सिंधु-सभ्यता का विस्तार : हड़प्पा से आलमगीरपुर तक

मानव सभ्यता के इतिहास पर आधारित श्रृंखला में प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि सिंधु-घाटी सभ्यता के प्रमाण केवल पाकिस्तान के हड़प्पा और मोहनजोदड़ो तक सीमित नहीं हैं। इसके प्रमाण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे आलमगीरपुर तक में मिलते हैं। पढ़ें सिंधु-घाटी सभ्यता से जुड़े दस स्थलों के बारे में

जन-विकल्प

हड़प्पा अब पाकिस्तान में है( उसके पंजाब सूबे के साहिबाल-मॉन्टीगढ़ी जिले में रावी नदी के बाएं किनारे बसी यह पुरातात्विक बस्ती भारतीय इतिहास की सबसे खास जगह बन चुकी है, क्योंकि यहां से सिंधु सभ्यता के अध्ययन की शुरुआत हुई थी। फिर दूसरी बस्ती है आलमगीरपुर जो उत्तरप्रदेश के मेरठ  जिले में हिन्डन नदी के तट पर अवस्थित है और यह भी उसी सभ्यता की कहानी बतलाती है जिसकी हड़प्पा बतलाती है। दोनों में कोई डेढ़ हजार किलोमीटर का अंतर है। इतने पुराने ज़माने में जब संचार और आवागमन के साधन इतने कम हों, क्या कोई सभ्यता इतनी विस्तृत और बुलन्द हो सकती है? वे कैसे लोग थे, जिन्होंने इस सभ्यता को परवान चढ़ाया और विस्तार दिया। उनकी मेधा, उनके परिश्रम और योजनाबद्ध तरीके से काम करने की उनकी प्रवृति के बारे में जानकर हैरानी होती है। बेशक वे स्वप्नदर्शी थे; और ऐसा लगता है मानों दुनिया को खूबसूरत और सुकूनदायक बनाने  का उन्होंने प्रण लिया हुआ था। वे तंग दिल तो कतई नहीं थे और उनमें वो तमाम विशेषताएं थीं, जो तरक्की-पसंद समाज के लिए जरुरी होते हैं। निश्चित ही उनके समाज में भाईचारे और एक दूसरे से सहयोग करने की प्रवृति होगी। उनके सभा-भवनों और कुछ मूर्तियों के मिले अवशेष से यह जानकारी तो मिलती ही है कि वे कला के विभिन्न रूपों और स्तरों से परिचित थे, और मिलना-जुलना पसंद करते थे। लड़कियां नृत्य-निपुण थीं और शिल्पी उन मुद्राओं को अपनी मूर्तियों में ढाल सकने में सक्षम थे। इन बातों में कोई दम नहीं है कि मेसोपोटामिया और मध्य एशिया से चल कर लोग भारत के सिंधु तट तक आये और यहां छा गए बल्कि सच्चाई यह अधिक प्रतीत होती है दोनों सभ्यताओं के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। ऐसे संबंधों में दोनों या सभी पक्ष एक दूसरे से सीखते हैं। इस बात के यथेष्ट प्रमाण हैं कि मेसोपोटामिया और हड़प्पा-वासियों के बीच आवाजाही थी। वे समुद्र-मार्ग से जुड़े होंगे, इसके भी प्रमाण हैं। हालांकि यात्रा मुश्किलों से भरा, लेकिन साहस-पूर्ण रहता होगा। मैंने पहले ही बतलाया है साहस और मेधा का उनके पास अभाव नहीं था और मुश्किलों से खेलना उन्हें खूब आता था। वे आज के उन थोड़े-से  भारतीयों की तरह, जिन्होंने मौजूदा भारतीय समाज पर येनकेन वर्चस्व हासिल कर इसे मुट्ठी में कर लिया है, काहिल और झगड़ा-पसंद बिलकुल नहीं थे। सामूहिकता और सहयोग उनकी मूल-प्रवृति थी और वे पूरी दुनिया से दोस्ती के लिए उत्सुक रहते थे, ऐसा अनुमान है।

