोकस मुख्यतः चुनाव जीतने पर होता है। और चुनावी राजनीति में, कम से कम अभी तक, एससी, एसटी व अधिक, अत्यंत व अति पिछड़े वर्गों की भूमिका और महत्व इतना नहीं है कि मजबूर होकर राजनैतिक दलों को उनके लिए काम करना पड़े। जैसे-जैसे इन वर्गों में जागृति बढ़ती जाएगी और जैसे-जैसे वे एक दूसरे के न्यायसंगत अधिकारों की रक्षा की खातिर गोलबंद होना सीख जाएंगे, वैसे-वैसे चुनाव में विजय प्राप्त करने की अपनी लालसा को पूरा करने के लिए राजनैतिक दलों को इन वर्गों की आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं पर ध्यान देना जरूरी होता जाएगा।    

परंतु राजनीति में यह परिवर्तन आने का इतंजार किए बगैर, नौकरशाहों को उनके प्रशिक्षण के दौरान या उसके पहले भी, अर्थात जब वे विद्यार्थी हों, उनमें सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता जगाने का प्रयास किया जाना चाहिए। उन्हें भारत के सामाजिक इतिहास से परिचित करवाया जाना चाहिए। उन्हे यह बतलाया जाना चाहिए कि भारतीय जाति व्यवस्था और अछूत प्रथा ने सदियों से उसके पीड़ितों अर्थात दलितों (एससी) सहित आदिवासियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्गों को किस तरह से प्रत्यक्ष रूप से क्षति पहुंचाई है और अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय समाज और राष्ट्र का क्या नुकसान किया है। उन्हें जनगणनाओं, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षणों और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणों सहित विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से परिचित करवाया जाना चाहिए ताकि वे यह समझ सकें कि दलितों और आदिवासियों और सामाजिक रूप से उन्नत जातियों, अर्थात गैर-एससी, गैर-एसटी व गैर-ओबीसी जातियों के बीच कितनी बड़ी खाई है। इनके बीच ओबीसी जातियां हैं, जो उन्नत जातियों की तुलना में एससी व एसटी के अधिक नजदीक हैं। इन सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक तथ्यों और आंकड़ों के प्रकाश में उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि इन वंचित वर्गों के साथ न्याय किया जाना क्यों महत्वपूर्ण है और समाज के एकीकरण और राष्ट्र की प्रगति के लिए इसका क्या महत्व है। जो विद्यार्थी अपने स्कूल/कालेज में अपने पाठ्यक्रम के भाग के रूप में और अपनी आयु के अनुरूप, इन सब चीजों के बारे में जानेंगे, वे सभी आईएएस या आईपीएस या भारतीय वन सेवा के अधिकारी या प्रथम श्रेणी की केन्द्रीय सेवाओं अथवा उनके समकक्ष राज्य सरकारों की सेवाओं के सदस्य नहीं बनेंगे। परंतु उनमें से कई आगे जाकर बैंकों, विश्वविद्यालयों या निजी क्षेत्र में महत्वपूर्ण पदों पर काम करेंगे। वे जो भी पेशा अपनाएंगे या जिस भी स्थान पर काम करेंगे, उन्हें उनके छात्र जीवन मे मिला सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय का संदेश कम से कम उनमें से कुछ को तो याद रहेगा।

परंतु, इसके लिए अध्यापकों का प्रशिक्षण भी जरूरी है – उनके शिक्षक बनने के पूर्व, अर्थात जब वे बीएड इत्यादि करेंगे तब और सेवाकाल के दौरान भी। परंतु यह तभी संभव हो सकता है जब राजनैतिक नेतृत्व और शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ व्यक्ति, इसे गंभीरता से लें। चूंकि इस तरह की शिक्षा देने में सक्षम शिक्षकों को पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षण देने में समय लगेगा, अतः तब तक इस क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों की सेवाएं विद्यार्थियों को सामाजिक न्याय और समानता के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए ली जा सकती हैं। ऐसे सेवानिवृत्त अध्यापक और प्राध्यापक और नौकरशाह, जो अपने सेवाकाल में सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित रहे हों, भी इस कार्य को कर सकते हैं।

केन्द्र और राज्यों के राजनैतिक नेतृत्व को इन मुद्दों को शिक्षा के एजेंडे और पाठ्यक्रम का भाग बनाने के लिए राजी किया जाना चाहिए। तथ्य यह है कि आज सरकारें और राजनैतिक दल, पाठ्यक्रम में इस तरह के परिवर्तन के प्रति बहुत उत्सुक नजर नहीं आते। अतः सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा। इसका एक उदाहरण है इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन राईट्स एजूकेशन, जिसने विभिन्न भाषाओं में अत्यंत सहज शैली में लिखित कई पाठ्यपुस्तकें तैयार की हैं। इस काम को आगे बढ़ाने और उसका विस्तार करने की आवश्यकता है। इस कार्य को करने वाली सामाजिक संस्थाओं को यह ध्यान में रखना होगा कि उनके द्वारा तैयार की गई सामग्री में राजनीति के लिए कोई स्थान न हो ताकि राजनैतिक दल उनकी राह में समस्याएं खड़ी न करें।

इसके साथ ही हर अधिकारी की यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी और कर्तव्य है कि वह व्यक्तिगत स्तर पर, अपने काम में और सामाजिक तौर पर सही राह चुने, जैसा कि मैंने प्रश्न क्रमांक तीन के उत्तर में कहा है।

वासंती देवी : आपके जीवन का एक अन्य पहलू भी बहुत दिलचस्प है। वह है आपकी व्यावहारिकता। किसी भी काम को कई चरणों में पूरा करने की आपकी आदत। आप यह मानते हैं कि दुनिया के बड़े-बड़े मुक्तिकामी आंदोलन एक-एक कदम आगे बढ़कर अपने लक्ष्य तक पहुंचे हैं। आप में असीम धैर्य है और इसी के चलते आप अन्याय और भेदभाव की विशाल चट्टान को छैनी के छोटे-छोटे वारों से धीरे-धीरे नष्ट करने में विश्वास रखते हैं। क्या आपने इस रणनीति का विकास हमारी व्यवस्था की पेंचीदगियों को समझने के बाद किया? क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा में होने के कारण, सत्ता केन्द्रों से आपकी नजदीकियों ने यह रणनीति बनाने में आपकी मदद की। कृपया यह बताएं कि आपने किस तरह रणनीति बनाकर कई ऐसे कानूनों को लागू करवाया जो मील के पत्थर साबित हुए और कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेने के लिए सरकारों को प्रेरित किया।

पी.एस. कृष्णन : यह कहना ठीक नहीं होगा कि मैं किसी भी काम को कई टुकड़ों में बांटकर पूरा करने में विश्वास रखता हूं। मैं केवल यह देखता हूं कि किसी भी समय मेरे पास कौन से अवसर उपलब्ध हैं और मैं उनका अधिकतम उपयोग कर सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता के लक्ष्यों की ओर बढ़ने का प्रयास करता हूं। कुछ मौकों पर मुझे बहुत कम अवसर उपलब्ध थे और मुझे परिस्थितियों के अनुरूप अपने कार्य की गति को सीमित करना पड़ा। मैं हमेशा अधिकतम हासिल करने का प्रयास करता हूं, परंतु यदि मुझे उससे कुछ कम भी मिल जाता है तो मैं उसे स्वीकार कर, शेष को हासिल करने का प्रयास जारी रखता हूं। मेरे प्रशासनिक जीवन के कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि मेरी रणनीति क्या थी और मैंने उसे कैसे विकसित किया।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

 किसी भी वांछित परिवर्तन को लाने के दो तरीके हो सकते हैं। एक रास्ता क्रांति का है, जिसमें वर्तमान सरकार को एक झटके में किनारे कर उसके स्थान पर नई सत्ता स्थापित कर दी जाए। ऐसा कुछ देशों में हुआ है। इसके कुछ लाभ हैं परंतु इसके दूरगामी दुष्प्रभाव भी होते हैं। क्रांति अक्सर एक हिरावल दस्ते द्वारा संभव बनाई जाती है और उसका नेतृत्व भी उसी के हाथों में होता है। जनता इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं होती, यद्यपि जन सामान्य में व्याप्त असंतोष और रोष के कारण वह ‘क्रांतिक द्रव्यमान‘ उपलब्ध हो पाता है, जो हिरावल दस्ते की क्रांति करने में मदद करता है। जब तक यह छोटा सा हिरावल दस्ता आदर्शवादी बना रहता है, तब तक क्रांति सफल रहती है। परंतु इतिहास गवाह है कि जब क्रांतिकारी सत्ता में आ जाते हैं तो उनका आदर्शवाद शनैः-शनैः गुम हो जाता है। यह भी एक ऐतिहासिक सच है कि अक्सर क्रांति का नेतृत्व, देश के सबसे उन्नत तबके द्वारा किया जाता है और उसके लक्ष्य हासिल हो जाने के बाद, क्रांति को आगे बढ़ाने में उसकी रूचि समाप्त हो जाती है और अन्य तबके जहां के तहां रह जाते हैं।

फिर, ऐसा भी तो नहीं है कि परिवर्तन लाने के तरीकों का कोई मेन्यू कार्ड हमारे सामने उपलब्ध हो और हम उसमें से किसी भी विकल्प को चुन सकते हों। क्रांति के लिए एक विशिष्ट साामाजिक वातावरण की आवश्यकता होती है। यह वातावरण भारत में वर्तमान मंे नहीं है। इसी कारण हमारे देश के कुछ इलाकों में जो क्रांतिकारी आंदोलन उभरे, वे न तो ज्यादा समय तक जिंदा रह सके और ना ही अपना प्रभाव छोड़ सके। तेलंगाना में 1944-48 के दौरान चला कम्युनिस्ट आंदोलन और केरल के पुन्नाप्रा-वायलार क्षेत्र में स्वतंत्रता के ठीक पहले और उसके तुरंत बाद चले आंदोलन इसके उदाहरण हैं। यद्यपि यह भी सही है कि इन आंदोलनों के कुछ सकारात्मक प्रभाव पड़े।

बहुसंख्यक ‘चिल्लर’ कैसे?

एक वैकल्पिक तरीका यह है कि हम हर अवसर का उपयोग ऐसे सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए करें ,जिनसे दलितों और अन्य वंचित वर्गों के जीवन में सुधार आए। परंतु यह करते हुए भी हमें सामाजिक न्याय – जिसमें केवल आरक्षण शामिल नहीं है – की स्थापना और समाज में समानता लाने के अपने अंतिम लक्ष्य को ध्यान में रखना होगा। ऐसा करने में भारत का संविधान हमारी बहुत मदद कर सकता है। मेरे पूरे करियर में भारतीय संविधान ने मेरे लिए एक ढाल का काम किया। मेरे खिलाफ अनेक विभागीय जांचें/कार्यवाहियां हुईं, परंतु कोई मुझसे यह नही कह सका कि मैंने कोई कानून तोड़ा है या मैं कुछ गलत कर रहा हूं या जो मैं कर रहा हूं, वह मुझे नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि हर बार मैं यह साबित कर सका कि जो मैं कर रहा हूं, वह संवैधानिक दृष्टि से वांछनीय और अपेक्षित है। डा. आंबेडकर को भारतीय समाज की गहरी समझ थी और इसलिए उन्होंने संविधान के जरिए जो प्रजातांत्रिक ढांचा खड़ा किया, उसमें सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता के क्रांतिकारी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त उपकरण मौजूद हैं। ये उपकरण 1950 से ही उपलब्ध थे परंतु शुरूआत में दलित और अन्य वंचित तबके इनका प्रभावी उपयोग करने में सक्षम नहीं थे क्योंकि उनमें पर्याप्त संख्या में शिक्षित व्यक्तियों का घोर अभाव था। जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार हुआ, दलितों और अन्य वंचित तबकों की इन उपकरणों का लाभ उठाने की क्षमता बढ़ती गई, यद्यपि अब भी यह वांछित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। आईएएस अधिकारी के तौर पर अपने करियर की शुरूआत में जब मैं गांवों में जाता था, तब मैं लोगों को समानता और न्याय के सिद्धांतों के बारे में बताता था और उन्हें यह भी समझाता था कि वे इन्हें कैसे हासिल कर सकते हैं। मैं उनसे खेती की जमीन और सिर पर छत के महत्व की चर्चा करता था और उन्हें यह बताता था कि आवासहीन और भूमिहीन दलितों व अन्य वंचित वर्गों को जमीनें और रहने का स्थान उपलब्ध करवाना कितना आवश्यक है। वे मेरी बातों को तुरंत समझ जाते थे क्योंकि उनके जीवन के अनुभव उससे मेल खाते थे। जब भी मैं उनकी बेहतरी के लिए कोई काम करता, वे मुझे दिल खोलकर धन्यवाद देते थे। ऐसे सभी मौकों पर मैं उनसे कहता था कि उन्हें मुझे धन्यवाद देने की जरूरत नहीं है क्योंकि जो कुछ उन्हें मिला है, वह उनका अधिकार है और उन्हें वह दिलवाना, मेरा कर्तव्य। जब भी मैं किसी गांव में जाता था तो मैं वहां रहने वाले लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी अवश्य लेता था। ऊँची जातियों के सदस्य, चन्द ऊँची जातियों का नाम लेकर गांव के बाकी निवासियों को ‘चिल्लर‘ (फुटकर) बता देते थे। फिर मैं उनसे पूछता था कि प्रत्येक ऊँची जाति के सदस्यों और ‘चिल्लर‘ की आबादी कितनी है। लगभग हमेशा यह सामने आता था कि ‘चिल्लर‘ की जनसंख्या, ऊँची जातियों से कहीं अधिक है। फिर मैं उनसे पूछता था कि ‘क्या बहुसंख्यक लोग चिल्लर हैं या ऊँची जातियों के कहीं कम जनसंख्या वाले लोगों को ‘चिल्लर‘ कहा जाना चाहिए‘‘? जब भी मैं यह कहता था, दर्शकों में मौजूद दलित और पिछड़ी जातियों के सदस्य मेरी बात को चुपचाप बहुत ध्यान से सुनते थे।

