दुनिया लगातार विकासमान है

सृष्टि की रचना कैसे हुई? किसने रचा है यह संसार? पेड़-पौधे, जीव-जंतू क्या सबके सब किसी ईश्वर के द्वारा बनाए गए हैं? वह डार्विन थे, जिन्होंने न केवल ईश्वरीय मान्यताओं को अपने तर्कों व प्रमाणों के आधार पर खारिज किया बल्कि यह भी बताया कि सतत परिवर्तन प्राकृतिक धर्म है। यही विज्ञान है

जन विकल्प

देश और दुनिया के बारे में जब भी हम कुछ सोचते हैं, तब दो तरह के पक्ष होते हैं। पहला तो यह कि इस दुनिया को किसी ईश्वर ने गढ़ दिया और ये जितने प्राणी और वनस्पति है, सब के सब ईश्वर ने कुछ कारण-वश बनाए हैं। जब ईश्वर ने ही दुनिया गढ़ दी, तब विचार की कोई खास जटिलता नहीं रह जाती। ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है। उस का कोई लक्ष्य रहा होगा, जिसके लिए उसने यह सृष्टि-रचना की है। यह उनकी लीला है। मनोरंजन या शायद एक प्रहसन। अन्यथा दुःख की इस घाटी या एक धर्म के अनुसार ‘आग की इस झील को बनाने का कोई औचित्य नजर नहीं आता। संस्थागत धर्मों जैसे सनातन, ईसाई, इस्लाम आदि ने अपने धर्मग्रंथों में सृष्टि रचना की अलग-अलग गाथाएं दर्ज़ की हैं। सब की सब पर्याप्त मनोरंजक और गुदगुदी पैदा करने वाली हैं। मसलन ईसाइयत, जिसने सृष्टि-निर्माण की चर्चा अपने धर्मग्रन्थ ‘बाइबिल’ के आरंभिक अध्याय ‘जेनेसिस’ में ही की है, के अनुसार ईश्वर (गॉड) ने स्वर्ग और धरती का निर्माण किया।

आरम्भ में यह धरती अनगढ़ और उबड़-खाबड़ थी, इसे ईश्वर ने पानी से परिपूर्ण किया। यहां अंधेरा ही अंधेरा था। ईश्वर ने कहा, यहां प्रकाश हो, और धरती उजाले से भर गयी। इसी जादुई विधि से ईश्वर ने तमाम प्राणियों और वनस्पतियों को गढ़ डाला। यह सब काम बस हफ्ते भर में पूरा हो गया। फिर चुटकी भर धूल से मनुष्य के गढ़ने, ईडन गार्डन बनाने, मनुष्य की सहचरी के रूप में उसकी ही पसली की एक हड्डी से स्त्री बनाने से लेकर आदम और ईव की वर्जना न मानने की मौन बगावत के दिलचस्प किस्से आज भी पढ़े-कहे जाते हैं और शायद आगे भी पढ़े-कहे जाते रहेंगे। इस्लामी धर्मग्रन्थ ‘कुरान मजीद’ तो ईश-वंदना से ही आरम्भ होता है। अरबी जुबान में ईश जैसी स्थिति को अल्लाह कहा गया है और उसकी सत्ता सर्वोपरि है। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं। यह प्रकृति, ये प्राणी और वनस्पति जगत सब उसके द्वारा निर्मित हैं और इसका केंद्र मनुष्य है। सनातन या हिन्दू धर्मग्रन्थ वेद और उपनिषदें भी सृष्टि रचना पर विमर्श करते हैं। मनुस्मृति में सृष्टि-उत्पत्ति की विशद विवेचना है, जिसके अनुसार सृष्टि पूर्व यह विश्व तम अर्थात अन्धकार में विलीन था। अथवा एक महाशून्य था। ईश्वर ने सृष्टि का संकल्प लिया और पृध्वी ,जल , वायु ,अग्नि और आकाश एक साथ अवतरित हुए। ईश्वर ने जल में बीज को छोड़ा और उससे स्वर्ण के समान चमकता हुआ अंडा बन गया। कोई वर्ष भर बाद अंडा फूटा और उसमे से ब्रह्म उत्पन्न हुए। फूटे हुए अंडे के दो टुकड़े धरती और आकाश बन गए। धरती और आकाश के बीच वायु और दिशाएं बन गयीं। नक्षत्र, ग्रह और पर्वतादि बनाने के बाद ब्रह्म ने अपने शरीर के दो भाग किये। एक भाग पुरुष और दूसरा स्त्री हुआ। और शायद इसीलिए बादरायण मुनि सम्भोग की अवस्था को ब्रह्म की अवस्था मानते हैं। ब्रह्म के पुरुष रूप से चार वर्णों की उत्पत्ति बतलायी गयी है। मनु के लिए मनुष्य की उत्पत्ति से अधिक वर्णों की उत्पत्ति का लेखा रखना आवश्यक था।

लेकिन ऋग्वेद का सृष्टि-सूक्त इस सम्बन्ध में एक काव्यात्मक रूपक रखता है ,जो दिलचस्प है –

तब शून्य भी नहीं था, न अस्तित्व

उस समय वायु नहीं था, न इससे आगे आकाश।

कौन इसे ढके था? यह कहां थी? किसके संरक्षण में थी?

क्या उस समय सृष्टि में जल ही जल था, अथाह गहराइयों में?

पर आखिरकार कौन जानता है और कौन कह सकता है,

यह सब कहाँ से आया, और कैसे सृष्टि की रचना हुई?

देवता स्वयं सृष्टि के बाद आये,

इसलिए कौन ठीक-ठीक जानता है कि सृष्टि का उद्भव कहां से हुआ?

(ऋग्वेद का उद्धरण। ए. एल. बाशम की किताब ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ से जिसे रोमिला थापर ने अपनी किताब ‘भारत का इतिहास’ में उद्धृत किया है।)

लेकिन उपरोक्त मजहबी और धार्मिक आख्यान सुनने में चाहे जितने प्रिय अनुभव हों, इनका आज की दुनिया में कोई औचित्य नहीं है। ये मनगढंत आख्यान केवल इस बात की सूचना देते हैं कि उस ज़माने में भी लोग सृष्टि के उद्भव व विकास के बारे में जिज्ञासा करते थे, और जिस किसी इंसान ने भी समाज और मनुष्य के रिश्तों की व्याख्या करनी चाही, उसे जनता की इस प्राथमिक जिज्ञासा का औन -पौन ही सही, समाधान करना पड़ा। दर्शन के क्षेत्र में अलबत्ता हर देश में ऐसे लोकायतिक विचार उभरे जिन्होंने भिन्न तरीकों से विश्व,सृष्टि और प्राणी जगत; खास कर मानव और उसके समाज, के बारे में ईश्वर-निरपेक्ष नजरिये से कुछ सोचने का प्रयास किया। भारत में उपनिषद काल की एक जिज्ञासु बाला गार्गी ने अपने गुरु याज्ञवल्क से सवाल किया था कि यदि ब्रह्म स्वयंभू अर्थात खुद-ब-खुद पैदा होने वाला है, तो यह मनुष्य क्यों नहीं? याज्ञवल्क के पास कोई जवाब नहीं था और कहते हैं उनकी एक धमकी ने गार्गी को चुप करा दिया। बुद्ध के समकालीन मक्खलि घोषाल जैसे कुछ विचारक थे , जिन्होंने इस सृष्टि को एक नियति-चक्र के रूप में देखा था। स्वयं बुद्ध भी ईश्वर-निरपेक्षता पर यकीं करते थे। सृष्टि निर्माण के सम्बन्ध में जितने भी पुराने गल्प हैं, सब का अध्ययन हमें दिलचस्प नतीजों तक ले जाता है और हम यह देख कर हैरान रह जाते हैं कि यह सृष्टि आखिर है क्या चीज?

