राज्यसभा और विधान परिषदों में भी लागू हो दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण : पी.एस. कृष्णन

वर्तमान में लोकसभा और विधानसभाओं में एक-चौथाई सदस्य एससी व एसटी हैं। लेकिन राज्यसभा और विधानपरिषदों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। आज के नवउदारवादी युग में वंचितों के हितों की रक्षा तभी हो सकेगी जब उनका समुचित प्रतिनिधित्व हो

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 18

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज पढ़ें कि नवउदारवादी युग में भारत के दलितों और आदिवासियों के लिए कानूनी प्रावधानों में किस तरह के सुधार हों – संपादक)


नवउदारवादी नीतियां और भारत के दलित-आदिवासी

  • वासंती देवी

(गतांक से आगे)

वासंती देवी : भारतीय राज्य की नवउदारवादी नीतियों के चलते लंबे समय से आदिवासियों के अधिकारों का क्रूरतापूर्वक दमन किया जाता रहा है। क्या आपको ऐसा लगता है कि नवउदारवादी शासन – जो न तो व्यक्ति का सम्मान करता है और ना ही प्रकृति का – आदिवासियों को न्याय और समानता दे सकेगा?

पी.एस. कृष्णन : सबसे पहले यह आवश्यक है कि हम राज्य और सरकार के बीच अंतर करें। भारतीय राज्य की मूल नीतियों और कर्तव्यों का निर्धारण संविधान में कर दिया गया है। अब मुद्दा केवल सरकारों द्वारा अपनाई गई नीतियों का है। सन् 1991 के बाद से सरकारों ने ऐसी नीतियां अपनाई हैं जिनमें बाजार को सबसे प्रमुख स्थान दिया गया है। निकट भविष्य में इन नीतियोें में बदलाव की आशा करना यथार्थपूर्ण नहीं होगा।

इसके साथ ही, दुनिया के कई हिस्सों में बाजार-केन्द्रित अनियंत्रित विकास के कुपरिणामों के विषय में जागृति आ रही है। दुनिया को यह अहसास हो रहा है कि बाजार-आधारित विकास से न केवल आर्थिक असमानता बढ़ी है वरन् मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग की आर्थिक स्थिति या तो गिरी है या वैसी ही बनी हुई है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय संपदा का बड़ा हिस्सा धन पशुओं के हाथों में केन्द्रित हो रहा है जो अपने धन का नंगा प्रदर्शन कर रहे हैं। वे अपने रहवास के लिए ऐसे भवन बना रहे हैं, जो राजाओं और सम्राटों को भी नसीब नहीं थे। इस तरह के विकास पर प्रतिक्रिया हाल में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उभरकर सामने आई। इस प्रतिक्रिया को अभिव्यक्ति दी बर्नी सेन्डर्स ने यद्यपि इसके लाभार्थी डोनाल्ड ट्रंप बने। यह परिघटना कई यूरोपीय देशों में भी देखी जा सकती है यद्यपि इसका स्वरूप विकृत है। यह प्रतिक्रिया आगे चलकर और सशक्त और मुखर होगी। सन् 1989 में इतिहास का अंत उतनी आसानी से और उतने सतही ढंग से नहीं हुआ, जिसकी कल्पना फ्रांसिस फुकयामा ने अपने लेख ‘द एंड आफ हिस्ट्री?‘ (1989) में की थी।

एससी-एसटी व अन्य वंचित वर्गों को उनके अधिकार व समानता उपलब्ध करवाने के लिए हम मैक्रो आर्थिक नीतियों में इस तरह के परिवर्तन या बदलाव आने का इंतजार नहीं कर सकते जिससे वे बाजार-केन्द्रित न होकर जनता के कल्याण पर केन्द्रित हो जाए। इन वंचित वर्गों के अधिकारों और सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई लगातार चलती रहनी चाहिए चाहे जो भी सरकार शासन में हो और उसकी आर्थिक नीतियां कुछ भी हों।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी.एस. कृष्णन

वासंती देवी : संविधान के लागू होने के छःह दषक बाद भी एससी और एसटी विकास का फल चखने तक से वंचित हैं और उनके व अन्यों-विशेषकर अगड़ी जातियों -के बीच अंतर बढ़ता ही जा रहा है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे सुरक्षात्मक कानूनों के बावजूद उन पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आ रही है। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि इन वर्गों में न्याय और समानता हासिल करने के लिए जरूरी राजनैतिक ताकत की कमी है? क्या आपको ऐसा लगता है कि बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दलितों के लिए पृथक मताधिकार की मांग – जिसे पूना पैक्ट के अंतर्गत अस्वीकार कर दिया गया था – इस समस्या का हल है? क्या पृथक मताधिकार की मांग को पुनर्जीवित करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं? ऐसी मांग किस हद तक व्यवहारिक होगी?

साथ ही, संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों में से 20-25 प्रतिशत एससी-एसटी हैं। वे अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम क्यों साबित नहीं हो रहे हैं?

पी.एस. कृष्णन : पृथक मताधिकार की मांग इस सोच पर आधारित थी कि एससी के लिए आरक्षित क्षेत्रों में केवल एससी मतदाता अपने ही समुदाय के उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनेंगे और इस प्रकार ऐसे उम्मीदवार चुने जाएंगे जिन्हें एससी का विश्वास और समर्थन हासिल होगा और जो चुनाव के बाद एससी के अधिकारों और महत्वाकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील रहेेंगे। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रेम्से मेकडोनाल्ड द्वारा 17 अगस्त 1932 को घोषित मेक्डोनाल्ड एवार्ड का आधिकारिक और औपचारिक नाम ‘द कम्युनल डिक्री बाय हिज मेजिस्टीज गर्वमेंट‘ था और इसे ही सामान्यतः ‘कम्युनल एवार्ड‘ कहा जाता है। इस एवार्ड में एससी के लिए ‘डिप्रेस्ड क्लासेज‘ शब्द प्रयुक्त किया गया है। इस एवार्ड के अंतर्गत ऐसे विशेष ‘डिप्रेस्ड क्लासेज‘ निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण प्रस्तावित था जिनमें उम्मीदवार और मतदाता दोनों डिप्रेस्ड क्लासिस के होंगे। गांधीजी, जो उस समय पुणे के यरवदा जेल में कैद थे, ने 12 सितंबर 1932 को ‘अछूतों‘ को पृथक मताधिकार दिए जाने के प्रस्ताव के विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद, देश का राष्ट्रीय नेतृत्व इस समस्या का हल ढूंढ़ने और गांधीजी का जीवन बचाने के लिए यरवदा जेल में किस तरह जुटा इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध है।


 यरवदा जेल में कांग्रेस के नेतृत्व और डाॅ. आंबेडकर – जो कांग्रेस के नेताओं के अनुरोध पर वहां पहुंचे थे – के बीच लंबी वार्ता के नतीजे में यरवदा पैक्ट हुआ। जिन मुद्दाें पर सहमति बनी उनमें से एक यह था कि पृथक मताधिकार की मांग को त्याग दिया जाए और इसकी जगह वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए मेक्डोनाल्ड एवार्ड में प्रस्तावित निर्वाचन क्षेत्रों से अधिक सीटों को वंचित वर्गों के लिए आरक्षित कर दिया जाए। यह व्यवस्था तब तक लागू रहनी थी जब तक परस्पर सहमति से इसे समाप्त न कर दिया जाए। यरवदा पैक्ट को केवल इसी बिंदु के लिए याद किया जाता है। परंतु इसमें कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल थे। इस पैक्ट के जरिए पहली बार इस बात पर राष्ट्रीय सहमति बनी की डिप्रेस्ड क्लासिस को सार्वजनिक सेवाओं और स्थानीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाए। दूसरे शब्दों में, राज्य के अंतर्गत सेवाओं और पंचायतों और नगरपालिकाओं में उन्हें आरक्षण मिले। इसी के चलते सन् 1942-43 में जब डाॅ. आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे, राज्य के अंतर्गत सेवाओं में एससी को आरक्षण प्रदान किया गया। इसी तर्ज पर सन् 1993 में संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के जरिए, पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया। पैक्ट में यह स्वीकार किया गया कि अछूत प्रथा एक राष्ट्रीय समस्या है और इसके उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जाना चाहिए। इस पैक्ट के जिस प्रावधान के संबंध में लोग सबसे कम जानते हैं वह यह था कि हर प्रांत में शिक्षा के लिए आवंटित धन में से एक निश्चित और पर्याप्त धनराशि डिप्रेस्ड क्लासेज के लिए शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर खर्च की जाए। यह प्रावधान उस समय किया गया जब देश में विकास की योजनाएं बनाने की कोई प्रक्रिया नहीं थी। इस प्रावधान ने एक तरह से एससी के लिए विशेष घटक योजना की नींव रखी, जिसे मैंने सन् 1970 के दशक के अंत में प्रस्तावित किया था। उस समय मैं केन्द्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव, अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग कल्याण था। यह योजना भारत के योजनाबद्ध विकास के माॅडल का एक हिस्सा थी।

यरवदा पैक्ट के अंतर्गत आरक्षण की जिस व्यवस्था को स्वीकार किया गया था उस पर टिप्पणी करते हुए डाॅ. आंबेडकर ने लिखा, ‘‘इसमें अछूतों की राजनैतिक मांग को स्वीकार कर लिया गया है‘‘। उन्होंने यह भी कहा कि इस पSक्ट के जरिए, प्रधानमंत्री के एवार्ड को खारिज नहीं किया गया है बल्कि उसके स्थान पर एक अन्य संवैधानिक सुरक्षा प्रणाली प्रस्तावित की गई है और पूना पैक्ट व कम्युनल एवार्ड में कोई अंतर नहीं है। इस पैक्ट ने देश भर में सद्भावना और उदारता का वातावरण निर्मित किया और यह हिन्दूज कांफ्रेंस की 25 सितंबर 1932 को बंबई में पंडित मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में आयोजित बैठक, जो इस पैक्ट का अनुसमर्थन करने के लिए आहूत की गई थी, की कार्यवाही से जाहिर है। इस कांफ्रेंस में डाॅ. आम्बेडकर ने यह आशा और विश्वास व्यक्त किया कि ‘‘जो हिन्दू उनके साथ हैं वे इस दस्तावेज को पवित्र मानेंगे और उसे लागू करने के लिए निष्ठापूर्वक प्रयास करेंगे’’।