नाम के आधार पर अपमान

मैं इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा। सन् 1960 में एक बार मैं कड़प्पा जिले के रायचोटी तालुक के एक गावं में बंदोबस्त के कार्य के सिलसिले में दौरे पर गया। उन दिनों यह परंपरा थी कि ऊँची जातियों के लोग दलितों का नाम लेते समय या उन्हें पुकारने के लिए एकवचन का इस्तेमाल करते थे अर्थात ऊँची जातियों के लिए ‘‘नारायणअप्पा’’ या ‘‘नारायणअय्या’’ परंतु दलितों के लिए ‘‘नारीगाड़ू’’। ‘‘नारीगाड़ू‘‘ को बुलाते समय वे जोर से ‘‘नारीगा’’ पुकारते थे। उस गांव में जमीन के एक टुकड़े पर एक रेड्डी ने अपना दावा प्रस्तुत किया था। अपने दावे के समर्थन में उसने एक विक्रय पत्र पेश किया, जिसके जरिए उसके पुरखों ने वह जमीन खरीदी थी। रायलसीमा और तेलंगाना के अधिकांश इलाकों की तरह, उस गांव में भी रेड्डियों का वर्चस्व था। उस पुराने विक्रय पत्र को पढ़ने से मुझे पता लगा कि क्रेता का नाम ‘गंगुडू‘ था। मैं समझ गया कि गंगुडू उस रेड्डी, जो जमीन पर दावा कर रहा था, का कोई पूर्वज था। यद्यपि मुझे मालूम था कि इसका कारण क्या है परंतु मैंने अनजान बनते हुए उससे पूछा कि उसके पूर्वज का नाम ‘गंगुडू‘ क्यों दर्ज किया गया है और उसे ‘गंगप्पा‘ क्यों नहीं लिखा गया, जैसा कि ऊँची जातियों के मामले में किया जाता है। वहां मौजूद रेड्डियों ने बताया कि पुराने जमाने में ब्राम्हण विक्रय पत्र तैयार करते थे और वे रेड्डियों के नाम इसी तरह लिखा करते थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या यह ठीक था, क्या इससे उनका अपमान नहीं होता था। उन्होंने मुझसे सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं था और उनके लिए अपमानजनक था। फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या इसी तरह, एससी को ‘नारीगाडू‘ कहकर पुकारना भी गलत नहीं है। वे इससे असहमत नहीं हो सकते थे। वहां दलित भी मौजूद थे और वे इस ‘शिक्षाप्रद‘ बातचीत को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।

आईएएस व अन्य अखिल भारतीय सेवाओं व विभिन्न पेशों में शिक्षित एससी व्यक्तियों की संख्या पूर्व की तुलना में बहुत बढ़ गई है। इनमें से कुछ, दलितों, आदिवासियों व पिछड़ी जातियों के स्वयंसेवी संगठनों के जरिए सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूचि ले रहे हैं। यह समाज में जागृति फैलाने का एक अच्छा तरीका है। और किसी भी संवेदनशील और देशशक्त नौकरशाह को इसी राह पर चलना चाहिए। वह या तो उसे मिले अवसर का भरपूर उपयोग कर सकता है या फिर केवल अपना करियर बनाने पर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकता है। आईएएस में आने के पूर्व, अछूत प्रथा, जाति प्रथा, दलितों की भूमिहीनता, उनकी कमजोर स्थिति व पिछड़ी जाति का होने के कारण किसी व्यक्ति को किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, इन सबके बारे में मैं पहले से ही गहराई से जानता था और इसलिए मैंने इन बुराईयों की जड़ों पर पहले दिन से ही प्रहार करना षुरू कर दिया। कोई भी आईएएस अधिकारी या आईपीएस अथवा आईएफएस अधिकारी भी, अपने सेवाकाल के शुरूआती दिनों से ही इन सामाजिक बुराईयों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर सकता है।

जब मैं सेवा में आया, तब मुझे इस बात का बहुत अच्छी तरह से एहसास था कि सभी राज्यों में जिन जातियों के सदस्यों के पास खेती योग्य भूमि का बड़ा हिस्सा है, उन्होंने उस राज्य या राज्य के हिस्से में चुनावों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए अप्रजातांत्रिक सत्ता हासिल कर ली है। जाहिर है कि यह संविधान की मंशा नहीं थी। स्वतंत्रता के तुरंत बाद, राजनैतिक पार्टियों और सरकारों का नेतृत्व इन्हीं जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के हाथों में था। यह उन कारणों में से एक था, जिनके चलते जब मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया और फिर मेरा चयन हो गया तब मैं कुछ असहज महसूस कर रहा था। मुझे यह भी पता था कि केन्द्र सरकार में औद्योगिक और व्यवसायिक निवेशकर्ताओं का दबदबा था यद्यपि उन दिनों सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति के कारण उनका प्रभाव कुछ हद तक कम था। इन सब जानकारियों के प्रकाश में मैंने निम्न कदम उठाए :

  1. मैंने कानून और नियमों का गहराई से अध्ययन किया, विशेषकर बोर्ड स्टेंडिग आर्डर्स का। मैंने यह समझा कि मेरे पास ऐसी कौन से अधिकार हैं जिनका उपयोग मैं किसी उच्चाधिकारी से आदेश प्राप्त किए बिना कर सकता हूं।

तदानुसार मैंने निम्न कार्य करना शुरू किए :

  • दलितों व अन्य आवासहीनों को मकान बनाने के लिए भूमि और दलितों व अन्य ग्रामीण भूमिहीन, निर्धन कृषि श्रमिकों को खेती की जमीन का वितरण।
  • जो सीमित संसाधन उपलब्ध थे, उनका उपयोग करते हुए उनमें से सबसे गरीब और कमजोर व्यक्तियों के लिए मकानों का निर्माण।
  • सरकार के स्वामित्व वाली खेती की जमीन पर अपात्र अतिक्रमणकारियों का कब्जा हटाकर उन जमीनों का उपयोग दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को खेती की जमीन, मकान बनाने के लिए प्लाट व मकान उपलब्ध करवाने के लिए करना।
  • दलितों और अन्य वंचित वर्गों में जागरूकता फैलाना और उनमें आत्मविश्वास जगाना।
  • हर संभव तरीके से अछूत प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रयास करना।
  1. ऐसे मामलों की पहचान करना, जिनमें मुझे किसी वरिष्ठ अधिकारी, जैसे कलेक्टर या बंदोबस्त अधिकारी या सरकार की अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता हो और ऐसे मामलों में गहन जांच और व्यक्तिगत निरीक्षण के जरिए एकत्रित किए गए तथ्यों के आधार पर तार्किक रिपोर्ट अथवा अनुशंसाएं भेजना। कई बार सरकार किसी मसले की जांच का काम कलेक्टर को सौंप देती थी और वे सब-कलेक्टर को रपट प्रस्तुत करनेे के लिए कहते थे। ऐसा ही एक मामला करमचेदू गांव का था, जिसकी चर्चा मैंने की है। इस गांव में आंध्र प्रदेश के उस इलाके की वर्चस्वशाली जाति के सबसे धनी लोग निवास करते थे।

जैसे-जैसे मेरी वरिष्ठता बढ़ती गई और मैं पहले जिला कलेक्टर और फिर राज्य व राष्ट्रीय स्तर के पदों पर पदस्थ हुआ, मैं जिला, राज्य और केन्द्र के शासकीय तंत्र का उपयोग करने में सक्षम हो गया और  सब-कलेक्टर के रूप में मैं जो कुछ कर सकता था उससे कहीं अधिक करने की स्थिति में आ गया। उदाहरणार्थ, जब मैं कलेक्टर था, तब मैं गांवों के अपने दौरों में विकास और कल्याण से संबंधित सभी विभागों जैसे कृषि, पशुपालन, सिंचाई व सामुदायिक विकास (ग्रामीण विकास का पूर्ववर्ती) आदि के प्रमुखों को अपने साथ ले जाता था। पूरा गांव हमारे सामने इकट्ठा हो जाता और लोग अपनी समस्याएं बताते। स्वभाविकतः दलितों और अन्य वंचित वर्गों के लोगों की समस्याओं को प्राथमिकता दी जाती थी। चूंकि सभी विभागों के प्रतिनिधि वहां मौजूद होते थे इसलिए अधिकांश मामले वहीं सुलझा लिए जाते थे, सिवाय ऐसे मामलों के जिनमें राज्य स्तर से ही कार्यवाही हो सकती थी।

भूमि वितरण मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। मैंने इसे करने के लिए निम्न कार्यपद्धति विकसित की :

  • मैंने हर तालुक के तहसीलदार से कहा कि वे सरकारी भूमि की उपलब्धता के आधार पर घटते क्रम में अपने तालुक के सभी गांवों की सूची बनाएं। फिर, वे उसी क्रम में प्रत्येक गांव में जाएं और कब्जेदारों को, यदि वे दलित या अन्य भूमिहीन गरीब हों तो, सरकारी जमीनों के पट्टे दें। अगर वे पाएं कि किसी जमीन के टुकड़े पर अपात्र लोगों, अर्थात जो भूमिहीन और गरीब नहीं हैं, ने कब्जा कर रखा हो तो उन्हें बेदखल कर उस जमीन का कब्जा दलितों और अन्य भूमिहीनों को दिलवाएं।
  • इस काम के लिए राजस्व अधिकारियों की मासिक बैठक में हर तहसीलदार के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाते थे। ये लक्ष्य तहसीलदार स्वयं जमीन की उपलब्धता, कार्य की मात्रा और जितना कार्य वे कर सकते थे उसके आधार पर निश्चित करते थे। इस लक्ष्य को अभिलेखित किया जाता था और प्रत्येक माह लक्ष्य प्राप्ति की समीक्षा होती थी। प्रत्येक अधिकारी की वार्षिक गोपनीय चरित्रावली में प्रविष्टि करने का यह भी एक आधार होता था।
  • सब-कलेक्टरों/आरडीओ की यह जिम्मेदारी थी कि वे कार्य की प्रगति पर नजर रखें। इस कार्यपद्धति को अपनाने से योजनाबद्ध तरीके से हम ज्यादा से ज्यादा भूमिहीन दलितों और अन्य गरीबों को भूमि उपलब्ध करवा सके।
  • किसी गांव में अधिकारियों का दल इस कार्य को करने के लिए किस दिन और किस समय आएगा, यह गांव वालों को पहले से ही सूचित कर दिया जाता था और उनसे यह कहा जाता था कि अगर निर्धारित दिनांक पर अधिकारियों का दल उनके गांव में न पहुंचे तो वे इसकी सूचना मुझे दें। इस पद्धति को अपनाने से लोग अपने आवेदनपत्रों के साथ सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने से बचते थे क्याेंकि प्रशासन स्वयं उनके दरवाजे पर आता था।
  • खेती की जमीन के वितरण के लिए जो तरीका अपनाया जाता था, उसी का इस्तेमाल आवासहीनों को अपना मकान बनाने के लिए भूमि उपलब्ध करवाने के लिए किया जाता था।

जब मैं सन् 1964 से 1967 तक खम्मम और 1967 से 1969 तक पूर्व गोदवारी जिलों का कलेक्टर था, तब मैंने एक नया काम शुरू किया और वह था आदिवासियों की उन जमीनों को उन्हें वापस दिलवाना, जिन पर गैर-आदिवासियों ने विभिन्न अवैधानिक तरीकों से कब्जा कर लिया था। यह एक कठिन काम था क्योंकि अधिकांश गैर-कानूनी कब्जेदार, वर्चस्वशाली जातियों के शक्तिशाली सदस्य और सत्ताधारी पार्टी के नेता थे या /और राज्य/जिला स्तर पर महत्वपूर्ण पदों पर थे। खम्मम और पूर्व गोदावरी, दोनों जिलों में काफी बड़ा क्षेत्र आदिवासी-बहुल था। सन् 1964 में खम्मम जिले के कलेक्टर का प्रभार ग्रहण करने के तुरंत बाद, एक प्रकरण मेरे सामने आया। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कासू ब्रम्हानंद रेड्डी ने एक नई व्यवस्था शुरू की थी, जिसके अंतर्गत हर जिले का प्रभार एक ऐसे मंत्री को दिया जाता था, जो उस जिले का निवासी नहीं होता था। खम्मम जिले के प्रभारी मंत्री श्री थोटा रामास्वामी थे। वे पूर्व गोदावरी जिले की एक स्थानीय भूमिस्वामी वर्चस्वशाली जाति के सदस्य थे। अस्वारावपेट नामक एक स्थान पर एक सार्वजनिक सभा हुई। उस सभा में एक स्थानीय नेता ने आदिवासियों की भूमि पर अन्यों के गैर-कानूनी कब्जे का मुद्दा उठाया। अस्वारावपेट में आदिवासियों की खासी आबादी थी। कोया वहां की मुख्य जनजाति थी। एक प्रमुख राजनैतिक नेता (जो बाद में राज्य में मंत्री, मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री बने) ने आदिवासियों का समर्थन हासिल करने के लिए इस आमसभा में जोरशोर से भोले-भाले कोया ‘प्रजालू‘ (कोया जनजाति के सदस्यों) के साथ बड़े पैमाने पर हुई धोखाधड़ी का मुद्दा उठाया। मंत्री ने स्थानीय राजनैतिक नेताओं की उपस्थिति में जिला कलेक्टर को यह निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें और आदिवासियों के साथ न्याय करें। मैं तो इस तरह के मौके के इंतजार में ही था। मैंने तुरंत जिले के सभी आरडीओ और तहसीलदारों को मंत्री के आदेश के परिपेक्ष्य में निर्देश जारी कर दिए। मैंने इन निर्देशों में कहा कि वे गैर-आदिवासियों के कब्जे वाली आदिवासियों की जमीनों का पता लगाएं और कब्जेदारों को बेदखल कर जमीनों को आदिवासियों को सौंपने संबंधी प्रस्ताव भेजें। इस तरह के प्रकरणों के निपटारे के लिए जो कानून बनाया गया था, उसका नाम था आंध्रप्रदेश शेडयूल्ड एरियास लेंड ट्रांसफर रेग्युलेशन (एपीएसएलपीआर) 1959। इस कानून में गैर-आदिवासियों को बेदखल कर उनकी जमीनाें को आदिवासियों को लौटाने का अधिकार, राज्यपाल के प्रतिनिधि को दिया गया था। इन दोनों जिलों और अन्य कुछ जिलों में भी, जिला कलेक्टर, राज्यपाल का प्रतिनिधि भी होता था अर्थात वह पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में आदिवासियों व उनके अधिकारों की रक्षा के लिए राज्यपाल का प्रतिनिधि था। इस दर्जे के कारण मुझे समग्र अधिकार प्राप्त थे। मैंने सरकार से अनुरोध कर अपने जिले में एक विशेष आरडीओ, विशेष तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की नियुक्ति करवाई। मैंने यह तर्क रखा कि मेरे जिले में ऐसी जमीनों क्षेत्रफल और काम के बोझ को देखते हुए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाना आवश्यक है।

इस तरह के मामलोें में नौकरशाही की सामान्य प्रवृत्ति यह होती है कि वह सबसे पहले कानून तोड़ने वाले मामूली व्यक्तियों को अपना निशाना बनाती है क्योंकि उनसे निपटना आसान होता है। जब यह प्रक्रिया शुरू होती है, तब वर्चस्वशाली जातियों के ऐसे व्यक्ति, जो विधि विरूद्ध कार्य कर रहे होते हैं और उनके नेता शोर मचाना शुरू कर देते हैं और उन तथाकथित गरीबों, जिन्हें उनकी जमीनों से बेदखल किया जाता है, के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाकर पूरी प्रक्रिया को रूकवा देते हैं। इस तरह, गरीबों के नाम पर वे स्वयं को सरकार की कार्यवाही से बचा लेते हैं। मैंने एक दूसरी रणनीति अपनाई। मैंने विशेष तहसीलदारों, विशेषकर नायब तहसीलदारों और आरडीओ को यह निर्देश दिए कि सबसे पहले वे ऐसे शक्तिशाली और धनी व्यक्तियों को चिन्हित करें, जिन्होंने आदिवासियों की भूमि पर कब्जा कर रखा हो और उन्हें बेदखल करने के प्रस्ताव भेजें। उन्हें सुनवाई का मौका देने के बाद मैं उनकी बेदखली के आदेश जारी करने लगा। जो प्रकरण मेरे समक्ष सबसे पहले आए उनमें से एक कृष्णा जिले के वरिष्ठ दलित नेता व पूर्व मंत्री श्री वेम्यूला कुरमैया के परिवार से संबंधित था। एक अन्य प्रकरण जिला परिषद के उपाध्यक्ष श्री थोटा कुरा वेंकटापैया के परिवार से संबंधित था। वे जिले की वर्चस्वशाली गैर-आदिवासी जाति से थे। तीसरा प्रकरण सिंगारेनी कोयला खदानों के एक वरिष्ठ अधिकारी श्री भास्कर चरयुनू के परिवार के एक सदस्य से संबंधित था। ये सभी लोग आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा जमाने के लिए एक सी कार्यप्रणाली अपनाते थे। वे इन जमीनों को अपने बच्चों के नाम दर्ज करवा देते थे। यह स्पष्ट था कि जिले के वर्चस्वशाली, भूस्वामी समुदाय के बड़े भूस्वामियों, एससी नेता के परिवारजनों और अन्य शक्तिशाली राजनीतिज्ञों को आदिवासियों की भूमि पर कब्जा जमाने का न तो कोई अधिकार था और ना ही आवश्यकता। मैंने इन लोगों के खिलाफ आदेश पारित किए और विरोध होने पर मंत्री श्री थोटा रामास्वामी के आदेश को उद्धत कर दिया। इसके बाद उन लोगों के लिए इस मुद्दे पर शोर मचाना मुश्किल हो गया। मैंने पूर्व गोदावरी जिले में अपनी अगली पदस्थापना के दौरान भी यही पद्धति अपनाई।

एपीएसएलपीआर के क्रियान्वयन और आदिवासियों से संबंधित अन्य कानूनों के संबंध में मेरे अनुभव के आधार पर मैंने सरकार को यह प्रस्ताव भेजा कि इस रेग्यूलेशन में संशोधन कर यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि आदिवासी क्षेत्रों में सभी जमीनों को आदिवासियों की जमीनें ही माना जाएगा और अगर यह पाया जाएगा कि ऐसे क्षेत्र में किसी जमीन पर किसी गैर-आदिवासी का कब्जा या स्वामित्व है, तो यह मानकर चला जाएगा कि ऐसा कब्जा या स्वामित्व, रेग्यूलेशन का उल्लंघन है, जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए। अर्थात यह साबित करने की जिम्मेदारी गैर-आदिवासी भूस्वामी/कब्जेदार की होगी कि उसका स्वामित्व या कब्जा वैध है। सरकार को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि वह अवैध कब्जेदार है। संयोगवश – और यह संयोग आश्चर्यजनक नहीं था – श्री एसआर शंकरन, जो उस समय नैल्लोर के कलेक्टर थे, ने भी उसी समय ठीक ऐसा ही प्रस्ताव सरकार को भेजा। हम दोनों ने यह प्रस्ताव भेजने के पहले एक दूसरे से विचार-विमर्श नहीं किया था। रेग्यूलेशन में इस आशय का संशोधन कर दिया गया परंतु मुख्यमंत्री श्री मारी चन्ना रेड्डी ने संशोधित रेग्यूलेशन के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। यह कानून का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन था क्योंकि रेग्यूलेशन, विधायिका द्वारा संशोधित किया गया था और मुख्यमंत्री, कार्यपालिका के सदस्य होते हैं। यह एक बुनियादी नियम है कि किसी कानून का क्रियान्वयन, कार्यपालिका के आदेश से रोका नहीं जा सकता। दो साल बाद उच्च न्यायालय ने संशोधन को वैध करार दिया। इसके बाद सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। ऐसा यह जानते हुए किया गया कि अदालत में अपील ठहरेगी नहीं। उच्चतम न्यायालय ने भी संशोधन को वैध ठहराया परंतु इसमें दो और साल लग गए। इस तरह चार कीमती वर्ष गुजर गए और इस दौरान गैर-आदिवासी अतिक्रमणकारी, आदिवासियों की जमीनों पर काबिज रहे। एक अन्य मुख्यमंत्री ने सन् 1987 में कार्यपालिका के अधिकारों का इसी तरह का दुरूपयोग करने का प्रयास किया। उस समय मैं राज्य सरकार में प्रमुख सचिव था और मैंने ऐसा नहीं होने दिया। इस प्रकरण की चर्चा मैं आगे करूंगा।

जैसे-जैसे मैं राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पदों पर पदस्थ होता गया, मेरा कार्यक्षेत्र और शक्तियां बढ़ती गईं। सन् 1973-76 के दौरान जब मैं संचालक, उद्योग था, उस समय मैंने तत्समय भारत सरकार द्वारा लागू की गई स्वरोजगार योजना के अंतर्गत एक उद्यमी विकास कार्यक्रम शुरू किया, जो वंचित वर्गों के युवाओं पर केन्द्रित था। मैंने एक अभियान चलाकर एससी, एसटी, बीसी व अल्पसंख्यक परिवारों के सदस्यों व ऐसी महिलाओं को चिन्हित किया, जिनमें उद्यमी बनने की संभावना थी। मैंने यह सुनिश्चित किया कि उनमें से कोई भी ऐसे परिवारों से न हो, जिनका कोई पारंपरिक व्यवसाय या उद्योग हो या जो पूंजी निवेश करने की स्थिति में हों। मैंने केवल ऐेसे परिवारों को चुना जिनके पास उनके घरों के अलावा कोई संपत्ति नहीं थी। इन परिवारों के उन युवा सदस्यों को चिन्हित किया गया जिनकी उद्यमी बनने में रूचि और इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की योग्यता थी। मैंने इन लोगों को भारत सरकार के स्माल इंडस्ट्रीज एक्सटेंशन एण्ड ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट (एसआईईटी), जिसकी इकाईयां लगभग हर राज्य में थीं, की मदद से छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रषिक्षण दिलवाया। एसआईईटी की एक इकाई हैदराबाद में भी थी। चूंकि मैं उस समय राज्य स्तर पर विभाग का मुखिया था इसलिए मैं पूरे विभाग की ऊर्जा को इस दिषा में केन्द्रित कर सका।

जिस समय मैं उद्योग विभाग में पदस्थ था, उस समय तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री श्री भट्टम श्रीराममूर्ति की पहल पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। विशाखापट्टनम निवासी श्री भट्टम, कांग्रेस की समाजवादी धारा के नेता थे और दलितों के प्रति सहानुभूति रखते थे। सन् 1975 में उन्होंने त्रिदिवसीय ‘हरिजन सम्मेलन‘ (उन दिनों आंध्रप्रदेश में हरिजन शब्द आम था और दलित शब्द का प्रयोग कम ही होता था) का आयोजन किया। खम्मम जिले के श्री जलगम वेंगल राव उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री थे। सम्मेलन के दौरान एक विचारगोष्ठी भी आयोजित थी, जो कि इस कार्यक्रम का बौद्धिक हिस्सा थी। संचालक, समाज कल्याण श्री के माधवराव के अनुरोध पर मैं विचारगोष्ठी का समन्वयक बनने के लिए राजी हो गया। एक तरह से मुझे ही संगोष्ठी की अध्यक्षता करनी थी। सम्मेलन की तैयारी के दौरान हम लोग लगभग रोज ही मिलते थे और हमने दलितों की प्रगति के लिए जो कदम उठाए जाने चाहिए उनके संबंध में एक समग्र दस्तावेज तैयार किया। यह दस्तावेज, जिसकी एक प्रति अब भी मेरे पास है, मेरे लिए तब अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ जब कुछ समय पश्चात मैं भारत सरकार में प्रतिनियुक्ति पर गया। इस दस्तावेज की सहायता से मैंने दलितों के विकास, कल्याण और सषक्तिकरण के लिए कई योजनाबद्ध प्रयास किए। सम्मेलन द्वारा उपलब्ध करवाए गए अवसर का उपयोग हमने श्री नारायणगुरू जैसे समाज सुधारकों से आंध्रप्रदेष के लोगों को परिचित करवाने के लिए किया। दलितों और अन्य कमजोर वर्गों के समाज सुधारक नायकों के अतिरिक्त, सम्मेलन स्थल पर श्री नारायणगुरू का चित्र भी लगाया गया। बीसवीं सदी की शुरूआत में जन्मीं श्रीमती सदालक्ष्मी, जो तेलंगाना की दो महान महिला नेताओं में से एक थीं (दूसरी श्रीमती जे ईश्वरीबाई थीं), ने सम्मेलन के समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उन्होंने विचार गोष्ठी की कार्यवाही की चर्चा करते हुए मुझे इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि मैंने दलितों के हितार्थ कई ऐसे सुझाव प्रस्तुत किए हैं जिनकी ओर पहले कभी किसी का ध्यान नहीं गया था।

सन् 1977 में मैं एक बार फिर केन्द्र में संयुक्त सचिव के पद पर प्रतिनियुक्ति पर गया। मुझे हस्तशिल्प विभाग का विकासायुक्त नियुक्त किया गया। उस समय यह विभाग वाणिज्य मंत्रालय का हिस्सा था। बाद में इसे उद्योग मंत्रालय में शामिल कर दिया गया। इन दोनों मंत्रालयों में नियुक्ति पाने के लिए अधिकारी लालायित रहते थे क्योंकि इससे उन्हें सेवाकाल के दौरान व उसके बाद भी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में काम करने का अवसर मिलने की संभावना रहती थी। सामान्यतः कोई भी अधिकारी इन मंत्रालयों में प्रवेश तभी पा सकता था जब उसका कोई गाॅडफादर हो। और गाॅडफादर अक्सर अपने परिवार या जाति के सदस्य हुआ करते थे। उन दिनों डाॅ. पी.सी. अलेक्जेंडर वाणिज्य सचिव थे। उन्होंने आंध्रप्रदेश में स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए मेरे द्वारा किए गए कार्यों से प्रभावित होकर मुझे इस मंत्रालय में नियुक्ति के लिए चुना था। अपने पद का कार्यभार ग्रहण करने के बाद, जब 17 अगस्त 1977 को मैंने उनसे मुलाकात की तब उन्होंने मुझसे कहा कि हस्तशिल्प को प्रोत्साहन देने के लिए उसी तरह के प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

