ओबीसी में उपवर्गीकरण जरूरी, धर्म प्रासंगिक नहीं

ओबीसी का उपवर्गीकरण जरूरी है ताकि आरक्षण का लाभ उन्हें मिल सके जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि ओबीसी का उपवर्गीकरण क्यों जरूरी है और यह भी कि इसमें गैर हिंदू धर्म के वे समुदाय भी शामिल हों जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं।)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 22

  • वासंती देवी

वासंती देवी : आप धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले चंद लोगों में से हैं। आपकेे प्रयासों से ही आंध्र प्रदेश सरकार ने ओबीसी कोटे के अन्दर उप-कोटा निर्धारित किया है।  इसका हिन्दू साम्प्रदयिकतावादियों द्वारा कटु विरोध किया जा रहा है। उनका तर्क है कि हमारा संविधान, धार्मिक आधार पर आरक्षण की इजाजत नहीं देता। वे यह समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यह आरक्षण, धर्म नहीं बल्कि जाति के आधार पर दिया जा रहा है। इस मामले में वर्तमान वैधानिक स्थिति क्या है? आपके विचार में यह व्यवस्था पूरे देश में कैसे लागू की जा सकती है?

पी.एस. कृष्णन : आंध्र प्रदेश सरकार को यह अहसास तो था कि सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी मुस्लिम जातियों की पहचान न किया जाना एक बड़ी कमी है। सच तो यह है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में, आंध्र प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य था, जहां यह काम नहीं हुआ था। मुसलमानों की पिछड़े वर्ग के एक ऐसे समुदाय, जिसे विशेष दर्जा दिए जाने की जरुरत है, के रूप में पहचान, स्वतंत्रता के पूर्व ही केरल की त्रावणकोर और कोच्चीन रियासतों में की जा चुकी थी। स्वतंत्रता के बाद, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ त्रावणकोर एंड कोच्चीन और राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात् केरल राज्य के अस्तित्व के आने पर भी यह स्थिति बनी रही। स्वतंत्रता के पूर्व से ही, मुसलमानों को पिछड़े वर्गों की सूची में स्थान दिया गया। मलाबार, जो सन 1956  तक मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, में मप्पिला को पिछड़े वर्ग के रूप में मान्यता दी गयी थी। मलाबार क्षेत्र में मुसलमानों को मप्पिला के नाम से जाना जाता है। आज के तमिलनाडु में लब्बाई, मप्पिला और दुदेकुला को तब से पिछड़े वर्गों की सूची में स्थान दिया गया था, जब वह मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। तमिल-भाषी लब्बाई, तमिलनाडू के सबसे बड़े मुस्लिम समुदाय हैं। दुदेकुला, आंध्र प्रदेश की एक तेलुगु जाति है, जिसके सदस्य इस राज्य से सटे हुए तमिलनाडू के जिलों में भी रहते हैं। कुछ परिवर्तनों के साथ, तमिलनाडू में यह स्थिति सत्तानाथान (1969-70) व अम्बासंकर (1985-1989) आयोगों की सिफारिशों के जरिए बनी रही। मैसूर में भी त्रावणकोर की तरह की व्यवस्था थी, जो 1956 में गठित कर्नाटक राज्य में बनी रही। स्वतंत्रता के पूर्व गठित मिलर समिति और मैसूर/कर्नाटक के स्वतंत्रता के पश्चात गठित पिछड़ा वर्ग आयोगों ने मुसलमानों को पिछड़े वर्ग के रूप में मान्यता दी और इसी आधार पर शासन ने कार्यवाई की। इससे सम्बंधित विस्तृत विवरण मेरी रपट ‘आइडेंटिफिकेशन ऑफ सोशियली एंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेज अमंग द मुस्लिम कम्युनिटी ऑफ आंध्र प्रदेश’ (2007), में है, जो अद्यतन किए जाने के बाद, पुस्तक के रूप में प्रकाशनाधीन है।

भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णन

सन 1953 में, अलग आंध्र राज्य अस्तित्व में आया और फिर 1956 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ। उस समय, केवल दुदेकुला, पिछड़ी जातियों की सूची में थे और यह सूची इस राज्य को पूर्ववर्ती मद्रास राज्य से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हाथ से मैला साफ करने का काम करने वाले मेहतर (मुस्लिम) समुदाय का अनंतरमण आयोग (1970) ने ही संज्ञान ले लिया था, परन्तु उसे पिछड़े वर्गों की सूची में इस गलतफहमी के चलते शामिल नहीं किया गया कि वह एससी की सूची में शामिल है। कुरैशी समुदाय, जो पारंपरिक रूप से कसाई का काम करता है, को 1986 में मुरलीधरण राव आयोग की अनुशंसा पर, इस सूची में शामिल किया गया था परन्तु अकारण और बिना विचार किये उसी वर्ष, उन्हें इस सूची से हटा दिया गया। इसके सम्बन्ध में विस्तृत विवरण मेरी रपट व आंध्र प्रदेश के मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों के बारे में मेरी प्रकाशनाधीन पुस्तक में उपलब्ध है।

सन 2004 में, आंध्र प्रदेश सरकार ने संपूर्ण मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा घोषित कर दिया और उसे पांच प्रतिशत आरक्षण दे दिया। इस निर्णय को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने टी. मुरलीधर राव प्रकरण में अपने फैसले में रद्द कर दिया। इस फैसले के दो आधार थे – पहला यह तकनीकी आधार था कि सरकार ने इस विषय में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श नहीं किया था और दूसरा यह कि इसके कारण कुल आरक्षण 51 प्रतिशत हो गया था, जो कि 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा से अधिक था।

सन 2005 में राज्य सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश के आधार पर, एक अधिनियम के जरिये, संपूर्ण मुस्लिम समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा घोषित किया और उनके लिए पांच प्रतिशत आरक्षण के व्यवस्था कर दी। इसे उच्च न्यायालय ने अर्चना रेड्डी मामले में इस आधार पर रद्द कर दिया कि मुस्लिम समुदाय के सामाजिक पिछड़ेपन को साबित करने के कोई आधार नहीं थे, आयोग द्वारा अपनाई गयी प्रक्रिया में कमियां थीं और 50 प्रतिशत की सीमा पार हो रही थी। दो न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में, अमरीका के उच्चतम न्यायालय द्वारा एक बिलकुल अलग संवैधानिक सन्दर्भ में विकसित कुछ अवधारणाओं जैसे ‘सस्पेक्ट लेजिस्लेशन’, ‘कम्पेल्लिंग गवर्नमेंट नीड’, ‘लीस्ट रेस्ट्रिक्टिव अल्टरनेटिव’ व ‘स्ट्रिक्ट स्क्रूटिनी’ का आयात कर लिया। उन्होंने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि उच्चतम न्यायलय ने 2002 में स्पष्ट रूप से कहा था कि इन अमरीकी अवधारणाओं की भारत के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है और इन्हें यहां लागू नहीं किया जा सकता।

