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कँवल भारती का विश्लेषण

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भारत की अवैदिक और भौतिकवादी चिंतनधारा मूल रूप से समतावादी रही है। इसी को चन्द्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ ने भारत का मौलिक समाजवाद कहा है।[1] इस मौलिक समाजवाद की अवधारणा हमें ‘बेगमपुर शहर’ में मिलती है, जो रैदास साहेब का बहुचर्चित पद है—

बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।

ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।

अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।

काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।

आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।

तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।

कह ‘रविदास’ खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।[2]

पूरा आर्टिकल यहां पढें : रैदास साहेब और बेगमपुरा की संकल्पना

 

 

 

 

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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