इस पद पर काम करने के दौरान मुझे पिछड़ी जातियों के एक बड़े तबके – शिल्पियों – के संपर्क में आने का अवसर मिला। मेरी पत्नी शांता जी को शिल्पियों, उनके काम और उनके द्वारा बनाए जाने वाले पारंपरिक सौंदर्य प्रसाधनों और अन्य उपयोगी वस्तुओं के बारे में काफी जानकारी और रूचि थी। इससे मुझे पिछड़े वर्गों के इस उत्पादक तबके के बारे में गहराई से जानने का मौका मिला। सच यह है कि पारंपरिक शिल्पी ही भारत का मुख्य व मूल उत्पादक वर्ग हैं। आज जो लोग उद्योगों के मालिक हैं, उनमें से अधिकांश साहूकारों, ऊँची ब्याज दरों पर धन उधार देने वालों और हुंडी चलाने वालों के वंशज हैं।

दुर्भाग्यवश, भारत के इस पारंपरिक उत्पादक वर्ग को प्रोत्साहन और आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध नहीं करवाए गए। उन्हें न तो वित्तपोषण मिल सका और ना ही ऐसी संस्थाओं तक उनकी पहुंच बन सकी, जिससे वे आधुनिक तकनीकी का उपयोग कर सकें। श्रीमती कमला देवी चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में सराहनीय पहल की थी जिसे श्रीमती पुपुल जयकर ने आगे बढ़ाया। परंतु समय के साथ, उनकी संस्था भी सरकार की उपेक्षा का शिकार हो अपना हौसला खो बैठी। विकासायुक्त के कार्यालय के कर्मचारियों की वर्षों से पदोन्नति नहीं हुई थी, यद्यपि वहां कई पद खाली पड़े थे। मैंने खाली पड़े सभी पदों को भरने के लिए पात्र व्यक्तियों को पदोन्नति दी। इससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा और उनमें नए उत्साह का संचार हुआ और शिल्पियों की समस्याएं समझने और उनका समाधान करने के काम में तेजी आई। मैं इस पद पर केवल एक वर्ष तक रहा – 16 अगस्त 1977 से 1 सितंबर 1978 तक।

इसी अवधि में मैं योजना आयोग के लघु उद्योगों में महिलाओं पर कार्यकारी समूह का अध्यक्ष था। यहीं मैंने सबसे पहले महिलाओं के लिए विशेष घटक योजना का प्रस्ताव किया। यद्यपि उस समूह की महिला सदस्य, विशेषकर वरिष्ठ सदस्य श्रीमती वीना मजूमदार, इस अवधारणा को लेकर बहुत उत्साहित थीं परंतु महिलाओं से संबंधित मंत्रालय ने इसे ठीक से लागू करने में रूचि नहीं ली।

जब चौधरी चरण सिंह ने दिया संसद में बेतुका बयान

विकासायुक्त के पद पर अपने कार्यकाल के बाद मुझे गृह मंत्रालय में एससी और बीसी मामलों के प्रभारी संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। इसके पहले तक यह कार्य संचालक स्तर के एक अधिकारी के प्रभार में था, जिसे महानिदेशक कहा जाता था। इस पद पर नियुक्त अधिकारी केवल एससी से जुड़े मामले देखता था, एसएडबीसी से जुड़े मामले नहीं। मंत्रालय इस पद पर नियुक्ति के लिए उपयुक्त अधिकारी की तलाश में था। तत्कालीन गृह मंत्री श्री चरण सिंह के लोकसभा में एक बेतुके वक्तव्य के कारण सरकार इस नव-सृजित पद जल्दी से जल्दी नियुक्ति कर देना चाहती थी। जनता पार्टी की सरकार सन् 1977 में सत्ता में आई थी। उत्तर भारत का भूस्वामी वर्ग, जनता पार्टी का मजबूत और महत्वपूर्ण गढ़ था। इस वर्ग के कुछ लोग ऊँची जातियों के थे और कुछ उन्नत पिछड़ी जातियों के। जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद, इन भूस्वामी वर्गों को लगा कि अब वे सत्ता में आ गए हैं और दलितों का खुल्लम-खुल्ला दमन कर सकते हैं। दलित जातियों और भूस्वामी जातियों के परस्पर रिश्तों में एक विरोधाभास था (और है)। इसका कारण यह है कि अधिकांश दलित, भूमिहीन, खेतिहर श्रमिक थे (और हैं) और भूस्वामियों के खेतों में काम करते हैं। आपातकाल के बाद सन् 1977 में हुए चुनाव में दलित ही एकमात्र ऐसा बड़ा वर्ग था, जिसने इंदिरा गांधी और कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। इंदिरा गांधी ने दलितों की भलाई के लिए कुछ कदम उठाए थे। यद्यपि ये कदम दलित समस्या की जड़ पर प्रहार नहीं करते थे परंतु इनसे दलित काफी हद तक प्रभावित थे। श्री एस. आर. शंकरन और मेरे जैसे अधिकारियों ने इंदिरा गांधी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम और उनके द्वारा की गई घोषणाओं का इस्तेमाल, दलितों के हित के लिए किए जाने वाले कार्यों को गति देने के लिए किया। दलितों द्वारा चुनावों में इंदिरा गांधी का समर्थन किए जाने से दलितों के दमनकर्ताओं को उन पर अत्यचार करने का बहाना मिल गया। दलितों पर हमलों का वास्तविक लक्ष्य था खेती की जमीनों और मजदूरी में साधारण सी वृद्धि करने की उनकी मांग को कुचलना। यद्यपि वृद्धि के बाद भी उनकी मजदूरी निर्धारित न्यूनतम दर से कम ही होती। इसके अलावा, दलित अपनी महिलाओं के अपमान और अछूत प्रथा के विरूद्ध भी खड़े हो रहे थे। यह  सब भूस्वामियों को मंजूर नहीं था। संख्या की दृष्टि से कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी। लोकसभा में उसके सदस्यों की संख्या 154 थी और इनमें से अधिकांश दक्षिण भारत के तटीय राज्यों से थे। इन सांसदों ने दलितों पर अत्याचार की घटनाओं को संसद में जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया और सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। संसद में इस मुद्दे पर बहस के दौरान गृह मंत्री श्री चरण सिंह अपना आपा खो बैठे और उन्होंने विपक्षी सांसदों से पूछा कि वे दलितों की हत्याओं पर इतने उत्तेजित क्यों हैं जबकि देश में हुई हत्या की घटनाओं के शिकार व्यक्तियों में दलितों का प्रतिशत पन्द्रह से कम है (उस समय दलित देश की आबादी का 15 प्रतिशत थी)। इस बेतुकी टिप्पणी के जवाब में विपक्षी सांसदों ने जानना चाहा कि क्या गृह मंत्री 15 प्रतिशत दलितों की हत्या का लक्ष्य निर्धारित करना चाहते हैं। इस घटना के बाद एससी-एसटी मामलों के प्रभारी मंत्री के तौर पर श्री चरण सिंह के लिए संसद का सामना करना असंभव हो गया। प्रधानमंत्री को गृह मंत्रालय का प्रभार तब तक के लिए अपने हाथों में लेना पड़ा जब तक कि वे इस पद पर नियुक्ति के लिए अपने विश्वसनीय किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति की तलाश न कर लें। कुछ माह बाद श्री एचएम पटेल को गृह मंत्री बना दिया गया। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि वे संसद में दलितों पर अत्याचार से संबंधित प्रश्नों की बाढ़ से कैसे निपटें। वे किसी ऐसे अधिकारी की तलाश में थे जो इस बोझ को उठा सके। मैंने इस पद के लिए अपना नाम प्रस्तावित किया। मेरे द्वारा वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में संयुक्त सचिव स्तर के पद तो छोड़ कर, गृह मंत्रालय में आने को राजी हो जाने पर, गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने राहत की साँस ली। उस समय तक, मंत्रालय मेरी कार्यशैली और सोच से परिचित हो चुका था। मेरी गोपनीय चरित्रावली इस बात का सबूत थी। मुझे मेरे गोपनीय चरित्रावली में की गयीं उन प्रतिकूल टिप्पणियों की जानकारी थी, जिनकी सूचना मुझे आंध्रप्रदेश के मुख्य सचिव ने दी थी और जिनकी चर्चा मैंने पहले की है। एक सज्जन, जिन्होंनें उस अवधि की मेरी गोपनीय चरित्रावली देखी थी, ने मुझे बताया कि उसमें इसी तरह की और टिप्पणियां भी थीं। शुरुआत में, उद्योग मंत्री और मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव, जो मेरे ठीक ऊपर के अधिकारी थे, ने मेरी सेवाएं गृह मंत्रालय को सौंपने से इनकार कर दिया और इस आशय की सूचना गृह मंत्रालय को भेज दी। इसके कुछ समय पश्चात, अतिरिक्त सचिव ने मुझे बताया कि मेरे सेवाएं मांगने के गृह मंत्रालय के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया है। उन्होंने इस बात पर हैरानी व्यक्त की कि गृह मंत्रालय की इतनी हिम्मत कैसे हो गयी कि वह ऐसी मांग कर सके। मैंने उन्हें बताया कि गृह मंत्रालय ने यह अनुरोध मुझसे स्वीकृति लेने के बाद किया था और यह भी कि मैं यह चाहता हूँ कि मैं उस मंत्रालय में एससी व बीसी से सम्बद्ध यह पद सम्हालूं। फिर मैं उद्योग मंत्री श्री जॉर्ज फर्नांडिस से मिला, जो एक अत्यंत तेज-तर्रार मंत्री थे। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे गृह मंत्री को पत्र लिखकर यह सूचित कर दें कि उनका मंत्रालय मेरी सेवाएं गृह मंत्रालय को सौंपने के लिए तैयार है। श्री फर्नांडिस ने मुझसे कहा कि मैं उद्योग मंत्रालय में रहते हुए, एससी व या पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए ज्यादा काम कर सकता हूँ और यह भी कि गृह मंत्रालय में मैं कुंठित हो जाऊंगा। मैंने उनसे असहमति व्यक्त करते हुए उन्हें यह सुझाव दिया कि उनकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के चलते, उन्हें भी किसी ऐसे मंत्रालय का कार्यभार लेना चाहिए जो दमित वर्गों से सीधे सम्बंधित हो। उसके बाद यह तय हो गया कि मैं गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव के नव-सृजित पद पर जाऊंगा। मैं मंत्रालय के मेरे प्रभार के राज्यमंत्री श्री धनिक लाल मंडल से भी मिला जो बिहार की एक अति पिछड़ी जाति के थे और राज्य के पिछड़े वर्गों के सबसे बड़े नेता श्री कर्पूरी ठाकुर के काफी नजदीक थे।

मैं अतिरिक्त सचिव श्री बीजी देशमुख और मंत्रालय के तत्कालीन सचिव श्री टीसीए श्रीनिवास वर्धन से भी मिला। जैसे ही मैं श्री श्रीनिवास वर्धन के कमरे में घुसा उन्होंने अपनी मूंछ पर हाथ फेरते हुए ‘कथककली‘ कहकर मेरा अभिवादन किया। उनका आशय यह था कि मेरी घनी मूंछों (जो अभी की तुलना में बहुत घनी थीं) के कारण में कथककली कलाकार दिखता था। मैंने उन्हें एससी के विकास के लिए जिन योजनाओं की मैंने परिकल्पना की थी उनके बारे मेें बताया। विशेषकर मैंने उन्हें विशेष घटक योजना के बारे में बताया और कहा कि मैं सभी क्षेत्रों में एससी के समग्र विकास के लिए उचित वातावरण उपलब्ध करवाने हेतु इस योजना को लागू करने का इरादा रखता हूं। मैंने उनसे कहा कि मैं एससी पर अत्याचार और उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार करने की घटनाओं पर भी कड़ी नजर रखना चाहूंगा। उन्होंने इन सभी मसलों पर मुझे खुलकर काम करने की स्वतंत्रता देने की बात कही। मैंने विशेष घटक योजना को क्रियान्वित करने के मेरे इरादे के बारे में अतिरिक्त सचिव और राज्यमंत्री को भी बताया। सभी ने मुझसे कहा कि मुझे इसे लागू करने की पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी। सच यह था कि एससी पर अत्याचार की घटनाओं से संबंधित संसदीय प्रश्नों के उत्तर तैयार करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर मैंने एक तरह से उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर दिया था कि वे मेरी शर्तें माने। मैंने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया। इससे मुझे यह अवसर मिला कि मैं दलितों की बेहतरी के लिए कई कदम उठा पाऊं जो भविष्य में उनमें जागृति के प्रसार के साथ उनके हाथों में ऐसे उपकरण बन सकें जिनकी मदद से वे अपना विकास और प्रगति सुनिश्चित कर सकें। उनमें से निम्न सबसे महत्वपूर्ण थे :

  1. एससी के लिए विशेष घटक योजना (एससीपी)