इसके बाद, राज्य सरकार ने संवैधानिक सिद्धांतों और उनकी उच्च न्यायपालिका द्वारा की गयी व्याख्या के आधार पर, मुस्लिम समुदाय के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने में मेरी सहायता मांगी। वह इसलिए, क्योंकि राज्य व केंद्र सरकार के स्तर पर, एससी-एसटी व पिछड़े वर्गों को न्याय दिलवाने के लिए मेरे द्वारा किये गए प्रयासों से सभी वाकिफ थे। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री जन्नत हुसैन और प्रमुख सचिव, पिछड़ा वर्ग कल्याण श्री अमिताभ भट्टाचार्य दिल्ली आए और इस विषय पर मुझसे चर्चा की। इसके बाद, दिल्ली में ही, मेरी मुख्यमंत्री से भी चर्चा हुई। मैंने उनके इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया कि मैं इस विषय पर राज्य सरकार के सलाहकार के रूप में, अपनी रपट दूं। मेरी एकमात्र शर्त यह थी कि मैं इस कार्य के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लूंगा। मुझे 2007 में कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ, आंध्र प्रदेश सरकार में सलाहकार, पिछड़ा वर्ग कल्याण, के पद पर नियुक्त किया गया। उस समय मैं भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के मानद परामर्शदाता की हैसियत से अशोक कुमार ठाकुर प्रकरण में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 का उच्चतम न्यायलय में बचाव करने में व्यस्त था। इस कारण मैं अपनी रिपोर्ट पर काम 10 मई 2007 को शुरू कर सका। सन 1857 में इसी दिन वह क्रांति शुरू हुई थी, जिसे अंग्रेज, सैन्य विद्रोह और भारतीय राष्ट्रवादी प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं, जहां तक संभव हो, मैं महत्वपूर्ण काम शुरू करने के लिए ऐसे ही अच्छे दिन चुनता हूं। मैंने अपनी रिपोर्ट एक महीने में तैयार कर ली क्योंकि इसके लिए जरूरी सभी जानकारियां और सामग्री मेरे दिमाग और मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में उपलब्ध थीं।

यह भी पढ़ें : मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने से सशक्त हो रहा पिछड़ा वर्ग

