आर्य बनाम हिंदू : एक विश्लेषण

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि आर्यों के ऋग्वेद में सिंधु तो है, ‘हिन्दू’ शब्द नहीं है। आर्यों का मुकाबला यहां पहले से रह रहे हिन्दुओं से हुआ। भारतीय इतिहास का इतना अधिक आर्य-केंद्रित होना भी, हमारे इतिहास-अध्ययन की एक बड़ी कमजोरी कही जाएगी

जन-विकल्प

आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ, यानी सम्मानित या ऊंचा। संस्कृत साहित्य में, सम्बोधन के रूप में यह वैसे ही प्रयुक्त होता था, जैसे आज की भाषाओं में महोदय, श्रीमान या ‘सर’ होता है। कालांतर में धीरे-धीरे यह जातिवाचक संज्ञा हो गया और फिर विशेषण भी बना। हम सब ने देखा है कि किस तरह धीरे-धीरे यह एक खास मानव-जाति के लिए प्रयोग में आने लगा। जैसे आर्यजन कहने का अर्थ हुआ श्रेष्ठ अथवा भद्रजनों की एक जाति। बौद्धों ने इस शब्द का विशेषण के रूप में प्रयोग किया। जैसे चार आर्य-सत्य (अरिया सच्चानि ) और आर्य अष्टांगिक मार्ग। पालि या पलिया भाषा में इसे अरिया कहा गया है। संस्कृत शब्दकोष के अनुसार आर्य शब्द के मूल में ऋ धातु है, जो गत्यर्थक यानि गति अर्थ में है। इसे अर धातु से भी जोड़ा गया है, जिसका अर्थ पहिया बताया गया है। हालांकि पालि भाषा में अर का मतलब पहिये में लगा आरा या स्पोक होता है। संभव है चक्का में ‘अर’ जुड़ जाने के उपरान्त वह चक्र कहा जाने लगा हो। अंततः यह चक्र पहिये के लिए प्रयुक्त होने लगा। दोनों अर्थों के अनुसार आर्य का मतलब हुआ गतिमान। मानव यदि गतिमान है, तो वह घुमक्कड़ अथवा खानाबदोश होगा। घुमक्कड़ तो व्यक्ति होता है। यदि कोई जाति या समूह घुमक्कड़ है, तो वह खानाबदोश है। खाना-ब-दोश, यानी कंधा ही हो घर जिसका। आर्य सम्भवतः ऐसे ही थे। लेकिन अर्थों की दुनिया इतने भर नहीं है। संस्कृत विद्वान एच. डब्लू. बेली ने अर धातु का अर्थ प्राप्त करना बताया है। इतिहासकार रामशरण शर्मा एक भिन्न अर्थ रखते हैं। उन्होंने आर्य में ‘अर’ धातु को तो चिह्नित किया, परन्तु इसका अर्थ कृषि से जोड़ा। इसे उपिन्दर सिंह ने भी अपनी किताब में रेखांकित किया है। लेकिन यदि ऐसा है तो रामशरण शर्मा खाना-ब-दोश और घुमक्क्ड वाले अर्थ को पूरी तरह बदल देते हैं। क्योंकि कृषि वैसे लोगों का व्यवसाय है, जो गतिमान नहीं हैं। यह स्थिरता की अपेक्षा करती है। इसलिए कोई जाति घुमक्कड़ और स्थिर एक साथ नहीं हो सकती है। हाँ, कोई गतिमान समूह कालांतर में कृषि कार्य से जुड़ कर स्थिर हो सकता है।

आर्य से आर्यावर्त और हिंदू से हिंदुस्तान 

प्रश्न यह भी है कि क्या कोई समूह अपनी संज्ञा स्वयं ही निश्चित करता है? पिछली शताब्दियों में अंग्रेजों को फिरंगी या म्लेच्छ किन लोगों ने कहा था? स्वयं अंग्रेजों ने नहीं, दूसरों ने। आर्य लोगों को भी यह नाम अन्य ने दिया होगा और बहुत संभव है कि यह शब्द उनकी भाषा का हो, जिन्होंने यह नाम दिया। इसके अर्थ संधान भी हम सम्बद्ध भाषा से ही प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए आर्य शब्द के अर्थों में नहीं उलझ कर हम इतना ही जान सकें कि उनकी प्रकृति-प्रवृति क्या थी, तो बेहतर होगा।

मैंने यह बताया है कि उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक किस प्रकार यह आर्य शब्द यूरोप के भद्रलोक में भाषा विज्ञान के लिबास में घुमड़ता रहा और भाषा विज्ञान की दुनिया से उठ कर नस्लवादी राजनीति के रूप में विकसित हुआ और तब दुनिया भर में एक कोहराम खड़ा हो गया। भारत के अभिजात व प्रश्रय-प्राप्त हिन्दुओं के इतिहास-प्रेमी तबके ने पश्चिमी जगत के इस बौद्धिक आवेग को एक अवसर के रूप में लिया। उन दिनों भारत पर ब्रिटिश शासन था। पौर्वत्यवादी और थिओसोफिकल सोच वाले यूरोपियनों ने भारत के अभिजात तबके से भाईचारा विकसित करने का इसे माध्यम बनाने की कोशिश की। कोशिश सफल रही। उस वक़्त भारतीय भद्रलोक का मुख्य केंद्र कोलकाता (1 जनवरी 2001 के पूर्व कलकत्ता) शहर था, जो ब्रिटिश भारत की राजधानी भी थी। भारत के ‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकारों ने भी पश्चिमी बुद्धिजीवियों की समझ के समक्ष स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। इसके दो प्रधान कारण थे। पहला कि ये बुद्धिजीवी मध्यवर्ग के नहीं, जमींदार और सामाजिक रूप से कुलीन तबके से थे। और दूसरे कि ये लोग शासक जाति से संबंध स्थापित करने के लिए व्याकुल थे। यह जरूर था कि ड्राइंग रूम में बैठ कर कभी-कभार अपनी राष्ट्रीयता की जुगाली भी करते थे; लेकिन उनका राष्ट्र ही बहुत सीमित था। वे अपने ही तरह के प्रश्रय-प्राप्त एक छोटे-से घेरे या समूह को भारत समझते थे। जो थोड़े उदार थे और जिन्होंने आगे जाकर अपने को सेक्युलर कहना शुरू किया, उनमें भी इतना ही अंतर था कि वे हिन्दुओं के द्विज तबके के साथ मुसलमानों के अशराफ तबके को अपने साथ टैग करते थे। मिहनतक़श तबकों और सामाजिक मामलों में वंचित तबकों; जैसे आदिवासियों और दलितों, के नजरिये की चिंता किसी को नहीं थी। जो हिन्दू राष्ट्रवादी थे उनका आदर्श समाज आर्यों द्वारा ‘सुरचित’ वैदिक-समाज था, जिसकी ओर समृद्धवेग से वे बढ़ना चाहते थे। वे अनजाने में राष्ट्र के भीतर एक कुलीन अथवा अपने वर्चस्व वाले राष्ट्र का स्वप्न देखने लगे। उन्होंने समझा ही नहीं कि अंग्रेजों और अन्य यूरोपियनों के सांस्कृतिक जाल में वे बुरी तरह उलझ कर रह गए हैं। एक सांस्कृतिक शीतयुद्ध में वे बुरी तरह पराजित हो गए थे, और इस पराजय की गहराई यह थी कि इसका भान तक उन्हें नहीं था। इस पूरे दौर में महाराष्ट्र के पुणे शहर में दलितों और किसानों की सांस्कृतिक आज़ादी का स्वर उठाने वाले जोतीराव फुले ने अपने तरीके से इस पूरे प्रसंग पर प्रतिक्रिया दी। लेकिन उनकी भी सीमा थी। वह भारतीय-अभिजात तबके के मानसिक आवेग और चालाकियों को तो समझ सके, लेकिन अभिजात अंग्रेजों की चाल को शायद नहीं समझ सके, या समझ कर भी इस प्रसंग पर किसी रणनीति के तहत चुप्पी साध ली। पूरे प्रसंग पर उनकी प्रतिक्रिया मिथकों के पुनर्पाठ पर हुई। फुले का सारा ध्यान भारतीय समाज के बहुजन हिस्से पर था, न कि समाज के एक छोटे से प्रश्रय प्राप्त हिस्से पर, जो कुलीन कहा जाता था। यह भी सही है कि फुले के पास न कोई पुरातात्विक साक्ष्य थे, न ही कोई अन्य पुख्ता इतिहास; जैसे कि उनके बाद में आंबेडकर को सुलभ हुए। इसलिए, उन्होंने बलिराजा की एक पौराणिक कथा का पुनर्पाठ रखा और यूरोपियन किसान-मजदूर तबके से सांस्कृतिक संबंध बनाने की विफल ही सही, एक कोशिश की। अभिजात तबके के पास वेद और दूसरे ग्रन्थ थे, तो फुले के पास बलिराजा की वह कथा, जिसके सहारे वह अपनी जनता को, और अंग्रेजों को भी; वह बताना चाहते थे कि एक स्वर्णिम-समय हमारा भी था और यह भी कि इन यूरोपियनों और हमारे बीच कुछ जैविक व सांस्कृतिक सूत्र हैं। इसे पहचानो। यही काम अंग्रेज अपनी अवचेतन चालाकी के साथ भारतीय अभिजन समुदाय से संबंध विकसित करने के लिए कर रहे थे। 

बंकिम चंद्र चटोपध्याय व जोतीराव फुले की तस्वीर

बंगाल और महाराष्ट्र अथवा कोलकाता और पुणे का राजनैतिक परिदृश्य सामाजिक आधार के मामले में एक दूसरे के विपरीत था। बंगाल में अंग्रेजों ने मुस्लिम शासकों को पराजित और अपदस्थ किया था। इसकी प्रतिक्रिया में वहां का द्विज हिन्दू तबका, खास कर ब्राह्मण-कायस्थ समाज, अंग्रेजों के प्रति एक आभार-भाव रखता था। अंग्रेजों ने द्विज हिन्दुओं की इस भावना और मनोविज्ञान को बहुत हद तक समझा था। लेकिन पुणे में बात भिन्न थी। वहां अंग्रेजों ने पेशवाओं के ब्राह्मण-राज को ध्वस्त किया था, इसलिए वहां के ब्राह्मणों में अंग्रेजों के प्रति हिकारत के भाव थे। यही हिकारत मराठा देशभक्ति कही जाती है। इसके उलट वहां के दलितों व किसानों में जो हिन्दुओं के अ-द्विज समुदाय से थे और जिसका सांस्कृतिक नेतृत्व फुले कर रहे थे, में अंग्रेजों के प्रति एक आभार भाव था, कि तुमने एक आततायी राज को ख़त्म किया। इस प्रसंग में बंकिम और फुले में एक वैचारिक, और उससे अधिक एक मनोवैज्ञानिक समानता दिखती है। इसे ध्यान में रख कर हमने अपनी राष्ट्रीयता और इतिहास पर कभी विचार नहीं किया है। 

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उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में यूरोप में नस्लवादी सोच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा था। भारत में राष्ट्रीयता, भिन्न-भिन्न तबकों की अस्मिता और बदलती हुई राजनैतिक स्थितियों में अभिजात तबके की वर्चस्व बनाये रखने की लालसा भिन्न रूपों में विकसित हो रही थी। इतिहास को महत्व अवश्य मिलने लगा था, लेकिन इस पर अधिकार जताने की विभिन्न तबकों की कोशिश भी तेज होने लगी थी। इन तबकों की इतिहास-दृष्टि पर विचार करेंगे तब कुछ दिलचस्प नतीजे हाथ आएंगे। इन नजरियों पर वर्गीय स्वार्थों का भारी बोझ है, वैज्ञानिक-चेतना का उतना ही अभाव भी। उन दिनों सभी तबके अपने-अपने नजरिये से इतिहास की व्याख्या कर रहे थे। सबसे अधिक जोर इस भारत-भूमि पर आर्यों के आगमन को लेकर था। कुछ लोगों की राय थी कि आर्य इस भारत भूमि पर सीधे किसी देवलोक से अवतरित हो कर आये। ऐसा मानने वाले उस पारम्परिक मानसिकता के लोग थे जिनके पास सृष्टि-रचना का दैवी-सिद्धांत था। दयानन्द सरस्वती इसी सोच के थे। उनके लिए यह भारत भूमि आदि-काल से आर्य-भूमि थी। लेकिन विभिन्न अध्ययनों से जो लोग गुजर रहे थे, वे दुनिया भर के ज्ञान की अवहेलना कैसे कर सकते थे। ब्रिटिश इतिहासकारों ने इन आर्यों को मध्य एशिया से अफगानिस्तान के रास्ते भारत लाया और भारतीय इतिहासकारों ने इसमें थोड़ा-बहुत जोड़-घटाव किया। मसलन बाल गंगाधर तिलक इसे अंटार्टिका प्रदेश से ले आये तो उन्हीं के रास्ते पर चलने वाले राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघसंचालक सदाशिव माधव गोलवलकर ने इस में इतना भर जोड़ा कि उन दिनों अंटार्टिका भी भारत का हिस्सा था। (मानों, देशों व राष्ट्रों की भौगोलिक सीमा तब तय कर ली गयी थी।) गोलवलकर से पूर्व सावरकर ने, जैसा कि पहले बतला चुका हूँ, अपने हिंदुत्व की सैद्धांतिकी में दयानन्द की आर्यभूमि को हिन्दुओं की पुण्यभूमि में परिवर्तित कर दिया था। इस पूरे सिलसिले में दयानन्द सरस्वती कुछ अधिक ईमानदार दिखते हैं। वह किसी तिलक, सावरकर या गोलवलकर की अपेक्षा संस्कृत के अधिक आधिकारिक विद्वान थे, जिसे उनकी पुस्तक ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ जो ऋग्वेद का भाष्य है, को देख कर समझा जा सकता है। उन्होंने हिन्दू अथवा हिंदुत्व, या राजा राममोहन राय के ‘हिन्दुइज़्म’ जैसे किसी शब्द पर कोई दावा नहीं किया है। वह आर्य समाज की बात करते हैं, वैदिक समाज की बात करते हैं। हिन्दू शब्द पर जोर आधुनिक भारत में केवल सावरकर करते हैं। हालांकि इससे मिलते-जुलते ‘हिन्द’ शब्द का प्रयोग गांधी ने अपनी किताब ‘हिन्द-स्वराज’ (1909) में किया है। हिन्द और हिन्दू में एक अन्तर्सम्बन्ध है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह आर्य या वैदिक सभ्यता का शब्द नहीं है। सिंधु शब्द पर विचार करते समय हम ने इस बात पर विमर्श किया है कि सिंधु से ‘हिन्दू’ बना होगा इसकी संभावना है, क्योंकि फारसी या ईरानी उच्चारण में ‘स’ का ‘ह’ उच्चारण हो जाता है। हालांकि ‘स’ से ‘ह’ वाले बिंदु पर पर्याप्त विवाद है। फारसी के अनेक शब्द ‘स’ से आरम्भ होते हैं, जैसे साल, सादगी, साज आदि। हड़प्पा-वासी सिंधु नदी को क्या कहते थे, यह ठीक-ठीक कहना संभव नहीं है। वेद में तो यह नाम है, इसका अर्थ है उसके रचयिता इसे सिंधु कहते थे। लेकिन हड़प्पावासी भी इसे वही कहते होंगे, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। संभव है, वे लोग इसे हिन्दू कहते हों, जैसा कि एक बनारसी विद्वान बच्चन सिंह ने अपनी किताब ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में बतलाया है, सिंधु को हिन्दू और सप्तसिंधु को हप्तहिन्दु कहने की परंपरा यहां पहले से ही थी और यहीं से यह उच्चारण फारसी जुबान में गया। इस आधार पर यह भी कहा जाएगा कि हड़प्पावासी तब हिन्दू कहे जाते रहे होंगे। जिन किसी कारणों से ये लोग दक्षिण पूर्व में खिसकते चले गए हों, वहां जा कर भी ये हिन्दू ही कहे जाते रहे। जैसे कोई बंगवासी दिल्ली या किसी अन्य शहर में जा कर भी बंग या बंगाली ही कहे जाते हैं। सिंधु सभ्यता के विघटन के उपरान्त जब आर्यों के दल पर दल यहां पहुंचे तब भी इस उजाड़ इलाके में कुछ लोग रहते हों, यह संभव है। उन्हें हिन्दू ही कहा जाता रहा होगा। हालांकि ऋग्वेद में सिंधु तो है, यह ‘हिन्दू’ शब्द नहीं है। आर्यों का मुकाबला इन हिन्दुओं से ही हुआ। इन पूर्ववासियों केलिए आर्यों ने दस्यु शब्द का व्यवहार किया है, जिसका सम्बन्ध संभवतः दास से है। हालांकि दास और दस्यु के पृथक पहचान के भी कुछ संकेत हैं। लेकिन इतना तो सत्य प्रतीत होता है कि यदि दस और दस्यु पृथक पहचान के भी हों, तो आर्य दबाव में वे एक पहचान के हो गए हों। निश्चित ही ये दास इस अर्थ में नहीं थे, जैसा आज अनुमान करते हैं। आज दास का अर्थ गुलाम के अर्थ में है। लेकिन धर्मानंद कोसंबी की मानें तो ये इस स्थिति में तब नहीं थे। इनका एक रूप ‘दाहि’ है, जिसका अर्थ कोसंबी के अनुसार देने वाला है। इसी अर्थ में वे ईरान में भी थे। अर्थात वे शक्ति-धन संपन्न थे। भारतीय इलाकों में ये दास हिन्दू थे और आज भी बहुत से सम्मानित लोग दास विरुद धारण करते हैं। कबीर और तुलसी यदि दास थे तो गुलाम के अर्थ में नहीं, पूर्ण अथवा मुक्त के आध्यात्मिक अर्थ में। सवाल यह है कि क्या आर्य हिन्दू हुए या हिन्दू आर्य हुए,या दोनों मिल कर कुछ और हुए। सत्य के नजदीक यह अधिक प्रतीत होता है कि आर्य हिन्दू बन गए। यानि यहां के लोगों के साथ घुल-मिल गए। सावरकर का हिंदुत्व आर्यों और हिन्दुओं की इस एकमेवता को स्वीकारता है, लेकिन उनकी चितपावन मनोवृत्ति (सावरकर चितपावन ब्राह्मण थे) समरसता की जगह वर्चस्ववादी व्याख्या कर जाती है। सावरकर के अनुसार अनार्यों अथवा हिन्दुओं ने आर्यों की अधीनता स्वीकार की। आर्यों की हिन्दुओं पर इस विजय की घोषणा रामचंद्र ने की। इसलिए सावरकर रामचंद्र के राज्यारोहण समारोह को हिन्दू राष्ट्र का स्थापना दिवस मानते हैं। यदि सावरकर की स्थापना स्वीकार ली जाय, तो यह आर्यों का राष्ट्र-दिवस हो जाएगा क्योंकि उन्ही के अनुसार, हिन्दू यानि यहां के अनार्य-वासी तो हार चुके थे। सावरकर के अनुसार ही उन्होंने अधीनता अथवा गुलामी स्वीकार की थी। उनके विचारों पर काम करने वाली संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसीलिए रामजन्मभूमि केलिए हुए संघर्ष को इतना तूल दिया और उसे राजनैतिक अर्थों से भर दिया। दरअसल सावरकर ने बड़ी होशियारी से अपने आर्यत्व के विजय की घोषणा कर दी। उनके हिन्दुस्थान का रूपक अपने वास्तविक रूप में आर्यावर्त है। यह वास्तविक हिन्दुओं की पराजय की गाथा गढ़ता है। कुल मिला कर यह एक बड़ा सांस्कृतिक छल है, जिसकी व्याख्या अभी होनी है। 

 

आर्य-प्रसंग बहुत ही प्राचीन मसला है। इस पर अनुमानों से ही अधिक काम लिया गया है। अनुमान लगाने वालों का अपना नजरिया होता है ,जो उनके सामाजिक स्वार्थों से आबद्ध होता है। आर्य इस देश में दाखिल जरूर हुए, चाहे वे जहां से हों। इस सम्बन्ध में इतिहासकारों ने जो शोध किया है, उसकी उपेक्षा हम नहीं कर सकते। इन अध्ययनों पर प्रश्न भी उठेंगें और फिर-फिर, नए-नए नजरिये से शोध होते रहेंगे। लेकिन इतिहास-वेत्ताओं की बहुस्वीकृत मान्यता के अनुसार वे मध्य एशिया के मैदानी इलाकों से कई दफा और कई रूपों में आये और यहां किसी न किसी रूप में समाहित होते चले गए, लेकिन 1500 ईस्वी पूर्व के आस-पास जब वे आये, तब घोड़ों और रथों पर आये। ऐसा प्रतीत होता है रथ उनके लिए हाल का अविष्कार था। इसके साथ ही उन्हें इंद्र जैसा एक लड़ाकू नेता भी मिला था। संभव है इसके कारण उनकी स्थिति कुछ मजबूत हो गयी हो। यह वह समय था जब सिंधु-मेहुल्ला संस्कृति का पतन हो गया था और हिन्दू-जन सिंध और पश्चिमी पंजाब के इलाकों को या तो छोड़ चुके थे या छोड़ रहे थे। अब उनके पास पुराने ज़माने वाला शौर्य नहीं था। उन की सामाजिक एकता भी विखंडित हो चुकी थी। जैसा कि वृत्र की कथा से ज्ञात है। ऐसे कमजोर और विरथ हिन्दुओं से जब रथी आर्यों का संघर्ष हुआ तो हिन्दुओं को पीछे हटना पड़ा होगा, ऐसा अनुमान तो किया ही जा सकता है। इसी संघर्ष , उल्लास और निश्चित ही भय का भी, ब्यौरा ऋग्वेद में हम देखते हैं। 

बेशक, आर्य इस भारत-भूमि के एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे होंगे और आज भी हैं। लेकिन यह तो साफ़-सी बात है कि वही सम्पूर्ण भारत नहीं हैं। भारतीय इतिहास का इतना अधिक आर्य-केंद्रित होना, हमारे इतिहास-अध्ययन की एक बड़ी कमजोरी कही जाएगी। आज भी उत्तर भारतीय एक सामान्य हिन्दू इतना आर्य-केंद्रित है कि इससे अधिक वह कुछ सोच ही नहीं पाता। उसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि सम्पूर्ण भारत पर उसके वर्चस्व का यह बोध कराता है। किन्तु दक्षिण के द्रविड़ या उत्तरपूर्व के मंगोल धज के लोगों को यह इतिहास पढ़ने में कैसा लगता है, क्या हमने कभी इस पर सोचा है? हमने इस पर कभी विचार किया है कि हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के राष्ट्र-कवि मैथिलीशरण गुप्त का राष्ट्रीय काव्य-ग्रन्थ ‘भारत -भारती’ का मंगलाचरण जब उत्तरपूर्व के बच्चे पढ़ते होंगे तब उनके कोमल मन में कौन-से भाव आते होंगे? मंगलाचरण देखा जा सकता है: 

मानस-भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती –

भगवान! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती .

हो भद्रभावोद्भभाविनि यह भारती हे भगवते 

सीतापते! सीतापते! गीतामते! गीतामते!

केवल आर्यजन ही भारतवर्ष की आरती क्यों उतारें? और यह “राष्ट्रकवि” सीतामते और गीतामते का गान करता हुआ क्या अपने ही वर्णित वर्णित राष्ट्रत्व से वंचित होता हुआ नहीं प्रतीत होता है? यह हिन्दू भी नहीं, एक आर्यभाषा के आर्य-कवि के रूप में साफ़-साफ़ नहीं दीखता है? हमारे देश में इतनी संस्कृतियों, नस्लों और प्रवृतियों के लोग रहते हैं। सबको एक दूसरे के प्रति सम-भाव और भाईचारा के भाव रखे बिना क्या भारत मजबूत हो सकता है? शायद नहीं। विवेकवान और अन्य अस्मिताओं के प्रति संवेदनशील होना मनुष्यता और लोकतान्त्रिक रिवाज की पहली पहचान है। और किसी ने नहीं, हमारी संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने संविधान के मूल दस्तावेज पर यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की थी कि इसके राष्ट्रगान में हमारा बिहार कहां है? ‘वन्दे मातरम’ पर देश के गैर हिन्दू और इकबाल के तथाकथित कौमी तराने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ पर देश के दक्षिणवासी आपत्ति करते हैं तब हम उनकी भावनाओं को क्यों नहीं समझना चाहते? ‘ओ आबे रौदे गंगा, वो दिन है याद तुझ को, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा’ के गीत जब द्रविड़ बस्तियों में सुने जाते हैं, और वे उनका अर्थ समझते हैं, तब उन्हें कैसा महसूस होता है। इस पर हम ने विचार किया है? गंगा किनारे किसका कारवां उतरा था कवि! आर्यों का? या तुर्कों का?

(कॉपी संपादन : नवल)


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