किन्नौर में बहु-पति प्रथा : ‘मैं अपने दोनों बेटों को कहता हूं कि वे एक ही लड़की से विवाह करें’

हिमाचल प्रदेश के जनजातीय इलाके किन्नौर में बहु-पति प्रथा है। सगे भाइयों की साझा पत्नी की यह प्रथा मैदानी इलाकों के लिए आश्चर्यजनक है। स्थानीय निवासी अमीर लामा बता रहे हैं कि किन्नौर के लाेग इस प्रथा का पालन कैसे करते हैं

(हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से उत्तर-पूर्व में करीब 250 किलोमीटर दूर स्थित है किन्नौर। बौद्ध धर्म यहां का मुख्य धर्म है, जिसका अनूठा संगम वहां की विशिष्ट प्राचीन देव-संस्कृति से हुआ था।  दरअसल यह देव-संस्कृति हिंदू धर्म का पर्याय नहीं है, बल्कि हिमालय के इस इलाके की विशिष्ठ संस्कृति है।

जून, 2018 में मैंने सपरिवार किन्नाैर और लाहौल-स्पीति की यात्रा की।  इस यात्रा के दौरान हमने दर्जनों लोगों से लंबी गपशप की। इनमें से एक थे किन्नौर के करला गांव के अमीर लामा।  

बौद्ध धर्म के अनुयायी अमीर लामा तीन भाई और पांच बहनें हैं। पिता शरब होज़ेर गांव के सांगोपांग लामा एवं क्षेत्र के चर्चित व्यक्ति थे। यह परिवार किन्नौर की बहु-पति प्रथा का पालन करता रहा है। अमीर लामा व उनके एक बड़े भाई की भी साझा पत्नी धर्म जङमो हैं तथा साझा विवाह से उनके चार बच्चे हैं। इनके छोटे भाई गृहस्थ जीवन से दूर हैं तथा बौद्ध भिक्षुक बन गए हैं। यह परिवार मध्य-हिमालय की प्राचीन परंपराओं व अनूठे स्थापत्य व कलाओं का भी वारिस है। स्वयं उनके घर में अनेक ऐसी बौद्ध-चित्राकृतियां व अन्य कलाकृतियां हैं, जिनकी उम्र संभवत: एक हजार वर्ष से अधिक की है।

अमीर लामा स्थानीय स्तर पर सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, लेकिन उनकी बातचीत में उस धूर्तता का अभाव है, जो प्राय: मैदानी इलाकों के समाज-कर्मियों में होती है। लेकिन  उनके विचार इतने रूढिवादी तथा शूद्रों और स्त्रियों के प्रति इतने प्रतिक्रियावादी हैं कि उन्हें सहन करना सामान्यत: कठिन था। लेकिन भारतीय समाज के यथार्थ-अध्ययन के लिए इन्हें जानना और आपको बताना मुझे आवश्यक लग रहा है।

अमीर लामा से यह बातचीत मैंने अपने मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड की थी, जिसे सहकर्मी प्रेम बरेलवी ने लिप्यांतरित किया है तथा नवल किशोर कुमार ने सुपाठ्य बनाने के लिए संपादित किया है। दोनों का आभार! – प्रमोद रंजन, प्रबंध संपादक, फारवर्ड प्रेस)


अमीर लामा से बातचीत – 2

  • एफपी टीम की भारत यात्रा

प्रमोद रंजन  : किन्नौर में बहु-पति प्रथा है। क्या आप लोग ने इसको लीगल (कानूनी) बनाने की मांग कभी सरकार से की? जैसे कि हिंदुओं की शादी हिदू मैरिज एक्ट के हिसाब से मान्य होती है। वैसे ही आप लोगों के लिए – आप आदिवासियों की  बहुपति प्रथा के लिए कोई कानून है?

अमीर लामा : इसका कोई लॉ (कानून) नहीं बना है। यह तो अपने कस्टम और समाज के मुताबिक है। कस्टम कहने का मतलब हमारा रिवाज है, जिसे हम निभाते हैं।

प्र. रं. : अभी कितने प्रतिशत लोग बहु-पति प्रथा के तहत विवाह कर रहे हैं?

अ. ला. : हमारे यहां इस तरह के विवाह को ञमफो पोसमा बाेलते हैं। यह अब कम हो गया है। अब 20 प्रतिशत लोग भी नहीं बचे, जो ञमफो पोसमा यानी, कॉमन मैरिज (बहुपति प्रथा) में हों। पहले सभी लोग करते थे। लेकिन अभी भी लोग काॅमन मैरिज कर रहे हैं। अभी हाल ही में  मेरे बेटे के हमउम्र लड़कों ने कॉमन मैरिज की है,और निभा रहे हैं।

प्र. रं. : कॉमन मैरिज का क्या लाभ देखते हैं आप?

अ. ला. : लाभ तो बहुत हैं। जैसे कि हम दो भाई हैं कॉमन मैरिज में। और हमारे चार बच्चे हैं। पर, मैं यहां आपके साथ मजे से बैठा बातचीत कर रहा हूं। बच्चों को लेकर मुझे कोई टेंशन नहीं है। भाई पूरा खर्चा वहन कर रहा है। दूसरा, परिवार नियोजन की जरूरत ही नहीं पड़ती। कॉमन मैरिज में बच्चे ज्यादा नहीं होते हैं।

प्र. रं. : बच्चे ज्यादा होंगे तो?

अ. ला. : बच्चे ज्यादा होंगे ही नहीं। बच्चे ज्यादा कैसे होंगे? यहां लावण गांव में पांच पतियों की एक घरवाली है, तो उनके तीन बच्चे हैं। ताे काहे को परिवार नियोजन करना? उन्हें परिवार नियाेजन करने की जरूरत ही नहीं है।

प्र. रं : आपके कितने बच्चे हैं?