सरकार की समय लेने वाली प्रक्रिया और ऐसी औपचारिकताओं जो किसी भी नई योजना के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करती है को किनारे कर मैंने एक पत्र का मसविदा तैयार किया जिसे अतिरिक्त सचिव के हस्ताक्षर से जारी किया गया। इस पत्र में सभी राज्यों से यह कहा गया कि वे अपनी पंचवर्षीय मध्यावधि और वार्षिक योजनाओं को तैयार करते समय एससी के लिए एससीपी भी बनाएं। इसके पीछे इरादा यह था कि एससी-एसटी को उनकी बेहतरी के लिए राज्यों और केन्द्र द्वारा विकास गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले धन और विकास योजनाओं में उनका उचित हिस्सा मिलना चाहिए। मेरे बैचमेट डाॅ. बी.डी. शर्मा (जो अब नहीं हैं) व डाॅ. भूपिंदर सिंह के प्रयासों से आदिवासी उपयोजना पहले ही लागू की जा चुकी थी। इन दोनों ने आदिवासियों के हित में जीवन पर्यन्त काम किया। आदिवासी उपयोजना क्षेत्रीय विकास योजना थी। यह आदिवासी के मामले में इसलिए प्रासंगिक थी क्योंकि देष के अधिकांश हिस्सों मे आदिवासी विशिष्ट क्षेत्रों में निवास करते हैं जहां कुल आबादी में उनका हिस्सा बहुत बड़ा होता है। इस उपयोजना को लागू करने के पीछे सोच यह थी कि अगर आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए अलग से धन उपलब्ध करवाया जाएगा तो इससे उनकी उन्नति सुनिश्चित की जा सकेगी। परंतु यह केवल अंशतः सच था और आदिवासी उपयोजना को एसटी के लिए उपयोगी बनाने के लिए उसमें कुछ सुधार की आवश्यकता थी। वह सुधार क्या था और कुछ वर्षों पश्चात उसे किस तरह लागू किया गया इसके बारे में मैं आगे बताऊंगा। जहां तक एससी की बात है उनके मामले में किसी क्षेत्र के विकास की योजना प्रासंगिक नहीं थी क्योंकि एसटी के विपरीत देश की एससी आबादी विशिष्ट क्षेत्रों में निवास नहीं करती। वे देश के लगभग हर गैर-आदिवासी गांव और शहर में रहते हैं और इन सभी स्थानों पर वे अल्पसंख्यक होते हैं। अधिकांश जिलाें में वे आबादी का पन्द्रह से बीस प्रतिशत, कुछ गिने-चुने जिलों में पच्चीस प्रतिशत और बहुत कम में पच्चीस प्रतिशत से ज्यादा हैं। केवल देश के एक जिले में उनकी आबादी जिले की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से अधिक है। परंतु वे खेतिहर श्रमिकों और अन्य ग्रामीण श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा हैं और शहरों में भी वे असंगठित क्षेत्र में दिहाड़ी पर मजदूरी करते हैं। हर गांव और शहर में छोटी-छोटी तंग बस्तियां होती हैं जिन्हें वे अपना कह सकते हैं। इन अलग बस्तियों को तमिलनाडु और केरल मेें ‘चेरी‘ कहा जाता है। चेरी एक प्राचीन द्रविड़ शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती अथवा निवास का स्थान। यह शब्द कई शहरों और गांवों के नाम का हिस्सा है जैसे पुडुचेरी, थालासेरी, शंघनासेरी इत्यादि। परंतु समय के साथ चेरी शब्द का प्रयोग केवल दलितों की बस्तियों के लिए किया जाने लगा और इसीलिए तमिलनाडु और केरल में चेरी के स्थान पर ‘कालोनी‘ शब्द का प्रयोग किया जाना शुरू हो गया। उत्तर और पश्चिमी भारत में अब ऐसी बस्तियों के लिए ‘वाड़ा‘ या ‘बस्ती‘ या ‘वास‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है। परंतु इस नए नामकरण से इन बस्तियों में रहने वाले एससी के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया है। वे अब भी उतने ही बदहाल हैं जितने कि पहले थे। इसलिए मैंने एससीपी का खाका कुछ इस तरह बनाया कि उसके जरिए हम इस तरह से धनराशि आवंटित कर सकें और योजनाएं बना सकें जिनसे

  • एससी समुदाय के व्यक्तियों
  • एससी समुदाय के परिवारों व,
  • एससी समुदाय के समूहों को सीधे लाभ पहुंच सके।

इसके अलावा एससी की स्थिति में सुधार के लिए इस योजना के अंतर्गत एससी बस्तियों में मकान बनवाए जाने थे, शुद्ध पेयजल के प्रदाय की व्यवस्था की जानी थी, बस्तियों और घरों का विद्युतीकरण किया जाना था, आंतरिक सड़कों को पक्का बनाया जाना था और रहवासियों को ऐसे स्थानों तक आसानी से पहुंचने की व्यवस्था की जानी थी जहां उन्हें अक्सर जाना होता है जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, स्थानीय स्कूल, स्थानीय बाजार, निकटतम बस अड्डा व श्मशान घाट (ऐसे मामलों में जहां उनके लिए अलग श्मशान घाट था। आज भी कई गांवों में उनके लिए अलग श्मशान घाट उपलब्ध नहीं है और ना ही उन्हें गैर-दलितों के श्मशान घाट का उपयोग करने की इजाजत है)।

धनिकलाल मंडल और मैं

मैंने सन् 1978 में इस सिलसिले में अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न राज्यों की बैठकें आयोजित कीं। पहली बैठक दिसंबर 1978 में मुंबई में हुई। इस बैठक में भारत सरकार के शक्तिशाली गृह मंत्रालय की ओर से मेरे द्वारा भेजे गए निमंत्रण पर महाराष्ट्र और गुजरात के संबंधित अधिकारी शामिल हुए। वे ऐसे अधिकारी थे जो एससी विकास व कल्याण के प्रभारी थे। अलग-अलग राज्यों में उनके पदनाम अलग-अलग थे। इसके अलावा योजना, वित्त, कृषि, सिंचाई, विशेषकर लघु सिंचाई, ग्रामीण विकास, नगरीय विकास, आवास आदि विभागों के अधिकारी भी बैठक में शामिल हुए। इस बैठक में आरंभिक वक्तव्य राज्यमंत्री श्री धनिक लाल मंडल ने दिया। मैंने उन्हें उनके भाषण के बिंदु उपलब्ध करवाए थे और वे मेरी इस नीति से पूरी तरह सहमत थे। श्री धनिक लाल मंडल डाॅ. राममनोहर लोहिया की विचारधारा के निष्ठावान अनुयायी थे और श्री कर्पूरी ठाकुर के कट्टर समर्थक थे। श्री कर्पूरी ठाकुर एक ऐसी अत्यंत पिछड़ी जाति के थे जिसके सदस्य परंपरागत रूप से जो कार्य करते थे उसी कार्य को करने वाली एससी जातियां पूरे देश में थीं। जितने भी राजनेताओं से मेरा परिचय हुआ है उनमें से श्री कर्पूरी ठाकुर सबसे निष्ठावान और ईमानदार थे। उन्हें वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को याद रखना चाहिए। वंचित वर्गों की बेहतरी के लिए काम करने के प्रति श्री धनिक लाल मंडल भी उतने ही प्रतिबद्ध थे जितने कि श्री कर्पूरी ठाकुर। हम लोगों में दलितों के वैध अधिकारों और हितों को बढ़ावा देने की रणनीति और इसके लिए उठाए जाने वाले कदमों के संबंध में खुलकर चर्चा होती थी (यह मेरे और श्री मंडल के लंबे साथ की शुरूआत थी। जब वे हरियाणा के राज्यपाल बने, तब, उनके निर्देश पर मुझे और मेरी पत्नी शांता को कमजोर वर्गों से संबंधित एक संगोष्ठी में आमंत्रित किया गया और उनके निमंत्रण पर हम दोनों राजभवन में बतौर उनके अतिथि रुके)। हमने सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर भारत सरकार के ध्यान न देने पर भी चर्चा की। मैंने उनसे कहा कि वे इन वर्गों का मुद्दा अभी न उठाएं। कारण यह कि उस समय मंडल आयोग ने अपना काम शुरू ही किया था। इससे सामाजिक दृष्टि से अगड़े वर्गों के वरिष्ठ अधिकारी पहले से ही असहज अनुभव कर रहे थे। मेरी उपस्थिति में योजना आयोग के अतिरिक्त सचिव स्तर के सलाहकार ने गृह मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव से कहा कि मंडल आयोग, पिछड़े वर्गों के लिए न जाने क्या सिफारिशें करेगा और इसलिए अभी एससी के सम्बन्ध में कोई कदम सावधानी से उठाया जाना चाहिए। मेरे विचार में यह एक तरह का षड़यंत्र था। मैंने उस सम्बन्ध में श्री धनिक लाल मंडल से बात की और उन्हें यह सलाह दी कि इस समय पिछड़े वर्गों की बात करना न केवल इन वर्गों के हितों के विपरीत होगा वरन इससे दलितों, जो सबसे वंचित वर्ग हैं, के लिए हम जो ठोस और महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, उस पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। मैंने उनसे कहा कि उपयुक्त समय आने पर मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि पिछड़े वर्गों के साथ न्याय हो। श्री धनिक लाल मंडल मेरे इस तर्क से सहमत थे कि दलितों की भलाई हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए और उन्होंने मेरी सलाह मान ली। लगभग एक दशक बाद, सन 1990 में, जब मैं पिछड़े वर्गों को मान्यता और आरक्षण दिलवाने में सहयोगी बन सका, तब मुझे यह संतोष था कि मैंने न केवल उनके प्रति अपने सामाजिक और संवैधानिक कर्तव्य का अनुपालन किया वरन श्री धनिक लाल मंडल से किया गया अपना वायदा भी निभाया। श्री धनिक लाल मंडल के योगदान को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को याद रखना चाहिए।

मुंबई में आयोजित पश्चिमी राज्यों की बैठक में श्री मंडल का उदघाटन भाषण, जिसे मैंने तैयार किया था और जिसे अगले दिन टाइम्स ऑफ इंडिया के बम्बई संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, ने एससीपी पर भारत सरकार की अनुमति की मुहर लगा दी। इसके पश्चात श्री मंडल ने आगे की कार्यवाही की बागडोर मेरे हाथों में सौंप दी। मैंने वहां उपस्थित राज्य सरकारों के अधिकारियों को एससीपी के पीछे की सोच और उसके सिद्धांतों से अवगत कराया, उन्हें यह बताया कि किस प्रकार यह योजना राष्ट्रीय नीति के अनुरूप है और एससीपी तैयार करने की प्रक्रिया और तरीके से उन्हें परिचित करवाया। कई अधिकारियों को कुछ शंकाएं थीं, जिनका मैंने समाधान किया।  मसलन, मैंने यह स्पष्ट किया कि अगर कोई विकास कार्यक्रम संपूर्ण आबादी के लिए है, जिसमें एससी भी शामिल हैं, तो उसके लिए आवंटित धनराशि में से एससीपी के अंतर्गत समानुपातिक राशि आवंटित किये जाने की जरुरत नहीं है। केवल ऐसे कार्यक्रम और योजनायें एससीपी में शामिल की जानीं चाहिए, जो प्रत्यक्ष रूप से और केवल एससी व्यक्तियों, परिवारों, समूहों या बस्तियों के लिए हों। दूसरी बैठक दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए बैंगलोर में और तीसरी, उत्तरप्रदेश के अधिकारियों के लिए लखनऊ में आयोजित की गयी। सभी राज्य सरकारों के अधिकारियों ने इस योजना में रूचि दिखाई और कुछ इस बारे में काफी उत्साहित भी थे। उस समय, ऐसे कार्यक्रमों, जो केंद्र और राज्यों दोनों के लिए महत्वपूर्ण थे, पर केन्द्रित राज्य सरकारों की क्षेत्रीय बैठकें आयोजित की जाती थीं। इन बैठकों को प्रधानमंत्री संबोधित करते थे और प्रत्येक क्षेत्र के मुख्यमंत्री उनमें हिस्सा लेते थे। इन बैठकों का आयोजन केंद्रीय गृह मंत्रालय किया करता था इसलिए मुझे और मेरे सहयोगी डॉक्टर भूपिंदर सिंह को यह मौका मिल गया कि हम प्रधानमंत्री के संबोधन में एससीपी और आदिवासी उप योजना (टीएसपी) के सम्बन्ध में एक-एक  अनुच्छेद डाल सके, जिसमें इन योजनाओं के सिद्धांत और कार्यपद्धति के संक्षिप्त वर्णन के साथ-साथ, यह भी कहा गया था कि भारत सरकार की इन्हें लागू करने में रूचि है और मुख्यमंत्रियों से यह अनुरोध किया गया था कि वे अपने-अपने राज्यों में इन योजनाओं को लागू करने में विशेष रूचि लें। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने मुख्यमंत्रियों को यह सन्देश दिया और इससे एससीपी और टीएसपी के कार्यान्वयन के कार्य में हमें बहुत मदद मिली। एससीपी का बेहतर ढंग से कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए जो एक अन्य तरीका मैंने अपनाया वह था एससी सांसदों की राज्य-वार व क्षेत्र-वार बैठकें आयोजित करना। ये बैठकें दिल्ली में आयोजित की गयीं और इनकी अध्यक्षता गृहमंत्री श्री एचएम पटेल ने की। वे हर बैठक की शुरुआत में मेरे द्वारा सुझाया गया प्रारंभिक वक्तव्य देते थे। विभाग के सचिव और अतिरिक्त सचिव भी इन बैठकों में मौजूद रहते थे। इन बैठकों में एससीपी पर विस्तार से चर्चा होती थी। मेरा उद्देश्य एससी सांसदों को यह बताना था कि एससीपी के रूप में उन्हें अब एक नया उपकरण उपलब्ध है और इस योजना के कार्यान्वयन में उनका सहयोग और समर्थन हासिल करना। इन बैठकों में राज्यों को उनके अनुसूचित जाति विकास निगमों में निवेश हेतु केंद्रीय सहायता उपलब्ध करवाने पर भी चर्चा होती थी व सांसदों को चाही गयी जानकारियां और स्पष्टीकरण प्रदान किये जाते थे। कुछ सांसद, जो इस योजना के निर्माण में मेरी भूमिका से परिचित थे, पहले ही मुझसे पूछ लेते थे कि उन्हें बैठक में क्या कहना है। मैं उनसे कहता था कि वे इस योजना का समर्थन करें और अपने अनुभव और अपने राज्यों में एससी की स्थिति के प्रकाश में, इसमें सुधार के सम्बन्ध में अपने सुझाव दें। एक सांसद, जिन्होंने इस सन्दर्भ में अत्यंत रचनात्मक भूमिका अदा की, थीं श्रीमती मार्गथम चंद्रशेखर, जो आगे चल कर इंदिरा गाँधी सरकार में मंत्री भी बनीं। एक अन्य थे श्री योगेन्द्र मकवाना, जिनसे मेरी पहली मुलाकात पश्चिमी क्षेत्र के सांसदों की बैठक में हुई। मंत्री के आगमन के पूर्व, उन्होंने मुझसे पूछा कि उन्हें अपने संबोधन में क्या कहना चाहिए। मेरा जवाब यह था कि वे चाहे जो कहें परन्तु एससीपी का समर्थन अवश्य करें। उन्होंने ऐसा ही किया। इन सभी कदमों के चलते, राज्यों ने अपने-अपने एससीपी, मध्यावधि योजना (जिसकी अवधारणा जनता सरकार ने प्रस्तुत की थी और जिसने इस सरकार के पहले और इसके बाद लागू पंचवर्षीय योजनाओं का स्थान लिया था) में शामिल करने हेतु भेजीं और साथ-साथ सन 1978-79 के लिए अपनी-अपनी वार्षिक एससीपी भी भेजीं। योजना आयोग के समक्ष इसके सिवा कोई विकल्प नहीं था कि वह उन्हें स्वीकार करे और उन पर उपयुक्त कार्यवाही करे। अगर यही काम सामान्य शासकीय प्रक्रिया से किया जाता तो इसमें सालों लग जाते और संभवतः वह हो भी नहीं पाता। योजना आयोग के एक सदस्य डॉ जेएस सेठी – जो कि गाँधीवादी समाजवादी थे- के अतिरिक्त अन्य कोई भी सदस्य न तो एससी, एसटी से जुड़े मुद्दों में रूचि रखता था और ना ही एससीपी जैसे ‘चोंचलों” में। योजना आयोग के सचिव – जिनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है – तो इसके सख्त खिलाफ थे। वैसे भी, योजना आयोग अपने आप में इतना सक्षम नहीं था कि वह इस अवधारणा को ठोस स्वरुप दे सके और केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों को एससीपी लागू करने के लिए जोर देकर कह सके। मैं इस योजना को सामान्य प्रक्रिया से हटकर ही स्वीकृति दिलवा सकता था और इसके लिए मुझे सरकार को यह याद दिलाना जरूरी था कि श्री चरण सिंह द्वारा एससी पर अत्याचारों के मुद्दे पर दिए गए वक्तव्य के पश्चात संसद में जो बवंडर उठा था, उसे शांत करने में मैंने सरकार और मंत्रालय की मदद की थी।

श्री चरण सिंह एक ईमानदार राजनेता थे व आर्य समाज और राममनोहर लोहिया की विचारधारा से प्रभावित थे। उनकी प्रशंसा में कई बातें कहीं जा सकतीं हैं। जैसे, उन्होंने जाटों को पिछड़ी जातियों में शामिल किये जाने का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने बहुत पहले कांग्रेस को अलविदा कह कर एक सामाजिक-राजनैतिक गठबंधन बनाया था जिसे अजगर कहा जाता था था। इसमें शामिल थे अहीर (जो यादवों का पुराना नाम था), जाट, गूजर और राजपूत। बाद में इसमें मुसलमानों को शामिल कर, इसे एक नया नाम ‘मअजगर’ दे दिया गया। वे इस गठबंधन के सहारे, कांग्रेस से लोहा लेना चाहते थे। कांग्रेस का नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथों में था और मुसलमान और दलित, ब्राह्मणों के पीछे चलते थे। उन दिनों उत्तरप्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में पिछड़े वर्गों में असंतोष बढ़ता ही जा रहा था क्योंकि कांग्रेस उनके लिए कुछ भी नहीं कर रही थी। मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग काफी बाद में, बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद हुआ। दलित भी धीरे-धीरे कांग्रेस से दूर होते गए क्योंकि उन्होंने पाया कि कांग्रेस की केंद्र व राज्य सरकारें उनकी बेहतरी के लिए कोई ठोस व समग्र कदम नहीं उठा रही हैं और ना ही अत्याचारों व अछूत प्रथा से उनकी रक्षा के लिए कुछ कर रहीं हैं। सन 1970 के दशक के उत्तरार्ध में, जब जनता सरकार सत्ता में आई, तब तक दलितों ने तो कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा था परन्तु पिछड़े वर्गों और जाटों का इस पार्टी से पूरी तरह मोहभंग हो चुका था। आपातकाल के दौरान किये गए अत्याचारों के चलते, उत्तरप्रदेश के मुसलमान भी कुछ समय के लिए कांग्रेस से दूर हो गए थे। पार्टी से मुसलमानों का दीर्घावधि अलगाव, बाबरी विध्वंस के बाद ही हुआ। यद्यपि चरण सिंह, अजगर गठबंधन के निर्विवाद नेता थे और पिछड़े वर्गों की पैरवी करते थे तथापि स्वयं जाट होते हुए भी, उन्होंने कभी अपने प्रभाव का उपयोग कर जाटों को पिछड़े वर्गों में शामिल करवाने की कोशिश नहीं की। इस मामले में उनकी ईमानदारी सराहनीय थी क्योंकि राजस्थान के एक हिस्से को छोड़कर, जहाँ जाट किसान सामंती व्यवस्था के शिकार थे, इस समुदाय के सदस्य सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं थे। परन्तु, श्री चरण सिंह में एक बड़ी कमी थी और वह यह कि दलितों के प्रति उनके मन में तनिक भी सहानुभूति नहीं थी। मेरे विचार में ऐसा इसलिए था क्योंकि वे पश्चिमी उत्तरप्रदेश और उससे सटे हुए प्रदेशों के एक बड़े भूस्वामी वर्ग से थे। इस वर्ग के हित, दलितों – जो कि मुख्यतः खेतिहर श्रमिक थे – से न सिर्फ मेल नहीं खाते थे वरन वे परस्पर विरोधाभासी थे। भूस्वामियों और खेतिहर श्रमिकों के हितों का टकराव, भारत के समक्ष उपस्थित सबसे गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या है और उत्तरप्रदेश इसका अपवाद नहीं है। चरणसिंह जैसे सत्यनिष्ठ राजनेता की मानसिकता भी  उनकी जाति से प्रभावित थी और वे भूस्वामियों के साथ थे, न कि खेतों में मजदूरी करने वाले दलितों के। हर राज्य के प्रतिनिधियों की योजना आयोग के साथ, आयोग द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, बैठकें हुआ करतीं थीं, जिनमें उनकी वार्षिक योजना और उसके आकार पर चर्चा की जाकर उसे अंतिम स्वरुप प्रदान किया जाता था। मैंने राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को बैठक के एक दिन पूर्व दिल्ली आमंत्रित करना शुरू किया ताकि मैं उनके साथ उनके एससीपी के विषय में विस्तृत चर्चा कर सकूं। राज्य सरकारों की पहली वार्षिक एससीपी, वित्त वर्ष 1978-1979 के लिए तैयार की गयी और उसके बाद से हर वर्ष यह योजना बनाई जाने लगी। इन योजनाओं ने निश्चित रूप से एससी वर्गों की बेहतरी में अपना योगदान दिया है परन्तु कुछ समस्याओं के चलते, ये उतनी प्रभावकारी सिद्ध नहीं हुईं, जितनी कि हो सकतीं थीं। एससीपी, दलितों के समग्र विकास और उन्नति का एक कारगार साधन बन सकती है। जैसे-जैसे इसकी कमियां दूर होती जायेगीं और जैसे-जैसे आम दलित में उन्हें उपलब्ध इस शक्तिशाली उपकरण के प्रति जागरूकता बढती जाएगी, इसकी प्रभावोत्पकता भी बढेगी। मैं यह मानता हूँ कि एससीपी दलितों के समग्र विकास और उन्नति की दिशा में मेरे जीवन और करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

  1. राज्यों को उनके एससी वित्त विकास निगमों में निवेश हेतु केंद्रीय सहायता

काफी लम्बे समय से, एससी और एसटी के लिए कुछ केंद्र-प्रवर्तित योजनायें (सीएसएस) लागू थीं। संयुक्त सचिव के रूप में, मैं एससी और एसटी दोनों के लिए निर्धारित सीएसएस का प्रभारी था। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण थी पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना (पीएमएस), जिसे डॉ आंबेडकर ने 1943 में प्रारंभ करवाया था। यह उन तीन महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक थी, जिन्हें आंबेडकर की पहल पर लागू किया गया था। अन्य दो थीं, राज्य के अंतर्गत नौकरियों और सेवाओं में एससी के लिए आरक्षण और एससी के लिए विदेश छात्रवृत्ति योजना (ओएसएस)। डॉ आंबेडकर इन योजनाओं को इसलिए लागू करवा सके क्योंकि वे वायसराय की कार्यकारी परिषद् के सदस्य थे। डॉ आंबेडकर को भारत के सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक श्रेष्ठि वर्ग, जो स्वतंत्र भारत में वर्चस्वशाली होने वाले था, के चरित्र का अच्छी तरह से अहसास था और इस बात का भी कि इसके चलते, एससी को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि ये तीनों योजनायें स्वतंत्रता के पहले ही लागू करवा दी जायें। स्वतंत्रता के पश्चात इन्हें जारी रखना आसान होता क्योंकि सत्ताधारियों के लिए इन्हें समाप्त करना कठिन होता। स्वतंत्र भारत में इन योजनाओं को आसानी से स्वमेव एसटी के लिए भी लागू किया जा सकता था। अगर डॉ. आंबेडकर ऐसा नहीं करते तो उसका क्या परिणाम हो सकता था, यह पिछड़े वर्गों के उदाहरण से स्पष्ट है, जिनके लिए स्वतंत्रता के पूर्व इस तरह की योजनायें लागू नहीं की गयीं और नतीजे में उन्हें अपना हक पाने के लिए कई दशकों तक इंतजार करना पड़ा। डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रारंभ की गयी ये तीनों योजनायें अब भी लागू हैं और इनसे एससी और एसटी को आगे बढ़ने में काफी मदद मिली है। सन 1982 में योजना आयोग ने पीएमएस को पंगु बनाने का प्रयास किया था। मैं आगे बताऊँगा कि मैंने किस तरह इस कोशिश को नाकामयाब किया। इसी तरह, 1996-97 में, मंत्रालय में ही ओएसएस को निष्प्रभावी बनाने का अधकचरा प्रयास किया गया था। इस खतरे से कैसे निपटा गया, इसका विवरण भी मैं आगे दूंगा।

जब मैंने 2 सितम्बर, 1978 को गृह मंत्रालय में एससी व बीसी विकास और कल्याण के प्रभारी संयुक्त सचिव के रूप में अपना कार्यभार ग्रहण किया, उस समय इन योजनाओं का कोई आर्थिक पक्ष नहीं था। इनमें से कोई भी योजना, एससी को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में कोई योगदान नहीं देती थी। मेरी यह मान्यता थी, और आज भी है, कि एससी का आर्थिक विकास, उनके लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उनका शैक्षणिक विकास। उनका आर्थिक विकास, उनकी उन्नति और आर्थिक गुलामी के उनकी मुक्ति की आवश्यक शर्त है। बेहतर आर्थिक स्थिति, पूरे समुदाय को मजबूती देगी, उन्हें उनके समक्ष उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने की क्षमता प्रदान करेगी और अछूत प्रथा व उससे जनित भेदभावों, निर्बलताओं और निषेधों से लड़ने की ताकत देगी।

पंजाब, कर्नाटक व आंध्रप्रदेश सहित कुछ राज्यों में, संबंधित सरकारों द्वारा स्थापित अनुसूचित जाति वित्त व विकास निगम (एससीडीसी) थेे। उनकी गतिविधियों के कुछ सुपरिणाम भी हुए थे परन्तु वे धन की कमी से जूझ रहे थे। कई राज्यों में ऐसे निगम थे ही नहीं। जब मैंने एससीपी लागू करवाने के लिए प्रयास शुरू किये, उसी के साथ मैंने एक योजना पर काम करना भी प्रारंभ किया जिसके अंतर्गत, राज्यों को सम्बंधित एससीडीसी में अपनी शेयर पूँजी के रूप में निवेश करने हेतु आवश्यक धनराशि केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई जानी थी। मैं यह नहीं चाहता था कि भारत सरकार सीधे एससीडीसी में निवेश करे क्योंकि इससे अंततः वे केन्द्रीय सरकार के उपक्रम बन जाते, जो कि न केवल देष के संघीय / अर्ध-संघीय ढांचे के सिद्धांत के खिलाफ होता बल्कि इससे राज्यों की पिछड़े वर्गों की उन्नति में रूचि भी समाप्त हो जाती। दलितों की भलाई के लिए केंद्र और राज्य – दोनों की सरकारों की इसमें रूचि होना आवश्यक है। मैंने एकमात्र शर्त यह रखी कि जिन एससीडीसी के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, उनके संचालक मंडलों में केंद्र सरकार द्वारा नामांकित दो सदस्य होंगें। इस शर्त को राज्य सरकारों ने बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया और उसे लागू भी किया।

इस योजना को स्वीकृत करने का प्रस्ताव, कैबिनेट के समक्ष 1979 में रखा गया। मैं उस हाल, जिसमें कैबिनेट की बैठक चल रही थी, के बाहर ऐसे चहलकदमी कर रहा था मानो मैं कोई युवा पति हूँ, जो प्रसूति कक्ष से अच्छी खबर का इंतजार कर रहा हो। बैठक के बाद, मंत्री श्री जॉर्ज फर्नान्डिस, जिन्हें मैंने इसके सम्बन्ध में जानकारी उपलब्ध करवाई थी, ने मुझे बताया कि प्रस्ताव को स्वीकृत कर दिया गया है। उन्होंने मुझे बताया कि कैबिनेट इस प्रस्ताव को बिना किसी चर्चा के स्वीकृति देने जा रही थी परन्तु उन्होंने कैबिनेट से कहा कि प्रस्ताव को स्वीकृत करने के पहले, वह उसके महत्व को समझे क्योंकि यह जनता सरकार के शासन में आने के बाद से, उसका सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होगा। श्री फर्नांडिस ने गृहमंत्री श्री एचएम पाटिल को यह सुझाव भी दिया कि वे इस सिलसिले में मुझसे एक वक्तव्य का मसविदा तैयार करवा लें, ताकि उसे अगले दिन प्रेस को जारी किया जा सके। मैंने वक्तव्य का मसविदा तैयार भी कर लिया ताकि अगर श्री पटेल मुझसे ऐसा करने को कहें तो मैं तुरंत उन्हें वह मसविदा सौंप सकूं। परन्तु उन्होंने मुझसे इस आशय का अनुरोध नहीं किया।

इस योजना के लिए पहले वर्ष 1978-79 में प्रतीकात्मक आवंटन किया गया जो, जहाँ तक मुझे याद है, रुपये 1.5 करोड़ था। प्रस्ताव के कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किये जाने के पूर्व, मैंने योजना आयोग और वित्त मंत्रालय के साथ विस्तृत बैठकें कीं ताकि प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी आसानी से मिल सके। योजना आयोग के सचिव के बारे में कहा जाता था कि जब वे गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे, तब उन्होंने काफी हिम्मत दिखाते हुए आपातकाल का विरोध किया था और इसकी सजा स्वरुप उन्हें एशियाई विकास बैंक के मनीला, फिलीपीन्स स्थित मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। वाह, क्या सजा थी! अधिकांश अधिकारी इस तरह की सजा का स्वागत करते। जनता सरकार ने उन्हें वापस बुलवाकर, योजना आयोग का सचिव नियुक्त किया था। उनके बारे में जो कुछ मैंने सुन रखा था, उससे मुझे लगता था कि वे मेरा पूर्ण समर्थन करेगें। परन्तु मेरी अपेक्षा गलत सिद्ध हुई। मुझे पता था कि अगर मैं इस योजना कि लिए अधिक आवंटन की मांग करूंगा तो योजना आयोग इस प्रस्ताव का विरोध करेगा। वित्त मंत्रालय योजना के लिए अधिक धन देने को तैयार था। मंत्रालय के जिस अतिरिक्त सचिव ने मुझसे इस विषय में चर्चा की और इस आवंटन को स्वीकृति दी, ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि मैंने 3 या 5 करोड़ रूपये की मांग क्यों नहीं की। उनका कहना था कि वे इस धनराशि को तुरंत स्वीकृत कर देते। मैंने कहा कि मैं शुरुआत में योजना को छोटे स्वरुप में लागू करना चाहता हूँ। मेरे द्वारा कम राशि की मांग किये जाने का असली कारण, योजना आयोग का रुख था, जिसके बारे में मैं जानता था परन्तु अतिरिक्त वित्त सचिव नहीं जानते थे। मैंने इस राशि को वित्त वर्ष 1978-79 के अंत में जारी करवाया और यह राज्य सरकारों के खातों में वित्त वर्ष के अंतिम दिन पहुंची। मैंने सभी राज्यों के वित्त सचिवों को टेलीफोन कर उन्हें यह सलाह दी कि तुरंत इस धनराशि को अपने-अपने एससीडीसी के खातों में स्थानांतरित करने की व्यवस्था करें। जिन राज्यों में एससीडीसी नहीं थे, उन राज्यों के वित्त सचिवों से मैंने कहा कि वे जल्द से जल्द इनका गठन करें और तब तक के लिए, इस राशि को अस्थायी रूप से किसी अन्य निगम के खाते में स्थानांतरित कर दें। इससे यह सुनिश्चित हो सका कि जितनी भी धनराशि जारी की गयी थी, वह उन राज्यों में एससीडीसी को प्राप्त हो गयी जहाँ वे थे, और जहाँ उनका अस्तित्व नहीं था, वहां यह राशि अंतरिम तौर पर किसी और निगम के खाते में जमा हो गयी। इसके कारण मैं सन 1979-80 और उसके बाद के वर्षों के लिए, इस योजना के लिए अधिक आवंटन की मांग कर सका।

एसीडीसी, दलितों की बेहतरी और उनकी आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध करवा सकते हैं। इन निगमों ने काफी अच्छा काम किया भी है परंतु कुछ कारणों से ये दलितों की बेहतरी में उतना योगदान नहीं दे सके, जितना कि वे दे सकते थे। ये कारण वहीं हैं, जिनकी चर्चा मैंने एससीपी के सिलसिले में की है। इन दोनों योजनाओं के क्रियान्वयन में कुछ कार्यात्मक समस्याएं हैं जिन्हें सुलझाने के संबंध में राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान और मेरी अध्यक्षता में गठित ‘पर्सपेक्टिव प्लानिंग आन एंपावरमेंट ऑफ शेडयुल्ड कास्टस इन टवेल्थ फाईफ इयर प्लान‘ उप समूह ने अपनी दिनांक 1 अगस्त 2011 की रपट में सुझाव दिए हैं। राज्यों को अपने-अपने एससीडीसी में निवेश हेतु केन्द्रीय सहायता उपलब्ध करवाने में मेरी सफलता के निम्न परिणाम हुए :

  • जिन राज्यों में एससीडीसी लगभग मृत अवस्था मेें थे उन्हें पुनर्जीवन मिल गया।
  • जिन राज्यों में एससीडीसी नहीं थे, वहां उनकी स्थापना हुई
  • मेरी सफलता से राज्य सरकारों के अधिकारियों को प्रेरणा मिली, उनका मुझमें विश्वास बढ़ा और वे मेरी सलाह पर काम करने के लिए और अधिक उत्साहित हो गए। मैं हमेशा यह सुनिश्चित करता था कि राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों से पत्राचार करते समय मैं ऐसे शब्दों का प्रयोग करूं जो हमारे देश के संघीय/अर्धसंघीय ढांचे के अनुरूप हों। गुजरात के तत्कालीन मुख्य सचिव श्री एचसी कपूर ने मेरे योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा कि मैंने न केवल उन्हें सही सलाह दी वरन् धनराशि भी उपलब्ध करवाई।

3. राज्यों के एससीपी के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता  

यह एससी के समग्र विकास के लिए मेरे द्वारा गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में सन् 1978 में पदभार ग्रहण करने के बाद उठाया गया तीसरा महत्वपूर्ण कदम था। विशेष केन्द्रीय सहायता (एससीए) के निम्न उद्धेष्य थे :

  • राज्यों को अपने एससीपी के आकार में वृद्धि करने और उसमें सुधार लाने के लिए प्रेरित करना। राज्यों को उपलब्ध कराई जाने वाली एससीए का निर्धारण करने के लिए जो फार्मूला मैंने तैयार किया था उसमें यह भी एक मानदंड था। अन्य मानदंड थे राज्य की आबादी में एससी की हिस्सेदारी, देश की कुल एससी आबादी में संबंधित राज्य की एससी आबादी का अनुपात, एससी की अत्यधिक पिछड़ी जातियााें जैसे सफाई कर्मचारी (हाथ से मैला साफ करने वाले), घुम्मकड़, अर्ध-घुम्मकड़ और विमुक्त जातियांे की आबादी और बाद के वर्षों में यह भी कि संबंधित राज्य में एससीपी का किस हद तक क्रियान्वयन किया गया।
  • इससे राज्यों को अपनी वार्षिक योजनाओं में आर्थिक विकास कार्यक्रमों से संबंधित कमियों को दूर करने में मदद मिलती थी।

एससीपी के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता उपलब्ध करवाए जाने की एक मुख्य शर्त यह थी कि इस सहायता का उपयोग केवल आर्थिक विकास से संबंधित योजनाओं को लागू करने के लिए किया जाएगा, किसी अन्य उद्धेश्य के लिए नहीं। मैंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि एससी द्वारा जोती जा रही जमीनों के लिए समूह लघु सिंचाई योजनाएं लागू की जानी चाहिए। सन् 1979 में मैं इस प्रस्ताव को स्वीकृति दिलवाने की कगार पर पहुंच गया था। शुरूआत में इसके लिए 50 करोड़ रूपये आवंटित किए जाने थे। इस कार्य के लिए मैंने श्री चरण सिंह, जो उस समय तक प्रधानमंत्री बन चुके थे, की स्वीकृति, उनके विशेष सहायक श्री विजय करण, आईपीएस के जरिए हासिल की। श्री विजय करण, कुरनूल के दिनों के मेरे पुराने मित्र थे जब वे जिले के बंगनापल्ली में एएसपी के रूप में पदस्थ थे। परंतु चरण सिंह सरकार की लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी और ऐसा माना जा रहा था कि देश में जल्दी ही लोकसभा चुनाव होंगे, यद्यपि तब तक उनकी घोषणा नहीं की गई थी। परंतु इस आधार पर वित्त मंत्रालय ने प्रस्ताव पर रोक लगा दी। वित्त मंत्रालय का यह निर्णय अवांछित था क्योंकि तब तक चुनावों की घोषणा नहीं हुई थी, और वैसे भी, इस योजना के स्वीकृत किए जाने से चुनावों का कोई लेना-देना नहीं था।

मैंने श्रीमती इंदिरा गांधी के सन् 1980 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद, इस प्रस्ताव को स्वीकृत करवा लिया। इस प्रस्ताव को स्वीकृत करवाने से संबंधित घटनाक्रम का कुछ विस्तार से वर्णन किया जाना आवश्यक है। प्रस्ताव को 30 मार्च 1980 को असाधारण परिस्थितियों में, इंदिरा गांधी सरकार में राज्य मंत्री श्री योगेन्द्र मकवाना, मेरे व मेरे साथी श्री ललित माथुर, जो मेरे एक कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील उप सचिव/संचालक थे, के संयुक्त असाधारण प्रयासों से स्वीकृति प्राप्त हो सकी। तब से इस योजना हेतु हर साल केन्द्रीय बजट में राशि का आवंटन किया जा रहा है।

  1. सफाई कर्मचारियों की मुक्ति और पुनर्वास के लिए योजना की शुरूआत – नागरिक अधिकार सुरक्षा अधिनियम को लागू करने के भाग के तौर पर सफाई कर्मचारियों (हाथ से मैला साफ करने वालों) की मुक्ति और पुनर्वास के लिए कार्यक्रम :

हाथ से मैला साफ करने की प्रथा का अछूत प्रथा से निकट का संबंध है। हाथ से मैला साफ करने वाले लगभग सभी लोग एससी हैं और उनमें भी कुछ विशिष्ट जातियों के। कुछ एसटी जैसे यनाडी और कुछ मुस्लिम पिछड़ी जातियों, जो यही काम करने वाली हिन्दू एससी जातियों के समकक्ष हैं, पर भी यह काम लाद दिया गया है।

मैं अपनी विवेचना से इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अगर हमें अछूत प्रथा के खिलाफ लड़ना है तो हमें उन लोगों को मुक्ति दिलानी ही होगी जिन्हें अपनी आजीविका कमाने के लिए हाथ से मैला साफ करने पर मजबूर कर दिया गया है। और इन लोगों को आजीविका के ऐसे वैकल्पिक साधन उपलब्ध करवाने होंगे जो साफ-सफाई से संबंधित न हों। सन् 1980 के दशक में इस कार्यक्रम की शुरूआत हुई और बाद में यह एक स्वतंत्र केन्द्र-प्रवर्तित योजना बन गई।

