दलित-बहुजनों के लिए आर्थिक न्याय के उपाय और वामपंथी नजरिया

भारतीय संदर्भ में उपयोगी भूमिका निभाने के लिए वामपंथियों को मार्क्सवाद की देश के यथार्थ के अनुरूप व्याख्या करनी चाहिए थी। मार्क्स को आंबेडकर के साथ जोड़ा जाना चाहिए था। वामपंथियों ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज किया कि भारत के अधिकांश दमित और शोषित व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक न्याय कैसे मिल सकता है। साथ ही यह भी कि वामपंथी पार्टियां किन कारणों से अबतक इन समुदायों की समस्याओं को समझ नहीं सकी हैं)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 24

  • वासंती देवी

वासंती देवी : प्रगतिशील ताकतें लंबे समय से ‘भूमि जोतने वाले की‘ का नारा देती आई हैं। उनका कहना है कि एससी व निम्न पिछड़े वर्गों के भूमिहीन परिवारों को खेती की जमीन उपलब्ध करवाने से इन वर्गों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में जबरदस्त सुधार होगा। क्या ऐसा करना वांछनीय और संभव है? क्या बड़ी संख्या में भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध करवाने के लिए पर्याप्त खेती-योग्य भूमि उपलब्ध है? वर्तमान में कृषि संकट के दौर से गुजर रही है और हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में क्या यह एक व्यवहार्य हल होगा या फिर देश का तेजी से औद्योगिकीकरण इस समस्या को सुलझाने का बेहतर उपाय है? कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों काम एक साथ भी किए जा सकते हैं।

भारत की अधिकांश आबादी – लगभग 68 प्रतिशत – गांवों में रहती है। एससी में ग्रामीणों का प्रतिशत और अधिक है और एसटी में सबसे ज्यादा है। फिर, कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जिन्हें भले ही तकनीकी दृष्टि से शहरी कहा जाता हो परंतु वे मूलतः ग्रामीण हैं। यद्यपि देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा कम हुआ है तथापि भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब भी खेती पर निर्भर है। भारत को एक वास्तविक शहरी राष्ट्र बनने में काफी समय लगेगा। ग्रामीण समाज में किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत, उसके मालिकाना हक की भूमि के आकार पर तो निर्भर करती ही है, वह इस पर भी निर्भर करती है कि उसकी भूमि सिंचित है अथवा नहीं। यही कारण है कि जिन जातियों के अधिकांश सदस्य भूमिहीन हैं उनकी सामाजिक हैसियत भी नीची है। इनमें मुख्यतः एससी और कुछ ओबीसी जातियां शामिल हैं। मैंने पाया है कि भूमिहीन जातियों में भी जिन व्यक्तियों या परिवारों के पास स्वयं की भूमि है, उनकी हैसियत अन्यों से कुछ बेहतर है। इस सिलसिले में मैंने पहले ही आंध्र प्रदेश के इरागमपल्ली गांव के श्री माला नरसैया का उदाहरण दिया है।

एससी के अधिकांश सदस्यों के भूमिहीन होने के पीछे अछूत प्रथा, उससे उत्पन्न भेदभाव और उन पर किए जाने वाले अत्याचार हैं। अछूत प्रथा और एससी पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त करने और इन वर्गों की सामाजिक हैसियत को सुधारने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक भूमिहीन एससी परिवार को कम से कम इतनी खेती-योग्य भूमि उपलब्ध करवाई जाए, जिससे उनका जीवनयापन हो सके। उन्हें आवंटित की जाने वाली भूमि में सिंचाई की व्यवस्था की जानी भी आवश्यक है। जैसा कि मैंने पहले कहा है, राज्यपालों की एक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि देश में इतनी भूमि उपलब्ध है जिससे सभी भूमिहीन एससी परिवारों को उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त खेती-योग्य भूमि उपलब्ध करवाई जा सके।