मैंने अपनी रपट सरकार को सौंप दी और उसके प्रमुख बिन्दुओं के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री, सम्बंधित मंत्रियों, अधिकारियों और एडवोकेट जनरल की उपस्थिति में प्रेजेंटेशन दिया। सरकार को 11 जून 2007 को सौंपी गई इस रपट में, मैंने मुस्लिम समुदाय का समग्र अध्ययन प्रस्तुत किया जिसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय के स्तरीकरण और पदक्रम के विवरण के साथ ही, पड़ोसी देशों और मध्यकालीन स्पेन में इस समुदाय की स्थिति पर भी चर्चा थी। मैंने इस पृष्ठभूमि में और निर्विवाद तथ्यों के आधार पर, आंध्र प्रदेश के मुसलमानों में सामाजिक दृष्टि से पिछड़े 13, अगड़े 10 और अन्य एक सामाजिक समूह की पहचान की और यह सिफारिश की कि उन्हें राज्य की पिछड़े वर्गों की सूची में एक अलग श्रेणी ‘ई’ के रूप में शामिल किया जाये और उन्हें 4 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि आरक्षण की 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा का उल्लंघन न हो और वह चिन्हित समुदायों की लगभग आबादी के अनुरूप भी था। राज्य सरकार ने मेरी रपट, आंध्र प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग को विचारार्थ भेजी। आयोग ने पूर्ण पारदर्शिता बरतते हुए, इस रपट को अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया और उस पर आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए। आयोग ने जनसुनवाईयां आयोजित कीं और मेरी रपट, सच्चर समिति की रपट, रंगनाथ मिश्रा आयोग की रपट और उसके स्वयं के सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर मेरे द्वारा चिन्हित सामाजिक समूहों के व एक अन्य सामाजिक समूह, जिसके बारे में जानकारी उसे अपनी पड़ताल के दौरान मिली थी, को आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की (मैं भी इस समूह के बारे में जानता था परन्तु मैंने उसे अपनी रपट में इसे शामिल नहीं किया था क्योंकि एनथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने अपनी सबसे ताजा प्रकाशन में उसके बारे में कुछ नहीं कहा कहा था)। आयोग ने कुछ समूहों के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पर्यायवाची शब्दों को भी अपनी रपट में जोड़ा और इन सभी समूहों को चार प्रतिशत आरक्षण देने की अनुशंसा की। राज्य सरकार ने मेरी रपट के प्रस्तुत किये जाने के एक माह और पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट के प्रस्तुतीकरण के एक सप्ताह के अन्दर, एक अध्यादेश जारी कर आरक्षण की इस नयी व्यवस्था को लागू कर दिया। अध्यादेश के बाद, इस आशय का विधेयक भी विधानसभा ने लगभग सर्वसम्मति से पारित कर दिया। इससे यह पता चलता है कि अगर सत्ताधारियों की इच्छा हो तो भारतीय व्यवस्था में भी त्वरित निर्णय लिए जा सकते हैं। इस विधेयक और अध्यादेश को कई रिट याचिकाओं द्वारा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। न्यायालय में राज्य सरकार, पिछड़ा वर्ग आयोग व अन्य उत्तरदाताओं ने संवैधानिक व तथ्यात्मक आधारों पर इस निर्णय का जमकर बचाव किया। न्यायालय को बताया गया कि ‘स्ट्रिक्ट स्क्रूटिनी’ जैसी अमरीकी अवधारणाएं भारत में लागू नहीं हो सकतीं और इसके लिए उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया गया। तथ्यों के स्तर पर, न्यायालय को बताया गया कि किसी भी याचिकाकर्ता ने इस आशय के सबूत प्रस्तुत नहीं किये हैं कि चिन्हित सामाजिक समूह पिछड़े नहीं हैं और यह भी कि इन समूहों का चिन्हांकन, मंडल आयोग के गैर-हिन्दू समुदायों में पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए अपनाई गई ‘रफ एंड रेडी’ प्रणाली के अनुरूप हैं और यह भी ये समुदाय पहले से ही चिन्हित हिन्दू पिछड़े वर्गों के मुस्लिम समकक्ष हैं या/और वे ‘अछूत’ या अन्य ‘नीची’ हिन्दू जातियों से धर्मपरिवर्तित मुसलमान हैं। इस सिलसिले में, पिछड़ी जातियों की पहचान के लिए, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा अपने दिशा-निर्देशों में वर्णित ‘फास्ट ट्रैक’ विधि का हवाला भी दिया गया। फास्ट ट्रैक विधि का अर्थ यह है कि जिन समुदायों का पारंपरिक पेशा ‘निम्न’ माना जाता है, उन्हें बिना किसी विस्तृत जांच या सबूत के पिछड़े वर्गों में शामिल किया जा सकता है, बशर्ते इसके विपरीत तथ्य उपलब्ध न हों। हमने न्यायालय में सरकार के निर्णय के बचाव की विस्तृत रणनीति तैयार की। इसके लिए उच्च न्यायालय में सुनवाई शुरू होने के कई दिन पहले से, महाधिवक्ता और उनके साथी वकीलों के साथ मेरी लम्बी बैठकें हुई थीं। उच्च न्यायालय में हर दिन की सुनवाई के बाद भी हम बैठक करते थे। प्रत्येक सुनवाई में मैं उपस्थित रहा। महाधिवक्ता ने पूरी मेहनत और निष्ठा से अदालत में तर्क प्रस्तुत किये और उनकी टीम ने उनका भरपूर साथ दिया।

उच्च न्यायालय ने दिनांक 8 फरवरी 2010 को 5-2 के बहुमत से दिए गए अपने फैसले में इस अधिनियम को मुख्यतः दो आधारों पर रद्द कर दिया।

(1) उसने पाया कि राज्य आयोग द्वारा अपनाई गयी प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी।

(2) वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अधिनियम एक विशिष्ट धर्म के लोगों को लाभ देता है और इस कारण, इस्लाम में धर्मान्तरण को प्रोत्साहन देगा।

राज्य सरकार ने तुरंत उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल कर दी। मेरी सलाह पर, राज्य सरकार ने तत्कालीन सोलिसिटर जनरल श्री जी. ई. वाहनवती और पूर्व अटॉर्नी जनरल श्री के. पारासरन को अपनी ओर से पैरवी करने के लिए चुना। हम लोगों ने राज्य सरकार की एसएलपी तैयार की और उसे उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया। राज्य सरकार और रिट याचिकाकर्ताओं के वकीलों के तर्क सुनने के पश्चात न्यायालय ने दिनांक 25 मार्च 2010 को एक अंतरिम आदेश पारित किया जिसमें यह कहा गया कि  एक ‘अन्य’ समुदाय को छोड़कर अन्यों के मामले में अधिनियम का क्रियान्वयन जारी रह सकता है और यह भी कि इस मामले को संवैधानिक पीठ के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाये। उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील, जिसमें अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों राज्यों की सरकारें उत्तरदाता है, पर अब तक संवैधानिक पीठ ने विचारण प्रारंभ नहीं किया है।