मैं सन् 1982 तक गृह मंत्रालय मे संयुक्त सचिव के रूप में पदस्थ रहा। उसके बाद कुछ समय राज्य में बिताने के बाद, मैं 1987 में केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर, भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद अनुसूचित जातियों के लिए विशेष आयुक्त/अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष आयुक्त के रूप में पदस्थ किया गया। इस पद पर मैं 2.10.1987 से 1.1.1990 तक पदस्थ रहा। दिनांक 1.1.1990 को मेरी पदस्थापना कल्याण मंत्रालय में सचिव के रूप में कर दी गई और मैंने 2.1.1990 को अपना पदभार ग्रहण किया। कल्याण मंत्रालय का गठन उस समय किया गया था, जब श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल (सन् 1984 के अंत से 1989 तक) मेें श्री अरूण नेहरू, गृह मंत्रालय में एक शक्तिशाली राज्य मंत्री थे। इस मंत्रालय में गृह मंत्रालय का एससी-एसटी कल्याण से संबंधित प्रभाग और कुछ अन्य मंत्रालयों से संबंधित विषय शामिल किए गए थे। नवगठित कल्याण मंत्रालय, एससी, एसटी, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, विकलांगों और कठिन परिस्थितयों में जी रहे बच्चों के कल्याण के लिए उत्तरदायी था। इस मंत्रालय का सचिव नियुक्त होने से मुझे न केवल सभी राज्य सरकारों तक पहुंच मिली वरन् मंत्रालय के विशाल मानव संसाधनों का उपयोग करने का अधिकार भी मुझे प्राप्त हो गया। मैं यही काम पहले गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव की हैसियत से करता रहा था और पिछले कुछ दशकों की मेरी गतिविधियों के कारण सभी राज्य सरकारों के अधिकारी मुझे पहचानते थे और यह भी समझते थे कि मेरी उनसे क्या अपेक्षाएं होंगी। इस पद पर रहने से मुझे यह मौका मिला कि मैं दलितों और पिछड़े वर्गों के कल्याणार्थ दूरगामी प्रभाव वाले कानून बनवा सकूं और योजनाएं लागू कर सकूं। यद्यपि मेरी पिछली पदस्थापना, भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर थी परंतु कुछ शक्तियां, कल्याण मंत्रालय में सचिव के रूप में मेरी पदस्थापना नहीं चाहती थीं क्योंकि इस पद पर पदस्थ व्यक्ति सरकार के नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता था और शक्तिशाली प्रतिगामी व नकारात्मक तत्व यह नहीं चाहते थे कि ऐसा करने का मौका मुझे मिले। उन्हें अच्छी तरह से यह मालूम था कि मैं क्या करूंगा। चूंकि 31 दिसंबर, 1990 को मुझे सेवानिवृत्त होना था इसलिए मेरे पास सिर्फ 364 दिन थे। इसे देखते हुए मैं पूरे दमखम से अपना एजेंडा तेजी से लागू करने के प्रयास में जुट गया। मेरी पूर्व पदस्थापनाओं की तरह, इस पद के लिए भी मेरा एजेंडा पहले से तैयार था और इसका आधार था एससी, एसटी, पिछड़े वर्गों और अन्य वंचित वर्गों व श्रेणियों के कल्याणार्थ उठाए जा सकने वाले कदम। इस अवधि में मैंने अपने एजेंडा के आधार पर निम्न कदम उठाए :

  1. बौद्ध धर्म अपना चुके दलितों को एससी का दर्जा दिलवाना।

डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में दलितों का बौद्ध धर्म मेें सामूहिक प्रवेश करवाया गया था। इसके बाद भारत सरकार को संविधान के अनुच्छेद 341 के तारतम्य में जारी राष्ट्रपति के अनुसूचित जातियों से संबंधित आदेश के खंड तीन में संशोधन कर बौद्ध धर्म अपना चुके दलितों को भी एससी का दर्जा देना था। मूल आदेशा के खंड तीन के अनुसार ‘‘कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो हिन्दू या सिक्ख धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में आस्था रखता हो, को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा‘‘। इस खंड में केवल एक संशोधन कर सिक्ख के पश्चात ‘या बौद्ध धर्म‘ जोड़ा जाना था। इससे बौद्ध दलितों को वही दर्जा प्राप्त हो जाता, जो बौद्ध धर्म अपनाने के पूर्व उन्हें प्राप्त था। ऐसा करना बौद्ध धर्म अपना चुके एससी के साथ न्याय और डाॅ. आंबेडकर के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए भी आवश्यक था। एससी, उनके नेता और प्रतिनिधि लगातार यह मांग कर रहे थे कि बौद्ध धर्म अपना चुके दलितों को एससी का दर्जा दिया जाए। रिपब्लिकन पार्टी के नेता श्री पीएन राजभोज ने इस मांग को लेकर भूख हड़ताल भी की थी। जैसा कि होता आया है, सरकार ने इस मांग पर न तो कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की और ना ही समय रहते कोई कदम उठाया। इसी तरह की मांग ईसाई धर्म अपना चुके दलितों की ओर से भी की जा रही थी।

गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप मेें मेरे कार्यकाल (1979-82) के दौरान मैंने सन् 1980-81 में यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि धर्मातंरित बौद्ध और ईसाई दलितों को एससी का दर्जा प्रदान किया जाए। मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री योगेन्द्र मकवाना ने प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी और तत्पश्चात फाईल, गृहमंत्री श्री जैल सिंह के समक्ष प्रस्तुत की गई। जहां तक मेरी जानकारी है, श्री जैल सिंह इस प्रस्ताव को स्वीकृत करने के पक्ष में थे परंतु तत्कालीन गृह सचिव श्री सैय्यद मुजफ्फर हुसैन बर्नी ने उन्हें यह कहकर डरा दिया कि अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो इससे सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी क्योंकि फिर यही मांग मुसलमानों द्वारा भी की जाएगी। तथ्य यह है कि इस्लाम अंगीकार करने वाले दलित, जिन्हें एससी मूल के मुसलमान या दलित मुसलमान कहा जाता है, की आसानी से पहचान की जा सकती है और वे अलग-अलग अनुमानों के अनुसार, देश की मुस्लिम आबादी का 0.8 से लेकर 1.2 प्रतिशत से अधिक नहीं हैं। उनमें मुख्यतः वे मुस्लिम जातियां शामिल हैं जो पारपंरिक रूप से सफाई का काम करती आ रही हैं जैसे हलालखोर, मुस्लिम मेहतर और मुस्लिम लाल बेगी व मुस्लिम जोगी और मुस्लिम नट जैसे घुमक्कड़ समुदाय, जिनके हिन्दू समकक्ष भी एससी हैं। ऐसा अन्य कोई मुस्लिम समुदाय नहीं है जो एससी के दर्जे की मांग करने की स्थिति में हो क्योंकि किसी समुदाय को एससी का दर्जा देने का मुख्य आधार यह है कि वह अछूत प्रथा का शिकार रहा हो। जहां तक सिक्ख धर्म अपना चुके दलितों का प्रश्न था, उन्हें पहले ही एससी के रूप में मान्यता दी जा चुकी थी।

अनुसूचित जातियों के संबंध में राष्ट्रपति के मूल आदेश में एससी का दर्जा सिक्खोें की केवल चार जातियों को दिया गया था – मजहबी, रविदास या रामदासी, कबीरपंथी और सिकलीगर – और वह भी केवल उन व्यक्तियों को जो पंजाब राज्य (जिसमें वर्तमान हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे) व पटियाला व ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन (पेप्सू) जिसके कुछ हिस्से बाद में पंजाब और हरियाणा का हिस्सा बना दिए गए, में निवास करते थे। काका कालेलकर आयोग (1953-55) की सिफारिश पर दलित मूल के सिक्खाें पर लगाए गए भौगोलिक प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए, यद्यपि इसी आयोग की पिछड़े वर्गों से संबंधित सिफारिशों को स्वीकार करने के बाद, सन् 1961 में उन्हें खारिज कर दिया गया। काका कालेलकर आयोग की सिफारिष के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश में जो संशोधन किया गया, उसके अंतर्गत अधिसूचित जातियों के सभी राज्यों में रहने वाले सिक्खों को एससी का दर्जा दे दिया गया। पारसियों में अछूत प्रथा नहीं है। जैन समुदाय, जिसे हाल में राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है, में भी कोई अछूत जाति नहीं है और उनमें से अधिकांश मूलतः हिन्दू उच्च जातियों बनिया/वैश्य से हैं। इस तरह, एससी का दर्जा देने का मुद्दा केवल बौद्ध, ईसाई व इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके दलितों से जुड़ा हुआ था। उस समय केवल ईसाई व बौद्ध धर्म में धर्मांतरित दलित, एससी का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे थे। अतः बौद्ध या ईसाई बन चुके दलितों को एससी का दर्जा देने से सरकार पर मुसीबतों का पहाड़ नहीं टूट पड़ता। परंतु दलित मुसलमानों द्वारा ऐसी ही मांग उठाए जाने का डर दिखाकर गृह सचिव ने गृहमंत्री को यह प्रस्ताव खारिज करने के लिए राजी कर लिया।

कल्याण मंत्रालय में सचिव का पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद मैंने मेरे मंत्री श्री रामविलास पासवान से दिनांक 8.1.1990 को दलित बौद्धों को एससी का दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा की। उस समय दलित बौद्धों को नव-बौद्ध कहा जाता था। जनता दल के चुनाव घोषणापत्र में दलित बौद्धों को एससी का दर्जा देने का वायदा किया गया था। मैंने यह प्रस्ताव जानबूझकर ऐसे समय प्रस्तुत किया जब श्री वी.पी. सिंह चुनाव प्रचार के लिए जनवरी 1990 के मध्य में महाराष्ट्र जाने वाले थे। मुझे किसी राजनैतिक दल की चुनाव में हार या जीत से कोई लेना-देना नहीं था परंतु मैं यह जानता था कि चुनाव के समय राजनेता इस तरह की मांगाों को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। मैं दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के वैध अधिकारों को उन्हें सुलभ करवाने के लिए ऐसे मौकों की तलाश में रहता था और इन अवसरों पर वंचित वर्गों के कल्याणार्थ, संवैधानिक दृष्टि से वैध और न्यायोचित प्रस्ताव राजनीतिज्ञों के समक्ष रख देता था।

श्री पासवान ने इस विषय पर श्री वी.पी. सिंह से चर्चा की और उनसे इस आशय की स्वीकृति प्राप्त कर ली कि इस प्रस्ताव को कैबिनेट की राजनैतिक मामलों की समिति (सीसीपीए) की बैठक के एजेंडे मे शामिल किया जाए। उन्होंने मुझे भी इस बारे में सूचित किया। मैंने तुरंत-फुरंत कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने के लिए मेरे द्वारा संयुक्त सचिव के पद पर रहते हुए दस साल पहले तैयार किया गया मसविदा ढूंढ निकाला। इसे तत्कालीन गृह सचिव के विरोध के कारण कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सका था। मैंने मंत्रालय के सम्मेलन कक्ष में बैठकर मोमबत्ती की रोशनी में इस प्रस्ताव को अद्यतन किया क्योंकि ठीक उसी समय बिजली धोखा दे गई। इस नोट को उसी रात श्री पासवान और कैबिनेट सचिवालय को भेज दिया गया और 12.1.1990 को आयोजित सीसीपीए की बैठक के एजेंडा में शामिल कर लिया गया। सीसीपीए की बैठक में प्रस्ताव का कोई विरोध नहीं हुआ। श्री जार्ज फर्नाडींस ने यह सुझाव दिया कि ईसाई धर्म अपना चुके दलितों को भी एससी का दर्जा दिया जाना चाहिए। मैं यह बात जानता था कि जनता दल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, लोकसभा में बहुमत के लिए वामपंथी दलों के अतिरिक्त, भाजपा पर भी निर्भर थी और ऐसे में अगर दलित ईसाईयों और दलित बौद्धों को एससी का दर्जा देने का प्रस्ताव एक साथ प्रस्तुत किया जाता तो दोनों को ही यह दर्जा नहीं मिल पाता।

प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह और अधिकांश कैबिनेट मंत्री भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे। सीसीपीए ने बौद्ध धर्मावलंबी दलितों को एससी का दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव को अनुमोदित कर दिया। सीसीपीए की बैठक समाप्त हो जाने के बाद मैं कैबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव श्री टीएन राघवेन्द्र राव से मिलने उनके कक्ष में गया। उन्होंने मेरी तरफ सीसीपीए के लिए तैयार किया गया मेरा नोट बढ़ा दिया। मैं जल्दी में उस पर हस्ताक्षर करना ही भूल गया था और मैंने बाद में उस पर हस्ताक्षर किए। इस घटना से स्पष्ट है कि अगर नौकरशाही को यह पता हो कि प्रधानमंत्री किसी प्रस्ताव के पक्ष में हैं तो कोई तकनीकी कारण उसके अनुमोदन में बाधा नहीं बनता, जब तक कि वह प्रस्ताव पूरी तरह से अनियमित या गैरकानूनी न हो। मेरा प्रस्ताव संविधान के प्रावधानों पर आधारित था और विधिमान्य और नियमानुकूल था।

राष्ट्रपति के अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से संबंधित आदेश में संशोधन, संसद द्वारा क्रमश: संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के प्रावधानों के अनुरूप प्रस्ताव पारित कर किया जा सकता है। इसके लिए उस प्रकार के विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती, जो अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संवैधानिक संशोधन के  लिए जरूरी होती है। संशोधन विधेयक को संसद के अगले सत्र, जो कि बजट सत्र था, में राज्यसभा और लोकसभा द्वारा पारित कर दिया गया। इस प्रकार, बौद्ध दलितों के साथ तीन दशकों से हो रहा अन्याय समाप्त हुआ और डाॅ. आंबेडकर के सम्मान की रक्षा हुुई। संसद में सभी दलों के नेताओं ने इस विधेयक का समर्थन किया परंतु भाजपा के श्री प्रमोद महाजन ने बिल का समर्थन करते हुए सरकार को यह चेतावनी दी कि वह ईसाई धर्म अपना चुके दलितों को एससी का दर्जा देने का प्रयास न करे।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद: अमरश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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