सिंधु-घाटी सभ्यता का विस्तार

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि सिंधु-घाटी सभ्यता मोहनजोदड़ो और हड़प्पा तक ही सीमित नहीं थी। इसका क्षेत्र अनुमान से कहीं अधिक व्यापक था। मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताओं से इसका विस्तार क्षेत्र बहुत अधिक था। साथ ही यह भी कि यह कोई थोपी हुई सभ्यता नहीं थी और न ही आर्यों का इससे कोई लेना-देना था

जन-विकल्प

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पर सर जॉन मार्शल की किताब 1931 में दो खण्डों में प्रकाशित हुई, तब जवाहरलाल नेहरू देहरादून जेल में थे। उन दिनों वह अपनी बेटी इंदिरा के नाम दुनिया के इतिहास पर केंद्रित चिट्ठियाँ एक सिलसिले में लिख रहे थे, जिसका संकलित रूप ‘ग्लिम्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ के रूप में बाद में प्रकाशित हुआ। 14 जून 1932 को वह, यानी नेहरू, एक पत्र लिखते हैं, जिसका शीर्षक है ‘अ जम्प बैक टू मोहनजोदड़ो’। उन्होंने तब तक जॉन मार्शल की किताब नहीं पढ़ी थी, उसकी समीक्षा ही पढ़ी थी, लेकिन इतना ही पढ़ कर वह ऐसे और इतने अभिभूत हुए कि यकायक पीछे मुड़ कर देखने के लिए मजबूर हो गए। इस पत्र में नेहरू उत्साह से इतने भरे हुए है कि अपनी बेटी के साथ हड़प्पा जाने की योजना भी बना लेते हैं। नेहरू का उत्साह भारत के प्रबुद्ध तबके के उत्साह की एक बानगी भर है। तब ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्ति के लिए पूरा देश संघर्ष कर रहा था और हमारे राष्ट्रवादी संघर्ष की जो वैचारिक बुनियाद थी, वह हड़प्पा के महत्व को समझने में बहुत हद तक असमर्थ थी। लेकिन कुछ लोग तो अवश्य थे, जो इसे समझ रहे थे, या समझना चाहते थे। तब के राष्ट्र-कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने काव्य -ग्रन्थ ‘भारत -भारती’ में ‘क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी’ जैसा जो वेदनात्मक गीत गाया था, उसमें सिन्धु सभ्यता के पतन का दर्द शामिल नहीं था। वह आर्यत्व के पतन का रुदन कर रहे थे। आर्य-भूमि, ऋषियों-मुनियों और कुछ अन्य पौरणिकताओं से खचित भारतीय हिन्दू अभिजन का मानस यह समझने में अक्षम था कि क्या यह सभ्यता आर्यों के आने के पूर्व की थी? जैसे अंग्रेजों को यह गलतफ़हमी थी कि वे एक अशिक्षित और अंधकारपूर्ण भारत को ज्ञानदान करने, रोशन करने और सबसे बढ़ कर इसे सभ्य करने आये हैं, वैसे ही कुछ हिंदुस्तानी लोगों को यह गुमान था कि हमारे पुरखों ने कभी एक अंधकारपूर्ण सप्तसिंधु प्रदेश में सभ्यता की रौशनी फैलाई थी। उनकी यह चेतना और किसी अन्य ने नहीं; अंग्रेजों ने ही पौर्वत्य चेतना के ज़माने में विकसित की थी। हिन्दुओं के बीच दयानन्द सरस्वती का आर्यसमाज आंदोलन इसी की सामाजिक-सांस्कृतिक परिणति थी। हालांकि आर्यसमाज ने आर्यों के बाहर से आने के सिद्धांत को कभी नहीं स्वीकार किया। दयानन्द किसी आर्य नस्ल की नहीं, आर्य संस्कृति की वकालत करते थे।

लेकिन भारतीय अभिजन के एक हिस्से के दिल-दिमाग में यह बात जरूर बैठ गयी थी कि सिंधु सभ्यता का विनाश आर्यों ने किया। इसे लेकर दीर्घ विमर्श चला। आर्य प्रभुत्व दिखाने का इससे अवसर भी मिला। लेकिन कोई भी सिन्धुवासियों को असभ्य मानने के लिए अब तैयार नहीं था। एक विचार यह भी आया कि सिन्धुवासियों की तुलना में आर्य बर्बर और गंवार थे और संघर्ष में सभ्य लोग बर्बर लोगों से प्रायः पराजित हो जाते हैं। जो हो, जीत तो आर्यों की हुई। भूतकाल की एक कल्पित विजय लगातार पराजित होते हुए एक समाज के लिए किसी न किसी मात्रा में मनोवैज्ञानिक बल प्रदान करता था। सिंधु घाटी में आर्य उपस्थिति थी या नहीं, या थी तो क्या यह सिन्धुवासियों के साथ उनके किसी सांस्कृतिक मेल-जोल का भी नतीजा था, इस पर कम ही विचार हुआ। बाद में भारतीय अभिजन भी इस सिद्धांत से परेशान होने लगे कि वे मूलतः बाहरी हैं और तब उनकी दिलचस्पी इस बात में ख़त्म हो गयी कि आर्यों का किस तरह बाहर से आना हुआ था, या किसी ज़माने में उनकी यहां के लोगों से निर्णायक लड़ाइयां हुई थीं। फिर तो धीरे-धीरे संस्कृतियों के एक दूसरे में समाहित होने अथवा मेल-जोल की भावना के निरंतर विकसित होने की बातें सर्वमान्य होने लगीं। यदि आर्यों या दूसरी जनजातियों-नस्लों के कई जत्थे क्रम से आये तो यहां लड़ने ही नहीं आये। संभव है कि इस सभ्यता ने उनका श्रमिकों के रूप में इस्तेमाल किया हो, और बाद में वे सब इस समाज के हिस्सा बन गए हों। इतनी बड़ी सभ्यता के विकसित होने के लिए निश्चय ही श्रमिकों की निरंतर मांग होती होगी। जो समाज इतनी बड़ी सभ्यता के सरंजाम ढूंढता होगा, उसके उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल का इंतजाम करता होगा, वह श्रमिकों के इंतजाम करने में भी स्वाभाविक रूप से दक्ष होगा। एक विकसित सभ्यता स्वाभाविक रूप से वैसे लोगों को आकर्षित करती है, जहाँ रोजगार के अवसर हों।


पाकिस्तान के मोहनजोदड़ो में उत्खनन में मिले सिंधु-घाटी सभ्यता के अवशेष

बाद के पुरातात्विक अनुसंधानों ने इतिहासकारों को और अधिक हैरान किया। यह सभ्यता मोहनजोदड़ो और हड़प्पा तक ही सीमित नहीं थी। इसका क्षेत्र अनुमान से कहीं अधिक व्यापक था। मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताओं से इसका विस्तार क्षेत्र बहुत अधिक था। अनुमानित क्षेत्र लगभग आठ लाख वर्ग किलोमीटर का है। उत्तर में यह चिनाब के दाएं किनारे भांडा (जम्मू-कश्मीर) है, तो दक्षिण में प्रवरा नदी के तट पर दैमाबाद (महाराष्ट्र); पश्चिम में सिंधु किनारे सुतकांगेडोर (पाकिस्तान) है तो पूरब में हिंडन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तरप्रदेश)। इतने बड़े क्षेत्र में हज़ार-बारह सौ से अधिक ठिकाने अभी मिल चुके हैं, जहाँ इस नगर सभ्यता के अवशेष होने की उम्मीद है। इसका अर्थ है उस वक़्त भारत के इस हिस्से की सम्पन्नता ऐसी थी, जितनी बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों तक इस इलाके की नहीं थी।

नक्शे में सिंधु-घाटी सभ्यता का विस्तार

इतने बड़े क्षेत्र में फैले इस सभ्यता का वैभवपूर्ण विकास कृषि, शिल्प और व्यापार के तत्कालीन उत्कर्ष को भी रेखांकित करता है। जब सभ्यता इतने बड़े क्षेत्र में फैलेगी तब विभिन्नताएं भी उभरेंगी। यह स्वाभाविक है। सभ्यता को फैलने और विकसित होने में सदियाँ लगी थीं। इस बीच कुछ नयी चीजें बनती रहीं। इतने बड़े क्षेत्र में कारीगरों के नए-नए समूहों के एक दूसरे के हुनर से परिचित होने, एक-दूसरे को सिखाने और उससे सीखने की निरंतरता चलती रहती है। जैसा कि बतलाया जा चुका है, वे व्यापार भी करते थे और पश्चिम मध्य-एशिया तक उनका आना-जाना था। इस आवाजाही में अन्य देश-समाज के लोग भी यहां आते-जाते होंगे। इतिहासकार दामोदर धर्मानंद कोसंबी के अनुसार मेसोपोटामिया के लोग सिंधु सभ्यता से सुपरिचित थे और उनके अभिलेखों में इसकी चर्चा है। मेसोपोटामिया के लोग इसे मेलुक्ख कहते थे। मेलुक्ख-मेसोपोटामिया का रिश्ता बना हुआ था। उनकी सभ्यता-संस्कृति से भी इस सभ्यता के लोगों का सांस्कृतिक आदान-प्रदान चलता होगा। वे मध्यकालीन भारतवासियों की तरह कूपमंडूक बिलकुल नहीं रहे होंगे। कूपमंडूक प्रवृति के लोगों का बहुत विकास संभव नहीं हो पाता।

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इस सभ्यता के जितने भी स्थल मिले हैं, उनमें से अब तक केवल दस फीसद का ही उत्खनन संभव हुआ है। लेकिन इससे इनकी संरचना, विभिन्नता,जीवन के तौर-तरीकों आदि के बारे में विपुल जानकारी प्राप्त हुई है। पहले ही बतलाया जा चुका है ,धातु-ज्ञान के हिसाब से वह ताम्र-कांस्य-युग था। पूरी सभ्यता में लोहे की कोई उपस्थिति नहीं मिली है। वे गन्ने और उससे उत्पादित गुड़-शक्कर से भी अनभिज्ञ थे। लेकिन रुई से वह सुपरिचित थे और वस्त्र उत्पादन में उनका कोई शानी नहीं था। टेरीकोटा की पुरोहित वाली मूर्ति पर फूलदार वस्त्र दीखता है, जो संभवतः शाल की तरह ओढ़ा जाने वाला वस्त्र है। जैसा कि बतला चुका हूँ, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में अन्य पशुओं के साथ घोडा नहीं है, लेकिन धौलावीरा और कालीबंगा में घोड़े के चिन्ह मिले हैं। लोथल इस सभ्यता का ऐसा स्थल है, जहाँ पोर्ट अथवा बंदरगाह होने के स्पष्ट अवशेष हैं। धौलावीरा में समृद्ध क्रीडागार है, जिसे अंग्रेजी में स्टेडियम कहा जाता है। इस तरह के क्रीडागार हर नगर में नहीं हैं। इस तरह यह विभिन्नता इस सभ्यता की एक और विशेषता है। इससे पता चलता है इन नगरों का क्रमिक रूप से धीरे-धीरे विकास हुआ। यह थोपी गयी सभ्यता नहीं है। इसमें एक तरह की केन्द्रीयता है, तो स्थानीयता और वैभिन्य भी हैं। वैभिन्य नगरों के प्रारूप में भी दीखता है। जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पूरब तरफ नगर टीला (नागरिक आवास)और पश्चिम तरफ दुर्ग टीला (प्रशासकों और पुरोहितों के आवास) होते थे। लेकिन धौलावीरा में नगर टीला और दुर्ग टीला के बीच भी एक टीला है, जिसे हम मध्य टीला कह सकते हैं। इससे इस बात का भी संकेत मिलता है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता धौलावीरा की अपेक्षा अधिक प्राचीन है और श्रेणी विभाजन के हिसाब से हड़प्पा-काल में समाज में यदि दो विभाजन था, तो धौलावीरा काल में तीन विभाजन हो गया। नगर टीला यानि नागरिक सेक्टर और दुर्ग टीला यानी राज सेक्टर में एक और ध्यान देने वाला अंतर यह है कि नगर टीला के मकान छोटे और दुर्ग टीला के मकान बड़े होते थे। लेकिन सामूहिक सभा भवनों और सामूहिक स्नानागारों में सब के जाने की इजाजत थी या नहीं, इसके कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। अनुमान यही है कि ऐसी कोई बंदिश नहीं थी। उस सभ्यता में वर्ग-भेद तो था, लेकिन जाति-भेद जैसी स्थिति के होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। जाति-भेद दरअसल एक भयभीत समाज की पहचान देता है, जिसमें विवाह और पेशा; या कम से कम पेशे का चुनाव व्यक्ति नहीं, समाज करता है। कई नस्लों या संस्कृतियों के लोग जब एक समाज में होते हैं, तब ऐसी स्थिति विकसित होती है। अब तक इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि नगर-टीला और दुर्ग-टीला में रहने वाले लोग अलग-अलग नस्लों अथवा संस्कृतियों के थे। दोनों की भाषा, खान-पान, पहनावे, देवता और संस्कार एक समान जान पड़ते हैं। हाँ, शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम में विभेद आना आरम्भ हो गया था। अन्यथा दो तरह के आवासीय टीले (सेक्टर) क्यों बनते? नगर-टीला में शारीरिक श्रम करने वाले और दुर्ग-टीला में मानसिक श्रम करने वाले लोग रहते थे, ऐसा अनुमान है। लेकिन इन समाजों में आवाजाही बनी हुई थी। उनके सभागार, स्नानागार और अन्य संस्कार-स्थल एक थे।

पाकिस्तान सरकार द्वारा 1984 में मोहनजोदड़ो पर केंद्रित डाक टिकट

अनुमान है, यह पूरी सभ्यता प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉइड्स यानि द्रविड़ नस्ल के लोगों की थी। आर्यों का इस सभ्यता से कुछ भी लेना-देना नहीं था। उत्खनन से प्राप्त कंकालों के डीएनए परीक्षण से भी यह बात पुष्ट हो चुकी है। जातिभेद और छुआछूत जैसी घृणामूलक भावनाओं का उदय तभी संभव होता है, जब दो भिन्न नस्ल के लोग एक साथ रहने लगें और दोनों अपनी सांस्कृतिक शुद्धता के लिए अतिरिक्त रूप से सतर्क हों। प्रायः यह देखा गया कि मानव-समाज नस्लीय विभेद को उतनी तरजीह नहीं देता जितना सांस्कृतिक विभेद को देता है। जब भिन्न नस्लों की संस्कृति एक हो जाती है, तब विभेद की स्थितियां कम होती हैं। सिंधु घाटी के लोगों की सभ्यता और संस्कृति ऐसी थी कि उनसे कम विकसित समाज यदि उनके नजदीक आये होंगे तो उनका उनलोगों की संस्कृति से समावेश हो गया होगा। संस्कृतियों के बीच भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत बहुत हद तक काम करते हैं। हाँ, जब प्रयास पूर्वक सांस्कृतिक साम्राज्यवाद या वर्चस्ववाद स्थापित करना होता है, तब सामाजिक संहिताएं बनाई जाती हैं, और कुछ लोग उसके पहरेदार बन जाते हैं। संस्कृतियों की स्वाभाविकता – नैसर्गिकता ख़त्म कर देने के प्रयास होते हैं। भारतीय समाज में यह स्थिति बाद में विकसित हुई। शायद हम अपने मूल विषय से दूर जाने लगे हैं, अतएव हम एक बार फिर सिंधु सभ्यता के विस्तार बिंदु पर ही केंद्रित होना चाहेंगे।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (14 नवंबर 1889 – 27 मई 1964)

ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति के पूर्व इस सिलसिले में मुख्य रूप से तीन जगहों पर ही पुरातात्विक खुदाई संभव हो सकी थी। 1920 में हड़प्पा और 1921 में मोहनजोदड़ो के बाद 1931 में चन्हुदडो में उत्खनन कार्य हुआ। फिर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक गतिविधियां इतनी तीव्र हुईं कि किसी व्यवस्था ने ऐतिहासिक अनुसन्धान में जाने की कोशिश नहीं की। 1939 से 1945 तक हम विश्वयुद्ध के रूप में एक अद्यतन इतिहास लिखने में ही व्यस्त रहे। और फिर 1947 में भारत को राजनैतिक आज़ादी और देश का बँटवारा साथ-साथ मिला। वह भयावह दौर था, जैसा कि हम सब जानते हैं। यह अलग बात है कि इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अहमदनगर जेल (1942-46 ) में रहते हुए,‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ का लेखन किया, जो एक राजनेता का इतिहास-संधान था। इस किताब में उन्होंने अपनी मोहनजोदड़ो की यात्रा का जिक्र किया है – ‘मैं मोहनजोदड़ो दो बार गया हूँ, 1931 और 1936 में। अपनी दूसरी यात्रा में मैंने देखा कि बरसात और गर्म रेगिस्तानी हवा ने बहुत-सी इमारतों को, जिनकी खुदाई हो चुकी है, अभी ही नुकसान पहुंचा दिया है। बालू और मिटटी के अंदर पांच हजार वर्षों तक हिफाजत से पड़े रहने के बाद ,खुली हवा के असर से वे बड़ी तेजी से नष्ट हो रही थीं और पुराने ज़माने के इन मूल्यवान खंडहरों के बचाने की कोई कोशिश नहीं हो रही थी। पुरातत्व विभाग के अफसर ने, जिसके पास यहां के देख-रेख की जिम्मेदारी थी, शिकायत की कि खुदाई में निकली इमारतों की हिफाजत के लिए उसे किसी प्रकार की मदद या सामान नहीं दिया जाता, न ही पैसे दिए जाते हैं। इन पिछले आठ वर्षों में क्या हुआ, इसकी मुझे जानकारी नहीं, लेकिन मेरा ख्याल है कि बर्बादी जारी है और इस तरह कुछ और सालों में मोहनजोदड़ो को अपना रंग-रूप देखने को नहीं मिलेगा। यह एक ऐसी दुर्घटना है, जिसके लिए कोई बहाना नहीं सुना जा सकता और कुछ ऐसी चीजें, जो फिर कभी देखने में आ नहीं सकती, मिट गई होंगी और केवल तस्वीरों या बयानों के आधार पर हम जान सकेंगे कि वे क्या थीं।’

नेहरू इस धरोहर को लेकर चिंतित और विचलित थे, लेकिन इस बीच किसी इतिहासकार ने सिंधु-सभ्यता पर कोई खास काम किया है, इसकी जानकारी कम से कम मुझे नहीं है। इस क्षेत्र में सब से बड़ा व्यवधान यह आया कि भारत के बंटवारे के बाद सिंधु घाटी का लगभग वह पूरा इलाका, जहाँ अबतक काम हुआ था, पाकिस्तान में चला गया। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चुन्हजोदड़ो से लेकर इस सभ्यता से जुड़े लगभग चार सौ स्थल पाकिस्तान के हिस्से हो गयीं। ये वे जगहें थीं, जहाँ इस सभ्यता का आरंभिक विकास हुआ था। इनमें से अब तक कुछ का ही अनुसन्धान संभव हो सका है। क्योंकि पाकिस्तान सरकार की खास दिलचस्पी इस क्षेत्र में नहीं रही है। जो भी कार्य हो रहे हैं, वे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की देखरेख में और उनकी ही दिलचस्पी से हो रहे हैं। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों की इस ओर दिलचस्पी अवश्य विकसित हुई है और वे सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

हाँ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस दिशा में 1950 के बाद गंभीर प्रयास शुरू किया। 1953 में राजस्थान के कालीबंगा, 1954 में गुजरात के लोथल, 1967 में गुजरात के ही धौलावीरा, महाराष्ट्र के दैमाबाद और इधर के वर्षों में हरियाणा के राखीगढ़ी और मेरठ जिले में हिंडन नदी के तट तक कई स्थलों के उत्खनन से जो नतीजे मिले हैं वे बतलाते हैं कि सिंधु सभ्यता सचमुच पंचनद इलाके से निकल कर, धीरे-धीरे विकसित-विस्तृत होते, सप्तसिंधु यानि गंगा-यमुना के इलाकों को छूने लगी थी। इस विषय पर हम अभी और चर्चा करेंगे।

(कॉपी संपादन : नवल)


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