इस तरह, सन 2007 से लेकर अब तक – अर्थात पिछले दस सालों में – आंध्र प्रदेश के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से वंचित मुसलमानों को शिक्षा व रोज़गार में आरक्षण मिल रहा है, जो उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। इस अवधि में, हजारों पिछड़े मुसलमानों को व्यावसायिक व अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश मिल गया है और उनमें से कुछ का चयन राज्य सरकार के अंतर्गत प्रथम श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए भी हो गया है। इनमें से दो युवा महिलाएं हैं – जिनमें से एक को प्रथम श्रेणी में राज्य प्रशासनिक और एक अन्य को राज्य पुलिस सेवा में नियुक्ति मिली है। यह शायद पहली बार है कि मुस्लिम महिलाएं इन उच्च पदों पर नियुक्त हुईं हैं। जहां तक मेरी जानकारी है, ऐसा निज़ाम के राज में पुरानी हैदराबाद रियासत में भी नहीं हुआ था।

जहां तक पूरे देश का प्रश्न है, मुसलमानों सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों जैसे ईसाई व सिक्ख, के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को, ओबीसी की केंद्रीय सूची और कई अन्य राज्यों की सूचियों में शामिल किया जा चुका है। इसमें कुछ नया नहीं है। पिछड़े वर्गों को चिन्हित कर उन्हें आरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की शुरूआत के साथ ही, मुसलमानों, या कम-से-कम उनके एक बड़े तबके को, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची में स्थान दिया जाता रहा है। काका कालेलकर समिति (1955), जिसकी सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया था, की रपट में भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के सूची में कई मुस्लिम समुदाय/जातियां शामिल थीं। यही बात मंडल आयोग की सिफारिशों के बारे में भी सही है। यह हमेशा से स्वीकार किया जाता रहा है कि जाति, या इसके जैसे सामाजिक समूह, हिन्दुओं के अतिरिक्त, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई व बौद्ध समुदायों में भी पाए जाते हैं। इसका एकमात्र अपवाद पारसी समुदाय है। जैन समुदाय के लगभग सभी सदस्य, हिन्दू वैश्य/बनिया जाति के समकक्ष हैं। जहां तक भारतीय बौद्धों का प्रश्न है, उनमें से अधिकांश वे एससी हैं, जिन्होंने आंबेडकर के साथ या उनके अनुसरण में, बौद्ध धर्म अपनाया। हिमालय के क्षेत्र में भी बहुत कम आबादी वाले कुछ बौद्ध समुदाय हैं, परन्तु वे एसटी की सूची में शामिल हैं।

बौद्ध धर्म अपनाने वाले एससी समुदाय के सदस्यों को एससी का दर्जा, राष्ट्रपति के आदेश के उपबंध (3) के कारण नहीं मिल सका। इस उपबंध के अनुसार, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो हिन्दू या सिक्ख धर्मों से इतर किसी धर्म का पालन करता हो, एससी का सदस्य नहीं माना जाएगा। बेहतर तो यह होता कि सरकार उपबंध (3) में संशोधन कर, बौद्ध धर्म अपनाने वाले हिन्दुओं को भी एससी का दर्जा देती। यह एक तरह से डॉ. आंबेडकर को श्रद्धांजलि भी होती। परन्तु शायद तब तक, हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग ने डॉ. आंबेडकर का सम्मान करना नहीं सीखा था। सन 1980 में, केंद्रीय गृह मंत्रालय में एससी व बीसी कल्याण के प्रभारी संयुक्त सचिव की हैसियत से, मैंने कैबिनेट के समक्ष इस धर्म-आधारित अनुचित प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए एक नोट  कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया था। तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री श्री योगेन्द्र मकवाना भी इससे सहमत थे। गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह का इस मामले में रुख सहानुभूतिपूर्ण था परन्तु मंत्रालय के तत्कालीन सचिव ने उनके कानों में ऐसा कुछ फूँक दिया कि वे इसके खिलाफ हो गए। इस मुद्दे पर मैंने अन्यत्र प्रकाश डाला है।

इसके 10 साल बाद, जब 2 जनवरी 1990 को मैं कल्याण मंत्रालय का सचिव बना (एससी मामलों के विशेष आयुक्त बतौर मेरा दर्जा और वेतन पहले सी ही भारत सरकार के सचिव के समकक्ष था परन्तु कुछ ताकतें नहीं चाहतीं थीं कि मैं मंत्रालय का सचिव बनूं और मुझे नीतिगत फैसले लेने का अधिकार मिले), तब सबसे पहले, मैंने कल्याण मंत्री श्री रामविलास पासवान को इस पूरे मामले से अवगत करवाया और उनसे अनुरोध किया कि वे प्रधानमंत्री से इस आशय की स्वीकृति लें कि इस पर कैबिनेट विचार करे। दिनांक 8 जनवरी 1990 को रात्रि करीब 8 बजे जब मैं ट्राईफेड (ट्राईबल कोआपरेटिव मार्केटिंग डेव्लपमेंट फेडरेशन) के कार्यालय मेें एक बैठक में था, श्री पासवान ने फ़ोन पर मुझे सूचित किया कि जब वे प्रधानमंत्री के साथ एक बैठक के पश्चात सीढियाँ उतर रहे थे, तब उन्होंने इस बाबत प्रधानमंत्री से बात कर उनकी स्वीकृति हासिल कर ली है। इसके तुरंत बाद मैं, शास्त्री भवन में स्थित मंत्रालय के सम्मलेन कक्ष में गया और वहां मैंने 1980 में तैयार किये गए अपने कैबिनेट नोट को अद्यतन किया। उस समय अचानक बिजली चले जाने के कारण, मैंने मोमबत्ती की रोशनी में नया नोट तैयार कर उसे कैबिनेट सचिव को भेजा। दिनांक 12 जनवरी 1990 को कैबिनेट की राजनैतिक मामलों की समिति ने इस पर विचार कर उसे स्वीकृति दे दी। मैंने यह काम इतनी तत्परता से किया इसका एक कारण तो इस मामले का महत्वपूर्ण होना था। दूसरा कारण यह था कि मुझे यह पता था कि श्री वी.पी. सिंह, जनवरी के मध्य में महाराष्ट्र में होने वाले चुनावों में अपनी पार्टी का प्रचार करने जाने वाले हैं। जाहिर है कि उन्हें इस निर्णय की उपादेयता के अतिरिक्त, चुनाव में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ा भी रहा होगा। इस निर्णय की घोषणा तुरंत कर दी गयी और संसद के अगले सत्र, अर्थात सन 1990 के बजट सत्र में, एक विधेयक पारित कर, उपबंध (3) में हिन्दू व सिक्ख के साथ-साथ ‘बौद्ध’ शब्द भी जोड़ दिया गया। इस तरह, भारत के सभी बौद्ध अब या तो एससी हैं अथवा एसटी।