सिंधु-सभ्यता के बारे में हम जो भी जान सके  हैं, उसका आधार उत्खनन में प्राप्त सामग्रियां ही हैं। हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की लिपियाँ अब तक पढ़ी नहीं जा सकी हैं, अतएव इस सम्बन्ध में कोई लेख या वृतांत हमे नहीं मिलते हैं, जिस तरह सुमेर और मिस्र की सभ्यताओं के बारे में मिलते हैं। सुमेरियन वृतांत दो  भाषाओं में लिखे जाते थे, जिसमें एक का सम्बन्ध आधुनिक भाषा से है, इसलिए उन्हें पढ़ा जा सका। सिंधु की लिपि जिस दिन पढ़ी जाएगी, बहुत संभव है, एक बार फिर वैसे ही उफान खड़ा होगा, जैसे उत्खनन के बाद हुआ था। लेकिन अब तो उत्खनन के सौ साल हो रहे हैं और कंप्यूटर आदि की तमाम सुविधाओं के बाद इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।

पुरातत्व से प्राप्त सामग्रियों के आधार पर ही हमने उस ज़माने का एक काल्पनिक ढांचा खड़ा किया हुआ है। इन सामग्रियों का काफी महत्व है और वे जोर देकर हमें अपने ज़माने में खींच ले जाती हैं। वे हमें कल्पना करने का अवसर अवश्य देती है, किन्तु बहकने भी नहीं देतीं। यदि वहां, उनकी सभ्यता में, कुंआ, अन्न-भण्डार, स्नानागार, शौचालय, वीथियाँ, सिटाडेल थे तो उससे  हम इंकार नहीं कर सकते। हमारी विवशता है कि उनके नगर-स्वरुप में हम इन चीजों को शामिल करें। इन सब के आधार पर एक दुनिया गढ़ना मुश्किल नहीं है। इसलिए हमारे लिए यह आवश्यक होगा कि इस सभ्यता से जुड़े कुछ प्रमुख स्थलों के उत्खनन की संक्षिप्त-सी एक रिपोर्ट हम तैयार रखें, जिससे इसके अध्ययन में सुविधा हो और इस दुनिया का एक खाका हमारी चेतना में बन जाय कि सिंधु सभ्यता आखिरकार है क्या चीज।  

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जैसा कि बतलाया जा चुका है पहला उत्खनन 1920 में, हड़प्पा में हुआ और अब तक कई जगहों पर उत्खनन का कार्य चल रहा है। यह आवश्यक नहीं कि हड़प्पा से ही इस सभ्यता की शुरुआत हुई। चूकि पूरे अध्ययन का आज भी बहुत स्पष्ट और क्रमिक ब्यौरा हमारे पास नहीं है और आधुनिक जमाने में, इस सभ्यता की कहानी हड़प्पा से ही शुरू हुई, अतएव हमारी विवशता है कि हम वही से आरम्भ करें। हम यहां चुने हुए दस पुरातात्विक स्थलों का संक्षिप्त -ब्यौरा रख रहे हैं, जो इस सभ्यता की कहानी कहती हैं।

हड़प्पा में प्राप्त एक सील

(1) हड़प्पा – पाकिस्तान के पंजाब सूबे के साहिबाल-मॉन्टीगढ़ी जिले का एक गांव, जो रावी नदी के बाएं तट पर स्थित  है। 1920 ई. में दयानन्द साहनी के नेतृत्व में यहां उत्खनन आरम्भ हुआ। एक समान आकार की पकी हुई ईंटो से बने नगर के अवशेष, समकोण पर एक दूसरे को काटती वीथियाँ, 33 फुट चौड़ा राजमार्ग, मार्ग के दोनों तरफ जल-निकासी के लिए पकी ईंटों की बनी नालियाँ, सेक्टर में बने नगर विन्यास, अनाज रखने के भंडार, नगर के पूर्वी भाग में नागरिकों के आवास, पश्चिम भाग में दुर्गनुमा आकृति-अनुमान किया जाता है, यहां पुरोहित और प्रशासक रहते होंगे। यहीं सिमेट्री (कब्रगाह )-एच  में 37 नरकंकाल मिले हैं।