अ.ला. : हमारे चार बच्चे हैं। हम तीन भाई हैं। सबसे छोटे भाई लामा हैं कुल्लू (भुंतर) में। हम दो भाई कॉमन (बहु-पति प्रथा) में रहते हैं। हमारे बड़े भाई वेटनरी (पशु चिकित्सालय) में हैं, रामपुर (किन्नौर) में। हमारे छोटे पिताजी ने अलग शादी की। इस कारण हमारे घर में झगड़े हुए। झगडे में उन्होंने बंटवारे के लिए अर्जी डाल दी। एक ही अर्जी में तहसीलदार ने ऑर्डर (आदेश) कर दिया कि इसका बंटवारा करो। तो मैं वहां गया और मैंने तहसीलदार से कहा कि सर, आपने ऐसा आदेश कैसे किया? हमारे किन्नौर के कस्टम (संस्कृति) के बारे में आप क्या जानते हैं? ताे तहसीलदार बोले- किन्नौर के कस्टम के बारे में क्या मतलब है? इसकाे हक नहीं है क्या अपने घर में? ताे मैंने कहा कि यह बात नहीं है। मैंने कहा कि हिंदू लोग ताे बड़े भाई की घरवाली को मां मानते हैं। मगर, हमारे किन्नौर में हम कॉमन मैरिज में रहते हैं। हमारे यहां बड़े भाई की पत्नी अन्य भाईयों की पत्नी भी होती है। और अगर आप जैसे साहब आ करके इस तरह बंटवारे का आदेश बिना हमारे रिवाज काे जाने-समझे देंगे, तो उससे तो हमारे लोगों को शह मिल जाएगी। बड़ा भाई शादी करेगा। कुछ दिन काॅमन (साझे) में रहेगा, फिर अलग शादी करेगा। महिला में कमी निकालेगा कि वह ऐसी है, वैसी है। इस तरह कमियां निकाल करके कुछ दिन बाद अलग शादी कर लेगा। तो हमारे इधर का माहाैल सब बदल जाएगा। बाहर वालों से निपटना आसान है। घरवालों से निपटना थाेड़ा मुश्किल है।

करला गांव में अपनी घर की छत पर अमीर लामा (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)

प्र. रं : आपके यहां अंतर्जातीय विवाह हाेते हैं? जाति से बाहर? होती होंगी तो उनका विरोध होता होगा?

अ.ला. : हमारे यहां अंतर्जातीय विवाह नहीं हाेते हैं। यदि हाेते हैं, तो उनका विरोध होता है।

प्र. रं : कॉमन मैरिज से पैदा हुए  बच्चे जब स्कूल जाते होंगे, तो फिर हिंदू एक्ट के अनुसार एक ही पिता का नाम लिखना होता हाेगा?

अ.ला. : यह प्रश्न आपने बहुत सही किया है। ऐसी समस्या आ रही है। क्योंकि, हम दो भाई हैं, तो दो भाई में क्या है कि बच्चे के स्कूल में एडमिशन के लिए, एक्सीडेंटल केस में या कहीं भी सर्टिफिकेट देना है या आप (एक भाई) नौकरी कर रहे हैं, नौकरी करते समय एक भाई काे कुछ हाे जाए, ताे उसकी पेंशन के लिए दिक्कत आती है। जैसे मेरा भाई नाैकरी कर रहा है और अगर उसको कुछ हो जाए, तो पेंशन लगाने के लिए मुश्किल….! अभी मैंने शादी की है, ताे घरवाली मेरे नाम से है, और भाई के नाम से नहीं चढ़ा हुआ है। तो यह क्या है, अभी कॉमन मैरिज काे कानून में नहीं लिया हुआ है। तो हिंदू कानून के मुताबिक सब होता है; इससे यहां पर बड़ी दिक्कत आ रही है। किसी को दाे-दाे, तीन-तीन पेंशन लगा रहे हैं, ताे उसमें सवाल उठा रहे हैं। मैं जब प्रधान था, तो मैंने साफ किया यह कि पत्नी का उसके सभी पतियों की पेंशन पर हक है।  

अपने पुराने घर में अमीर लामा (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)

प्र. रं : जैसे मान लीजिए कि तीन भाई हैं। शादी के बाद दाे की मृत्यु हो गई, तो दोनों की पेंशन मिलेगी पत्नी काे?

अ.ला. : हां, दोनों की पेंशन मिलेगी। इस पर ऑब्जेक्शन भी आया है कई बार। काफी क्वैरीज लगाकर इसे रोकने की कोशिश की, तो मैं बिलकुल नहीं माना। मैंने कहा कि यह हमारा कानून है। इसकाे पेंशन मिलनी चाहिए। उसकाे सभी भाइयाें ने अपने साथ पत्नी मानकर रखा है, तो उसको उनकी पेंशन मिलनी चाहिए। कई लोग उसको घुमा-फिराकर के, परिवार रजिस्टर को घुमा-घुमाकर राेकने लगे; तो मैं बिलकुल नहीं माना। मैंने कहा कि हमारे यहां यह चलता है, उसको उसका हक देना पड़ेगा।

कॉमन मैरिज में रहने वाला अगर सरकारी नौकरी में है तो उसकी मृत्यु के बाद पत्नी को पेंशन के मामले में दिक्कत आती है। पेंशन के मामले में यह कहते हैं कि आपकी पत्नी एक है। पति कई हैं? तो पर्टिकुलर पंचायत में नाम तो एक पति का ही लिखा हुआ है (अमूमन बड़े भाई का नाम होता है)। तो इस बारे में जो कस्टम (रीति-रिवाज) में है। अब जैसे मेरी पत्नी है, तो उसके आगे मेरा नाम चढ़ा हुआ है, पंचायती रजिस्टर  में; और मेरा भाई बाहर नौकरी करता है। मान लो मेरे भाई को कुछ हो जाए, तो मेरी पत्नी को उसकी पेंशन लेने में दिक्कत आएगी। इसका मुख्य कारण यह है कि यहां हिंदू लोगों को पंचायत में अधिकारी बनाकर भेजा जा रहा है और मुख्य बात क्या है कि हम भी अपने कस्टम को बोल (मतलब अपने रीति-रिवाज के बारे में बाहर के सरकारी नौकरों को बता) नहीं पा रहे हैं। वहीं, हमारे लोग, जो बाहर जाकर के आते हैं; वे बाहर उस तरह से नहीं देखते हैं, तो उन्हें यहां की शादी के रीति-रिवाज निभाने में तकलीफ होती है। तो यह हमारी भी कमी है। बच्चों को भी उसका (अपने रीति-रिवाज का) ठीक से नहीं पता हो पाता है।

प्र. रं : मैंने खबर देखी, भाजपा की वर्तमान सरकार में; यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयाेग) ने यह किया है कि विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए सिर्फ मां का नाम लिखना पड़ेगा। पिता का नाम लिखना जरूरी नहीं होगा। तो इससे कुछ तो राहत मिलेगी आप लोगों को?