इस मामले में हर गांव में स्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। कुछ मामलों में, पूर्व तैय्यारी के साथ और लोगों की सहमति से, भूमिहीनों को ऐसे इलाकों में बसाया जा सकता है, जहां उन्हें आवंटित करने हेतु पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो। इसमें ऐसी बंजर भूमि भी शामिल हो सकती है, जिसे खेती-योग्य बनाया जा सकता है। चीन की सरकार अपने गरीबी-उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत एक योजना संचालित करती है, जिसमें कठिन व दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को ऐसे क्षेत्रों में बसाया जाता है, जहां बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हों। जैसा कि में पहले भी बता चुका हूँ, इसके लिए भूदान ज़मीनें भी उपलब्ध हैं। मंदिरों की भूमि को नीलामी के ज़रिये खेती के लिए किराये पर दिया जाता है व अधिकांश मामलों में, यह भूमि गांवों के भूस्वामी श्रेष्ठी वर्ग के कब्ज़े में चली जाती है। इसकी जगह, इस भूमि को एससी व कमज़ोर पिछड़े वर्गों के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों को किराये पर दिया जा सकता है। भूमिहीनों को आवंटन हेतु ज़मीन खरीदी भी जा सकती है। दलितों में भूमिहीनता को समाप्त करना या बहुत कम करना निश्चित रूप से संभव है। इस सम्बन्ध में राज्यपालों की समिति के निष्कर्षों को आंध्र प्रदेश की रंगाराव समिति ने पुष्टि की है। केरल, देश में सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है. ऐसी सामान्य धारणा है कि केरल में एससी व अन्य भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों को आवंटित करने के लिए ज़मीन उपलब्ध ही नहीं है। सच यह है कि राज्य में लगभग 60,000 एकड़ बागानों की ऐसी भूमि है, जिसकी लीज की अवधि समाप्त हो चुकी है। इस भूमि को सरकार ले सकती है और उसे लेना भी चाहिए। इस ज़मीन को पारंपरिक रूप से भूमिहीन ग्रामीण एससी परिवारों, ऐसे एसटी ग्रामीण भूमिहीन परिवारों, जिनकी ज़मीनों पर बड़े पैमाने पर गैरक़ानूनी कब्ज़ा कर लिया गया है और अन्य ग्रामीण भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में वितरित किया का सकता है। नवम्बर 2016 की अपनी केरल यात्रा के दौरान मैंने पाया कि वहां पांच लाख एकड़ से अधिक बागानों की ऐसी भूमि है, जिसकी लीज की अवधि समाप्त हो चुकी है और जो टाटा और हैरिसन जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के कब्ज़े में है। इस भूमि को भी सरकार अपने आधिपत्य में लेकर, उसे वितरित कर सकती है। यदि गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की ज़मीनों के क्रय या उन पर कब्ज़ा करने को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों और नियमों को उचित ढंग से और दृढ़तापूर्वक लागू किया जाय। तो इससे एसटी को उनकी खोई हुई भूमि वापस मिल सकती है और केरल व अन्य राज्यों में आदिवासियों में भूमिहीनता की समस्या का काफी हद तक निवारण किया जा सकता है। इस गंभीर समस्या का स्थायी हल निकालने के लिए, भारत सरकार को अपनी आर्थिक संसाधनों का प्रयोग करते हुए एक व्यापक कार्यक्रम शुरू करना चाहिए। अगर केंद्र सरकार इस काम के लिए आगे नहीं आती तो राज्य सरकारों को अपने स्तर पर यह काम करना चाहिए। मैंने इसके लिए टास्क फोर्स प्रणाली अपनाने की सलाह दी है, जो संक्षेप में इस प्रकार होगी:

पूर्व आईएएस अधिकारी पी.एस. कृष्णन

प्रत्येक ताल्लुक/तहसील/मंडल में एक तहसीलदार, एक सर्वेक्षणकर्ता व अन्य सक्षम प्राधिकारियों का दल बना कर, उसे वाहन इत्यादि जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाने चाहिए। यह दल, प्रत्येक गाँव में जाकर, हर एससी परिवार को निम्न तरीकों से भूमि उपलब्ध करवाए।

(1) सभी सरकारी ज़मीनों जैसे खाली पड़ी भूमि/गैर-मज़रुआ-आम (व निजी स्वामित्व वाली को छोड़कर अन्य सभी ज़मीनों) व भूदान भूमि का आकलन करे, जिन्हें तुरंत एससी परिवारों व अन्य भूमिहीन गरीब कृषि श्रमिक परिवारों को आवंटित किया जा सकता है।

(2) उन एससी व अन्य भूमिहीन कृषि श्रमिकों को इस सरकारी भूमि का पट्टा दे, जो उस पर खेती कर रहे हैं(

(3) सरकारी भूमि के अपात्र कब्जाधारियों से ज़मीन को मुक्त करवाकर, उन्हें इन ज़मीनों का पट्टा देकर उन्हें उस पर कब्ज़ा दिलाये।

मैंने यह अनुशंसा भी की है कि जहाँ सार्वजनिक भूमि पर्याप्त न हो, वहां एससी परिवारों में वितरण के लिए निजी भूमि भी खरीदी जा सकती है. भूमि अधिग्रहण के ज़रिये भी ज़मीन उपलब्ध करवाई जा सकती है. मैंने यह सुझाव भी दिया है कि इसके लिए भूमि अधिग्रहण व पुनर्वास अधिनियम 2013 में एक छोटा-सा संशोधन कर, एससी की भूमिहीनता को दूर करने को भी ‘सार्वजनिक उद्देश्यों’ की परिभाषा में सम्मलित किया जा सकता है। एससी के अलावा, सभी एसटी व अन्य निर्धन भूमिहीन खेतिहर श्रमिक परिवारों को भी उनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त खेती-योग्य भूमि उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।

एससी के मालिकाना हक वाले सभी खेतों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। इसके लिए, राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक लघु सिंचाई कार्यक्रम चला कर,  ट्यूबवेल, बोरवेल, सामुदायिक ट्यूबवेल, सामुदायिक बोरेवेल, बंधेरा आदि का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

एससी व एसटी को खेती के लिए ज़मीन उपलब्ध करवाने और उनके खेतों के लिए सामूहिक लघु सिंचाई योजनाओं के ज़रिये सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करवाने का वायदा, राष्ट्रपति ने सन 2004 में संसद के संयुक्त अधिवेशन में दिए गये अपने अभिभाषण में किया था। यह यूपीए सरकार द्वारा अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में मेरी सलाह और प्रयासों से इस आशय का संकल्प व्यक्त किये जाने के परिप्रेक्ष्य में किया गया था। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान भी ‘ज़मीन जोतने वाले की’ के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त के गयी थी।

यह सही है कि वर्तमान में कृषि क्षेत्र संकट के दौर से गुज़र रहा है। परन्तु इसके कारण, दलितों की भूमिहीनता को दूर करने के प्रयास बंद करने की ज़रुरत नहीं है। इन दोनों मुद्दे पर एक साथ ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है। मैंने यह बात कई बार वर्तमान और पूर्व सत्ताधारी राजनैतिक दलों और गठबंधनों के नेताओं के समक्ष मजबूती से रखी है। यह सचमुच खेदजनक है कि राष्ट्रपति के संसद के संयुक्त अधिवेशन में किये गए वायदे को भी सरकारों ने नहीं निभाया।

देश का तीव्र गति से औद्योगीकरण, भारत की सरकारों के एजेंडे पर हमेशा से रहा है और है. परन्तु यह दलितों में भूमिहीनता की समस्या से निपटने के महत्वपूर्ण मिशन का विकल्प नहीं हो सकता। तकनीकी विकास के कारण हम आज ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि विकास से भी रोज़गार में वृद्धि नहीं हो रही है। नए उद्योग खुल रहे हैं परन्तु उनसे रोज़गार के अवसरों में इजाफा नहीं हो रहा है।

दलितों, आदिवासियों और ओबीसी में एका बनाने को भूमिहीनता को दूर करना जरूरी

वासंती देवी : आज भारत के कई हिस्सों में ओबीसी वर्चस्वशाली और दलित-पीड़क बन गए हैं. यह विशेषकर भूस्वामी पिछड़ी जातियों के बारे में सही है। तमिलनाडू में तो पारंपरिक भूस्वामी जातियों के सदस्य अपनी ज़मीनें पिछड़े वर्गों को बेच कर शहरों में बस गए हैं। अगर अब मुख्य संघर्ष एससी और पिछड़े वर्गों में है तो उसे कैसे समझा जाये और उसका क्या हल हो?

क्या आपको ऐसा लगता है कि एससी और निम्न ओबीसी को एक होकर, उच्च ओबीसी और अन्य जातियों के विरुद्ध गठबंधन बनाना चाहिए? जब हमारे देश में जाति किसी व्यक्ति की मुख्य पहचान है तब क्या गरीब एक वर्ग के तौर पर एक हो सकते हैं? क्या निर्धन वर्ग की एकता, जाति प्रथा का निषेध होगा?

पी.एस. कृष्णन : ग्रामीण भारत में मुख्य संघर्ष एससी व ओबीसी की बीच नहीं वरन प्रमुख भूस्वामी जातियों और एससी के बीच है। ‘प्रमुख भूस्वामी जातियों’ से मेरा आशय है, अधिकांश भूस्वामी व्यक्तियों या परिवारों की जाति या जातियां। दूसरे शब्दों में, उन व्यक्तियों की जाति, जो अधिकांश भूमि के मालिक हैं।  ये जातियां अगड़ी भी हो सकती हैं और पिछड़ी भी। यह आवश्यक नहीं है कि इन जातियों के सभी सदस्य भूस्वामी हों। इनमें से कुछ खेतिहर श्रमिक भी हो सकते हैं। परन्तु जाति के अपवित्र बंधन के चलते, हर क्षेत्र की भूस्वामी जातियां अपने जाति के भूमिहीनों का समर्थन हासिल करने में भी कामयाब हो जाते हैं।

एससी व ओबीसी की गैर-भूस्वामी जातियों जैसे हस्तशिल्पियों और मछुआरों के हितों में कोई टकराव नहीं है। हर क्षेत्र के एससी भूमिहीन, खेतिहर श्रमिक होने के कारण, उस क्षेत्र की प्रमुख भूस्वामी जाति या जातियों की कृपा पर निर्भर होते हैं। वे अपने जीवयापन की लिए भूस्वामियों पर निर्भर होते हैं। ऐसी स्थिति में, यह ज़रूरी है कि एससी की इस मजबूरी को समाप्त किया जाये। हर गांव के प्रत्येक एससी परिवार को उसके जीवयापन के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध करवना और उनके लिए सामूहिक लघु सिंचाई योजनाओं की व्यवस्था करना ही इस समस्या का हल है। इससे एससी का सशक्तिकरण होगा और वे अपने जीवनयापन के स्त्रोत को खोने के डर के बिना, मजबूती से अपनी गरिमा और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष कर सकेंगे। एससी ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते उन्हें ज़मीन उपलब्ध करवाकर उन्हें सशक्त बनाया जाये।

दलित भूमिहीनता के संपूर्ण निवारण के लिए यह ज़रूरी है कि अन्य भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों को भी खेती की ज़मीन उपलब्ध करवाई जाए। ‘अन्य भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों’ में से अधिकांश कमज़ोर ओबीसी जातियों के हैं, जिनका एससी से हितों का कोई टकराव नहीं हैं। अगर उनकी भूमिहीनता समाप्त हो जाती है तो इससे दोनों के बीच एक गठजोड़ स्थापित होगा और सदियों से भूमिहीन दलित खेतिहर श्रमिकों और भूमिहीन गैर-दलित खेतिहर श्रमिकों के बीच खड़ी दीवार ढह जाएगी। थातिचेर्ला/थाल्लाल्केरा का जो उदहारण मैंने पहले दिया है, वह इस सम्भावना की ओर इंगित करता है। कुछ गैर-एससी भूमिहीन खेतिहर श्रमिक परिवार, सम्बंधित गांव/ इलाके/क्षेत्र की प्रमुख भूस्वामी जातियों से आते हैं। उन्हें इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाने से उनके व भूस्वामी जातियों के बीच का जाति-आधारित अतार्किक, असामाजिक व राष्ट्र-विरोधी गठबंधन भी समाप्त हो सकेगा। मैं यह नहीं कहता कि इससे समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी परन्तु इससे निश्चित तौर पर बड़ी संख्या में गांवों को इस समस्या से मुक्त करने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही, कानूनों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए और सभी एससी को सुरक्षा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। हाल ही में संसद द्वारा पारित एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015 के अंतर्गत किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में यह आशंका हो कि वह एससी या एसटी पर अत्याचार कर सकता है, का ऐसे क्षेत्र में प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है, जिसे ऐसे क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया हो जहां एससी और एसटी पर अत्याचार होने की संभावना हो। पहले ऐसा केवल अनुसूचित क्षेत्रों या आदिवासी क्षेत्रों के मामलों में किया जा सकता था। इस प्रावधान का विस्तार अन्य चिन्हित क्षेत्रों में किए जाने से पूरे देश में दलितों को बेहतर सुरक्षा देना संभव हो गया है, विशेषकर ऐसे इलाकों में, जहां सिंचित भूमि का मालिक होने के बावजूद उनकी स्थिति कमजोर बनी हुई है।

जिन लोगों को इस प्रावधान के अंतर्गत किसी क्षेत्र से निर्वासित किया जाता है, वे सचमुच ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति होने चाहिए जो अपनी जाति के गुंडों या अन्य गुर्गों के जरिए दलितों को निशाना बनाते हैं। ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति स्थानीय नेता हो सकते हैं, क्षेत्रीय नेता या किसी राजनैतिक दल के राष्ट्रीय नेता भी। मैंने कई ऐसे राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को देखा है जो राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर तो अत्यंत मृदु व उदार व्यवहार करते हैं परंतु अपने गांव या जिले में पहुंचते ही दमनकारी और जातिवादी नेता बन जाते हैं। कई ऐसे ताकतवर व्यक्ति भी दलितों पर अत्याचार करते हैं जो स्वयं तो नेता नहीं होते, परंतु किसी राजनैतिक दल के स्थानीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय नेता का वरदहस्त उन्हें प्राप्त होता है। किसी राजनैतिक दल से उनका जुड़ाव, विचारधारा या सिद्धांत पर आधारित नहीं होता। उनकी वफादारियां भी बदलती रहती हैं और अक्सर वे अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए उस पार्टी के साथ हो लेते हैं जो सत्ता में हो। इस कानून को ऐसे लोगों के विरूद्ध सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि सत्ताधारी दल और मुख्य विपक्षी दल भी इस तरह के व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही करने के पक्ष में नहीं होते। उन्हें कानून-सम्मत कार्यवाही करने के लिए मजबूर करने हेतु उन पर दबाव बनाया जाना चाहिए। यह काम पीड़ित दलितों व उनके न्यायपूर्ण व कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वालों को शांतिपूर्वक लामबंद कर बनाया जा सकता है। यदि दलित-पीड़क नेताओं की जाति के भूमिहीन कृषि श्रमिकों को भी भूमि उपलब्ध करवा दी जाएगी तो उससे इस तरह के जातिवादी नेता अलग-थलग पड़ जाएंगे और उन्हें गुर्गे और समर्थक नहीं मिल सकेंगे। इससे इन नेताओं के लिए यह शोर मचाना भी संभव नहीं रह जाएगा कि उनकी जाति पर हमला हो रहा है और वे इस झूठे नारे के आधार पर अपनी जाति के निर्धन व्यक्तियां को दलितों के विरूद्ध भड़काने में कामयाब नहीं हो सकेंगे।