दुर्भाग्यवश, उदारता और सद्भावना का जो वातावरण उस समय उत्पन्न हुआ और जो राजनैतिक आरक्षण पर 25 सितंबर को आयोजित कांफ्रेंस में पंडित मदनमोहन मालवीय, तेज बहादुर सप्रू और डाॅ. आंबेडकर के भाषणों में अभिव्यक्त हुआ और जिसमें अछूत प्रथा के उन्मूलन और दलितों को शिक्षित करने आदि के संबंध में प्रतिबद्धता व्यक्त की गई थी, वह लंबे समय तक बना नहीं रह सका। जल्दी ही इस मामले में कई तरह के विवाद और मतविभिन्नताएं सामने आ गईं। डाॅ. आंबेडकर और कांग्रेस नेताओं के बीच डिप्रेस्ड क्लासेज को चिन्हित करने की प्रक्रिया के संबंध में मतभेद हो गए। यरवदा पैक्ट के उपबंध 2 और 3 में कहा गया था कि डिप्रेस्ड क्लासेज के लिए आरक्षित प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में पहले एक प्राथमिक चुनाव होगा, जिसमें डिप्रेस्ड क्लासेज के सभी मतदाता निर्वाचक मंडल का भाग होंगे और वे चार उम्मीदवारों के पैनल को चुनेंगे। इसके पश्चात, संयुक्त निर्वाचक मंडल, जिसमें डिपे्रस्ड क्लासेज व अन्य मतदाता दोनों शामिल होंगे, इस पैनल में से एक उम्मीदवार को चुनेंगे। यह व्यवस्था प्रांतीय व केन्द्रीय दोनों विधानमंडलों के चुनाव में लागू की जानी थी। परंतु हिन्दू मतदाता, अछूतों की कीमत पर यरवदा पैक्ट के प्रावधानों को लागू न करने के तरीके और बहाने ढू़ंढ़ने लगे। पैक्ट के उपबंध दो और तीन को लागू करने की प्रक्रिया के निर्धारण के लिए नियुक्त हेमण्ड समिति के काम शुरू करने के पहले ही उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि पैनल के लिए कम से कम चार उम्मीदवार उपलब्ध होने चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो प्राथमिक चुनावों सहित आरक्षित सीटोें पर चुनाव होना ही नहीं चाहिए। उनकी यह मांग भी थी कि सामान्य मतदाताओं को दो मत देने का अधिकार होना चाहिए। उन्हें सामान्य सीट के किसी एक उम्मीदवार के अतिरिक्त आरक्षित सीट के किसी एक उम्मीदवार को भी मत देने का अधिकार होना चाहिए। इसका अर्थ यह होता कि ऊँची जातियों के हिन्दुओं के अधिकांश मत डिप्रेस्ड क्लासेज के उस उम्मीदवार के पक्ष में जाते, जिसे वे सबसे ज्यादा पसंद करते और ऐसे मतों की संख्या, डिप्रेस्ड क्लासेज के मतदाताओं के मतों की संख्या से अधिक होती। डाॅ. आम्बेडकर ने इन दोनों प्रस्तावों का विरोध किया। हेमण्ड कमेटी ने पैक्ट के दोनों उपबंधों की डाॅ. आंबेडकर की व्याख्या को स्वीकार करते हुए यह कहा कि पैनल में अधिकतम, ना कि न्यूनतम, चार उम्मीदवार होंगे और सामान्य मतदाताओं को दो मत देने का अधिकार नहीं होगा। इसके बाद, चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहे कांग्रेस नेताओं ने यह नीति अपनाई कि वे ऐसे उम्मीदवार खड़े करेंगेे, जो उन एससी उम्मीदवारों को हरा सकें जो एससी के अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े होंगे। इस विश्वासघात से डाॅ. आंबेडकर को बहुत निराशा हुई और इसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘व्हाट कांग्रेस एंड हेव डन टू द अनटचेबिल्स’ (डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर, राईटिग्स एंड स्पीचिस खण्ड- 9, 1991 में पुनमुर्द्रित) मेें अभिव्यक्त किया है।

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अगर यरवदा पैक्ट के सभी प्रावधानों को ईमानदारी से लागू किया जाता तो यह संभावना बनती कि संसद और राज्य विधानमंडलों में ऐसे एससी उम्मीदवार चुनकर पहुंचते जो एससी की आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं के प्रति प्रतिबद्ध और उनके प्रति वफादार होते। अगर भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का भी राजनैतिक दलों द्वारा निष्ठा से क्रियान्वयन किया जाता तब भी इसके बेहतर नतीजे होते। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक दलों ने यह सुनिश्चित किया कि ऐसे एससी उम्मीदवार, जो इन वर्गों के साथ मजबूती से खड़े रहते, चुनाव हार जाएं। राजनैतिक दलों ने यह सुनिश्चित किया कि एससी के लिए आरक्षित सीटों से भी ऐसे उम्मदवार चुने जाएं जो उनके निर्देशानुसार काम करें। इससे अनुसूचित जातियों की संविधान में  आस्था को गहरी चोट पहुंची और समाज के एकीकरण और राष्ट्र को मजबूत बनाने की प्रक्रिया बाधित हुई। इन घिनौनी चालों का जो परिणाम हुआ वह इससे स्पष्ट है कि सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में दलितों के सबसे जुझारू नेताओं में से एक योगेन्द्र मकवाना को हार का सामना करना पड़ा।

आज देश के एससी, पृथक मताधिकार के प्रस्ताव को खारिज किए जाने निर्णय को गलत मानने लगे हैं। कुछ वर्ष पहले, कर्नाटक के श्री के हनुमंतथप्पा, जो कि पूर्व सांसद व अनुसूचित जातिं व जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं, ने पृथक मताधिकार के मुद्दे को फिर से उठाने पर विचार करने हेतु एक बैठक का आयोजन किया। श्री मकवाना और मैं इस बैठक में उपस्थित थे। इस बैठक को प्रेस ने बहुत हल्के में लिया। पूर्व सूचना के बाद भी इस कार्यक्रम को कवर करने के लिए कनिष्ठ रिपोर्टर भेजे गए। इस प्रस्ताव पर उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं हुई और अंततः इसे भुला दिया गया।

हमारा अनुभव यह बताता है कि पृथक मताधिकार की अवधारणा को पुनर्जीवित किया जाना व्यावहारिक नहीं है। इसे लागू करने के लिए संविधान संशोधन आवश्यक होगा। इसकी बहुत कम संभावना है कि वर्तमान या निकट भविष्य में कोई भी शासक दल इस आशय का संविधान संशोधन करने के लिए विधेयक संसद में प्रस्तुत करेगा। ना ही हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि इस तरह के संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक बहुमत उपलब्ध हो सकेगा। अगर ऐसा संशोधन कर भी दिया गया तब भी इसे न्यायपालिका से हरी झंडी मिलने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। न्यायपालिका इस तरह के प्रस्ताव को इस आधार पर खारिज कर देगी कि वह संविधान के मूल ढ़ांचे के अनुरूप नहीं है।

अब जो व्यवहारिक है वह यह है कि राजनैतिक दलों पर इस बात के लिए दबाव बनाया जाए कि वे लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों को खड़ा करें जो एससी व एसटी के अधिकारों के पक्ष में दृढ़़ हों। इसके लिए एससी और एसटी को लामबंद करना होगा और उनमें जागृति फैलाने के प्रयास करने होंगे। दलितों को लामबंद करने के प्रयासों में आने वाली समस्याओं के कई उदाहरण हैं। जैसे अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना और आदिवासी उपयोजना के विरोध के खिलाफ वंचित वर्गों को लामबंद करने के प्रयासों की असफलता। हाल में, ऊना में दलितों पर हुए अत्याचार के विरूद्ध लोगों को लामबंद करने के प्रयास भी बहुत सफल नहीं हुए। इन प्रदर्शनों के लिए कुछ हजार व्यक्ति ही जुटे और किसी भी मामले में इनकी संख्या दस हजार से अधिक नहीं थी। इसके विपरीत, अत्याचार निवारण अधिनियम के निरसन की मांग – जोे कि किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकती – व शक्तिशाली और वर्चस्वशाली ऊँची जातियों को ओबीसी में शामिल किए जाने के समर्थन में कुछ ऊँची जातियों द्वारा जो प्रदर्शन गुजरात और महाराष्ट्र में किए गए, उनमें भारी भीड़ उमड़ी। ये दोनों ही मांगें सामाजिक यथार्थ और संवैधानिक प्रावधानों के विरूद्ध हैं। इन दोनों राज्योें के विभिन्न शहरों में इन मुद्दों को लेकर जो रैलियां हुईं उनमें दसियों हजार व्यक्तियों ने भाग लिया और कुछ में तो प्रदर्शनकारियों की संख्या दो लाख से भी अधिक थी। संसाधनाें और जागृति के अभाव में जो समस्याएं एससी व एसटी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को लागू करवाने के पक्ष में इन समुदायों के व्यक्तियों को लामबंद करने में पेश आती हैं, ये उसके कुछ उदाहरण हैं। इन दोनोें समस्याओं को दूर करने के बाद ही एससी और एसटी को राजनैतिक सत्ता में अपना वाजिब हक मिल सकेगा और वे विकास के फल का स्वाद चख सकेंगे। जब तक यह नहीं हो जाता तब तक एससी और एसटी के अधिकार उन्हें प्रदत्त किए जाने के पक्ष में अधिकतम दबाव बनाने की जरूरत है। उन्हें सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों के समकक्ष लाने और अपमान और अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए यह आवश्यक है। ऐसा करने के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितयां उपलब्ध हैं परंतु उनका समझदारी से उपयोग किया जाना होगा।