अ.ला. : हां जी, हां; इससे राहत मिलेगी।

प्र. रं : आपके दो बेटे हैं। आप चाहेंगे कि वे कॉमन मैरिज करें?

अ.ला. : हां, मेरी यही इच्छा है। मैं उनको समझाता हूं। मैं उनको यह उदाहरण देता हूं कि खेताें की, जगह की कमी है। तो इस वजह से भविष्य में दूर की बात सोचते हुए एक ही शादी करें। अलग-अलग शादी करेंगे, तो दिक्कत हाेगी। मेरी तो चलो थोड़ी-बहुत जगह है। हम लोग थोड़ी-सी जमीन वाले, थोड़ी आय के संसाधन वाले हैं। लेकिन अगर हम ही अपने रीति-रिवाज को भूलकर इस तरह करेंगे, तो आगे की पीढ़ी या गरीब-गुरबा जो हैं, उसको अडॉप्ट करने (हमारे पदचिह्नों पर चलने ) की कोशिश करेंगे। तो इसलिए मैं अपने बच्चों को यह बोलता हूं कि हम इस तरह अपने रिवाजों को निभाएं ताकि दूसरों के लिए उदाहरण बनें। हमें देखकर कहीं ऐसा न हो कि जिनके पास जगह-जमीन नहीं है, वे लोग अलग-अलग शादी करने लगें, और एक दिन ऐसा आए कि उन बेचारों के पास जगह-जमीन ही नहीं बचे। एक दलित परिवार में मैंने देखा है कि उसमें बंटवारा होते-होते आज उनके पास मकान बनाने के लिए भी जगह नहीं है।

अमीर लामा और ध्रर्म जङमो (विवाह के कुछ समय बाद की तस्वीर)

प्र. रं : काॅमन मैरिज को तोड़ने वाले भी बहुत लोग होंगे आपके यहां?

अ.ला. : हां, तोड़ने वाले भी बहुत हैं। तोड़ने का भी मुख्य कारण यह है कि जाे पढ़ने के लिए बाहर जा रहे हैं, तो बाहर अलग-अलग सब देख रहे हैं। दूसरा, वहां पर लाेग मजाक उड़ाते हैं कि एक ही घरवाली के साथ सब भाई कैसे रह सकते हो? तो बाहर रहने वाले लोग शर्म के मारे इस तरह अपनी-अपनी शादी करने लगे। दूसरा, हमारे यहां शादी दो प्रकार से होती है। एक ताे लड़की को भगाकर ले जाते हैं। तो समझिए उसकी शादी हो गई। उसमें इस समय (बच्चे होने के बाद) में भी हम लोग शादी मनाते (करते) हैं। शादी मनाने में हमारे यहां लाेगों (रिश्तेदार आदि) को बुलाकर दावत वगैरह करते हैं। रिश्तेदार सामान वो सामान जो पहले कभी उनके यहां शादी वगैरह में दिया होता है, वह सब लाैटाते हैं। यह शादी काफी बाद में भी करते हैं। बच्चे भी बड़े हाे जाते हैं। ऐसे में बच्चे क्या बोलते हैं कि हमारे मां-बाप की शादी है। ताे नीचे (किन्नाैर के अलावा दूसरी जगहाें) के लोग मजाक उड़ाते हैं।

प्र. रं : समझ नहीं पाया!

अ.ला. : जैसे, मेरे पास कोई आय का साधन नहीं है और मुझे शादी करनी है। ऐसी स्थिति में मैं लड़की के परिवार के किसी जिम्मेदार आदमी को चुपके से बताउंगा कि आपकी लड़की के साथ शादी करनी है।

इसके बाद अपने दाे-चार दाेस्ताें काे बाेलूंगा और लड़की को जबरन उठाकर ले आऊंगा।

प्र. रं : दारोस कहते हैं उसकाे?

अ.ला. : दाराेस तो नहीं, जबरदस्ती करके ले जाने बाली बात होती है।

प्र. रं : उस शादी काे कहते क्या हैं?

अ.ला. : ऐसी शादी को टाबाेकीमा बोलते हैं। टाबाेकीमा बाेल करके लड़की उठा ली जाती है। उसमें लड़की रोती भी है। लड़की को जबरदस्ती लाते हैं, ताे हो सकता है कि उस लड़की को किसी और से प्यार हो; फिर भी उसको ले आते हैं और शादी कर लेते हैं। जबरदस्ती करके ले आएंगे और आराम से 10 साल बाद या 15 साल बाद भी समय देखकर पंडित काे पूछकर शादी कर लेते हैं। हम लोग उसकाे बड़ी शादी बोलते हैं। ताे उस शादी में बच्चे भी बारात में जाते हैं। यह हमारे यहां का रिवाज है। किन्नौर से बाहर के लोग मजाक उड़ाते हैं कि तुम्हारे यहां कैसी शादी हाेती है कि बच्चे बड़े-बड़े हो जाते हैं, तो मां-बाप शादी करते हैं।

करला में अमीर लामा का घर। लामा बताते हैं कि उनका यह घर कई सौ वर्ष पुराना है (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)

प्र. रं : हमारे उधर झारखंड में असुर आदिवासी हैं। उनके यहां एक होता है ‘घर ढुकु’। आपके यहां से ठीक उलटा होता है उनके यहां। उसमें होता यह है कि लड़का पसंद आ गया लड़की को या लड़की के मां-बाप को, तो लड़की उसके (लड़के के) घर में घुस जाएगी, तो उसको रखना पड़ेगा। रह गई, तो बच्चे हो जाते हैं। ऐसे में उनके बच्चों की शादी तब तक नहीं होगी, जब तक उनकी शादी नहीं होगी। तो फिर वे लाेग 15-20 साल बाद अपनी शादी करते हैं; उसमें बच्चे भी शामिल हाेते हैं।

अ.ला. : जी!अच्छा, दूसरा हमारे यहां एक अच्छी बात है कि हमारे यहां लड़कियों को इज्जत दी जाती है। आपके यहां लोग लड़का मांगने जाते हैं। हमारे यहां लड़की मांगने जाते हैं। इसमें लड़की के परिवार वालों से बड़ी मिन्नत (विनती) करनी पड़ती है। जैसे, लड़की की छाेटी बहनाें काे मनाना पड़ेगा। अगर लड़की की दस-पांच सहेलियां हैं, तो उनको भी मनाना पड़ेगा। उन्हें मनाने के लिए पांच, सात या नाै आदमी शराब की बोतल लेकर जाएंगे। बोतल के ढक्कन पर घी लगा होता है। इसे हम शगुन कहते हैं। हम लड़की की सहेलियों को घी का टीका लगाकर बोतल से थोड़ी-थोड़ी शराब देंगे। यदि उन्होंने स्वीकार कर लिया तो माना जाता है कि सहेलियों ने शादी के लिए रजामंदी दे दी। अगर उनकाे नहीं मनाएंगे, तो वे कहेंगी कि हमसे बिना पूछे ही लड़की को ले गए; तो वे पेनाल्टी (जुर्माना) लगाएंगी। अगर देर हो जाए बारात ले जाने में, तो गेट बंद करके रखेंगी। इसके अलावा जूताें का हार बनाकर रखेंगी। जूताें का हार पहना देंगी लड़के काे। फिर लड़के के जूते चुराकर रख देंगी। उस पर अलग से नेग लेंगी। बाद में जब खाना खिलाएंगी, ताे सबसे पहले लामा बैठेगा, उसके पीछे लाड़ा (मुख्य दूल्हा यानी दूल्हों का सबसे बड़ा भाई) बैठेगा और उसके पीछे उसके भाई (बाकी दूल्हे) बैठेंगे। ताे एक बड़ी, खुले मुंह की पानी से भरी (पांच, दस, पंद्रह लीटर की या उससे ज्यादा बड़ी) केतली रखेंगी। जब लड़के काे प्यास लगेगी, तो उसी केतली से उसे अपने हाथ से उठाकर लड़के को पानी पीना पड़ेगा। नहीं तो पानी नहीं देंगी; प्यासा रहना पड़ेगा। और उसे (पानी की केतली को) नहीं उठा पाने पर जुर्माना अलग लगेगा। पांच हजार, 10 हजार रुपए जुर्माना भरना पड़ता है। वह जो जुर्माना है, लड़की की सहेलियाें का हाेता है।

प्र. रं : बहु-पति प्रथा के बारे में और कुछ बता पाएंगे? कैसे पालन करते हैं इसका? उनकी दिनचर्या कैसी रहेगी?

अ.ला. : हमारे यहां पास में लावण गांव है। उस गांव में पांच भाइयों की एक पत्नी है। लेकिन हमारे यहां का रिवाज ऐसा है कि सब निभ जाता है। कहीं कोई परेशानी नहीं होती।

अमीर लामा के निजी बौद्ध उपासना गृह में लगी पेंटिंग्स। उनके उपासना गृह में मौजूद ये वॉल पेंटिग्स सैंकडों वर्षों पुरानी हैं (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)

प्र. रं : ऐसा बहुत कम होता होगा कि इतने पति हों। अधिकतर तो दो या तीन भाई होते होंगे?

अ.ला. : होते हैं, तीन-चार भाई भी होते हैं। लेकिन, ऐसा बहुत कम होता है कि पांच पति हों। पांच तो ज्यादा हैं। लेकिन, जहां तक निभाने की बात है; जैसे चार भाई हैं, उन्होंने शादी की एक महिला से। उसमें वह (पत्नी) रात को एक के पास सोएगी। फिर दूसरे के पास जाएगी। फिर तीसरे के पास। तो उसको सोना भी तो है। तो ऐसे में वह किसी को दिन में भी टाइम देती है, किसी को रात में; और इसका फैसला औरत ही करती है। फिर काम पर भी जाएगी; उसे सब काम भी करना है। तो जब वह खाना बनाने के बहाने घर में बैठेगी, तब सारे भाइयों को समझाकर या प्यार जताकर संतुष्ट करेगी। लेकिन, संतुष्ट करने के बाद वह खेतों में नहीं जाएगी।

प्र. रं : खेतों में नहीं जाएगी, तो खेतों का काम कैसे होगा?

अ.ला. : जो रात को उसके साथ सोया; वह जाकर खेतों का काम करेगा। वह (पत्नी) सबको संतुष्ट कर लेती है; सबको एडजस्ट कर (निभा) लेती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि जिस (भाई) की प्रसिद्धि ज्यादा है, उसके साथ ज्यादा समय बिताती है। जो थोड़ा सुंदर नहीं है या कम पैसे कमाने वाला है, उसके साथ ज्यादा टाइम नहीं लगाती है। तो डबल शादी करने का एक यह भी कारण हो गया है। अन्यथा तो पत्नी अच्छी है, समझदार है;  चाहे सुंदर है या नहीं है, सबको एक साथ नहीं रखती अपने साथ। एक-एक करके वह रखेगी; और सभी पतियों में अपनापन बनाए रखना पत्नी के ही हाथ में है।

अमीर लामा का वृहत परिवार, पुरानी तस्वीर

प्र. रं : क्या ऐसा भी होता होगा कि चार भाइयों में दो ने एक ही पत्नी से शादी की और दो ने अलग-अलग शादी कर ली?

