ओबीसी में शामिल हों अज़लाफ़ व अरज़ाल मुसलमान : पी.एस. कृष्णन

सच्चर समिति ने अपनी रपट के अध्याय दस में यह अनुशंसा की है कि सभी अज़लाफ़ व अरज़ाल मुस्लिम जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया जाए। यह उचित और व्यावहारिक है

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि अज़लाफ़ और अरज़ाल मुसलमान जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से बहुत पिछड़े हैं, उन्हें विकास की मुख्यधारा में कैसे लाया जा सकता है)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 23

  • वासंती देवी

वासंती देवी : सच्चर समिति, एनएसएसओ व अन्य रपटों से यह सामने आया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व विकास के अन्य सूचकांकों के मान से, मुसलमानों की स्थिति एससी से भी खराब है। वर्तमान में देश में जिस तरह का साम्प्रदायिक वातावरण व्याप्त है, उसके चलते क्या आपको लगता है कि मुसलमानों की स्थिति में बेहतरी की कोई उम्मीद की जा सकती है?

पी.एस. कृष्णन : सच्चर समिति ने विभिन्न मानकों पर मुसलमानों की कमजोर स्थिति को देश के सामने रखा। कुल मिलाकर, सच्चर समिति का निष्कर्ष यह है कि मुसलमानों की स्थिति एससी और एसटी से थोड़ी ही बेहतर है। अपने निष्कर्षों के आधार पर सच्चर समिति ने अपनी रपट के अध्याय दस में यह अनुशंसा की है कि सभी अज़लाफ़ व अरज़ाल मुस्लिम जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया जाए। यह काम काफी हद तक समिति की रपट आने के पूर्व ही किया जा चुका था। अज़लाफ़ श्रेणी में मुसलमानों की ऐसी ‘नीची जातियां‘ शामिल हैं, जिन्हें अछूत नहीं माना जाता। मोटे तौर पर वे निम्न हिन्दू जातियों, जिन्हें शूद्र कहा जाता है, के समकक्ष हैं। मुसलमानों के एक छोटे से तबके में वे जातियां हैं जिन्हें एससी की तरह अछूत माना जाता है। इन जातियों को सामूहिक रूप से अरज़ाल कहा जाता है और यह एक अपमानजनक संबोधन है।

सच्चर समिति ने अनुशंसा की है कि अरज़ाल जातियों को एससी के समकक्ष सुविधाएं दी जानी चाहिए। यह अनुशंसा उचित और व्यावहारिक है। दसवीं पंचवर्षीय योजना 2001 को तैयार करने के लिए गठित पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण पर कार्यकारी  समूह, जिसका मैं अध्यक्ष था, ने यह सिफारिश की थी कि मुसलमानों की घुमंतु, अर्ध-घुमंतु, विमुक्त व सफाईकर्मी जातियों सहित भिक्षावृत्ति से जीवनयापन करने वाली व अन्य कमजोर जातियों, जिन्हें पारंपरिक रूप से अरज़ाल कहा जाता है, को अन्य धर्मों की समकक्ष जातियों के साथ, ओपन एंडिड वजीफे दिए जाने चाहिए, (जोकि एससी-एसटी को उपलब्ध हैं) और उनका संपूर्ण पुनर्वास किया जाना चाहिए। ऐसा करना पूरी तरह से उचित होगा और यह आसानी से किया जा सकता है। मैंने इस मुद्दे की ओर वर्तमान सरकार सहित, पूर्व सरकारों और उनके नेताओं का ध्यान समय-समय पर आकर्षित किया है।

भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णन

मुस्लिम समुदाय में गैर-पिछड़े वर्गों का प्रतिशत मात्र 15 से 20 के बीच है और इनमें भी बड़ी संख्या में गरीब परिवार शामिल हैं। इनकी बेहतरी के लिए उचित उपाय (जिनमें आरक्षण शामिल नहीं हो सकता) किए जाने चाहिए। इसी तरह, हिन्दुओं, ईसाईयों, सिक्खों आदि की सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों के गरीबों की बेहतरी के लिए भी उपाय किए जाना आवश्यक है।

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वर्तमान सरकार का नारा है ‘सबका साथ, सबका विकास’। मुसलमानों के पिछड़े वर्गों की पहचान कर, उन्हें आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने के लिए ऊपर वर्णित प्रक्रिया को अपनाना और सभी धर्मों की अगड़ी जातियों के गरीबों की बेहतरी के लिए उपाय करना, इस नारे के अनुरूप होगा। मुसलमानों सहित समाज के उन सभी सदस्यों को, जो सबके साथ न्याय में विश्चास रखते हैं, इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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