अब हम बात करें मुसलामनों के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की। मंडल आयोग ने कई मुस्लिम जातियों/समुदायों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया था परन्तु आयोग ने किसी भी राज्य के सभी मुसलमानों या किसी अन्य धर्म के सभी अनुयायियों को पिछड़ा घोषित नहीं किया। परंतु कई राज्यों ने मुसलमानों के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान कर उन्हें आंशिक या पूर्ण रूप से अपनी ओबीसी सूचियों में शामिल नहीं किया था। जिन मामलों में मुसलमानों का कोई सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग, संबंधित राज्य और मंडल दोनों की सूची दोनों में शामिल था, उसे पहले चरण की केंद्रीय सूची में शामिल कर लिया गया। यह सन 1990 के वी.पी. सिंह सरकार के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को आरक्षण प्रदान करने वाले आदेश के उस प्रावधान के अनुरूप था, जिसे मेरे सुझाव पर जारी किया गया था और जिसे उच्चतम न्यायालय ने सन 1992 में मंडल प्रकरण में अपने निर्णय में वैध करार दिया था। सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची को पिछड़े वर्गों पर विशेषज्ञ समिति ने मूलतः मेरे दिशा-निर्देशन में तैयार किया था।

मंडल मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय और इसके पश्चात पारित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1993 में यह प्रावधान था कि आयोग द्वारा सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किये जाने के किसी वर्ग या जाति के अनुरोध पर आयोग विचार करेगा और फिर इस अनुरोध को स्वीकार या अस्वीकार करने के सम्बन्ध में केंद्र सरकार को अनुशंसा करेगा। इस प्रक्रिया के दौरान मैंने यह सुनिश्चित किया कि वे सभी वास्तविक रूप से पिछड़े समुदायों/जातियों और विशेषकर ऐसे मुस्लिम समुदायों /जातियों को इस सूची में शामिल किया जाये, जिनकी पहचान या तो संबंधित राज्य या मंडल आयोग या दोनों ने नहीं की थी। वर्तमान में, केंद्रीय सूची में लगभग 200 मुस्लिम जातियां/समुदाय शामिल हैं।

वर्तमान में, केंद्रीय सूची और अधिकांश राज्य सूचियों में जो मुस्लिम जातियां/समुदाय शामिल हैं, वे भारत और संबंधित राज्यों की मुस्लिम आबादी का 80 से 90 प्रतिशत हैं। कुछ राज्यों में इनका प्रतिशत और अधिक है। उदाहरण के लिए, हरियाणा का मेव समुदाय, जो सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा है, राज्य की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 90 प्रतिशत है। केरल की केंद्रीय सूची में जो मुस्लिम समुदाय शामिल नहीं हैं, वे राज्य की कुल आबादी के 2 प्रतिशत से भी कम हैं। केंद्रीय सूची और राज्यों की सूचियों में मुसलमानों के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अधिकांश वर्ग शामिल हो गए हैं। इस मामले में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आसाम में कुछ कमियां थीं। आंध्रप्रदेश के मामले में, आंध्र प्रदेश सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े मुस्लिम वर्गों के लिए आरक्षण अधिनियम 2007 के ज़रिये यह कमी दूर कर दी गयी है। इस अधिनियम के अंतर्गत मेरी और आंध्र प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रपटों के आधार पर, 14 जातियों/समुदायों को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की राज्य सूची में एक अलग श्रेणी ‘ई’ में शामिल कर लिया गया है। इन्हें केंद्रीय सूची में शामिल किये जाने का अनुरोध, राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग में लंबित है। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी राज्य सूची में इस कमी को हाल में दूर कर लिया है। जहां तक मेरी जानकारी है, अब केवल ओडिशा और आसाम में इस सिलसिले में उपयुक्त कार्यवाई की जानी बाकी है।

सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े मुस्लिम वर्गों के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या ओबीसी सूची में शामिल होना नहीं वरन यह है कि उन्हें आरक्षण में कितनी हिस्सेदारी मिलती है। वे अपेक्षाकृत कम पिछडी भूस्वामी जातियों के साथ स्पर्धा कर उनका वाजिब हिस्सा पाने की स्थिति में नहीं हैं। उत्तर भारत में सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े मुस्लिम वर्गों के अधिकांश सदस्य या तो हस्तशिल्पी हैं या परंपरागत पेशों में संलग्न हैं। उनमें विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाली जातियां, घुमंतू व अर्ध-घुमंतू समुदाय, भिक्षा से जीवयापन करने वाली जातियां व सफाईकर्मी निर्धन समुदाय शामिल हैं। मेरे अध्ययन के अनुसार, दक्षिण भारत में मुस्लिम समुदाय में अधिकांश वे व्यक्ति शामिल हैं, जिन्होंने उन जातियों से धर्मान्तरण किया है, जो कि अब एससी में शामिल हैं। मुसलमानों के पिछड़े वर्गों को अपेक्षाकृत कम पिछड़ी भूस्वामी जातियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में जो परेशानी आती है, वही हिन्दुओं की अधिक, अत्यंत व अति पिछड़ी जातियों की समस्या भी है। इस समस्या का अल्पावधि हल है, ओबीसी का उपवर्गीकरण और दीर्घकालीन हल है आर्थिक व शैक्षणिक उपाय। वर्गीकरण के दो तरीके उपलब्ध हैं जिनमें से किसी एक को विभिन्न राज्यों व केंद्र द्वारा अपनाया जा सकता है।

सन् 1993 में केन्द्र सरकार ने उपवर्गीकरण की दिशा में एक अंतरिम कदम उठाते हुए इस कार्य को पिछड़े वर्गों के मामलों के विशेषज्ञों की एक समिति को सौंप दिया। जब हम इस समिति को सौंपे गए क्रीमी लेयर संबंधी कार्य को समाप्त कर उपवर्गीकरण पर विचार करना शुरू करने वाले थे, तभी सरकार ने अचानक समिति से यह जिम्मेदारी वापस ले ली। शायद ऐसा कम पिछड़े वर्गों के दबाव में किया गया था। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग लगातार सरकार को यह सलाह देता आ रहा है कि वह पिछड़े वर्गों का उपवर्गीकरण करे। मैं भी अपनी व्यक्तिगत हैसियत से और सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से संबंधित संस्थाओं जैसे योजना आयोग के कार्यकारी समूह और स्टीयरिंग कमेटियों के सदस्य बतौर इस पर जोर देता रहा हूं।

भारत सरकार ने उपवर्गीकरण की दिशा में पहला ठोस कदम दिनांक 23 दिसंबर 2011 को दो ओएम ।ऑफिस मेमोरेंडम) जारी कर उठाया जिनके जरिए अल्पसंख्यक समुदायों के ऐसे पिछड़े वर्गों, जो पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची में शामिल थे, को सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर (धर्म के आधार पर नहीं) के लिए आरक्षण में 4.5 प्रतिशत का उप-कोटा निर्धारित किया गया था। परंतु इस निर्णय को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 20 मई 2012 को रद्द कर दिया। मेरे विचार में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत सरकार और उसके वकीलों ने उच्च न्यायालय में इन आदेशों का बचाव करने में पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई। भारत सरकार की इस निर्णय के विरूद्ध अपील, जिसे तैयार करने में मैंने भी सहायता की थी, अब भी उच्चतम न्यायालय में लंबित है।

मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों और हिन्दू, सिक्ख व ईसाई समुदायों की अधिक, अत्यंत और अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण में उनका वाजिब हिस्सा दिलवाने के लिए यह आवश्यक है कि चुनावी गुणा-भाग को परे रखते हुए, तार्किक व निष्पक्ष ढ़ंग से पिछड़े वर्गों का उपवर्गीकरण किया जाए।

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ओबीसी की सूची में किसी भी जाति या वर्ग को धर्म के आधार पर शामिल नहीं किया गया है। हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाईयों या सिक्खों की विशिष्ट जातियों/समुदायों व जाति-सदृश सामाजिक समूहों को केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा ओबीसी की सूची में उनके सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण शामिल किया गया है ना कि उनके धर्म के कारण। केन्द्रीय और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों ने भी इस सिलसिले में जो भी अनुशंसाएं की हैं, वे इसी आधार पर की गई हैं। सच तो यह है कि सामाजिक पिछड़ेपन के निर्धारण में धर्म की कोई प्रासंगिकता ही नहीं है।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply