लागू हुआ ओबीसी उपवर्गीकरण तो लालू-मुलायम जैसे नेताओं का खात्मा तय

मंडल की राजनीति के सहारे शीर्ष पर पहुंचे लालू और मुलायम के दिन अब लदते दिख रहे हैं। उनका यह हश्र भाजपा की ओबीसी में विभाजन की रणनीति के कारण हुआ है। माना जा रहा है कि राजनीतिक स्तर पर इसे आजमा चुकी भाजपा अपनी राजनीतिक पकड़ को चिरजीवी बनाए रखने के लिए ओबीसी का उपवर्गीकरण करेगी

ओबीसी के उपवर्गीकरण को लेकर केंद्र सरकार द्वारा गठित रोहिणी कमीशन के तीसरे अवधि विस्तार की अवधि 31 जुलाई को समाप्त हो रही है। माना जा रहा है कि इसके पहले यह कमीशन अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा। आने वाले समय में बिहार और बंगाल सहित कई राज्यों में चुनाव होने हैं, लिहाजा इसकी संभावना भी तेज हो गयी है कि केंद्र सरकार ओबीसी के उपवर्गीकरण को अमलीजामा पहनायेगी।

दरअसल, कानूनी रूप से केंद्र सरकार ने भले ही अभी ओबीसी का उपवर्गीकरण नहीं किया हो लेकिन राजनीतिक स्तर पर उसने यह कर दिखाया है। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने ओबीसी के शीर्ष में शामिल यादव जाति को अलग-थलग कर दिया। कांशीराम की बहुजन राजनीति का दम भी भाजपा ने जाटवों के विरोध में गैर जाटवों को गोलबंद कर निकाल दिया। उसकी इस रणनीति ने उसके विपक्षियों का खात्मा कर दिया।

बिहार और उत्तर प्रदेश में इसका असर साफ देखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ गठबंधन के बावजूद समाजवादी पार्टी, जो एक समय मंडल की राजनीति के सहारे न केवल यूपी में बल्कि केंद्र में भी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करने में सफल थी, इस बार भाजपा की रणनीति के कारण केवल पांच सीटें जीतने में कामयाब हो सकी। हालांकि सपा के सहयोग से मायावती की पार्टी दस सीटों पर जीतने में कामयाब रही। लेकिन जिस तरह की चुनौती की अपेक्षा चुनाव के पहले थी, वह दूर-दूर तक नहीं दिखी। जबकि बिहार में सोशल जस्टिस के कभी चैंपियन रहे लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का सूपड़ा साफ हो गया।

समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद

दरअसल, चाहे वह मुलायम सिंह हों या फिर लालू प्रसाद, इन दोनों की राजनीति मंडल आंदोलन के कारण चरम पर पहुंची। बताते चलें कि मंडल कमीशन का गठन 1 जनवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने किया था। तब इसका मकसद यह था कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिले। बी पी मंडल के नेतृत्व में इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट 1983 में ही सौंप दी। लेकिन इसे अगस्त 1990 में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा लागू किये जाने की घोषणा संसद में की गयी। इसके साथ ही ओबीसी वर्ग की राजनीति पर पकड़ मजबूत होने लगी।

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जिन दिनों मंडल आंदोलन चरम पर था उन दिनों ही भाजपा ने यह थाह लिया था कि अब कांग्रेस के दिन जाने वाले हैं। उसने मंडल आरक्षण का काट कमंडल में खोजा और हिंदुत्व की राजनीति शुरू की। हालांकि आज जिस मुकाम पर भाजपा है, वहां तक पहुंचने में उसे लंबा अरसा लगा। भाजपा 2014 से पहले इतनी ताकतवर कभी न थी। इस बार जब उसने अकेले ही 303 सीटों का आंकड़ा पा लिया है, तो यह कहना अतिश्योक्ति बिल्कुल भी नहीं कि अब वाकई में मंडल का दौर समाप्त हो चुका है।

अब सवाल यह है कि मंडल के सहारे राजनीति करने वालों का क्या होग? क्या उनकी राजनीति पूरी तरह खत्म हो जाएगी? या फिर यह भी संभव है कि जिस तरह से मंडल की राजनीति से निकले नीतीश कुमार ने 1997 में ही भारतीय राजनीति के नब्ज को समझते हुए भाजपा की शरण ले ली थी, लालू और मुलायम को भी अब भाजपा की शरण में जाना ही होगा?

इन सवालों से अलग एक बड़ा सवाल यह भी है कि यदि लालू और मुलायम दोनों यदि भाजपा की शरण में नहीं जाते हैं तो उनके पास राजनीति में खुद को जिंदा रखने के लिए क्या उपाय हैं?

जाहिर तौर पर इस सवाल का जवाब भी ओबीसी उपवर्गीकरण की रणनीति में शामिल है। भाजपा यह जानती है कि लालू हों या मुलायम अब ये इस स्थिति में नहीं हैं कि ओबीसी के उपवर्गीकरण को रोक सकें। वैसे भी सामाजिक संरचना और आरक्षण के समुचित बंटवारे के लिहाज से यह जरूरी हो गया है कि पिछड़े वर्ग की वे जातियां जो कमजोर हैं, उन्हें मौका मिले। ऐसे में लालू और मुलायम जैसे मंडल नेताओं की बेहतरी इसी में है कि वे ओबीसी उपवर्गीकरण का समर्थन करें और अपनी पार्टी में भी परिवार को दूर रखकर पिछड़ी वर्ग की सभी जातियों को समुचित हिस्सेदारी दें। परिवारवाद के दिन अब लद चुके हैं। यह बात वे जितनी जल्दी समझ लें, उनके लिए उतना ही बेहतर होगा।

(इनपुट : टाइम्स ऑफ इंडिया)

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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