अ.ला. : ऐसा भी है, कहीं-कहीं।

प्र. रं : तलाक की क्या व्यवस्था है आपके यहां?

अ.ला. : तलाक में हमारा सीधा यह है; जैसे किसी से झगड़ा हो जाता है, जैसे- लड़का-लड़की में नहीं बनती है; तो भिष्टू (विवाह करवाने वाला सम्मानित बिचौलिया) आएंगे और लड़का-लड़की के घर वाले भी आएंगे; कहीं बैठेंगे, किसी एक के यहां। जैसे, अगर लड़की ने गलत किया है, तो लड़के के घर में जाएंगे और लड़के ने गलत किया है, तो लड़की के घर में जाएंगे। वहां जाने के बाद लड़का-लड़की का बयान लिखित में दर्ज करेंगे। इसके बाद एक सूखा लक्कड़ (लकड़ी) लाएंगे। सूखे लक्कड़ को दो आदमी दोनों छोर से पकड़ेंगे, उसके बाद उसको तोड़ेंगे; तोड़कर के बोलेंगे कि आज के बाद हमारा-आपका कोई संबंध नहीं है। इस तरह से हमारे यहां तलाक होता है।

प्र. रं : क्या तलाक के बाद दोनों शादी कर सकते हैं, अपनी-अपनी इच्छा से?

अ.ला. : हां, उसके बाद दोनों शादी कर सकते हैं।

प्र. रं : अगर कॉमन मैरिज की है, तो कैसे तलाक करेंगे?

अ.ला. : कॉमन मैरेज में सब भाई एक साथ में जाएंगे तलाक देने।

प्र. रं : अगर मान लीजिए एक भाई को तलाक लेना है तो?

अ.ला. : एक भाई को तलाक लेनी है, तो जैसे मान लो उसने अलग शादी कर ली; तो उसमें (कॉमन मैरिज वाली पत्नी से) कोई तलाक नहीं होगा। मगर उसको अलग शादी करने की स्थिति में यह होगा कि सबसे पहले भिष्टू लोग उसके मायके (किसी एक भाई से विवाह करने वाली लड़की के घर) में जाएंगे, उनको मनाएंगे कि वह (लड़का) पहले से शादीशुदा है। फिर लड़की के घर वाले उनसे पैसा, खर्चा-पानी मांगेगे, तो वह शादी, जो किसी भाई ने अलग कर ली है, तोड़ी जाएगी। अगर मान लो पहले से कॉमन मैरिज है, फिर भी अलग शादी कर ली और अलग चला गया रहने। और इधर कॉमन पत्नी से अगर बच्चा पैदा हो गया उसके (अलग शादी करने वाले के) नाम से, तो उसके (बच्चे के) खर्च का उस पर (अलग शादी करने वाले भाई पर) दावा करेंगे। अगर अलग शादी करने वाला भाई नौकरी कर रहा है, तो इसमें ऐसा भी प्रावधान है कि उसकी पत्नी (जो अन्य भाइयों की भी कॉमन पत्नी) है, वह जगह-जमीन के कागजों में उस अलग शादी करने वाले भाई का नाम नहीं चढ़ाने देगी।

किन्नौर का एक स्थानीय व्यंजन साक्षात्कारकर्ता प्रमोद रंजन (दाएं) को परोसते अमीर लामा (बाएं)। इस स्थानीय व्यंजन को वहां की विशिष्ट नमकीन चाय के साथ ग्रहण किया जाता है (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)

प्र. रं : अगर मान लें कि अलग शादी करने वाले भाई का नाम महिला (कॉमन पत्नी) के पति के रूप में नहीं दर्ज हुआ हो तो?

अ.ला. : हां, दूसरे भाई का नाम हुआ; तब तो नहीं कर पाएगी। क्योंकि, हमारे यहां यह कानून ही नहीं है।

प्र. रं : लेकिन, सामाजिक रूप से उसको पैसा देना पड़ेगा?

अ.ला. : हां, सामाजिक रूप से उसको पैसा देना पड़ेगा।

प्र. रं : तो वह जो भाई है, जिसने अलग शादी कर ली, उसकी कॉमन पत्नी से तलाक तब भी नहीं होगी?

अ.ला. : नहीं, कॉमन पत्नी से तलाक तब भी नहीं होगा।

प्र. रं : मान लीजिए शिमला में कोई नौकरी कर रहा है और उसने वहां शादी कर ली। कॉमन पत्नी से बच्चा है, पैसा भी देना पड़ा उसे। और वह कभी घर आएगा, तो क्या वह अपनी कॉमन पत्नी के साथ सो पाएगा?

अ.ला. :  नहीं सो पाएगा।

प्र. रं : (कॉमन) पत्नी ही अनुमति नहीं देगी या भाई भी इसका विरोध करेंगे?

अ.ला. : ऐसे में तो झगड़ा ही हो जाएगा। फिर वह आएगा ही नहीं। कई लोग तो ऐसा भी करते हैं कि बाहर रहते हैं, तो शर्म से अलग शादी कर ली और यहां आए तो अपनी कॉमन पत्नी के साथ रहे; फिर चले गए और अपनी पत्नी (अकेले जिससे शादी की) के साथ रहते हैं। ऐसे में उनके भाई और परिवार के लोग अच्छे हैं, तो निभा भी लेते हैं।

 

प्र. रं : कइयों की मजबूरी भी होगी। जैसे कोई एक भाई आईएएस अधिकारी हो गया; उसके दूसरे भाई गांव में छूट गए, तो वैसे ही दबाव में रहेंगे कि उतना विरोध नहीं करते होंगे शायद। संबंध बनाके रखना चाहेंगे उससे कि काम पड़ेगा, क्योंकि वह आईएएस है।

अ.ला. : हां जी, हां जी; ऐसा भी है।

प्र. रं : लेकिन कॉमन मैरिज में तलाक संभव नहीं है। और अगर तलाक हो भी गया, तो वैसे ही लकड़ी तोड़कर करते होंगे?

अ.ला. : नहीं, ऐसा नहीं होगा। सिंगल मैरिज में ही होगा तलाक, कॉमन मैरिज में होगा ही नहीं। सीधा उसको खर्चा देंगे। न उनको लक्कड़ काटना होगा, न कुछ और करना होगा।

प्र. रं : यदि कोई महिला चाहे तो कोर्ट में भी तलाक नहीं होता होगा?

अ.ला. : कोर्ट में करते नहीं अक्सर लोग। पर, कई लोग कॉमन मैरिज में करते हैं ऐसा।

प्र. रं : कोर्ट में कैसे करते होंगे केस? यह बताना पड़ता होगा कि पांच पति हैं; या चार पति हैं।

अ.ला. : हां, इसमें बताना होगा। एक कल्पा साइड की भीमसेन तहसीलदार हैं। उन्होंने एक केस में, जिसमें एक भाई ने केस किया कि मेरे नाम पर लड़के (कॉमन पत्नी से पैदा हुए पुत्र) का नाम गलत चढ़ाया हुआ है। जब शादी हुई और बच्चा जब पैदा हुआ, तब मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था। जब (मेरे भाइयों की) शादी हुई मुझे छुट्टियां नहीं मिलती थीं। तो यह बच्चा मेरे से कैसे हो सकता है? मेरी हाजिरी चेक कर लीजिए। …अच्छा, हमारे यहां शादी होने के बाद बकरा कटता है रात को। उसमें सारे भाई लाइन में बैठेंगे; या बच्चे हैं, तो वे भी बैठेंगे। उसमें सबसे पहले बाप बैठेंगे, फिर मां बैठेगी और उनके बीच में एक पति दुल्हन का भाई बनकर बैठेगा, सिर्फ उस दिन के लिए। और अगर पतियों में कोई एक भाई नहीं होगा, तो उसकी जगह एक छुरी रखेंगे। …तो उन्होंने भीमसेन तहसीलदार ने कहा कि तेरे बदले में छुरी रखी गई थी कि नहीं? उसने कहा कि रखी गई थी। तब तहसीलदार बोले कि उसका कोई प्रूफ है, जो रिटर्न में भिष्टू लोग लिखते हैं। तब वह फाइल पेश की गई, उसमें उसका नाम था, पति के रूप में। तब उन्होंने कहा कि तू उसको (कॉमन पत्नी को) नहीं छोड़ सकता। तू जो है यूनिवर्सिटी में था या जहां भी था;  तेरे बदले में छुरी रखी गई। इसलिए, तुझको उसे पत्नी मानना पड़ेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि यहां घुनसा और हुलसा होते हैं। …आपको बता दूं कि भेड़-बकरी चराने वालों को घुनसा और हुलसा बोलते हैं। घुनसा और हुलसा का मतलब- जैसे ही गर्मियों में भेड़-बकरियां ऊपर ले जाता है, उसे हुलसा बोलते हैं। सर्दियों में जो भेड़-बकरियों को नीचे ले जाता है, उसे घुनसा बोलते हैं। …तो तहसीलदार कहने लगे कि हमारे यहां फुआलों में तो सर्दियों में घुनसा जाता है। गर्मियों में हुलसा जाता है, तो वह कब सेक्स करेगा? कोई इसका प्रूफ दे सकता है? तू जब यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था, तो हमें क्या मालूम कि वहां से कब आया और सेक्स करके चला गया। तू हो सकता है कि हेलीकॉप्टर में आ करके एक दिन में सेक्स करके चला गया हो। बच्चा तो एक दिन में भी रह जाएगा। तो इस तरह भीमसेन तहसीलदार ने उसे नहीं छोड़ा।

किन्नौर में बहु पति प्रथा है। इस तस्वीर में सबसे बाएं ध्रर्म जङमो (अमीर लामा और उनके बड़े भाई की साझा पत्नी), अमीर लामा स्वयं और उनके बगल में उनके दोनों पिता (पुरानी तस्वीर)

बाजला अरस (किन्नौर में बना स्थानीय कानून, जो स्थानीय सरकार ने बनाया हुआ है) में तो यह भी लिखा हुआ है कि सभी भाइयों के पर्टिकुलर नाम भी लगाना जरूरी नहीं है, कॉमन मैरिज में। बड़े भाई का लगाओ, चाहे छोटे भाई का लगाओ। जगह-जमीन के मामले में ऐसा होगा कि राम, श्याम और मोहन (यानी बड़े भाई से छोटों के नाम क्रमशः चढ़े होंगे) । राम मर जाएगा, तो श्याम का नाम जगह-जमीन में चढ़ेगा। और श्याम के मरने के बाद मोहन का नाम चढ़ाया जाएगा। उसके बाद में जितनी भी औलादें हैं, उनके नाम में बराबर में बंटेगी जगह-जमीन। जो महिलाएं चतुर हैं, वे तो नाम बदल-बदलकर लगा देंगी। जैसे, किसी महिला के चार पति हैं, तो चार बच्चों में एक-एक के आगे एक-एक बाप का नाम लगवा देगी। आजकल तो नए-नए कानून बन गए हैं। इसमें वकील लोग क्या करते हैं कि किसी का भी नाम चढ़ा दिया। पहले क्या करते था सरकारी कर्मचारी कि हर किसी के नाम से लगा देता था। कहीं बड़े भाई के नाम से, कहीं छोटे भाई के नाम से लगा देता था। बेचारी औरतें ऐसी भी हैं कि एक भाई बोल देता है कि मेरा नाम लगा के आना बच्चे के आगे, तो उसका लगा दिया ग्राम पंचायत में। कोई बोलता है कि मेरा लगा दे, तो उसका लगा दिया।

प्र. रं : नाम बदल-बदलकर कैसे लगाती हैं? क्या जमीन में या पंचायती रजिस्टर में?

अ.ला. : जैसे मतलब यह है कि मैं पैदा हुआ। तो मेरी मम्मी ने कहा मेरा लड़का हुआ है, इसको एक बाप के नाम पर लगा दो।

प्र. रं : मतलब एक पैदा हुआ, तो एक पिता के नाम पर लगा दिया; दूसरा पैदा हुआ, तो दूसरे का नाम लगा दिया?

अ.ला. : हां जी, हां जी; इस तरह करते हैं। तो इस स्थिति में मां भी चुस्त होती है; बाप भी चुस्त होता है। अगर किसी (एक भाई) की नीयत में खोट होता है, तो वह चुपके से (बच्चे के नाम को) अपने नाम पर नहीं लगाएगा, बड़े भाई का नाम लगा देगा। तो मां अगर चतुर होगी, तो वह समझ जाएगी कि यह बिगड़ा हुआ आदमी है। इसलिए, वह क्या करेगी कि बड़े भाई का (जिसके साथ शादी हुई उसका) नाम न लगाकर सबसे पहले सबसे छोटे भाई भाई का नाम जोड़ देगी। अन्यथा सबसे पहला हक तो बड़े भाई का है। शादी भी बड़ा भाई करेगा। बारात में भी लाड़ा (दूल्हा) बनकर भी बड़ा भाई जाएगा। पहले सेक्स करने का अधिकार भी बड़े भाई का ही होता है। इतना होने के बावजूद भी अगर मां चुस्त होगी, तो बच्चे का नाम जो है, छोटे भाई के नाम से पहले जोड़ेगी।

प्र. रं : इससे क्या फायदा है?

अ.ला. : वही तो राम, श्याम और मोहन वाला जो उदाहरण दिया; उसमें दिक्कत आ रही है। तो हिंदू लॉ करके तहसीलदार लोग और वकील लोग क्या कर रहे हैं कि किसी भाई का नाम चढ़ा दिया, किसी का नहीं चढ़ाया; तो नाम पर अड़ जाते हैं कि भई इस बच्चे के नाम में इसका (पिता के रूप में) नाम नहीं है, तो इसका हिस्सा (संपत्ति आदि) इसको (बच्चे को) कैसे मिलेगा?

करला गांव में बने बौद्ध मंदिर में पूजा करने जाते लोग (तस्वीर : एफपी ऑन रोड, 2018)]

प्र. रं : तो पुरुष क्या चाहता है कि बच्चा मेरे नाम से हो?

अ.ला. : नहीं, कई पुरुष तो यह चाहते हैं कि बच्चा उसके नाम से न हो। वह चाहता है कि जब तक मेरी शादी नहीं हो रही है, मैं उसके (कॉमन पत्नी के) साथ रहूं; बाद में जो है मैं दूसरी शादी कर लूं। तो यह मैंटेलिटी जो है, वह खतरा बन रही है।

प्र. रं : अच्छा, संपत्ति का मालिकाना हक किसके पास होता है?

अ.ला. : संपत्ति का मालिकाना हक पुरुष के पास हाेता है। महिलाओं को कोई अधिकार नहीं है; न घर-जमीन खरीदने का, न बेचने का। महिलाओं के पास क्या है? जैसे- अगर वह शादी न करके मायके में बैठेगी, तो इस स्थिति में, जब तक उसकी जिंदगी है; तब तक उसको खर्चा-पानी देंगे। उसे घर में रहने की जगह देंगे; कमाने के लिए खेत या खर्च के लिए रुपया-पैसा देंगे। इसके अलावा महिलाओं को कोई अधिकार नहीं है।

प्र. रं : किन्नौर में महिलाओं की क्या स्थिति है? दो-तीन चीजें मैंने देखीं।जबरन उठाकर शादी करते हैं, उससे तो स्पष्ट है कि महिलाओं की स्थिति बहुत ही खराब होगी। फिर जो बहु-पति प्रथा है; उसको अगर दूसरे दृष्टिकोण से देखें, तो भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति दासी की होती है। यहां तो उसे लगभग-लगभग दो-तीन पुरुषों का काम करना पड़ता है। एक चीज आपने और बताई कि संपत्ति का अधिकार महिलाओं को नहीं है। लेकिन, आप कहते हैं कि महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी है। हम महिलाओं का सम्मान करते हैं..

अ.ला. : हमारा यह मानना है कि जैसा आपने कहा सबसे पहले जगह के बारे में महिलाओं को अधिकार नहीं है, तो इसके बारे में हमारे पूर्वजों ने बनाया हुआ है कि जैसे किसी लड़की की चार पतियों से शादी हो जाती हैं। तो जब हम शादी करने के लिए जाते हैं, तो वहां ससुराल में लिखा जाता है कि अगर इसको (लड़की को) कोई तकलीफ होती है; या तंग किया जाता है; तो उसको ता-जिंदगी, जब तक वह जीती है; एक-एक चीज का, जैसे- मकान और दहेज में गाय, भैंस, बकरी देना है। जमीन या फिर पैसा भी जरूरी हैं; जिसके पास ज्यादा जगह-जमीन है, वह बगीचे का कुछ हिस्सा लिख करके देता है। इसके अलावा शादी नहीं करके जो महिलाएं घर (मायके) में बैठती हैं; यहां पर ऐसा भी है कि हमारी कई महिलाओं की शादी नहीं होती। वे घर में बैठती हैं; तो उनको जिंदगी जीने के लिए खर्चा दिया जाता है। जैसे मेरा यह मकान है। मान लीजिए मेरी बहन ने शादी नहीं की तो उसको एक कमरे का किराया या रहने के लिए जगह दी जाएगी। उसका जो  किराया लेना चाहे, या जो भी करे, वह कर सकती है। यानी उस संपत्ति पर उसका अधिकार बना रहेगा। तो हमारे किन्नौर में देखिए, जगह-जमीन की वैल्यू कितनी है। तो जब तक उसकी (महिला की) जिंदगी रहती है, तब तक उसको उपयोग भी करेगी। ऐसा भी होता है कि जमीन के लालच में कई लोग महिलाओं को मार-काटकर जमीन अपने नाम कर लेते हैं। ऐसा कई जगह हुआ है। ऐसी जमीन जो बच्चे के नाम पर हो गई, वह तो बच जाती है। लेकिन, जो महिला को मिल गई. तो इस तरह के लोग उन्हें बेवकूफ बनाकर के शादी करेंगे; इस तरह शादी का लालच देकर जमीन लेंगे। तो वे लोग खुश हैं कि उनको जमीन नहीं मिल रही है, उनको तो जिंदगी के लिए सब कुछ साधन मिल गया, तो वे खुश हैं। दूसरी बात यह है कि उसको (कॉमन मैरिज करने वाली महिला को) कई पतियों का काम करना पड़ता है, उसमें हमने ऐसा नियम बनाया है; जैसे- हम तीन भाई हैं, तो हम लोग क्या करते हैं कि आज एक भाई घर में हैं, तो मैं कहीं बाहर जाऊंगा। मैं घर में हूं, तो दूसरा भाई कहीं बाहर काम से जाएगा। यानी हम साथ नहीं बैठेंगे। रुटीन जो है, वह महिला खुद बना देगी। कभी उनका दिन को, कभी-कभी उनका रात को होगा काम। कभी दोपहर के बाद होता है। दूसरा, यह महिला यह मानकर चलती है कि उसको मर्द से ज्यादा ही अधिकार है। इस तरह से महिला संतुष्ट करती है सभी पतियों को। मैंने देखा है अपनी लाइफ में पहले भी मैं देखता रहा कि एक से अधिक पतियों के साथ ‘काम’ करने से किसी को ऐसा नुकसान नहीं हुआ है। उलटा मैंने देखा कि बहु-पति को लेकर महिलाएं बहुत खुश रहती हैं। उसको किसी भी चीज में खर्चा पानी में, दूसरी चीजों को कोई तकलीफ नहीं होती। कोई कमी नहीं होती है; कुछ भी। इसलिए, वह बहुत खुश रहती है।

प्र. रं : और बाकी घरेलू जो काम होते हैं, उसको कैसे बांटते हैं? क्या घरेलू कामों में पुरुष सहयोग करते हैं?

अ.ला. : बिल्कुल, बिल्कुल सहयोग करते हैं। बर्तन धोने से लेकर दूसरे कामों में और हमारी महिलाएं तो बहुत ज्यादा काम करती हैं। दिन भर काम करती हैं। खाना बनाने से लेकर पतियों के लिए काम है, वह करना। वह भी बड़ी खुश होकर सारे काम करती हैं। उनको कोई दुख नहीं है। कई बार उसे बाहर जा करके दूसरे काम भी करने पड़ते हैं। ऐसा केस हमारे को देखने को नहीं मिलता कि पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है। हमारे यहां भी लो-कास्ट के जो लोग हैं; उनमें एक पति है, वहां हमने देखा है कि झगड़ा बहुत ज्यादा होता है। कहने का मतलब यह है कि जिस औरत का एक पति है, उसमें झगड़ा बहुत ज्यादा देखा गया है। लेकिन, बहु-पति वाले में झगड़ा नहीं होता। जैसे, मैं यहां पर हूं, मेरे भाई भी हैं; उसकी (पत्नी की) काम-भावना की भी पूर्ति होगी और काम भी हो रहा है। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का काम भाई देख रहा है। मैं खाली हूं, तो मैं देख रहा हूं। इस तरह जहां तक मेरा है, आज हम गर्व से कह सकते हैं कि यह प्रथा सही है। अगर हम अलग-अलग शादी कर लेंगे, तो यहां से हमारा बंटवारा हो जाएगा। तो जगह-जमीन थोड़ी-थोड़ी हो जाएगी। इस तरह से भाई-भाई में झगड़ा भी होगा।

प्र. रं : अच्छा, दलितों में बहु-पति प्रथा है कि नहीं है?

अ.ला. :हां उनमें भी  बहु-पति प्रथा है। लेकिन कम है। दलितों में कई ने कॉमन मैरिज की थी; वे लोग लड़ाई करके कई जहर खा करके मरे भी हैं। कोर्ट मैरिज भी करने वाले हैं इनमें।

प्र. रं : महिला या पुरुष?

अ.ला. : पुरुष। क्योंकि, महिला है उसके दो-तीन पति हैं; तो वह तो सबके साथ संभोग करेगी ही। मगर, दूसरा पति यह बोलता है कि मेरे को कम समय दे रही है तू; ऐसे दूसरा बोलता है- तू मेरे को कम समय दे रही है। तो इस तरह वे आपस में झगड़ा करते हैं और इसके साथ ज्यादा समय दे रही है कि उसको ज्यादा। तो दोनों को एक तरह से वह प्यार नहीं दे पाती। इस तरह झगड़ा करके जहर तक खा लेती है। लोअर कास्ट में ऐसा ज्यादा हो रहा है।

प्र. रं : अच्छा, अजंता-एलोरा में कई मंदिरों में सामूहिक रति-क्रिया की मूर्तियां हैं। कॉमन मैरिज में..?

अ.ला. : कॉमन मैरिज में ऐसा है कि दो भाई हैं, आपस में उनकी थिंकिंग अच्छी है; तो वे ऐसा करते हैं। कुछ भाई, जिनमें आपस में प्रेम होता है, तो दोनों एक साथ रह करके एक ही पलंग पर सोकर इस तरह कर लेते हैं। ऐसा देखने को मिलता है।

प्र. रं : इसे बुरा नहीं माना जाता है क्या?

अ.ला. : इसको बुरा नहीं माना जाता। ये कुछ लोग हैं ऐसे। पहले तो इतने कमरे ही नहीं थे। एक ही कमरे में बैठते थे, एक ही में रहते थे, एक ही में सोते थे। तो पहले तो ज्यादातर लोग सामूहिक ही करते होंगे।

प्र. रं : क्या यहां बहु-पत्नी प्रथा भी है। मतलब एक पुरुष कई महिलाओं से शादी कर सकता है? या सिर्फ बहु-पति प्रथा है?

अ.ला. : हमारे यहां बहु-पत्नी प्रथा नहीं है। ऐसा तो ठरकी लोग ही कर सकते हैं!

(समाप्त)

(लिप्यांतरण : प्रेम बरेलवी, कॉपी संपादन : प्नेम/नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

 

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply