चन्द्रगुप्त मौर्य और मौर्य-साम्राज्य 

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में। वे प्रस्ताव करते हैं कि मौर्य वंश के शौर्य और समृद्धि का बहुलांश नंदों का है। साथ ही वे यह भी बता रहे हैं कि चाणक्य को लेकर किस तरह के चक्रजाल बुने गऐ हैं

जन विकल्प

मौर्य-काल, विशेष कर चन्द्रगुप्त को लेकर, ऐतिहासिक सामग्री भले ही कम उपलब्ध हों, लेकिन इस संबंध में जनश्रुतियों और किस्से-कहानियों की भरमार है। ये इतनी हैं कि इनका अध्ययन-सम्पादन कुछ खास धैर्य और विवेक की मांग करता है। मौर्य कौन थे? यह चन्द्रगुप्त कौन था? यह चाणक्य वास्तविक है या काल्पनिक? ये सारे प्रश्न इकट्ठे इस तरह उठ खड़े होते हैं कि कोई भी हैरान हो सकता है। आधुनिक इतिहासकारों के लिए कुछ कारणों से यह काल उनका प्रिय विषय रहा है। न केवल इतिहासकारों, बल्कि कह सकते हैं, राजनेताओं के लिए भी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री और उससे अधिक उल्लेखनीय स्वतंत्रता-सेनानी जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में जोर दिया कि स्वतंत्र भारत के झंडे में मौर्य सम्राट अशोक का प्रतीक ‘चक्र’ रहना चाहिए। डॉ .भीमराव आंबेडकर भी इस बौद्ध प्रतीक के रखने के हिमायती थे। वह रहा भी। संविधान सभा ने सारनाथ वाले अशोक स्तम्भ को राष्ट्रीय चिह्न के रूप में अंगीकार किया। मौर्यों की शासन व्यवस्था, उनके सरोकार, उनके द्वारा खींचे गए विस्तृत और भव्य भारत के भौगोलिक नक़्शे को लोगों ने कई कारणों से पसंद किया। भारत के संसद भवन में एक बालक की प्रतिमा देख मुझे प्रथमद्रष्टया लगा था यह बालक कृष्ण की होगी, लेकिन नहीं, नीचे लिखा है ‘बालक अजापाल चन्द्रगुप्त भावी भारत निर्माण की कल्पना में’ (शेफर्ड बॉय चन्द्रगुप्त मौर्य ड्रीमिंग ऑफ़ द इंडिया ही वाज टु क्रिएट)। यह अलग बात है कि पौराणिकता से पगे हमारे इतिहास ने अपने आँचल में इस नायक के बारे में कुछ ख़ास प्रमाण नहीं रखा है। चन्द्रगुप्त के बारे में स्पष्ट उल्लेख केवल एक जगह रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है, जहाँ उसके राज्य और शासन के बारे में तो थोड़ी जानकारी है, लेकिन जीवनवृत्त के बारे में कुछ भी नहीं है। 

हाँ, यूनानी-रोमन अभिलखों में जिस सेंड्रोकोट्स की चर्चा है, वह कोई और नहीं चन्द्रगुप्त ही है। मेगास्थनीज विरचित ‘इंडिका’ जो उद्धरणों के रूप में ही उपलब्ध हुई और अब उनके एक पृथक संकलन के रूप में उपलब्ध है, में चन्द्रगुप्त (सेंड्रोकोट्स ) और उसके शासन-प्रबंध का विस्तृत विवरण है। इस तरह वह पहला भारतीय शासक है जिसका अंतर्राष्ट्रीय महत्व इतने पुराने ज़माने में था और संभवतः यही कारण है कि आज भी इतिहासकारों की इसमें विशेष अभिरुचि है। हालांकि, उसके जीवन वृत्त के बारे में पर्याप्त छेड़छाड़ की गयी है। किस्से-कहानियों का एक सिलसिला बना दिया गया और उस पूरे इतिहास को एक तिलिस्म के रूप में खड़ा करने की कोशिश की गयी है। यथास्थान हम इस पर भी विचार करेंगे। अभी तो हम उस ऐतिह्य को देखना चाहेंगे जो किसी रूप में हमें उपलब्ध है। उन सवालों को भी छूना चाहेंगे, जो इस सन्दर्भ में उठते रहे हैं।

संसद भवन, नई दिल्ली के द्वार संख्या-5 के सामने बालक चंद्रगुप्त मौर्य की तस्वीर

मौर्य-काल 321 ईसापूर्व में चन्द्रगुप्त मौर्य के सत्तारूढ़ होने से आरम्भ होता है। बिन्दुसार (शासनकाल 297-273 ईसापूर्व ) और अशोक (शासनकाल 268-232 ईसापूर्व) इस साम्राज्य के दो अन्य यशस्वी सम्राट हुए। अशोक के पौत्र वृहद्रथ की हत्या उसके ही सेनापति पुष्यमित्र ने कर दी और ईसापूर्व 185 में वह सम्राट बन गया। इस तरह ईसापूर्व 321 से 185 तक, यानि कुल 136 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य कायम रहा। यह काल हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास का उल्लेखनीय काल रहा है और शायद यही कारण है कि समाज के प्रतिगामी और उदार दोनों पक्षों ने अपने-अपने हिसाब से इस दौर की व्याख्या की है, या इसे आत्मसात किया है। अपने-अपने तरीके से इस ऐतिहासिक विरासत पर कब्ज़ा जताने के भी प्रयास हुए हैं। अंतर्विरोध यहीं से आरम्भ होता है।

इस काल से जुड़े कुछ सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। यह चन्द्रगुप्त कौन था? मौर्य कौन थे? इस संबंध में विरोधाभासी बातें हमें मिलती हैं। रोमिला थापर के अनुसार ‘चन्द्रगुप्त का संबंध मोरिया जन से था,परन्तु वह निम्न वर्ण का था और उसका परिवार स्पष्टतया वैश्य था।’ दामोदर कोसंबी उन्हें ‘आदिवासी मूल या मिश्रित वंश’ के मानते हैं। उनके अनुसार ‘मौर्य (पालि : मोरिय ) नाम मोर टोटम का सूचक है, यह वैदिक-आर्य नाम नहीं हो सकता।’ इतिहासकारों में से अधिकांश ने यही माना है कि वह सामान्य कुल से आता था। लेकिन इस सामान्य के मतलब क्या? इसके पूर्व आये नंदों को तो नीच-कुलोत्पन्न कहा गया। क्या यह चन्द्रगुप्त नीचे से कुछ ऊपर था? कहा गया है वह मुरा नामक एक धाई का पुत्र था, जो नन्द दरबार में काम करती थीं। इस आधार पर उसे शूद्र मान लिया गया। लेकिन वह तक्षशिला जैसे विश्रुत शिक्षा संस्थान का विद्यार्थी भी रहा और श्रुतियों के अनुसार वहां उसने वेद-वेदांगों का विधिवत अध्ययन किया। तो क्या तत्कालीन समाज में एक शूद्र धाई के बेटे का तक्षशिला में प्रवेश करना संभव था? बौद्ध-ग्रंथों दीघनिकाय, महावंश और दिव्यावदान में मौर्यों की चर्चा है, भले ही वह अशोक के परिप्रेक्ष्य में हो, लेकिन इनके मौर्य क्षत्रिय हैं, न कि शूद्र या कि विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’ की तरह निचली जाति के। यह संभव है कि मौर्य निचले तबके से हों, और राजा होने के कारण अशोक तक पहुँचते-पहुँचते वे क्षत्रिय कहे जाने लगे हों। यह भी कहा जाता है कि पिप्पलिवन के मोरिय कुल से उसका संबंध था। यह पिप्पलिवन नेपाल की तराई में स्थित रुम्मिनदेई (बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी के निकट) से लेकर उसके नीचे कसिया (वर्तमान गोरखपुर जिला) तक फैला था, और यहाँ मोरिय लोगों का गणराज्य था। संभव है इस इलाके का कोई व्यक्ति मगध के राजदरबार में अधिकारी-कर्मचारी हो और उस परिवार से चन्द्रगुप्त आता हो। लेकिन कुछ लोगों के अनुसार वह नन्द का ही वैध अथवा ‘अवैध पुत्र’ था, जो उसकी किसी रानी या फिर सेविका की कोख से जन्मा था। वर्तमान नई दिल्ली स्थित संसद-भवन की जिस प्रतिमा का उल्लेख मैंने ऊपर किया है, उसका निर्माण हिल्डा सेलिमन ने किया और उसे संसद भवन को भेंट किया। इसमें चन्द्रगुप्त को अजापाल या शेफर्ड कहा है। लेकिन इन सबसे अधिक दिलचस्प एक जनश्रुति है, जिसका उल्लेख करना बुरा नहीं होना चाहिए। कम से कम किस्सागोई तो यहाँ पर्याप्त है। इस के अनुसार चन्द्रगुप्त की माँ पाटलिपुत्र स्थित मगध राजदरबार में काम करती थी और उसका वह चंचल पुत्र था। उस ज़माने में कोई स्त्री दरबार में अधिकारी तो नहीं ही होगी। वह या तो सेविका होगी या फिर रानी-मंडल की सदस्य। लेकिन यहाँ उसे एक बागी का पुत्र बताया गया है। संभव है ऐसे किसी बागी की पत्नी को दरबार में गुलाम रहने को मजबूर कर दिया गया हो। जिस रूप में भी हो, बालक चन्द्रगुप्त का दरबार में आना-जाना होता था। एक रोज राजा अपने दरबारियों के समक्ष अपनी होशियारी का प्रदर्शन कर रहा था, जैसा कि राजा प्रायः करते रहते हैं। लोहे के पिंजड़े में शेर की एक मूर्ति थी। वह दरबारियों को चुनौती दे रहा था कि कोई है, जो पिजड़े को बिना तोड़े इस शेर को बाहर निकाल दे? दरबारियों को कुछ सूझ नही रहा था, अथवा राजा को खुश करने के लिए वे अपनी असमर्थता का स्वांग कर रहे थे। दरबार में बैठे बालक को कौतुहल हुआ। वह तन कर खड़ा हुआ और बोला – मैं निकाल दूंगा। राजा को गुस्सा आ गया। चिढ कर बोला- नहीं निकाला तो काट दूंगा। निर्भीकता पूर्वक चन्द्रगुप्त का जवाब था- नहीं निकालूंगा तब न! राज-दरबार में आते-जाते चन्द्रगुप्त का इतना निर्भय होना स्वाभाविक था। वह दरबार और राजाओं के मनोमिजाज से भी परिचित होगा। उसने एक हाथ में पिंजड़ा लिया। आग मंगवाई। पिंजड़े को आग पर रख दिया। मूर्ति मोम की बनी थी। पिघल कर गिर गयी। पिंजड़ा साबूत रह गया। थोड़े समय के लिए बालक चन्द्रगुप्त की धाक जम गयी। लेकिन राजा की नजर में वह चढ़ गया। चन्द्रगुप्त की माँ को महसूस हुआ, बेटे ने खतरा मोल ले लिया है। उसने बेटे की हिफाजत के लिए उसे चिड़िया पकड़ने वाले एक मिर्शिकार के हाथ सुपुर्द कर दिया अथवा बेच दिया। लेकिन चन्द्रगुप्त की चंचलता तो जन्मजात थी। वहां भी उसकी कारस्तानी जारी रही। वह अपने मालिक द्वारा पकडे गए चिड़ियों को छुप-छुपा कर उड़ा दिया करता। बेचारा मिर्शिकार तबाह था। उसने चिढ कर किसी किसान के हाथ इसका सौदा कर दिया। किसान के यहाँ गायों की चरवाही करनी थी। बालक चन्द्रगुप्त ने इस जगह को भी अपने अनुकूल बनाने की कोशिश की। चरवाहों के बीच ही उसने राजदरबार का रूपक खेल बनाया। डंडों को जोड़ कर उसने सिहासन बनाया और उस पर खुद बैठ गया। राजा और उसके दरबार को उसने देखा था। राजा का स्वांग वह कर सकता था और वही कर रह था। कहते हैं इसी वक़्त एक ब्राह्मण उधर से गुजर रहा था। वह ठिठक गया और बच्चों का यह खेल देखने लगा राजा को अपने अधिकारों का प्रदर्शन करते देख ब्राह्मण को कुछ चुहल सूझी। वह इस स्वांग में आकर खुद शामिल हो गया। झुक कर राजा को सम्मान प्रदर्शित किया और फिर याचना की – ‘गरीब ब्राह्मण हूँ। दूध पीने के लिए एक गाय मिल जाती तो कृपा होती।’

चन्द्रगुप्त ने राजकीय गरिमा के साथ कहा – ‘गायें चर रही हैं। जो गाय पसंद हो, ले जाओ।’ 

– ‘लेकिन महाराज! जिनकी गाय है वे क्या मुझे दण्डित नहीं करेंगे?’ याचक ब्राह्मण ने व्यंग किया। 

चन्द्रगुप्त तन कर खड़ा हो गया। बोला – ‘मैं हूँ राजा। मैं कहता हूँ, ले जाओ, अपनी पसंद की गाय। ‘ 

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बालक चन्द्रगुप्त का यह इत्मीनान और दृढ़-भाव किसी को भी पसंद आता, उस याचक ब्राह्मण को भी पसंद आया। वह तो इस पर रीझ ही गया। वह और कोई नहीं, ऐतिहासिक किंवदंतियों का चाणक्य था। कहते हैं चाणक्य ने चन्द्रगुप्त की माँ से संपर्क किया। उसने उसे किसान से मुक्त कराया और तक्षशिला तक पहुँचाया, जहाँ जनश्रुतियों के अनुसार, वह स्वयं शिक्षक था। उसके बाद की चन्द्रगुप्त-कथा जगजाहिर है कि किस प्रकार उसने उत्तर-पश्चिम के इलाके में अपनी राजनैतिक जड़ें तलाशीं। सिकंदर के आक्रमण के समय तक्षशिला का राजा आम्भी था, जो सिकंदर के सामने बिछ गया था। इर्द-गिर्द राजनैतिक अफरा-तफरी मची थी और सिकंदर के लौट जाने के बाद जो यूनानियों के विजित क्षेत्र यहां रह गए थे, उस पर शासन करने के लिए सेल्यूकस यहाँ रह गया था। इन विषम परिस्थितियों के बीच चन्द्रगुप्त ने बुद्धिमता से काम लिया और एक ऐसा युवा जो सिकंदर की तरह किसी राजकुल से सीधे तौर से जुड़ा नहीं होता अंततः 321 ईसापूर्व में मगध का शासक बन जाता है। यह एक युगांतरकारी घटना इसलिए थी कि चन्द्रगुप्त की स्थिति महापद्मनंद से काफी विलग थी। जनश्रुति के अनुसार महापद्मनंद राजमहल में प्रवेश पा चुका और तत्कालीन रानी का विश्वासपात्र था। लेकिन इसके विपरीत चन्द्रगुप्त चरवाही कर रहा था। चरवाही वाली कथा को हम खारिज भी कर दें तो कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि हम चन्द्रगुप्त को अभिजात घोषित कर सकें। इसीलिए पुरानी दुनिया के यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क (प्रथम सदी) ने चन्द्रगुप्त को एक सामान्य कुलोत्पन्न किशोर के रूप में चिह्नित किया है।


चन्द्रगुप्त को महापद्मनंद की तरह अपमानजनक सम्बोधन नीच कुलोत्पन्न क्यों नहीं कहा गया? भारतीय इतिहासकारों में से अधिकांश के लिए वह क्षत्रिय क्यों बन गया? उसके कुल की अधिक छीछालेदर क्यों नहीं की गयी? इन सवालों पर हमने कम ही विचार किया है। क्या इसका कारण केवल यह नहीं है कि चन्द्रगुप्त द्वारा नन्द साम्राज्य को उखाड़ फेंकना तत्कालीन मगध के अभिजनों के मनोविज्ञान को संतुष्ट कर रहा था? नंदों ने चुपचाप एक सामाजिक उथल-पुथल ला दिया था। उसका क्षत्रान्तक रूप अभिजनों को भला कैसे रास आ सकता था! नंदों ने संस्कृत के विकास पर जोर दिया था; क्योंकि एक बड़े राष्ट्र के लिए इलाकाई बोलियों-जुबानों की जगह एक ऐसी जुबान चाहिए थी, जिसमें स्थानीयता के तत्व कम हों। इसीलिए उसने पाणिनि को इस दिशा में काम करने के लिए उत्साहित किया अथवा उसके काम का महत्व देख उसे राजकीय संरक्षण दिया। लेकिन वर्णव्यवस्था वाली सामाजिक संरचना को हतोत्साहित भी किया, क्योंकि यह उसकी कल्पना के राष्ट्र निर्माण में बाधक बन रहा था। इस स्थिति में ब्राह्मणों के दो दल हो गए प्रतीत होते हैं। उदार ब्राह्मणों का दल नन्द को पसंद कर रहा था, क्योंकि राक्षस के रूप में उनका मंत्री, जो स्वयं ब्राह्मण था, नन्द के पक्ष में था। लेकिन रूढ़िवादी ब्राह्मणों के एक दल ने इसका विरोध किया। चाणक्य की कोई ऐतिहासिक अवस्थिति है तो यह उस दकियानूसी प्रवृत्ति का ही प्रतिनिधि प्रतीत होता है। चाणक्य के बारे में हम आगे विस्तार से बात करेंगे। लेकिन फिलवक्त इतना तो जान ही लेना चाहिए कि यदि यही कौटिल्य भी हैं, तो हमें इस तथ्य की जानकारी होनी चाहिए कि इनकी कृति ‘अर्थशास्त्र’ सामाजिक प्रतिगामिता का भयानक पिटारा है। ‘अर्थशास्त्र’ का रचयिता यदि नन्द वंश के विरुद्ध कोई अभियान चलाता है, तो इसके कारण छुपे नहीं रह जाते।

लेकिन चाणक्य की पहेली इतनी सरल भी नहीं है। चाणक्य यदि इतना ही सामाजिक प्रतिगामी है, जितना अर्थशास्त्र का रचयिता, तो फिर वह चन्द्रगुप्त जैसे लगभग अज्ञातकुलशील बालक को शिक्षित करने के लिए तक्षशिला क्यों ले जाता है? यदि चन्द्रगुप्त को तक्षशिला ले जाने वाली घटना सही है, तो इस आधार पर कहना पड़ेगा कि चाणक्य सामाजिक उदारता में यकीन करता है और तय लकीरों पर अनुगमन नहीं करता। जैसी कि किंवदंती है वह अपने जीवन के आखिरी समय में जैन साधु हो जाता है। एक वैदिक ब्राह्मणवादी अचानक वेद-विमुख परिव्राजक धर्म में कैसे, किन स्थितियों में अग्रसर हो जाता है? कोई भी यूनानी अभिलेख कहीं भी चाणक्य या विष्णुगुप्त की कोई चर्चा नहीं करते। अन्य कोई भारतीय अभिलेख भी चाणक्य की अवस्थिति चन्द्रगुप्त के मंत्री के रूप में नहीं करते। ऐसे में क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि चाणक्य का पूरा चक्रचाल हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के दरम्यान इसलिए रचा गया कि इससे प्राचीन इतिहास को एक अभिजन तेवर प्रदान किया जा सके? हद तो यह है कि इस मामले में मार्क्सवादी से लेकर अभिजनवादी इतिहासकार एकमत हो गए। रोमिला थापर ने चन्द्रगुप्त में जुड़े गुप्त को वैश्य चिह्न के रूप में देखा, क्योंकि हिन्दू सामाजिक संहिता ‘मनुस्मृति’ के अनुसार वैश्य गुप्त शीर्ष धारण करेंगे। इस आधार पर चन्द्रगुप्त में उनने वैश्यत्व की तलाश की। लेकिन चाणक्य के मूल नाम विष्णुगुप्त में भी तो गुप्त है। इस आधार पर उन्हें ब्राह्मण कैसे घोषित किया? चन्द्रगुप्त के बारे में वह कहती हैं ‘वह एक ब्राह्मण कौटिल्य के संरक्षणाधीन था।’ रोमिला यहीं नहीं रुकतीं। वह बताती हैं ‘चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके समर्थकों की सैनिक शक्ति नंदों के मुकाबले कम थी, और यही वह बिंदु है जहाँ कौटिल्य की कूटनीति उपयोगी सिद्ध हुई।’ यानि नन्द शासन के तख्तापलट में निर्णायक भूमिका कौटिल्य की थी। ऐसी व्याख्या इतनी धृष्टतापूर्वक करने के पीछे कोई कारण तो होंगे। लेकिन इस ओर अब और बढ़ना विषयांतर होना होगा।

मेरी इस बात में कोई रूचि नहीं है कि चन्द्रगुप्त की जाति और वंश क्या है। वह जनसामान्य का है, किसी नौकरानी का बेटा है, चरवाही करता रहा है; इतना ही काफी है। मुझे तो यह प्रतीत होता है कि मातृकुल से उसका जुड़ाव अधिक है और यही कारण है कि उसने अपने राजवंश को माँ मुरा के नाम पर रखा। उसका कोई पिता तो होगा। विष्णुपुराण के अनुसार कोई सर्वार्थसिद्ध उसका पिता है। उसने उसकी खोज में कोई दिलचस्पी नहीं दिखलाई और न ही मध्यकालीन शूद्र नायक शिवाजी की तरह क्षत्रियत्व हासिल करने के लिए खजाना लुटा दिया। चाणक्य के जो वर्णन जनश्रुतियों में है, वह वर्णवादी बिलकुल नहीं है। क्योंकि यह चाणक्य अपने चन्द्रगुप्त को यूनानी क्षत्रप सेल्यूकस की बेटी हेलेना से विवाह करने पर जोर देता है। ऐसा चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ के रचयिता की तरह वर्णवादी नहीं दिखता। लेकिन इसी के साथ उसके जीवन वृत्त की चर्चा से हम आगे बढ़ना चाहेंगे।

चन्द्रगुप्त ने 321 से लेकर 298 यानि लगभग तेईस वर्षों तक शासन किया। उसने स्वेच्छा से शासन त्याग किया और अपने बेटे बिन्दुसार को सत्ता सौंप दक्षिण कर्नाटक चला गया, जहाँ जैनियों के सल्लेखना विधि से अन्न त्याग कर उसने जीवन लीला ख़त्म की। प्रमाणों के अनुसार वह 25 की उम्र में मगध-सम्राट बनता है। 23 वर्ष शासन करने के बाद उसकी उम्र 48 की होगी। इस उम्र में सन्यास और सल्लेखना विधि से मृत्यु का स्वागत यह बताता है कि वह संकल्प-पुरुष था। उसने सब कुछ हासिल किया और सब कुछ का त्याग किया। नन्द साम्राज्य का उसने अंत अवश्य किया, लेकिन महापद्मनंद के पदचिन्हों पर ही चला और जिस मगध साम्राज्य की आधारशिला पद्मनन्द ने रखी थी, उसे उसने और बढ़ाया। सन्यास के कोई आठ साल पूर्व उत्तर-पश्चिम सीमांत इलाके में यवनों को पराजित कर उसने मगध की सीमा में ला दिया। दक्षिण में उसके रथों के घर्घर नाद को संगम कवियों ने सुना और उसे शब्दों में बाँधा। पूरब की तरफ भी उसने दूर तक अपनी सीमा रेखा खींची। पूरे हिमालय को उसने अपने साम्राज्य से जोड़ा।

मेगास्थनीज के विवरणों में आया हुआ चन्द्रगुप्त सचमुच सिकंदर का प्रतिरूप लगता है। पाटलिपुत्र ,जो यूनानी विवरण में पालिमबोथरा के रूप में आया है का विवरण मेगास्थनीज ने इत्मीनान से किया है। वह तत्कालीन दुनिया का सबसे आकर्षक नगर है, जिसकी भव्यता बेबीलोन आदि यूनानी नगरों से कहीं आगे है। मेगास्थनीज के वर्णन के अनुसार यह नगर वहां स्थित है, जहाँ एरनोबोआस (सोन नद ) गंगा में मिलता है। पालिमबोथरा गंगा के किनारे बसा हुआ है। यह 80 स्टेडिया (लगभग 15 किलोमीटर) लम्बाई और 15 स्टेडिया (लगभग 3 किलोमीटर) चौड़ाई वाला नगर है। नगर के चारों तरफ 6 प्लेथोरा चौड़ाई और 30 क्यूबिट गहराई वाली एक कृत्रिम नहर जैसी खुदाई की गयी है, जिसमें पानी भरा रहता है। नगर में 570 टावर और चार बड़े व 60 छोटे द्वार बने हैं। मेगास्थनीज के अनुसार राजप्रासाद की समृद्धि और वैभव ऐसा है जिनसे मेमनोमियन मूसा की तमाम समृद्धियाँ फीकी पड़ जाती हैं। मेगास्थनीज पालिमबोथरा (पाटलिपुत्र) के राजप्रासाद और व्यवस्था की महिमा बखानते विभोर हो गया प्रतीत होता है। 

वर्तमान पटना के कुम्हरार मोहल्ले में अभी भी उस मशहूर राजप्रासाद के पुरावशेष हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग ने उसे अपने कब्जे में लिया हुआ है। आज से 45 वर्ष पूर्व मैंने जब इस स्थल को देखा था, तब सभागार के अस्सी में से अधिकांश स्तम्भ नजर आते थे। लेकिन महीने रोज पहले जब मैंने इसे देखा, तब गहरे उदास हुआ कि सभी स्तम्भों को बालू मिटटी से भर दिया गया है। वहां बेतरतीब कास-कुश के जंगल उग आये हैं। वहां स्थित एक सूचना पट पर हिंदी और अंग्रेजी में लिखा है कि पानी के जमाव के कारण ऐसा किया गया है। आज के तकनीकी युग में पानी निकालने के अनेक उपाय हैं। लेकिन उसे बालू-मिटटी से भर देना तो उन पुरातत्ववेत्ताओं का अपमान है जिन्होंने बड़े परिश्रम से इन्हें ढूंढा और हमारे सामने लाया। लेकिन जो सच है, वह सामने है। निश्चय ही यह दुखद है। हम अपनी धरोहरों को भी सुरक्षित रखने में विफल हैं। उस ऊंचाई को छूना तो हमारी कार्यसूची में ही नहीं है।

वर्तमान में पटना, बिहार के कुम्हार में हुए उत्खनन स्थल की तस्वीर।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उत्खनन के दौरान प्राप्त अवशेषों को मिट्टी से भर दिया है

कुम्हरार में खड़े होकर मैंने उस समय का ख्याल किया जब चन्द्रगुप्त अपनी मंत्रिपरिषद के साथ यहां बैठकें करता था और उसके दरबार में देश और दुनिया के कोने-कोने से लोग तकलीफें और फरियाद लेकर उससे मिलने आते होंगे। बाज दफा यूनानी राजनयिक, बेबीलोन और ईरान का कोई व्यापारी या कोई प्रसिद्ध कारीगर किसी न किसी सिलसिले में उससे मिलते होंगे। चन्द्रगुप्त अपनी माँ का ख्याल करता होगा, जो उसी दरबार में शायद नौकरानी रही थीं। मैंने कई दफा इस पर भी सोचा कि उनलोगों ने किस मिहनत और संकल्प से यह सब हासिल किया था। यह सब विचारते हुए रोमांचित हो जाना अस्वाभाविक नहीं था। 

पटना के कुम्हरार में खुदाई के दौरान की तस्वीर। खुदाई के दौरान यहां मौर्य कालीन अवशेष मिले थे। इनमें मौर्य कालीन स्तंभ शामिल थे

मगध साम्राज्य और पाटलिपुत्र का यह राजप्रासाद चन्द्रगुप्त का बनाया हुआ था, इस बात की संभावना कम ही है कि नंदों की निम्नता से चिढ़े हमारे अभिजन इतिहासकारों ने इस बात की मीमांसा नहीं की कि चन्द्रगुप्त एक सुदृढ़ और सुव्यवस्थित पृष्ठभूमि पर सत्तारूढ़ हुआ था। सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि इस मौर्य शौर्य और समृद्धि का बहुलांश नंदों का है। हाँ, नंदों के समय कोई मेगास्थनीज नहीं आया था। इसलिए यह सब कुछ चुपचाप मौर्यों के हवाले हो गया। बुद्ध के विचारों पर उपनिषदों की छाया देखने वाले अभिजन समाज ने मौर्य शासन-व्यवस्था और उसकी समृद्धि में नंदों की भूमिका पर कोई विचार नहीं किया। शायद इसलिए कि वे शूद्र थे — नीच कुलोत्पन्न। यह है हमारी कुलीन और कुटिल परिदृष्टि।

(कॉपी संपादन : नवल)


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