दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए मौत की सज़ा का जाल

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली की रिपोर्ट के मुताबिक मौत की सज़ा पाए कुल आरोपियों में 76% (279 क़ैदी) या तो पिछड़ी जातियों या अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित थे। इनमें सभी 12 महिला आरोपी पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित थीं। सैयद जैगम मुर्तजा की रिपोर्ट

देश में अक्सर किसी भी सनसनीख़ेज़ वारदात के बाद लोग सख़्त सज़ा और सख़्त क़ानून की मांग करने लगते हैं। लेकिन शायद ही लोग समझते हैं कि भारत में क़ानून की किताब सबसे मोटी है और इसके सबसे सख़्त क़ानूनों की मार समाज के सबसे निचले तबक़ों पर पड़ती है। आंकड़े बताते हैं कि आज़ादी के बाद मौत की सज़ा पाने वालों में सबसे ज़्यादा दलित, पिछड़े और मुसलमान हैं। ज़ाहिर है कि ये वो तबक़े हैं जो आर्थिक रुप से कमज़ोर हैं और लंबी चलने वाली, महंगी क़ानूनी प्रक्रिया में पिस कर न्याय से वंचित रह जाते हैं।

हमें पढ़ाया गया है कि क़ानून नियमों की एक प्रणाली है जो व्यवहार को विनियमित करने के लिए सामाजिक या सरकारी संस्थानों के माध्यम से बनाई और लागू की जाती है। क़ानून को न्याय का विज्ञान और न्याय की कला भी कहा गया है। लेकिन आज़ादी के बाद के अनुभव बताते हैं कि न्याय की इस कलाकारी में वंचित तबक़े व्यवस्था का शिकार हो रहे हैं क्योंकि अपने आर्थिक और सामाजिक हालात के चलते वो इस विज्ञान को समझ नहीं पा रहे हैं।

2016 तक के राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 14 साल में देश भर में सिर्फ 4 लोगों को फांसी हुई है। इनमें एक मुंबई आतंकी हमले का आरोपी अजमल क़साब है, दूसरा मुंबई धमाकों का आरोपी याक़ूब मेमन और तीसरा संसद हमले का आरोपी अफज़ल गुरु। 14 अगस्त 2004 को बलात्कार के आरोपी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई। ये हत्या या बलात्कार जैसे किसी जघन्य अपराध में फांसी का अब तक का आख़िरी मामला है। लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है। इसी दौरान देश में 375 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई है। इनके मामलों में अलग-अलग स्तर पर या तो सुनवाई चल रही है या उनकी दया याचिकाएं लंबित हैं। इनमें दो-तिहाई से ज़्यादा वंचित तबक़ों से हैं।

2016 में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी यानि एनएलयू, दिल्ली ने ‘डेथ पेनाल्टी इंडिया’ नाम से एक रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ उस समय देश के विभिन्न हाईकोर्ट में मौत की सज़ा के 270 मामले जबकि सुप्रीम कोर्ट में 52 मामले लंबित थे। इस समय तक राष्ट्रपति के पास 30 दया याचिकाएं लंबित थीं जबकि 21 मामलों में दया याचिका ख़ारिज कर दी गई थी। इनमें सबसे ज़्यादा 213 मामले हत्या से जुड़े थे, 84 यौन अपराधों से संबंधित थे, 31 आतंकवादी गतिविधियों से, 24 अपहरण करके हत्या, 18 डकैती के दौरान हत्या, 2 रक्षा क़ानून और 1 ड्रग क़ानून से संबंधित था।

फांसी की सजा पाने वालों में दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुसलमान अधिक

यह रिपोर्ट बताती है कि मौत की सज़ा पाए कुल आरोपियों में 76% (279 क़ैदी) या तो पिछड़ी जातियों या अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित थे। इनमें सभी 12 महिला आरोपी पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित थीं। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ मौत की सज़ा पाए लोगों में 73.8%  आर्थिक रुप से बेहद ख़राब स्थिति में थे। इनमें 23% कभी स्कूल गए ही नहीं जबकि 61.6% हाई स्कूल तक भी नहीं पढ़े थे। मौत की सज़ा पाने वालों में महज़ 24% सवर्ण हैं, 34.6% पिछड़े वर्ग से, 24.5% अनुसूचित जाति/जनजाति समूहों से जबकि 20.7% धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। हालांकि अब हालात और बदतर हुए हैं लेकिन 2016 के बाद से सरकारी आंकड़े आने बंद हो गए हैं तो निश्चित संख्या पता कर पाना मुश्किल है। लेकिन यह सच है कि क़ानून का शिकंजा कमज़ोर तबक़ों के लिए ही है।

इसी तरह 2003 में गया के पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य ने इसी तरह के आंकड़े पेश किए थे। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया था कि तब भागलपुर जेल में मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे 36 में से 35 आरोपी अल्पसंख्यक, पिछड़े या एससी/एसटी समूहों से थे। इनमें सिर्फ एक अपराधी कर्रे सिंह का संबंध सवर्ण वर्ग से था। तब शांडिल्य ने इसे मौत की सज़ा में 100 फीसदी आरक्षण लिखा था।

इधर सरकारी आंकड़ों बताते हैं कि देश की क़रीब 1400 जेलों में 4.33 लाख क़ैदी हैं। इनमें 67% ऐसे हैं जिनके मामलों में या तो सुनवाई हो रही है या सुनवाई शुरु ही नहीं हुई है। जेलों में बंद कुल क़ैदियों में आधे से ज़्यादा यानि 53 फीसदी मुसलमान, दलित या आदिवासी हैं। मुसलमानों की आबादी में हिस्सेदारी क़रीब 14 फीसदी है लेकिन जेल में बंद क़ैदियों में इनकी हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज़्यादा है। इसी तरह देश की आबादी में क़रीब 24% हिस्सेदारी रखने वाले एससी एसटी समुदाय की विचाराधीन कैदियों की संख्या में 34% हिस्सेदारी है। 2016-17 में, यानि सिर्फ एक साल में यूपी में 160 लोगों पर एनएसए यानि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत कार्रवाई हुई। इनमें आधे से ज़्यादा मुसलमान थे, बाक़ी दलित, यादव और दूसरी कमज़ोर जातियां।

 

दूसरी ओर सबल बड़े से बड़ा अपराध करने के बावजूद क़ानून के शिकंजे से बचने में कामयाब हो जाते हैं। एक उदाहरण तो बिहार में 1995 से लेकर 2002 के बीच हुए अनेक नरसंहारों का है जिनमें करीब तीन सौ दलित-ओबीसी मारे गए। इनमें लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला, शंकरबिगहा, मियांपुर आदि शामिल हैं। इन सभी मामलों में पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को पलटते हुए अभियुक्तों को बरी दिया। अनेक आरोपियों को निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी।

इसे हाल ही के उस मामले से भी समझा जा सकता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 6 लोगों को मौत की सज़ा के अपने ही पुराने फैसले को उलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में 6 लोगों की मौत की सजा को बरक़रार रखा था। अब इनको बरी करते हुए अदालत ने कहा है कि कि 2003 के मामले में जांच “निष्पक्ष और ईमानदार नहीं थी”। अदालत ने 16 साल जेल में काट चुके इन 06 लोगों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया है।

दरअसल, क़ानून के इस जाल में वंचित तबक़े विवेचना के स्तर पर ही व्यवस्था का शिकार हो जाते हैं। अधिकतर मामलों में विवेचक ये मन बनाकर जांच शुरु करता है कि आरोपी किसी ख़ास तबक़े से है इसलिए उसने अपराध किया ही होगा। कोर्ट में जाने के बाद अदालत के चक्कर, अच्छे वकीलों की महंगी फीस और तारीख़ के बाद तारीख़ के तंत्र में ग़रीब की न्याय पाने की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं।

मौत की सज़ा को उलटने का ये दुर्लभ मामला मौत की सज़ा के बारे में बुनियादी सवालों को पुनर्जीवित करता है। क्या मौत की सज़ा अपराध रोकने या अपराधी के मन में डर बैठाने में कामयाब रही है? ज़ाहिर है नहीं। हां ग़रीब और वंचितों में मौत की सज़ा का डर ज़रुर है, क्योंकि उनको मालूम है वो क़ानून की चौखट पर न्याय की लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं हैं। देश के मज़बूत तबक़े बहुत हद तक क़ानून के वैज्ञानिक जाल से बच निकलने की कला सीख चुके हैं लेकिन वंचितों के पास न कलाकारी के लिए संसाधन हैं और न लड़ने की शक्ति।

(कॉपी संपादन : नवल)


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