मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने से सशक्त हो रहा पिछड़ा वर्ग

1990 में देश का पिछड़ा वर्ग यदि मौका खाे देता तब निश्चित तौर पर इस वर्ग को आरक्षण के लिए अनिश्चितकाल तक आरक्षण से वंचित रहना पड़ता। मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू होने से सरकारी सेवाओं में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है और साथ ही राजनीति में उनकी भूमिका भी निर्णायक होती जा रही है

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि मंडल आयोग की अनुशंसाओं के लागू होने के क्या प्रभाव पड़े हैं?)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 21

  • वासंती देवी

वासंती देवी : देश में ओबीसी के उभार का श्रेय मंडल सुधारों को जाता है या उनकी राजनैतिक लामबंदी को?

पी.एस. कृष्णन : मैं तो यही कहूंगा कि शुरूआत लोगों को लामबंद करने से होती है और इसका प्रभाव राजनीति और राजनैतिक दलों पर पड़ता है। मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुरूप, ओबीसी को आरक्षण का लाभ इसलिए मिल सका क्योंकि वे राजनैतिक दृष्टि से लामबंद थे। इस आरक्षण से उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिली। तटवर्ती प्रदेशों में सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को स्वाधीनता से पहले ही आरक्षण प्रदान कर दिया गया था और इसका कारण था इस क्षेत्र के प्रांतों और रियासतों में इन वर्गों की सामाजिक एकता। इस सामाजिक लामबंदी पर कोल्हापुर, मैसूर, त्रावणकोर और कोच्चीन जैसी रियासतों के शासकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी और उन्होंने इन वर्गों की भलाई के लिए कई कदम उठाए। इसी के नतीजे में मद्रास प्रेसीडेंसी में जस्टिस पार्टी की सरकार अस्तित्व में आई। इसी लामबंदी के चलते इन प्रांतों और रियासतों के साथ-साथ, बाम्बे प्रेसीडेंसी में आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई। उत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों में यह प्रक्रिया काफी धीमी थी। इन वर्गों को लामबंद करने में महात्मा फुले, नारायणगुरू व पेरियार द्वारा स्वतंत्रता के पूर्व चलाए गए आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। परंतु इस तरह के आंदोलन विंध्य पर्वतमाला के उत्तर में स्थित राज्यों में न तो स्वतंत्रता के पूर्व हुए और ना ही स्वतंत्रता के तुरंत बाद।

उत्तर भारत में इन वर्गों को आरक्षण देने की मांग सबसे पहले डाॅ. राममनोहर लोहिया ने की। परंतु इन वर्गों को लामबंद करने में समय लगा। उत्तर भारत में जिस राज्य में सबसे पहले यह प्रक्रिया शुरू हुई वह था बिहार। श्री दरोगा प्रसाद राय, जो स्वयं पिछड़े वर्ग से थे, ने 1971 में मुंगेरीलाल आयोेग की नियुक्ति की। इस आयोग की सात खंडों की रपट के आधार पर कुछ वर्षों बाद बिहार में पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया गया। सन् 1977 की जनता लहर में बिहार के मुख्यमंत्री बने श्री कर्पूरी ठाकुर ने सबसे पहले पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया। वे स्वयं बिहार के एक अति पिछड़े वर्ग से थे।

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सन् 1977 के पहले, उत्तर भारत के कुछ अन्य राज्यों में भी सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को लामबंद करने के प्रयास किए गए। उत्तर प्रदेश में इस अभियान की अगुवाई श्री चरण सिंह ने की।

चरण सिंह को यदि इन वर्गों का पूर्ण समर्थन मिल सका तो इसका कारण यह था कि उन्होंने कभी यह प्रयास नहीं किया कि उनके समुदाय (जाट) को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया जाए। वे यह मानते थे कि जाट सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं (जो कि सही भी था) और इसलिए उन्होंने हमेशा जाटों को पिछड़े वर्गों में शामिल किए जाने की मांग का विरोध किया। सन् 1960 के दशक के अंत और सन् 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछड़े वर्गों की लामबंदी, सन् 1977 के आम चुनाव व उसके बाद अनेक राज्यों के विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी की विजय का एक महत्वपूर्ण कारक थी।

उत्तर भारत में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की मांग करने वाले पहले डॉ. राममनोहर लोहिया (23 मार्च 1910 – 12 अक्टूबर 1967) ने ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ का नारा दिया था

जनता पार्टी सरकार के शासन में आने के बाद मंडल आयोग की नियुक्ति की गई। यह नियुक्ति सन् 1977 के चुनाव में पिछड़े वर्गों की महत्वाकांक्षाओं के प्रकटीकरण का नतीजा थी। परंतु अनेक ऐसे कारणों से, जिनकी चर्चा मैं यहां नहीं करना चाहूंगा, मंडल आयोग के अपना काम समाप्त कर अपनी रिपोर्ट दिनांक 31 दिसंबर 1980 को प्रस्तुत करने के पहले ही जनता पार्टी की सरकार गिर गई। इसके एक दशक बाद, सन् 1989 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चा और श्री वी.पी. सिंह की विजय के मुख्य कारकों में से एक थी पिछड़े वर्गों की लामबंदी। इसी के चलते मंडल आयोग की अनुशंसा के अनुरूप, केन्द्रीय सेवाओं में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।

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वी.पी. सिंह की अल्पजीवी सरकार ने मंडल आयोग की रपट पर निष्पक्ष कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए। उनमें से एक था कल्याण मंत्रालय के सचिव पद पर मेरी नियुक्ति। इसके पूर्व मैं अनुसूचित जातियों (व कुछ अवधि के लिए अनुसूचित जनजातियों) के लिए विशेष आयुक्त था। यह पद भारत सरकार के सचिव के समकक्ष था। मेरी नियुक्ति तत्कालीन कैबिनेट सचिव के विरोध के बाद भी की गई। मुझे विभाग के मंत्री श्री रामविलास पासवान ने बताया कि कैबिनेट सचिव ने प्रधानमंत्री को मेरे बारे में भ्रामक जानकारी दी है। श्री पासवान के अनुसार, कैबिनेट सचिव ने उनसे और प्रधानमंत्री से कहा कि मेरी ‘‘सेवा अवधि बहुत कम है।‘‘ इसका प्रधानमंत्री और मंत्री ने यह अर्थ लगाया कि मैं सचिव पद पर नियुक्ति के लिए बहुत कनिष्ठ हूं।

मैंने श्री पासवान को बताया कि उस समय सचिव के रूप में पदस्थ अधिकारियों में से अधिकांश मुझसे कनिष्ठ हैं। कैबिनेट सचिव का आशय यह था कि मेरी सेवानिवृत्ति में बहुत कम समय बचा है। शायद वे उस नियम के संदर्भ में अपना यह तर्क दे रहे थे, जिसके अनुसार किसी आईएएस अधिकारी को सचिव पद पर तभी नियुक्त किया जाना चाहिए जब उसका कम से कम दो साल का सेवाकाल शेष हो। परंतु कैबिनेट सचिव ने जानबूझकर अपनी बात को इस तरह से रखा जिससे ऐसा लगे कि मैं इस पद पर नियुक्ति के लिए कनिष्ठ हूं। जहां तक दो वर्ष के न्यूनतम कार्यकाल संबंधी नियम का प्रश्न है, इसमें सचिव के साथ-साथ उसके समकक्ष पदों पर पदस्थ रहने की अवधि भी शामिल होती है। मुझे मेरी सेवानिवृत्ति की तिथि से तीन से भी अधिक वर्ष पहले, सचिव के समकक्ष पद पर नियुक्त किया गया था बल्कि मैं इस पद पर नियुक्ति के लिए इसके भी दो साल पहले – जब मैं राज्य सरकार में पदस्थ था – पात्र था। मेरे द्वारा मंत्री और प्रधानमंत्री को सही स्थिति से अवगत करवाने के बाद, दिनांक 1 जनवरी 1990 को मुझे कल्याण मंत्रालय के सचिव पद पर नियुक्त कर दिया गया। मैंने 2 जनवरी 1990 को अपना कार्यभार ग्रहण कर लिया। उस समय मेरी सेवानिवृत्ति को केवल एक वर्ष बाकी था परंतु मेरे सामने संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक यथार्थों के अनुरूप, स्पष्ट एजेंडा होने और इस क्षेत्र में मेरे लंबे अनुभव के चलते मैं इस एक वर्ष में भी दूरगामी प्रभाव वाले ऐसे कई निर्णय करवा सका, जो एक दशक (ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण) या उसके भी पहले (जैसे नवबौद्धों को एससी का दर्जा व अनुसूचित जातियों व जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक हैसियत) से लंबित निर्णयों को कार्यरूप में परिणित कर सका।

पी.एस. कृषणन, भारत सरकार के पूर्व सचिव

मेरी जानकारी और ज्ञान के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि ओबीसी के मामले में उचित और निष्पक्ष निर्णय करवाने में मेरी महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका थी। शायद मेरे अतिरिक्त कोई अन्य अधिकारी यह काम नहीं कर पाता। परंतु सचिव पद पर मेरी नियुक्ति संयोग मात्र नहीं थी। इसका मुख्य कारण था ओबीसी को चुनाव घोषणापत्र में किए गए वायदे और उनके समर्थन के आधार पर सरकार का सत्ता में आना। और यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि इसके पहले के एक दशक में उत्तर भारत में इन वर्गों को लामबंद करने के सघन व सफल प्रयास हुए थे। इस तरह, पिछड़े वर्गों की लामबंदी और सरकार व प्रशासनिक हल्कों में इन वर्गों को न्याय दिलवाने के प्रति प्रतिबद्ध लोगों की नियुक्ति एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी। जाहिर है कि इस प्रक्रिया में लोगों की लामबंदी की अत्यंत महत्वपूर्ण और मूलभूत भूमिका थी। इतिहास के इस मोड़ पर राजनैतिक व प्रशासनिक कार्यपालिका में सही व्यक्तियों की उच्च पदों पर उपस्थिति महत्वपूर्ण थी। राजनैतिक वातावरण और सही व्यक्तियों की सरकार में उपस्थिति का यह संयोजन निर्णायक था क्योंकि वी.पी. सिंह सरकार लंबी नहीं चली और ना ही चल सकती थी। इस सरकार के गिरने के बाद जो सरकारें बनीं उनके नेतृत्व को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगर 1990 में पिछड़े वर्ग यह मौका खो देते (जैसा कि उन्होंने स्वतंत्रता के पूर्व  किया था) तो उन्हें आरक्षण के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार करना पड़ता। मंडल सुधार, अर्थात मंडल आयोग की रपट के आधार पर लिए गए नीतिगत निर्णयों, ने पिछड़े वर्गों की उन्नति को जबरदस्त गति प्रदान की। इस सिलसिले में यह भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय स्तर पर वी.पी. सिंह के शीर्ष पर पहुंचने के साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार में भी इन वर्गों के सदस्य मुख्यमंत्री बने।

मैं दक्षिण और उत्तर भारत में पिछड़े वर्गों की लामबंदी में दो महत्वपूर्ण अंतर पाता हूं। प्रायद्वीपीय भारत, और विशेषकर दक्षिणी राज्यों, में पिछड़े वर्गों की प्रगति की शुरूआत 19वीं सदी के मध्य और 20वीं सदी की शुरूआत में उनकी सामाजिक लामबंदी से हुई। यह लामबंदी मूलतः समाजसुधार के लिए हुई थी परंतु शिक्षा, शासन और प्रशासन में बेहतर भागीदारी हासिल करना भी इसका लक्ष्य था। इस सामाजिक लामबंदी ने राजनीति और राजनैतिक दलों को प्रभावित किया और इससे सामाजिक और राजनैतिक प्रजातांत्रिकरण की नींव पड़ी। उत्तर भारत में लामबंदी की प्रक्रिया काफी बाद में शुरू हुई और इसकी प्रकृति मुख्यतः राजनैतिक थी। दोनों ही मामलों में इन वर्गों के लिए आरक्षण को सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य बनाने में इस लामबंदी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आरक्षण से इन वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिला और प्रशासन व सरकार में उनकी मौजूदगी बढ़ी। इन वर्गों की प्रगति की गति तभी और तेज हो सकेगी जब इनके तुलनात्मक रूप से अगड़े वर्ग कुछ पहल करें। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है ओबीसी का निष्पक्ष उप-वर्गीकरण ताकि आरक्षण और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाए गए कदमों का लाभ अधिक, अत्यंत और अति पिछड़ी जातियों को मिल सके।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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