(2) मोहनजोदड़ो – पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में सिंधु नदी के बाएं तट पर स्थित, 1921  में राखालदास बनर्जी (आर.डी. बनर्जी) के नेतृत्व में उत्खनन आरम्भ हुआ। मोहनजोदड़ो का मतलब है मुर्दों का टीला अथवा माउंट ऑफ़ डेथ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बीच 482 किलोमीटर का फासला  है। लेकिन यहां भी हड़प्पा जैसी नगर योजना है। विशाल अन्न-भंडार मिला है। बार्ली अथवा जौ जैसे अनाज मिले हैं। टेरीकोटा का बना दाढ़ीवाला पुरोहित, सील – जिस पर उभरी आकृति को ‘पसुपति’ कहा गया है और नृत्यमुद्रा में एक लड़की की मूर्ति, जो ब्रॉन्ज यानि कांसे की बनी है, यहां मिली है। एक सील पर एक ऐसे पशु-मनुष्य जिसका पिछले हिस्सा जानवर का है, क्योंकि उसमे पूंछ है और अगला हिस्सा मनुष्य का है और वह एक बाघ से दोनों हाथों से मुस्तक-प्रहार कर रहा है। दोनों भिड़े हुए हैं। अचंभित करने वाली बात यह भी है कि यह तय करना मुश्किल है कि आधा हिस्सा नर का है या मादा का। क्योंकि इसमें स्तन भी है और दाढ़ी भी। सील काफी संख्या में मिले है (लगभग एक हजार दो सौ), इसलिए अनुमान किया जाता है कि यह एक बड़ा व्यापार केंद्र था। कपास-रुई के अवशेष भी मिले हैं। इन सबके अलावा यहां इक्कीस मानव कंकाल भी मिले हैं, लेकिन कब्रिस्तान जैसी स्थिति के कोई सबूत नहीं हैं।

मोहनजोदड़ो में प्राप्त एक सील

(3) चुन्द-जोदड़ो  – पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में। जिला नवाबशाह। सिंधु नदी के बाएं तट पर स्थित है। 1931 में एन. गोपाल मजूमदार के नेतृत्व में उत्खनन आरम्भ हुआ। यहां मनके (माला में उपयोग की जाने वाली गोल आकृति) बनाने का कारखाना मिला है, जैसा कि लोथल में भी  है। एक मुद्रा मिली है जिस पर तीन घड़ियालों और और दो मछलियों का अंकन है। ईंटों पर बिल्ली और कुत्तों के खुरों (पैरों )के निशान मिले हैं। इन्हें पकाये जाने के पूर्व ये जानवर इन पर चले होंगे और निशान बन गए। इससे नगर में इन जानवरों की उपस्थिति की जानकारी मिलती है। ईंटें आयताकार और वर्गाकार दोनों हैं। मिटटी की बनी हुई पकी हुई नालियां यहां मिली हैं। एक विशेषता और है कि राजकीय आवासों का दुर्गीकरण अर्थात ऊंची चारदीवारी से उनकी घेराबंदी नहीं की गयी है। काजल, कंघा, उस्तरा और लिपस्टिक जैसी चीजें भी यहां मिली हैं। चुन्द-जोदडो की सभ्यता-संस्कृति को झूकर या झांगर संस्कृति भी कहा जाता है।

(4) कालीबंगा –  भारत के राजस्थान प्रान्त के हनुमानगढ़ जिले के दक्षिण में घग्गर नदी के किनारे बसे इस स्थान की खुदाई 1953 में ब्रजवासी लाल और अमलदास मजूमदार के नेतृत्व में हुई। यहां जुते हुए खेत मिले हैं। इससे पता चलता है कि कृषि जीवन और नगर जीवन में नजदीकियां आने लगी थीं। यहां कुछ दूसरे प्रकार के अनाज मिले हैं, जो अन्य स्थलों पर नहीं हैं। जैसे सरसों और चना; जो तिलहन और दाल हैं। यहां कच्ची ईंटों के बने मकान पाए गए हैं। लेकिन नालियां और कुँए पक्की ईंटों के हैं। अलंकृत ईंटों के भी प्रयोग हुए हैं। इन सबके  आधार पर यह तय कर पाना मुश्किल लगता है कि यह हड़प्पा के बाद की है या पूर्व की। यानि यह नगर-सभ्यता के आरोह क्रम में है या अवरोह क्रम में। संभव है कच्ची ईंटों के प्रयोग पर्यावरण को देखते हुए विकसित हुए हों। क्योंकि पक्की ईंटों से बने कुँए और नालियां इंगित करती हैं कि वे पक्की ईंटों से अवगत थे।

