1857 के स्वाधीनता संग्राम का बहुजन पाठ

इस लेख में ओमप्रकाश कश्यप 1857 के संग्राम, उसकी पृष्ठभूमि और उसकी असफलता के कारणों की बहुजन नजरिए से व्याख्या कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे ब्रिटिश सत्ता, भारतीय राजे-महराजों, नवाबों और उच्च जातियों के साथ बहुजनों के रिश्तों और संघर्षों के स्वरूप को भी विस्तारसे प्रस्तुत कर रहे हैं, ओमप्रकाश कश्यप

सत्ता द्वारा लाभान्वित वर्ग इतिहास का उपयोग खुद को उसका वास्तविक दावेदार सिद्ध करने तथा सत्ता-केंद्रों को कब्जाए रखने के लिए करते हैं। इससे जनसाधारण की इच्छा-आकांक्षाओं, संघर्षों और अधिकारों की उपेक्षा होने लगती है। इतिहास मुट्ठी-भर शासक वर्ग के हितों का संरक्षक बनकर रह जाता है। इतिहास की शीर्षोन्मुखी दृष्टि के कारण ही, अंत तक ‘अपनी’ झांसी को बचाने में जुटी रही लक्ष्मीबाई 1857 के स्वाधीनता संग्राम की प्रमुख नायिका मान ली जाती है। जबकि उसी स्वतंत्रता संग्राम की  बहुजन नायिकाएं जैसे झलकारी बाई, काशी और मुंदरा का बहुजनों के अलावा कोई नाम भी नहीं लेता। जो रानी की सहेलियां भी थीं; तथा केवल और केवल रानी तथा झांसी की प्रतिष्ठा के लिए लड़ी थीं, जिनकी शौर्य-कथा रानी जितनी ही रोमांचक और प्रेरणास्पद है। ये बहुजन नायिकाएं प्रतिष्ठा और मान-सम्मान के मामले में बहुत पीछे ढकेल दी जाती  हैं। अनेक इतिहास लेखक तो उनका नामोल्लेख भी नहीं करते।

1857 का ‘सैनिक विद्रोह’ एक तरह से जनविद्रोह था। उसमें समाज के लगभग सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। हिंदू-मुसलमान उसमें कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। फिर भी जितने विवाद या मत-वैभिन्न्य उस घटना को लेकर हैं, उतने भारतीय इतिहास की किसी और घटना को लेकर नहीं हैं। सबसे पहला विवाद इसपर है कि उसे महज ‘सैनिक विद्रोह’ कहा जाए अथवा ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’? जान विलियम के, चार्ल्स बाल, कर्नल जी. बी. मेलीसन जैसे अधिकांश अंग्रेज इतिहासकार उसे ‘सैनिक विद्रोह’ से ज्यादा मानने को तैयार नहीं हैं। जबकि सुंदरलाल, विनायक दामोदर सावरकर आदि भारतीय इतिहासकारों की नजर में वह ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ था। इस तरह भारतीय और पाश्चात्य इतिहासकारों में से कोई भी उस घटना को लेकर पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है। फिर भी कुछ बातों को लेकर सामान्य सहमति है। पहला यह कि जहां-जहां वह युद्ध चला, उसमें भारत के कमोबेश सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। दूसरे युद्ध की असफलता का मूल कारण विपल्वियों के बीच तालमेल की कमी थी।

1857 के विद्रोह की एक पेंटिंग

भारतीय इतिहास का वह पहला युद्ध था, जिसमें अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता के दर्शन हुए थे। थॉमस लॉ के अनुसार 1857 में ‘शिशु-हत्या करने वाले राजपूत, धर्मांध ब्राह्मण….कट्टर, उन्मादी मुसलमान, तुंदियल, विलासी और महत्त्वाकांक्षी मराठाᅳउस लड़ाई में सब एक थे। गाय की पूजा करने वाले, गौ-मांस का भोजन करने वाले….सुअर को देखकर मुंह फेर लेने वाले, उसे खाने वाले….अल्लाह एक है, मुहम्मद उसके पैगंबर हैं….कहने वाले और ब्रह्म-नाम का रहस्यमय मंत्रोच्चारण करने वालेᅳउस विपल्व में सब साथ-साथ आ जुटे थे।’[i] युद्ध के प्रमुख कारणों में अंग्रेजों की लगान नीति, राजे-रजबाड़ों पर गिद्ध-दृष्टि तथा मशीनीकरण के कारण भारतीय कामगारों की तबाही को माना जाता है। अंग्रेजों ने भू-प्रबंधन में भारी फेरबदल द्वारा, किसानों से जमीन का मालिकाना हक छीनकर कंपनी को उसका मालिक मान लिया था। उन्हें खेती के बदले मोटा लगान सरकार को देना पड़ता था। लगान-वसूली के नाम पर जमींदार और नबाव किसानों के साथ मनमाना दुर्व्यवहार करते थे। शिल्पकर्मियों और कामगारों ही हालत और भी बुरी थी। सतरहवीं शताब्दी के आरंभ तक निर्यात केंद्रित रही भारतीय अर्थव्यवस्था आयात प्रधान हो चुकी थी। ब्रिटेन में भारत से आयात होने वाले सामान पर तरह-तरह के कर थोपे जा रहे थे। चीन, भारत, पर्शिया में बुने गए रेशमी वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका था। उनका इस्तेमाल करने पर 200 पाउंड तक का जुर्माना किया जा सकता था।[ii] ढाका जो महीन मलमल के लिए दुनिया भर में ख्यात था, 1827 से 1837 के भीतर उसके निर्यात में लगभग आठ गुना की गिरावट आई थी। कच्ची धातु के लिए जंगल कब्जाए जा रहे थे। इससे आदिवासियों में आक्रोश भरा था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से दो वर्ष पहले 1855 में आधुनिक झारखंड के संथाली विद्रोह का विद्रोह का बिगुल बजा चुके थे। उनके लक्ष्य कहीं व्यापक थे। 1857 के विद्रोह का घोषित लक्ष्य अंग्रेजों को इस देश से बाहर खदेड़ना था। उनके देख-निकाले के बाद सत्ता का स्वरूप कैसा होगा? अर्थव्यवस्था कैसी होगी? इस बारे में किसी की कोई योजना न थी। संथाल विद्रोह में राजनीतिक और आर्थिक स्वाधीनता दोनों अंतर्निहित थीं। 60000 संथाल आदिवासी अंग्रेजों और जमींदारों से एक साथ लड़े थे। परंपरागत हथियारों से जूझते हुए लगभग 15000 संथालों ने कुर्बानी दी थी। उस समय ‘कंपनी-बहादुर’ की ओर से लड़ने वाले अधिकांश सैनिक भारतीय ही थे। विपल्व के कारणों तथा उसकी व्याप्ति पर देशी-विदेशी इतिहासकारों ने खूब लिखा है।

1857 के विद्रोह की वीरांगना झलकारी बाई की प्रतिमा

विपल्व का प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि 1857 से पहले अंग्रेजों ने चारों ओर लूट मचा रखी थी। समाज का कोई वर्ग ऐसा न था, जो उनके छल-प्रपंच का शिकार न हो। इस कारण नीचे से ऊपर तक सभी वर्गों में आक्रोश था, फिर भी एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। आखिर क्या कारण है कि 1757 में, प्रथम स्वाधीनता संग्राम से ठीक एक शताब्दी पहले प्लासी की लड़ाई में नबाव सिराजुद्दोला की पराजय का जश्न मनाने हिंदू, मुस्लिमों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ने को मजबूर हुए थे? यदि मामला सांप्रदायिक एकता का था तो उन्होंने सिखों को अपनी ओर मिलाने की कोशिश क्यों नहीं की थी? हमें ध्यान रखना होगा कि स्वतंत्रता समर के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता केवल राजनीतिक स्तर पर थी। धार्मिक और सामाजिक भेद-भाव में कोई बदलाव नहीं आया था। मार्च 1930 में हिंदुवादी संगठन ‘धर्म सभा’ के मुखपत्र ‘समाचार चंद्रिका’ ने एक विद्यार्थी पर द्वेषपूर्ण ढंग से हमला किया था। उसका दोष बस इतना था कि उसने एक मुस्लिम बेकरी वाले की दुकान से बिस्कुट खरीदकर खाने का दुस्साहस किया था। अखबार ने आरोप लगाया था कि वह युवक राजा राममोहन राय के प्रगतिशील खेमे का है। इसका उत्तर देते हुए राजा राममोहन राय समर्थक अखबार ‘संवाद कौमुदी’ ने लिखा था कि युवक का ‘ब्रह्मसमाज’ से कोई रिश्ता नहीं है। ‘संवाद कौमुदी’ के अनुसार युवक ने कुछ भी गलत नहीं किया था। अखबार ने ‘समाचार चंद्रिका’ पर आरोप लगाया था कि उसका कट्टरपंथी हिंदू संगठन से संबंध है। दूसरों पर आरोप लगाने से पहले उसे अपने गरेबां में झांककर देखना चाहिए। [iii]

1857 के कारणों की पड़ताल करते समय हिंदू समाज की आंतरिक बेचैनी की उपेक्षा कर दी जाती है। अंग्रेजों के प्रति समाज के प्रभुवर्गों का आक्रोश केवल इसलिए नहीं था कि उन्होंने इस देश में संसाधनों की लूट मचा रखी थी। अपितु राजनीतिक स्तर पर वे सुधार भी थे, जिन्होंने सवर्ण जातियों के शताब्दियों से चले आ रहे एकाधिकार को चुनौती दी थी। मुस्लिम इस देश में आक्रामक बनकर आए थे। उसके बाद शताब्दियों तक वे इस देश के शासक बने रहे। शूद्र और अतिशूद्र इसी देश के निवासी थे। मगर उनकी दासता हजारों वर्ष पुरानी थी। एक तरह से वे आजादी का सपना ही भूल चुके थे। उनीसवीं शताब्दी उनके लिए अवसर लेकर आई थी। बदलाव की पहली प्रेरणा अठारवीं शताब्दी की अमेरिकी क्रांति(1775-1778) से मिली थी। उन्हीं दिनों थॉमस जेफरसन के साथ अमेरिकी संविधान लिखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले थॉमस पेन की पुस्तक ‘मनुष्य के अधिकार’ प्रकाशित हुई। उसने राज्य और उसके नागरिक को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया था। पेन का मानना था कि मनुष्य समाज की इकाई मात्र न होकर स्वतंत्र व्यक्तित्व का स्वामी होता है। यदि मनुष्य का कर्तव्य है कि समाज द्वारा निर्धारित नियमों और मर्यादाओं का पालन करे, तो समाज का भी कर्तव्य है कि वह मनुष्य के सुख, शांति और स्वतंत्रता में व्यवधान न आने दे। उससे पहले भारतीय राजनीति धर्म केंद्रित थी, जिसमें समाज के आगे इकाई का महत्त्व गौण होता था। ऊपर से जाति-आधारित विभाजन जिसमें एक वर्ग के पास अकूत अधिकारों के साथ तो दूसरा अधिकार विपन्न जीवन जीता था।

वीरांगना झलकारी बाई पर भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

अमेरिकी क्रांति के बाद देश के शूद्रों और अतिशूद्रों को लगा कि रंगभेद की तरह जाति-भेद को भी मिटाया जा सकता है। कि समानता और स्वतंत्रता केवल सपना नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जिन्हें रंगभेद के शिकार अमेरीकियों की तरह वे भी हासिल कर सकते हैं। लेकिन यह काम दूसरों के भरोसे या उनकी अनुकंपा द्वारा संभव नहीं है। जाति और वर्ण-व्यवस्था का पुजारी रहा समाज अपने विशेषाधिकारों को आसानी से त्यागने वाला नहीं है। खासतौर पर धर्म-केंद्रित राजनीति में; जो मनुष्य को जन्म से ही अपने पाश में जकड़ लेती है। परिणाम यह हुआ कि दमित वर्गों में जैसे-जैसे चेतना विकसित हुई, धर्म स्वाभाविक रूप से आलोचना के दायरे में आ गया। उसपर पहला प्रहार किया, ज्योतिराव फुले ने। उनका ‘तृतीय रतन’ नाटक 1855 में प्रकाशित हुआ था। नाटक गरीब किसान और उसकी पत्नी के जीवन पर आधारित था। फुले और एक उदारपंथी विदूषक उसमें सूत्रधार की भूमिका निभाते हैं। नाटक में एक पुरोहित किसान के घर आता है और उसकी गर्भवती पत्नी को विपरीत ग्रहदशा का भय दिखाता है। यह कहकर डराता है कि दुष्ट ग्रह उसके अजन्मे बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बचाव के लिए वह देवता मरुत की पूजा करने और ब्राह्मणों को भोज कराने की सलाह देता है। डरे हुए किसान दंपति ब्राह्मण की बात मान लेते हैं। एक बार चंगुल में फंस जाने के बाद पुरोहित तरह-तरह के कर्मकांडों के बहाने किसान को लूटता जाता है। अज्ञान और अशिक्षा में फंसे किसान दंपति उसके आगे बेबस हैं। लेकिन अंत में उन्हें बात समझ में आती है। उसके बाद वे पुजारी को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। फुले ने न केवल धर्म और जाति के माध्यम से हो रहे शोषण की ओर से आगाह किया, अपितु शिक्षा के महत्त्व से भी परिचित कराया था। उन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग से स्कूल खोले। लड़कियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की। यह चेतना शिक्षा की देन थी, जो नए कानूनी सुधारों के बाद संभव हो पाई थी।

1857 के विद्रोह की एक अन्य पेंटिंग

1857 के विपल्व की पृष्ठभूमि को समझने के लिए एक नजर उन कानूनी सुधारों पर भी डालनी होगी।  भारत को अपना उपनिवेश बनाने के लिए ब्रिटिश संसद ने चार्टर अधिनियम-1813 लागू किया था, जिसे ‘ब्लैक चार्टर’ भी कहा जाता है। उसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चाय और अफीम के व्यापार को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में एकाधिकार को समाप्त कर दिया था। साथ ही भारत के संबंध में दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए थे। आने वाले समय में वे भारतीय समाज और राजनीति के लिए बड़े परिवर्तनकारी सिद्ध होने वाले थे। पहला था, ईसाई मिशनरियों को भारत आकर प्रचार कार्य करने की अनुमति। और दूसरा था, जाति, धर्म, वर्ग की सीमाओं से परे सभी वर्गों की शिक्षा के लिए कार्यक्रम चलाना। उसके लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। धर्म प्रचार के लिए ईसाई मिशनरियों ने यहां जगह-जगह स्कूल खोले। उनमें उन वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था की गई जिन्हें जातीय भेदभाव के कारण शिक्षा से वंचित रखा गया था। उससे पहले भारत में शिक्षा पारंपरिक संस्थानों के माध्यम से दी जाती थी। उनका स्वरूप विशुद्ध जातिवादी था। उसमें ब्राह्मण के लिए शिक्षा के सभी रास्ते खुले हुए थे। क्षत्रिय युद्ध-संबंधी और वैश्य केवल व्यापारिक कामकाज के लिए आवश्यक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी। इस कारण उनका मिशनरी स्कूलों की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। ज्योतिराव फुले के प्रयासों से आगे चलकर शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूल खोले गए। लेकिन कोई भी ब्राह्मण अध्यापक उनमें पढ़ाने को तैयार न था। फिर भी, तरह-तरह की परेशानियों के बीच कारवां जैसे-तैसे आगे बढ़ने लगा।

संथाल विद्रोह के नायक सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू पर जारी डाक टिकट

1813 में जिस समय चार्टर अधियिनम लागू किया गया, सुप्रसिद्ध उपयोगितावादी चिंतक जेम्स मिल, ईस्ट इंडिया कंपनी में अधिकारी था। उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ शीर्षक से बड़ी ग्रंथमाला की रचना की थी। अपनी यथार्थवादी दृष्टि के कारण, भारतीय बुद्धिजीवियों के बीच उसे खासी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जेम्स मिल उपयोगितावादी चिंतक बैंथम का शिष्य था, जिसने धार्मिक नैतिकता केंद्रित राज्य के बजाय कानून के राज्य को वरीयता दी थी। जिससे आगे चलकर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। 1833 में ब्रिटिश सरकार ने नया चार्टर लागू किया। उस समय तक जेम्स मिल का बेटा जॉन स्टुअर्ट मिल कंपनी की सेवा में आ चुका था। छोटे मिल ने उपयोगितावाद का विचार अपने पिता से ग्रहण किया था। लेकिन अपने पिता के साथ-साथ उसपर रूसो का भी प्रभाव था। जॉन स्टुअर्ट मिल मानवीय स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था। ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी में आते समय उसकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी। कह सकते हैं कि भारत उसके लिए ऐसी जगह थी, जहां वह अपने विचारों को प्रयोग में बदल सकता था। निस्संदेह उसने ऐसा किया भी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 1833 के बाद जब भारत में रह रहे अंग्रेजों ने, इस देश की जनता पर लागू होने वाले कानूनों से बाहर रखने की अपील की तो मिल ने उसका जोरदार विरोध किया था।


1833 का चार्टर तैयार करने में जॉन स्टुअर्ट मिल की अहं भूमिका थी। उस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त कर, उसे पूरी तरह प्रशासनिक कंपनी बना दिया गया। दूसरा बड़ा फैसला था, सभी कानूनों के दस्तावेजीकरण का। उसके लिए अधिनियम में ‘विधि आयोग’ बनाने की अनुंशसा की गई थी। तीसरा और बड़ा प्रावधान था, प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह स्पर्धात्मक बना देना। तदनुसार उनमें जाति, धर्म, प्रजाति, क्षेत्रीयता की सीमाओं से परे, कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता था। उसके फलस्वरूप सरकारी नौकरियों के रास्ते सभी वर्गों के लिए खुल गए। 1833 के चार्टर के क्रियान्वन में जो कानून बने, उन्होंने शताब्दियों से चले आ रहे मनुस्मृति के पक्षपातपूर्ण विधान को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। शूद्रों और अतिशूद्रों की दृष्टि से वह युगांतरकारी बदलाव था; जबकि बाकी के लिए उनके वर्षों से चले आ रहे विशेषाधिकारों पर कुठाराघात था।

चार्टर 1813 ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा का अधिकार दिया था। जिससे उनके लिए ज्ञान के बंद दरवाजे खुलने लगे। 1833 के चार्टर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि स्पर्धात्मक परीक्षाओं में पास होकर वे उच्च पदों तक पहुंच सकते हैं। 1853 जो चार्टर लागू हुआ उसमें सामुदायिक प्रतिनिधित्व को मान्यता दी गई थी। उसके फलस्वरूप शताब्दियों से शासित होते आए शूद्र-अतिशूद्र शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने लगे। यह सही है कि शिक्षा में आगे होने के कारण ब्राह्मण उन दिनों शासन-प्रशासन द्वारा सर्वाधिक लाभान्वित वर्ग थे। दो-तिहाई पदों पर उन्हीं का बोलबाला था। फिर भी बदलाव की हवा उनके लिए चिंता का विषय बनी हुई थी। बहुत धीरे ही सही, मगर सत्ता उनकी मुटृठी से फिसलने लगी थी। यह उनकी सहनसीमा से बाहर था कि जिन लोगों को वे शताब्दियों से अपने पैरों के नीचे रौंदते आए हैं, वे स्थानीय निकायों में उनके बराबर बैठकर, अपने दमन और दुर्दशा के सीधे उन्हें जिम्मेदार ठहराकर बराबरी की मांग करें। लेकिन परिस्थितियां बदली हुई थीं। एक ओर अंग्रेज थे, जो खुद को आधुनिकतम सभ्यता का दावेदार बताकर, भारत में बने रहना चाहते थे। दूसरी ओर केंद्र में मुगल साम्राज्य अंतिम सांसें गिन रहा था। देश करीब छह सौ छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा था, जिनके वैभवहीन, विलासी राजा और नबाव अंग्रेजों की चाटुकारिता में खुद को धन्य समझते थे। ऐसे में सीधे विरोध संभव न था। हताशा और नैराश्य के बीच उनका एकमात्र सपना था, धर्म-केंद्रित राज्य की वापसी का, ताकि उनके विशेषाधिकार सुरक्षित हों। इसके लिए वे साम-दाम-दंड-भेद, हर तरह से लगे रहते थे।

संयोग से चर्बी वाले कारतूसों ने उन्हें जनता को भड़काने का अवसर दे दिया। उन कारतूसों को मुंह से खोलना पड़ता था। हालांकि अंग्रेज सैन्य अधिकारी कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल से इन्कार कर रहे थे, लेकिन उनके पास कोई भरोसेमंद तरीका नहीं था, जिससे सैनिकों के दिल में घर कर गई धारणाओं से मुक्ति दिला सकें। तेज रफ्तार अफवाहों के बीच वे कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे। मेजर जनरल हर्सी को लिखे गए पत्र में ‘रायफल अनुदेश विभाग’ के कप्तान राइट ने लिखा थाᅳ‘मैंने उन्हें(अपनी समझ के अनुसार) यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि कारतूसों में भेड़ की चर्बी और मोम का इस्तेमाल किया गया है।’[iv] इसपर सैनिकों का कहना था कि हम तो विश्वास कर लें, लेकिन गांव जाने पर लोग इसपर विश्वास नहीं करेंगे। उन्होंने कप्तान राइट से बाजार से इन वस्तुओं को खरीदकर प्रयोग करने को भी कहा था।

बैरकपुर जहां विपल्व की नींव रखी गई, कोलकाता प्रेसीडेंसी का मुख्यालय था। वहां कंपनी की चार रेजीमेंट थीं। जॉन हर्सी उनका जनरल था। 24 जनवरी की 1857 को उसने अपने अधिकारियों को सूचित करते हुए लिखा थाᅳ‘सिपाहियों के दिमाग में इस तरह की गलतफहमी संभवतः ‘धर्म सभा’ की रिपोर्ट से पैदा हुई है। वह कोलकाता स्थित हिंदुओं का संगठन है। उसने लोगों को यह कहकर भड़काया है कि चर्बी वाले कारतूस असल में सिपाहियों को ईसाई बनाने का षड्यंत्र है।’[v] उल्लेखनीय है कि 1813 के बाद भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म-प्रचार की अनुमति प्राप्त हो चुकी थी। धर्म-प्रचार के लिए वे सामान्य प्रलोभन से लेकर अशिक्षित जनता को डराने-धमकाने जैसा हर प्रोपेंगडा इस्तेमाल कर रही थीं। इसकी जानकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों को भी थी। कुछ उससे नाखुश भी थे। 29 मई 1807 को सेंट जार्ज फोर्ट के गवर्नर को संबोधित एक पत्र में लार्ड मिंटो ने लिखा थाᅳ‘भारतीय उपनिवेश में कंपनी के शासन की जानी-पहचानी और घोषित नीति, विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के बीच सामंजस्य बनाए रखने की है।’[vi] ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष को संबोधित एक अन्य पत्र में, ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-प्रचार के नाम पर बांटी जा रही सामग्री की आलोचना करते हुए उसने लिखा था कि प्रचार सामग्री मेंᅳ‘बगैर किसी तर्क या प्रमाण के, लोगों को उस धर्म के विरुद्ध भड़काया जा रहा है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है।’[vii]पत्र में उसने मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान को कंपनी के उद्देश्यों के लिए हानिकारक माना था।

ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार के अराजक तरीकों ने ‘धर्म सभा’ जैसे परंपरावादी संगठनों, जो हिंदुओं को किसी भी प्रकार के सुधार का विरोध करते थे, को जनभावनाओं को भड़काने का अवसर दिया था। प्रसंगवश बता दें कि ‘धर्म सभा’ की स्थापना गोपीमोहन देब नामक भद्र बंगाली ने 1830 में की थी। 1857 में गोपीमोहन देव के बेटे राधाकांत देब संस्था के प्रमुख प्रभारी थे। उनके परिवार की गिनती कोलकाता के धनाढ्य वर्ग में थी। उन्होंने अपनी समृद्धि अंग्रेजों के आने के बाद अर्जित की थी। राधाकांत देब बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत के अच्छे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे। मगर थे ठेठ परंपरावादी। वे सती प्रथा को भारतीय समाज और संस्कृति की पहचान से जोड़ते थे। इसलिए सती प्रथा पर रोक के लिए राजा राममोहन राय के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन के वे घोर विरोधी थे। सरकार को पत्र लिखकर उन्होंने सती प्रथा पर कोई रोक न लगाने की प्रार्थना की थी।

धर्म आरंभ से ही राजनीति का बड़ा हथियार रहा है। बड़े-बड़े साम्राज्य मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए उसका उपयोग करते आए हैं। ऐसे राज्य जो लोगों की सामान्य जरूरतों का ध्यान रखने में विफल रहते हैं, जनता का ध्यान बांटने के लिए प्रायः धर्म और संस्कृति का राग अलापने लगते हैं। धर्म बड़े साम्राज्य गढ़ने की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं में हमेशा सहायक होता आया है। 1813 के चार्टर में ईसाई मिशनरियों को भारत आकर धर्म प्रचार करने की अनुमति देने के पीछे भी यही मंशा थी। ‘धर्म-सभा’ के माध्यम से बंगाली भद्रजन भी ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे थे। केवल धर्म के सहारे ही वे अपने वर्गीय अधिकारों की सुरक्षा कर सकते थे। इससे सिपाहियों में, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे, और धर्म जिनकी चेतना को नियंत्रित करता थाᅳआक्रोश बढ़ना स्वाभाविक था। मंगल पांडे पर मुकदमे के दौरान गवाह के रूप में पेश हुए बिगुलवादक जान लेविस के अनुसार, मंगल पांडे ने दूसरे सिपाही मेहरलाल से कहा थाᅳ‘मैं यह धर्म के लिए कर रहा हूं।’ [viii]

ध्यान देने की बात है कि जिन कारतूसों को निषिद्ध मानकर सिपाहियों ने विद्रोह की शुरुआत की थी, उनमें से अनेक ने आगे की लड़ाई उन्हीं कारतूसों के भरोसे लड़ी थी। स्वयं मंगल पांडे की 19वीं बटालियन में भी ऐसे हिंदू(ब्राह्मण) सिपाहियों की संख्या बहुतायत में थी, जो कभी न कभी चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल कर चुके थे। दूसरे विपल्व में हिस्सा लेने वाले सिपाहियों से कहीं अधिक भारतीय सिपाही ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे। उन्हीं की मदद से कंपनी विपल्व को दबाने में कामयाब हुई थी। वे सब कभी न कभी चिकनाईयुक्त कारतूसों का प्रयोग कर चुके थे। मगर ऐसा कोई रिकार्ड नहीं मिलता, जिससे पता चले कि पता चले कि चर्बी वाले कारतूसों के सेवन से इतने लोगों को अपने धर्म या जाति से हाथ धोना पड़ा था। ना ही किसी ने ऐसी मांग की थी। चिकनाई-युक्त कारतूसों के पीछे सच चाहे जो भी हो, बड़े पैमाने पर उनका प्रयोग हिंदू और मुसलमान सैनिकों को भड़काने के लिए किया गया था। दोनों को साथ इसलिए रखा गया था, क्योंकि बिना एक-दूसरे की मदद के सैन्य-विद्रोह असंभव था।

उस लड़ाई में सिखों को, जिन्होंने अतीत में हिंदू धर्म, यहां तक कि गौ-रक्षा के लिए भी, अनेक लड़ाइयां लड़ी थीं, आश्चर्यजनक रूप से अलग कर दिया गया था। यहां तक कि अंग्रेज जो अफवाह फैला रहे थे, उनपर भी ध्यान नहीं दिया गया। क्या सिर्फ इसलिए कि सिख अल्पसंख्यक थे? हिंदुओं और मुसलमानों का ध्यान उस ओर भले ही न हो, मगर अंग्रेज़ सतर्क थे। सिखों को विपल्व से दूर रखने के लिए उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अंग्रेज़ पराजित हुए तो उसका परिणाम मुस्लिम शासकों की वापसी के रूप में होगा। सिखों की नवें गुरु तेगबहादुर के बलिदान की यादें ताजा थीं। उनकी मानसिकता को देखते हुए पंजाब के तत्कालीन चीफ कमीश्नर जॉन लारेंस ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यदि विपल्व सफल हुआ तो दिल्ली का बादशाह ‘सिख का सिर लाने वालों को पुरस्कृत करना आरंभ कर देगा।’9[ix] फिर भी यह कहना अनुचित होगा कि विपल्व में सिखों की सहभागिता नगण्य थी। हालांकि पंजाब के अधिकांश रजबाड़े अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। फिर भी दिल्ली से लेकर लखनऊ और इलाहाबाद तक, बड़ी संख्या में सिख सैनिक विपल्वियों के साथ थे। इस तथ्य की अनेक इतिहासकारों ने उपेक्षा केवल इसलिए की है, क्योंकि अंग्रेज इतिहासकारों ने पंजाब के रजबाड़ों के सहयोग के लिए उनका आभार माना था। इस कारण पंजाबी रजबाड़ों की सेनाओं को, जिनमें सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल थेᅳखालिस सिखों की सेना मान लिया जाता है।

सुंदरलाल और दूसरे भारतीय इतिहासकारों ने ईसाई मिशनरियों के अतिरेकी प्रचार-प्रचार के लिए उनकी आलोचना की है। लेकिन वे हिंदुओं, विशेषकर दमन और उत्पीड़न का शिकार रहीं निचली जातियों के ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने के मूल कारण के बारे में चुप्पी साध लेते हैं। गौरतलब है कि मनुस्मृति के आधार पर शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में इन वर्गों के मन में शिक्षा की ललक बढ़ी थी, लेकिन हिंदुओं के पारंपरिक शिक्षा सदनों में उनके प्रवेश की मनाही थी। ईसाई मिशनरियों ने भारत में आकर बड़ी संख्या में स्कूल खोले थे। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा के रास्ते प्रशस्त हुए। वे अपने बच्चों को मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में पढ़ाने लगे। फिर भी ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने का यही कारण नहीं था। मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों और अतिशूद्रों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए उनके नामकरण को लेकर भी प्रतिबंध थे। तदनुसार वे अपने लिए सम्मानजनक नाम नहीं चुन सकते थे। वे वही नाम रख सकते थे जिनसे दैन्य और सेवाभाव झलकता हो। ईसाई धर्म में ऐसा कोई प्रतिबंध न था। इसलिए प्रायः होता यह था कि मिशनरी संचालित स्कूल में प्रवेश  करते समय अध्यापक स्वयं ईसाई धर्म की परंपरा के अनुसार नामकरण कर देते थे। इससे शूद्रों-अतिशूद्रों को समाज में उनकी विशिष्ट और अपमानजनक पहचान से मुक्ति मिल जाती थीᅳइस कारण वे विरोध भी नहीं कर पाते। ऐसे नामकरण का धर्मांतरण से कोई संबंध न था।

इस लेख का उद्देष्य 1857 के विद्रोह की महत्ता को नकाराना नहीं है। न ही उन सैनिकों और सेनानायकों की नीयत पर संदेह है जिन्होंने उस युद्ध में प्राण-प्रण से हिस्सा लिया था। लेकिन यह भी तय है कि विद्रोही सैनिकों की कोई योजना नहीं थी। और जो राजे-रजबाड़े उनके साथ थे, उनमें से अधिकांश के अपने क्षुद्र स्वार्थ थे। इसलिए जैसे ही युद्ध के विपरीत परिणाम आने शुरू हुए, उन्होंने अपने हाथ पीछे खींचने आरंभ कर दिए थे। विपल्व की असफलता का कारण यह भी था कि नबाव बख्त खान, नाना साहेब, तात्या टोपे, झांसी की रानी, कुंवर सिंह, फैजाबाद के मौलवी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन महज अपने-अपने क्षेत्रों तक सीमित थे। उनके उद्देश्य सीमित थे।  देश के दूसरे विपल्वी संगठनों अथवा विपल्व के केंद्र के साथ उनका कोई तालमेल नहीं था। इसके विपरीत, जबकि ब्रिटिश शासन का प्रभाव क्षीण होता नजर आ रहा था, आम जनता और विपल्वी नेताओं के क्षेत्रीय एवं वर्गीय स्वार्थ सिर उठाने लगे थे, परिणामस्वरूप विपल्व की धार कुंद होने लगी थी।

जिन सैनिकों ने विपल्व का बिगुल फूंका था, उनमें से अधिकांश का संबंध किसान परिवारों से था। विपल्व उनके लिए समाजार्थिक स्वतंत्रता की उम्मीद लेकर आया था। उधर जमींदारों और नबावों को लगता था कि विपल्व कामयाब हुआ तो उनके हाथों से जमीन जा सकती है। इस कारण अधिकांश जमींदार तो पहले से ही अंग्रेजों के साथ थे। विपल्व का सर्वाधिक लाभ भी उन्हीं को हुआ। उसके बाद अंग्रेज यह समझने लगे थे कि भारत के प्रभुवर्ग को अपने साथ लिए बिना उनका यहां लंबे समय तक टिके रह पाना संभव नहीं है। इसलिए भूमि सुधारों ने नाम पर उन्होंने बड़े रजबाड़ों और जमींदारों से जो जमीन हासिल की थी, धीरे-धीरे उसे वापस लौटाना आरंभ कर दिया था। 1858 में भारत को ब्रिटिश उपनिवेश बनाते समय महारानी विकटोरिया ने घोषणा की थीᅳ‘हम यह ऐलान करते हैं कि स्थानीय रजबाड़ों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो समझौते किए हैं, वे सभी ब्रिटेन की सरकार को मान्य हैं….हम भारतीय रजबाड़ों के अधिकार, मान-सम्मान और उनकी प्रभुसत्ता का सम्मान करते हैं….वे अपनी समृद्धि और उच्च सामाजिक हैसियत का लाभ उठा सकेंगे।’10[x] परिणाम यह हुआ कि देश की दो-तिहाई भू-संपदा फिर से बड़े जमींदारों के कब्जे में आ गई। इसी के साथ राजनीतिक-सामाजिक सुधारों का चक्र लगभग थम-सा गया।

सवाल है कि 1857 के विपल्व से इन बहुजनों को क्या हासिल हुआ? उत्तर हैᅳकुछ नहीं। देखा जाए तो उस समय बहुजन दो हिस्सों में बंटे थे। एक ओर वे थे जो सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता जितना ही महत्त्वपूर्ण मानते थे। जिनका मानना था कि सदियों से अशिक्षा और दमन के शिकार रहे बहुजनों को, जिन्हें सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सहभागिता से वंचित रखा गया है, राजनीतिक आजादी हासिल करने से पहले सामाजिक स्वतंत्रता अर्जित करनी होगी। चूंकि अंग्रेजों के आने के बाद ही उन्हें शिक्षा और राजनीतिक सहभागिता के अवसर मिलने आरंभ हुए थे, इसलिए वे उनके भारत में बने रहने का समर्थन करते थे और स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए थे। दूसरा वर्ग उन उत्साही बहुजनों का था, जो विपल्वियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में हिस्सा ले रहे थे। उनमें झलकारी बाई और उनके पति पूरन कोरी, ऊदा देवी, लोचन मल्लाह, महावीरी देवी, नन्ही देवी, बांके चमार, नत्थू धोबी(जलियां वाला बाग), गंगू पहलवान, आदिवासी सिद्धो-कान्हू तथा उनकी बहनें फूलो-झानो, रानी दुर्गावती, रानी अबंतीबाई, रणवीरी देवी, आशा देवी जैसे हजारों बहुजन, आदिवासी शामिल थे, जिन्होंने विपल्व के दौरान अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, स्वाधीनता संग्राम में अपनी आहूति दी थी।

1857 के बाद इस देश में बने रहने के लिए अंग्रेजों ने यहाँ के प्रभुवर्गों को ध्यान में रखकर जो समझौते किए थे, उनमें बहुजनों की उपेक्षा की थी। 1813 से 1853 तक अंग्रेजों ने इस देश में जो राजनीतिक सुधार किए थे, उनसे वे पीछे नहीं हट सकते थे, क्योंकि वे सब कानून उनकी औपनिवेशिक नीति का हिस्सा थे। 1857 के बाद जो कानून बने, उनमें बहुजनों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई थी। भारत के प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन-अनुसंधान हेतु विलियम फोर्ट कालिज की स्थापना 1800 में हुई थी। लेकिन भारतीय साहित्य के अध्ययन और संग्रहण के काम में विशेष तेजी 1857 के बाद ही देखने में आई। इस दौर में संस्कृत साहित्य का भारी मात्रा में अनुवाद हुआ। अंग्रेज विद्वानों ने संस्कृत और दूसरी भाषाओं से खोज-खोजकर अंग्रेजी में प्रस्तुत किया। ‘सीक्रेड बुक्स आफ ईस्ट’ के अंतर्गत पचास से अधिक ग्रंथ प्रकाशित किए गए। बौद्ध, जैन और प्राकृत साहित्य को दुनिया के सामने लाने में अंग्रेजों की बड़ी भूमिका रही। वेद, उपनिषद, जातक साहित्य, व्याकरण, कथा साहित्य, महाकाव्य, गणित, ज्योतिष, इतिहास तथा आयुर्वेद के ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। इतना काम एक साथ, कुछ ही वर्षों के बीच हुआ, जितना उससे पहले शताब्दियों में नहीं हो पाया था। लेकिन ऐसा करते समय अंग्रेजों की दृष्टि पूरी तरह निरपेक्ष बनी रही। भारतीय समाज और संस्कृति को लेकर जो अन्वेषणात्मक और आलोचकीय दृष्टि जेम्स मिल के ग्रंथों में थी, उसका अभाव बना रहा। फुले और उनके समकालीन लेखकों की ओर से यूरोपीय लेखक लगभग मुंह फेरे रहे। उनके लिए 1857 के समर का एकमात्र सबक था कि कुछ भी हो, इस देश के प्रभुवर्ग को नाराज नहीं करना है। उनके काम का बहुजनों को इतना लाभ तो हुआ कि संस्कृत के भाषायी ज्ञान के अभाव में जो भारत के प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने में असमर्थ थे, अब वे उन्हें अनुवादों के माध्यम समझ सकते थे। लेकिन मानवीय दृष्टि से उन ग्रंथों की जैसी पड़ताल आवश्यक थी, उसके लिए उन्हें डॉ. आंबेडकर, पेरियार जैसे बहुजन बुद्धिजीवियों और नेताओं के उभार तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

संदर्भ :

[i] ​थॉमस लॉ, सेंटल इंडिया : ड्यूरिंग दि रिबेलियन आफ 1857 एंड 1858, लोंगमेन

एंड ग्रीन, लंदन, 1860, पृष्ठ 324, सेमुअल इस्लाम द्वारा  ‘सिख एंड 1857 : मिथ एंड फेक्ट्स में उद्धृत।

[ii] मार्क्स : आर्टिकिल आन इंडिया, ‘ग्रेट रिबेलियन’ आलेख तल्मीज खाल्दुन द्वारा  उद्धृत, ‘रिबेलियन : ए सिपोजियम’, संपादक पी. सी. जोशी, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, 1857, पृष्ठ—6

[iii] समाचार दर्पण, 13 मार्च 1830, एसएसके—आई 136, ए. एफ. सलाउद्दीन अहमद, अली फौलाद अहमद द्वारा ‘सोशल आइडियाज एंड सोशल चेंज इन बंगाल 1818—1835’ में उद्धृत

[iv] जी. एफ. फोरेस्ट, ए हिस्ट्री आफ इंडियन म्युटिनी, खंड—1, विलियम ब्लेकवुड एंड संस, लंदन, 1904 पृष्ठ 4.

[v] दि ग्रेट रिबेलियन, तल्मीज अहमद

[vi] रेमसे मूर, दि मेकिंग आफ ब्रिटिश इंडिया, 1756—1858, लोंगमेंस ग्रीन एंड कंपनी, लंदन, पृष्ठ 251

[vii] उपर्युक्त

[viii] जी. एफ. फोरेस्ट, सलेक्शन ​फ़्रोम दि लेटरर्स डिस्पेचिज एंड अदर पेपर्स प्रीजर्वड इन मिलिट्री, डिपार्टमेंट आफ इंडिया, खंड—1, पेज 141.

[ix] केव ब्राउन, पंजाब एंड सिंध इन 1857 (1861), खंड—1, पृष्ठ 28-29, तल्मीज खाल्दुन द्वारा पृष्ठ 33 पर उद्धृत

[x] रेमसे मूर, उपर्युक्त, पृष्ठ 382


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