ये परिस्थितियां कुछ कारकों से निर्मित हुई हैं। इनमें से एक है एससी व एसटी में छोटे ही सही परंतु एक मजबूत शिक्षित मध्यमवर्गीय तबके का उभार। यह तबका आरक्षण की नीति और सामाजिक न्याय स्थापित करने के उद्देश्य से लागू की गई योजनाओं के चलते उभरा है। दूसरा कारक है एससी की चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता। कुछ राज्यों में बहुमत में न होते हुए भी वे चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने की स्थिति में हैं। परंतु यह तभी हो सकता है जब ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में एससी-एसटी में उनके अधिकारों व उनके लिए निर्धारित लाभों के संबंध में न केवल जागृति उत्पन्न की जाए वरन् उन्हें यह भी बताया जाए कि वे राजनैतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को किस तरह यह अहसास दिला सकते हैं कि उनके समर्थन के बगैर चुनावों में विजय आसान नहीं होगी। यह काम इन वर्गों के शिक्षित मध्यमवर्ग को तो करना ही होगा, इसके साथ ही उन लोगों को भी इसमें हाथ बंटाना होगा जो सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं और देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था को और अधिक सार्थक बनाना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त, यह भी आवश्यक है कि एससी की विभिन्न जातियों के बीच परस्पर प्रतिद्वंद्विता समाप्त की जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एससी वर्गों में पूर्ण एकता आवश्यक है। इसमें एक समस्या है। एससी की विभिन्न जातियों के विकास का स्तर अलग-अलग है और तदानुसार, आरक्षण और अन्य योजनाओं का लाभ लेने की उनकी क्षमता भी अलग-अलग है। इसके कारण उनके बीच उत्पन्न होने वाले परस्पर वैर-भाव को एससी की विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों और नेताओं को दूर करना होगा।

यद्यपि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लगभग एक-चौथाई सदस्य एससी-एसटी हैं तथापि दलितों और आदिवासियों के एक बड़े वर्ग की मान्यता है कि वे उनके हितों की रक्षा करने में उतने सक्षम व प्रभावी सिद्ध नहीं हो सके हैं, जितने कि हो सकते थे। यह कहना गलत होगा कि वे पूर्णतः अप्रभावी हैं। उनमें से कुछ, एससी और एसटी से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं और कई इन वर्गों की बदहाली के प्रति चिंतित और संवेदनशील हैं। परंतु समस्या यह है कि लोकसभा व विधानसभाओं के एससी-एसटी सदस्यों की आवाज उनकी ही पार्टियों के संसदीय और विधायक दलों में सुनी नहीं जाती। उनकी भूमिका बहुत सीमित है। इसके अतिरिक्त, कई मामलों में जब इन वर्गों के सदस्य पर्याप्त अनुभव प्राप्त कर लेते हैं और वे समझने लगते हैं कि एससी और एसटी की बेहतरी के लिए कौन-से कदम उठाए जाने चाहिए, तब उन्हें पार्टियां अपना उम्मीदवार नहीं बनातीं और उनकी जगह ऐसे नए लोगों को नामांकित करती हैं जिन्हें नए सिरे से चीजों को सीखना और समझना  पड़ता है। इसके अतिरिक्त, पार्टियां सामान्यतः आरक्षित सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों को खड़ा करने से परहेज करती हैं जो मजबूती से और बिना किसी लाग-लपेट के एससी-एसटी के अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाते हैं। यहां मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि एससी-एसटी सदस्यों की संसद और राज्यों के विधानमंडलों में एक-चौथाई उपस्थिति नहीं है। इसका कारण यह है कि राज्यसभा और विधानपरिषदों में उनके लिए आरक्षण नहीं है। इस कारण उच्च सदनों में एससी-एसटी की उपस्थिति न के बराबर है। इस समस्या का व्यावहारिक समाधान मैंने उपर के अनुच्छेदों में वर्णित किया है।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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