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है, एससी और कमजोर ओबीसी अर्थात ओबीसी की भूमिहीन जातियों और यहां तक कि एससी और भूस्वामी जातियों के भूमिहीन परिवारों के बीच भी हितों का कोई टकराव नहीं है। अतः उनका सामाजिक गठबंधन बनाना संभव है। परंतु यह गठबंधन ऐसा नहीं होना चाहिए जिसे भूस्वामी ओबीसी या अगड़ी जातियां अपना शत्रु समझने लगें। जिस कदम की चर्चा मैंने ऊपर की है और इसी तरह के अन्य कदमों से दलितों के अलावा भूस्वामी ओबीसी जातियां और अगड़ी जातियों के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों को सशक्त कर ऐसे व्यक्तियों और परिवारों को अलग-थलग और कमजोर किया जा सकता है, जो जाति के नाम पर दलितों के विरूद्ध समर्थन जुटाते हैं। यह सामाजिक गठबंधन किसी जाति या जातियों के खिलाफ नहीं होगा बल्कि उन व्यक्तियों और परिवारों के खिलाफ होगा जो जाति के नाम पर भूमिहीन गरीबों का मोहरों की तरह इस्तेमाल करते हैं।

यहां मैं एक भाषा संबंधी प्रश्न पर भी कुछ कहना चाहूंगा। मेरी राय में इस मुद्दे को जाति बनाम वर्ग का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। हमारे संविधान में ‘वर्ग’ शब्द का प्रयोग सामाजिक वर्गो के संदर्भ में किया गया है। उदाहरण के लिए, संविधान के भाग 16 का शीर्षक है “कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध”। इस भाग में अनुच्छेद 330 से 342 तक शामिल हैं। इन अनुच्छेदों में एससी व एसटी के अनुसूचीकरण, उनके लिए आरक्षण और पिछड़े वर्गों की दशा के अन्वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति व एससी व एसटी राष्ट्रीय आयोगों की स्थापना आदि के संबंध में प्रावधान हैं। इस तरह एससी, एसटी व ओबीसी हमारे संविधान के संदर्भ में ‘वर्ग’ हैं। उच्चतम न्यायालय ने सन् 1968 में माईनर पी. राजेन्द्रन बनाम तमिलनाडू प्रकरण में अपने निर्णय में इस तथ्य का संज्ञान लेते हुए कहा था कि “जाति एक वर्ग भी है”। यह निर्णय, ओबीसी विधिशास्त्र में मील का पत्थर था। जाति और वर्ग के बीच के विभेद को समझने में असमर्थता के पीछे है उत्तर-सामंती औद्योगिक यूरोप के आर्थिक वर्गों पर आधारित समाजों के विश्लेषण को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना। भारत में आर्थिक वर्ग विभिन्न जातियों में समाहित हैं। मैंने अपने शोधपत्रों और मेरी पुस्तक ‘एम्पावरिंग दलितस फॉर एम्पावरिंग इंडिया:  ए रोड मैप (मानक पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2009) में जातियों के सामाजिक वर्गों और आर्थिक वर्गों/श्रेणियों के घालमेल का विश्लेषण निम्नांकित रेखाचित्र के जरिए किया था।

इसके साथ ही यह भी सच है कि जातियों की विभिन्न परतें, आर्थिक वर्गों से एकदम मेल नहीं खातीं। जैसे, एससी जातियों में मुख्यतः खेतिहर श्रमिक शामिल हैं व इसी तरह अन्य जातियों की भी अपनी विशिष्टाएं हैं। परंतु प्रत्येक जाति में अलग-अलग आर्थिक वर्ग भी हैं। एससी में राज्य की नीतियों के कारण – विशेषकर संविधान के लागू होने के बाद – एक छोटा शिक्षित मध्यम वर्ग उभरा है। सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों में पूंजीवादी निवेशक, सूक्ष्म व छोटे उद्यमी, मध्यमवर्गीय पेशेवर और महत्वाकांक्षी निम्न मध्यम वर्ग शामिल हैं। ऐसी स्थिति में समाज को न्यायपूर्ण आधार पर पुनगर्ठित करने के लिए यह जरूरी है कि दलितों, आदिवासियों और कमजोर ओबीसी पर विशेष ध्यान देकर उन्हें सशक्त किया जाए और इस दिशा में उठाए जाने वाले कदम यथासंभव ऐसे हों जिनसे उन लोगों को एकसाथ लाया जा सके जिनके आर्थिक हितों में कोई टकराव नहीं है और जिनके हितों मे कुछ समानताएं हैं। यही एक तरीका है जिससे हम उस चक्रव्यूह से निकल सकते हैं जिसे भारतीय जाति व्यवस्था ने निर्मित किया है। और इसके साथ ही इस यथार्थ को भी ध्यान में रख सकते हैं कि विभिन्न जातियां में ऐसे सामाजिक वर्ग हैं जिनके अधिकांश सदस्य वंचित और शोषित हैं।

वामपंथी दलों ने नहीं समझा भारतीय सामाजिक व्यवस्था और इसकी खामियों को

वासंती देवी : वामपंथी दलों की अक्सर इस आधार पर आलोचना की जाती है कि वे इस यथार्थ को स्वीकार नहीं कर सके हैं कि जाति, भारतीय समाज के केन्द्र में है. जाति के संबंध में वामपंथियों की सोच पर आपका क्या कहना है? क्या आपको लगता है कि भारत में वामपंथी यदि अपने पारंपरिक गढ़ों से बाहर अपना प्रभाव नहीं बढ़ा सके हैं तो उसका कारण जाति को स्वीकार करने व समझने में उनकी विफलता है. क्या वामपंथियों को मार्क्सवाद की भारत के संदर्भ में पुनर्व्याख्या करनी थी?

भारत में जो सामाजिक-आर्थिक स्थितियां हैं उनमें वामपंथ को शक्तिशाली राजनैतिक ताकत के रूप में उभरना था। परंतु जिन इलाकों में सामाजिक-आर्थिक स्थितियां उनके लिए सबसे अनुकूल हैं, वहीं वामपंथी पार्टियां सबसे कमजोर हैं। मुझे लगता है कि इस विश्लेषण में कुछ दम है कि वामपंथियों ने भारत में एक शक्तिशाली राजनैतिक बल बनने का अवसर इसलिए खो दिया क्योंकि वे भारत की जाति और अछूत प्रथा के सामाजिक यथार्थ और उसकी दमनकारी शक्ति को नहीं समझ सके। वामपंथियों ने जाति को अधिरचना का भाग मान लिया जबकि सच यह है कि जाति और अछूत प्रथा, दमन, शोषण और वंचना के मुख्य ढ़ांचे की नींव है और इस दमन, शोषण और वंचना के मुख्य शिकार हैं दलित और कमजोर ओबीसी, जो मुख्यतः ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। यही, कुछ परिवर्तनों के साथ शहरी क्षेत्रों में भी हो रहा है। वामपंथियों ने जाति प्रथा के इस महत्वपूर्ण पक्ष को कभी स्वीकार नहीं किया। मार्क्सवाद हमें जो मूल्यवान शिक्षा देता है वह यह है कि हम समाज को विभिन्न हितों के संदर्भ में देखें, उसमें मुख्य विरोधाभासों को चिन्हित करें और दमितों का समर्थन करें। मार्क्सवादी सूत्रीकरण ने जाति को संज्ञान में ही नहीं लिया क्योंकि जिन समाजों से मार्क्सवाद परिचित था, वहां जाति थी ही नहीं। भारतीय संदर्भ में उपयोगी भूमिका निभाने के लिए वामपंथियों को मार्क्सवाद की देश के यथार्थ के अनुरूप व्याख्या करनी चाहिए थी। मार्क्स को आंबेडकर के साथ जोड़ा जाना चाहिए था। वामपंथियों ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज किया कि भारत के अधिकांश दमित और शोषित व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इसकी जगह, वामपंथियों का पूरा ध्यान संगठित क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के एक बहुत छोटे से हिस्से पर रहा। अगर मार्क्सवाद की व्याख्या भारतीय सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखते हुए की गई होती तो ग्रामीण भारत के अधिकांश दलित व गैर-दलित खेतिहर व अन्य श्रमिक वामपंथियों के झंडे तले होते और वामपंथी दलों के क्षेत्रीय व राष्ट्रीय नेतृत्व में दलित और कमजोर ओबीसी जातियों के नेता शामिल होते. यह नहीं हुआ।

हाल में, पूरे देश, और विशेषकर अपने गढ़ बंगाल में, भारी नुकसान उठाने के बाद, शायद वामपंथियों को यह समझ आया है कि वे कहां गलत थे और वे अपनी गलती को सुधारना का यत्न कर रहे हैं। वे यह काम निरंतरता के साथ किस हद तक और कब तक कर पाते हैं, यह देखना अभी बाकी है।

ऐसा कहा जाता है कि प्रजातंत्र के लिए लगभग समान प्रभाव वाले कम से कम दो राजनैतिक दलों की ज़रुरत होती है। भारत जैसे विशाल देश को, लगभग समान प्रभाव वाले कम से कम तीन राजनैतिक दलों की ज़रुरत है। भारत में आज जो हालात है, उनमें वामपंथी निश्चित रूप से इन तीन में से एक दल हो सकते हैं और यह वांछनीय भी है कि वामपंथी, राष्ट्रीय राजनीति का एक स्तम्भ बनें। परन्तु ऐसा होगा या नहीं और अगर होगा तो कब तक, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे किस हद तक और कब तक दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को न्याय दिलवाने की पहल को अपनी राजनीति के केंद्र में रख पाते हैं।

पूंजीवाद और दलित उद्यमिता

वासंती देवी : कुछ दलित बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि पूंजीवाद और उसका ताज़ा स्वरुप नव-उदारवाद, दलितों की मुक्ति की राह प्रशस्त करेगा और इसलिए उनमें उद्यमिता को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। कुछ अन्य बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि पूंजीवाद हमेशा दमितों के हितों को चोट पहुंचता है। उद्यमिता से शायद कुछ दलित आर्थिक वंचना से बहार निकल सकें परन्तु इससे आम दलित, दमन के एक नए स्वरुप के शिकार हो जायेगें. आपका इस बारे में क्या विचार है?

पी.एस. कृष्णन : दलितों की मुक्ति और उनकी गरिमा की लड़ाई बहुआयामी होने चाहिए। जो दलित खेतिहर श्रमिक हैं, जो गरीब किसान हैं, जो हस्तशिल्पी हैं, जो हाथ से मैला साफ़ करने पर मजबूर हैं, और जो शिक्षित हैं – उन सभी के लिए योजनाएं और कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। ऐसा नहीं हैं कि इनमें से किसी एक के चलाई जाने वाली योजना, दूसरे का विकल्प हो सकती है। यह बात छठी पंचवर्षीय योजना 1980 के लिए एससी के विकास पर कार्यकारी समूह की रपट में कही गयी थी। इस समूह का अध्यक्ष मैं था और यह इस विषय पर कार्यकारी समूह की पहली रपट थी।

कुछ शिक्षित एससी उद्यमी बन सकते हैं और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। परन्तु यह राह बहुत कम दलित परिवारों को उपलब्ध है। अधिकांश दलित परिवार गांवों और गांव-नुमा कस्बों में रहते हैं, जहां वे या तो खेतिहर श्रमिक हैं या फिर रोजाना कमाने-खाने वाले मजदूर। यह स्थिति निकट भविष्य में बनी रहेगी और इसमें किसी ख़ास परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में उद्यमिता, जो कि निश्चित रूप से वांछनीय और दलितों के एक छोटे हिस्से के लिए उपयुक्त है, आम दलितों की समस्याओं का हल नहीं हो सकती।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

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