कालीबंगा में प्राप्त एक सील

यहां चूड़ियां बनायीं जाती रही होंगी, क्योंकि उसकी प्रचुर उपस्थिति मिली है। पत्थर की चूड़ियां भी बनाई जाती थीं। एक और विशेषता है कि यहां के घर आंगन-शुदा हैं।  तंदूर जैसे चूल्हे हैं, जिसे कुछ लोग अग्निकुंड भी कह रहे हैं। शव-विसर्जन के 37 साक्ष्य मिले हैं। शवों को कब्र में इस तरह लिटाया जाता था कि उनका सिर उत्तर दिशा में हो। दाह-संस्कार का रिवाज संभवतः आंशिक तौर पर था। एक अंडाकार कब्र में एक बच्चे की खोपड़ी में छह छेद पाए गए हैं। यह शल्य-चिकित्सा है या किसी कापालिक का कृत्य यह तय करना मुश्किल है।

(5) लोथल – गुजरात (भारत) के अहमदाबाद जिले के धोलका तालुका में, सरागवाला के निकट भोगवा नदी के किनारे अवस्थित है लोथल। 1954 ई. में रंगनाथ राव के नेतृत्व में यहां उत्खनन आरम्भ हुआ। पूरी सिंधु सभ्यता में इस स्थान की विशेषता है कि यहां  गोदी-बाड़ा है, जहां से समुद्र में जहाजों का परिचालन होता रहा होगा। यह बाड़ा 223 मीटर लम्बा ,35 मीटर चौड़ा और 38 मीटर गहरा है। इस पर 12 मीटर चौड़ा एक दरवाजा है, जिससे पानी पर नियंत्रण रखा जाता था। बाड़े से जलनिकासी का भी प्रबंध था। उस ज़माने में इतने सक्षम जल-प्रबंधन पर आश्चर्य होता है। इस बंदरगाह से पश्चिम एशिया और अफ्रीका से व्यापार होता रहा होगा . यानी यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। यहां  कुँआ, स्नानघर, शौचालय और अग्निकुंड मिले हैं। एक प्रशासनिक भवन है, जो 126 मीटर लम्बा और तीस मीटर चौड़ा है। खास बात यहां मिले बीस समाधि-स्थल हैं, जिसमें तीन युग्मित (जोड़ा) समाधियां हैं। युग्मित समाधियों में एक मादा और दूसरा नर है। अनुमान किया जाता है ये पति-पत्नी होंगे। दोनों के एक-साथ मरने की संभावना तो नहीं होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में क्या यह समझा जाना चाहिए कि सती जैसी कोई प्रथा तब प्रचलन में थी? हालांकि खास स्थितियों में आज भी प्रेमी जोड़े आत्महत्या करते हैं। संभव है कुछ ऐसा मामला भी हो। यहां मनके बनाने का काम होता था। नीले पत्थरों को तराश कर मनके बनाये जाते थे और उनसे जेवर बनाये जाते रहे होंगे। इन्हीं का व्यापार यहां से होता होगा। अनाज के भंडार यहां भी मिले हैं। चावल की भूसी यहां की खास उपलब्धि है, जो इंगित करती है कि गेंहू और जाऊ (जौ) के अतिरिक्त चावल की उपस्थिति इस सभ्यता में थी। कार्बन तिथि-निर्धारण इंगित करता  है कि लोथल 2400 ईसापूर्व सक्रिय था( सिंधु-सभ्यता का यह प्राइम समय था।

(6) धौलावीरा – यह इलाका गुजरात प्रान्त के कच्छ में मानसर नदी के किनारे अवस्थित है, जो अब खादिरबेर गांव है। 1967-68 में जगपति जोशी के नेतृत्व में यहां उत्खनन आरम्भ हुआ। 1990 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपने हाथ में ले लिया। धौला का मतलब है पुराना और वीरा यानि कुँआ। धौलावीरा यानि पुराना कुँआ। जैसे दिल्ली में भी एक जगह है धौला-कुँआ।

धौलावीरा व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। 1990 ई.से 2005 ई. तक यहां 13 बार उत्खनन हुए हैं और हर बार कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। यही वह जगह है जहां एक बड़े खेलघर (स्टेडियम) की अवस्थिति मिली है। यहां एक विशाल जलाशय मिला है,जो 80.5 मीटर लम्बा, 12 मीटर चौड़ा और 7.5 मीटर गहरा है। यह अद्भुत जल-प्रबंधन है। हीरे, मोती, जानवरों की हड्डियाँ, मिटटी और पीतल के बर्तन, रत्न, पत्थर की बनी 33 सेंटीमीटर की नेवले की मूर्ति भी उत्खनन से प्राप्त हुए हैं। एक नेमप्लेट अथवा नामपट्टिका प्राप्त हुई है, जिसपर दस अक्षर हैं। इन्हे पढ़ा नहीं जा सका है। लेकिन इसे देखने से अनुमान होता  है कि इन लोगों ने शून्य और जोड़-गुना के चिन्ह तय कर लिए थे। यहीं घोड़े के अवशेष भी मिले हैं। मेरा अनुमान है कि यह कुछ बाद का नगर है। लेकिन इतिहासकार इसे 2650 ईस्वीपूर्व तक खींच कर ले जाते हैं। घोड़े यदि आर्यजनों के साथ आये तो इसका समय विवादित है। सिंधु नगर योजना में, जैसा कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिला है, पूरब तरफ नगर टीला और पश्चिम तरफ दुर्ग टीला मिला है, लेकिन धौलावीरा में इन दो टीलों के बीच एक और टीला मिला है, जिसे सुविधा के लिए मध्य-टीला कहा जा सकता है।

(7)  राखीगढ़ी – यह इलाका हरियाणा प्रान्त के हिसार जिले में है। 1963 में इसे चिन्हित जरूर किया गया, लेकिन इस पर व्यवस्थित काम 1997 के बाद ही आरम्भ हो सका, जिसे अमरेन्द्रनाथ के नेतृत्व में 2000 ई.तक संपन्न किया गया। राखीगढ़ी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से भी अधिक बड़े परिक्षेत्र में फैला है। यहां स्वर्ण (सोना) फाउंड्री थी, जहां मनके बनाये जाते थे। 300 से अधिक बिना पॉलिश किये कीमती पत्थर यहां पाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल आभूषण निर्माण में होता था। यहां से मछली पकड़ने वाले ताम्बे के बने हुक या काँटे,  खिलौने, पहिये आदि मिले हैं। चाँदी-जड़े सूती वस्त्र भी यहां मिले हैं। लेकिन अध्ययन की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है कब्रगाहों के 53 ठिकाने, जिसमे से 46 अस्थि-पंजर प्राप्त किये जा सके हैं। 37 की जांच हो चुकी है। इनमें 17 वयस्क और 8 किशोर-वय की अस्थियाँ हैं। 12 के बारे में अब तक कुछ तय नहीं पाया गया है। 17 वयस्क अस्थियों में से तीन ऐसी स्त्रियों के हैं, जिन्होंने बाएं हाथ की कलाई में चूड़ियां पहन रखी हैं। एक स्त्री-कंकाल के हाथ में स्वर्ण-आभूषण है। इसी स्त्री के सिर के पास एक कीमती पत्थर रखा हुआ है।

हरियाणा के हिसार में राखीगढ़ी के बारे में पुरातत्व विभाग द्वारा लगाया गया एक साइन बोर्ड

(8) रोपर – भारतीय पंजाब प्रान्त के रोपर (जिसे रूपनगर भी कहा जाता है) जिले में सतलज नदी के तट पर अवस्थित है। 1955-56 में यज्ञ दत्त शर्मा के नेतृत्व में यहां काम हुआ। यहां की नगर योजना पर सिंधु-सभ्यता का पूरा प्रभाव है। यहां इस बात के संकेत मिलते हैं कि नगरीय तत्व इस सभ्यता में धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहे हैं। यहां एक कब्र मिला है, जिसमे मानव कंकाल के पास एक कुत्ते का कंकाल पाया गया है। अन्य कोई उल्लेखनीय सामग्री यहां नहीं मिली है।  

(9 ) दायमाबाद – महाराष्ट्र प्रान्त के अहमदनगर जिले में गोदावरी की एक सहायक नदी प्रवरा के किनारे अवस्थित दायमाबाद दक्षिण में सिंधु-सभ्यता के विस्तार का साक्ष्य देता है। इसके दक्षिण तरफ अब तक इस सभ्यता का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। इसका उत्खनन बी. पी. बोपार्डीकर ने 1958 में किया। दूसरी दफा उत्खनन 1974-75 में एस. के. राव के नेतृत्व में हुआ और अब तक का आखिरी उत्खनन 1978-79 में एस. ए. शाली के नेतृत्व में हुआ। यहां पर वर्गाकार और आयताकार घर पाए गए हैं। दीवारें मिटटी और गारा से मिला कर बनाई गयी हैं, जिसमें लकड़ी के डंडों की टेक दी  गयी है। मृदभांड के डिजायन ज्यामितीय हैं, जिसमें तिरछी सामानांतर रेखाओं के प्रयोग हुए हैं। टोंटीदार नाली वाले लाल पृष्ठभूमि पर काले डिजायन वाले मृदभांड भी पाए गए हैं। यहां ताम्बे की चार वस्तुएं – रथ चलाते हुए एक मनुष्य, सांढ़, गैंडा और हाथी की आकृतियां मिली हैं। कुछ कम कीमत वाले रत्न-पत्थर भी मिले हैं। आज दायमाबाद एक निर्जन स्थान है। लेकिन उपरोक्त पुरातात्विक अवशेष कोई 1400 ईस्वीपूर्व में इसके नगर होने की सूचना देते हैं। यहां कब्र भी मिले हैं, जिसमें शव का सिर उत्तर दिशा में लिटाया हुआ पाया गया है।

(10 ) आलमगीरपुर – उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे यह अवस्थित है। यह जगह ‘परसाराम का खेरा’ के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा इसका उत्खनन 1958-59 में हुआ। यहां प्राप्त ईंटों का साइज लम्बाई में 11.25 ईंच से 11.75 इंच, चौड़ाई में 5.25 ईंच से 6.25 इंच और मोटाई में 2.5 ईंच से 2.75 ईंच हैं। यहां छत बनाने वाले ढलवां-थपुआ खपड़े बनाये जाते थे। बर्तन बनाने की फाउंड्री भी यहां थी। मनके और खिलौने भी बनाये जाते थे। कुल मिला कर यह उत्पादन वाला इलाका था। स्वाभाविक है यह व्यापारिक केंद्र भी होगा।

उपरोक्त स्थानों के अलावा पाकिस्तान के सुतकांगेडोर, कोटदीजी, बालाकोट, आपरी आदि और भारत के रंगपुर (गुजरात, 1954, एस. आर. राव), बाड़ा (1956, यञदुत्त शर्मा), संधोल (1968 एस. एस. तलवार) , सुरकोटड़ा (जे.पी. जोशी, 1964), भांडा (1982, जम्मू-कश्मीर,जे. पी. जोशी), भगवानपुरा (हरियाणा, जे.पी. जोशी) और कुन्ताली (गुजरात) जैसी जगहें हैं जो चुपचाप इस सभ्यता के अनेक रहस्य छुपाये बैठी हैं। बतला चुका हूं कि हज़ार से अधिक स्थानों में ये नाम बहुत कम हैं। लेकिन इनके विस्तार हमें इस बात के संकेत तो देते ही हैं कि सभ्यता का फैलाव एक बड़े क्षेत्र में था। भविष्य  में और अधिक संधान होंगे, कुछ अधिक रहस्य उद्घाटित होंगे। लिपियों की गुत्थियां सुलझेंगी। और तब इस सम्बन्ध में हम कुछ अधिक आधिकारिक ढंग से कुछ कह सकेंगे। इतिहास अध्ययन में अनुमानों के लिए कम स्पेस होना चाहिए। तथ्यपूर्ण बातें अधिक होनी चाहिए। वैज्ञानिक अध्ययन का यही आधार होता है।

(कॉपी संपादन : नवल)


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