सृष्टि के उद्भव व विकास के बारे में एक सुचिंतित वैज्ञानिक नतीजे तक, हम हाल की दो सदियों में ही आये हैं, जब यूरोप में रेनेसां और प्रबोधन काल आया, जिसके आखिरी नतीजे के रूप में साइंस और टेक्नोलॉजी का व्यवस्थित विकास संभव हुआ। यूरोप में उभरे चेतना के इन आंदोलनों ने मनुष्य में नए तरीके से सोचने की प्राविधि विकसित हुई। लोग तर्क और साक्ष्य के सहारे सवाल उठाने लगे। गैलीलियो ने जब टेलिस्कोप बनाया तब अंतरिक्ष की हलचल की विश्वसनीय जानकारी मिली। इसने हमारे जमे-जमाये रूढ़िवादी ख्यालों पर चोट की। स्वयं गैलीलियो को राज दरबार और पुरोहिती व्यवस्था से उत्पीड़ित होना पड़ा। लेकिन सच्चाई की चर्चा जब छिड़ जाती है तब रूकती नहीं है। हमारे वैज्ञानिकों-शोधकर्ताओं ने तकलीफें झेलीं, लेकिन ज्ञान की इबारत लिख डाली। पारम्परिक रूढ़िवादी ख्यालों पर सवाल उठने लगे। बड़ी बात यह हुई कि इन सवालों को मान्यता मिलनी शुरू हुई। एशियाई, अफ़्रीकी, अमेरिकी समाजों में भी धीरे-धीरे नयी चेतना उभरने लगी, जिसे इन देश-समाजों का रेनेसां या नवजागरण कहा गया। हमारे देश भारत में भी रेनेसां चुप्पे और दबे क़दमों से आया। लेकिन जब आया, तब इसने हमारी चेतना को झकझोर दिया। हमने वेद-पुराणों की कहानियों को विगत इतिहास का एक हिस्सा मान लिया। हम कभी ऐसा भी सोचा करते थे, आज इसका इतना भर ही मोल है। अब तो बारहवीं कक्षा का भी कोई छात्र, मजे से सृष्टि निर्माण और मनुष्य के क्रमिक विकास की कहानी बता सकता है। यह सब हमारे पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।

आकाश-गंगाओं, नक्षत्रों और ग्रहों-उपग्रहों की कहानी सुनाने का कोई कारण इसीलिए नहीं है कि आज की दुनिया के लिए यह आम बात हो गयी है। इस पूरी कहानी का सार-संक्षेप इतना ही है कि हमारी पृथ्वी किसी ईश्वर की रचना नहीं ,एक प्राकृतिक घटना है। करोड़ों वर्ष पूर्व केंद्रीय आग के गोले, जो आज सूर्य है, से यह पृथ्वी निकली और फिर आहिस्ता-आहिस्ता इस रूप में आई कि यहां जीवन संभव हो सका। लाखों वर्षों के प्राकृतिक उतार-चढ़ाव से यहां समंदर बने और फिर इसी समंदर यानी जल के बीच से एक-कोशीय जीवों का बनना संभव हुआ। इन जीवों को आज अमीबा कहा जाता है। फिर बहुकोशीय जीव बनने आरम्भ हुए। इन सब में लाखों वर्ष लगे होंगे। प्राणी जगत में एक बड़ी क्रांति तब आई जब मेरुदंड वाले प्राणी बनने लगे। ये थीं मछलियां। इसके बाद एम्फीबिया आये, जैसे मेढ़क। ये जल और थल दोनों जगह रह सकते थे। एम्फीबिया के बाद पेट के बल रेंग कर चलने वाले सरीसृप या रेप्टाइल जीव आये। फिर पक्षी और आखिर में स्तनपायी अथवा मैमल का आना हुआ। स्तनपायी का अर्थ ही है स्तन से दूध पिलाने वाला जाति-समूह। इसकी मादा जाति बच्चे देती है और अपने बच्चों को स्तन से दूध पिलाती है। इसके पूर्व के सभी जाति-समूह अंडज हैं, अर्थात अंडे से जन्मने वाले। हम मनुष्य इसी मैमल अर्थात स्तनपायी समूह से हैं।

चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (1809-1882)

जिस वैज्ञानिक ने बड़ी मिहनत से विकासवाद की इस सैद्धांतिकी को एक स्वरुप दिया उसका नाम चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (1809-1882 ) था। इस ब्रिटिश वैज्ञानिक ने कड़ी मिहनत से पांच साल (1831 से 36 ) तक बीगल नमक एक जहाज से कई द्वीप समूहों की यात्रा की। बहुत से जीवों, वनस्पतियों और जीवाश्मों (फासिल्स) का अध्ययन किया। जीवाश्म पत्थरों पर उभरे उन प्राणियों या वनस्पतियों के निशान हैं, जो अब नहीं हैं।

अर्चिओप्टेरिक्स एक ऐसा ही प्राणी था, जो अब जीवाश्म रूप में ही है। यह प्राणी सरीसृप और पक्षी के बीच की कड़ी है। इसकी चोंच में रेप्टाइल की तरह दांत है, लेकिन यह उड़ता रहा था, क्योंकि इसके पास पंख भी थे। यह सब हमें इसके जीवाश्म से पता चलता है। इस जीवाश्म के अभाव में हम विकास की गुत्थी को नहीं सुलझा सकते थे। ऐसी जाने कितनी गुत्थियों को, कितने जीवाश्म सुलझाते हैं।

1859 में डार्विन की प्रसिद्ध किताब प्रकाशित हुई ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज’। इसके छपते ही तहलका मच गया। व्यवस्थित ढंग से, साक्ष्यों के आधार पर प्रकृति और प्राणी जगत के लिए दैवी रचना का सिद्धांत ख़ारिज कर दिया गया। इससे चर्च और पादरियों की वैचारिक सत्ता पर चोट पहुंची और उन्होंने अपने तरीकों से प्रतिकार भी किया, जैसे पहले भी करते आये थे। किन्तु सच्चाई का प्रकटीकरण तो हो गया था। एक मौन वैचारिक क्रांति हो गयी। सैकड़ों वर्षों की सृष्टि निर्माण को लेकर बनी हमारी अवधारणाओं को इसने ध्वस्त कर दिया। 1871 में एक दूसरी किताब ‘डिसेंट ऑफ़ मैन एंड सिलेक्शन इन रिलेशन टू सेक्स’ में डार्विन ने मनुष्य के विकास की पहेली को सुलझाने की कोशिश की। इसी पुस्तक में उसने बन्दर जैसे किसी जीव से मनुष्य के विकास की बात बतलायी।

अब डार्विनवाद बहुत पुराना हो चुका है, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व अक्षुण्ण है और रहेगा। उसने हमें बतलाया कि यह दुनिया यकायक नहीं बन गयी। जीव भी यकायक नहीं बने। इनका क्रमिक विकास हुआ है। यह विकास अभी हो रहा है, आगे भी होता रहेगा। पिछली सदी के दार्शनिक नीत्शे ने इस विकास को लेकर ही सुपरमैन की एक सैद्धांतिकी विकसित की, जो कुछ मामलों में अत्यंत ही खतरनाक वैचारिकी है। लेकिन अब लगभग एकमत से स्वीकार लिया गया है कि दुनिया क्रमिक विकास द्वारा ही बनी है। यह आज भी विकासमान है, आगे भी रहेगा। अर्थात नैरंतर्य अथवा सतत निरंतरता प्राकृतिक धर्म है। यही विज्ञान है।

(कॉपी संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply