सिकंदर की भारत से भिड़ंत

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं सिकंदर के बारे में जिसने पोरस को छल से पराजित किया और फिर मित्र भी बनाया। उनके मुताबिक सिकंदर भले ही केवल 19 महीने तक भारत भूमि पर रहा, लेकिन चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में वह अपना प्रतिरूप छोड़ गया था

जन-विकल्प

एक मित्र ने एक बार इस बात पर सवाल उठाया था कि सिकंदर-प्रसंग को भारतीय इतिहास का हिस्सा क्यों बनाया जाय? उनके अनुसार भारत-पाक बँटवारे के बाद हमें पाकिस्तानी सरजमीं पर क्या हुआ, के ब्योरे को भारत के इतिहास से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, या फिर हमें पूरी दुनिया का इतिहास एक साथ रखना-देखना चाहिए। मैं मित्र की बात से न तब सहमत था, न अब हूँ। पूरी दुनिया का इतिहास एक साथ देखना बहुत अच्छा है, और इसके अपने ही मजे हैं। लेकिन भारत का भी अपना एक इतिहास है, जैसे हर देश-समाज का है। बड़ी बात यह है कि भारत सिर्फ एक राजनैतिक-भौगोलिक घेरा कभी, किसी ज़माने में नहीं रहा है। यह एक पूरा उपमहाद्वीप है, जिसकी राजनीतिक सीमायें इधर-उधर होती रही हैं, लेकिन प्राकृतिक सीमायें कभी नहीं बदलीं, न शायद बदल सकती हैं। फिर यह भारत एक जीवित संस्कृति भी है। हम स्वात घाटी, खैबर दर्रे, सिंध के पंचनद दोआब इलाके को विस्मृत कर भारत का इतिहास नहीं देख सकते। इसलिए कि भारत का उद्भव यहीं, इसी इलाके में हुआ है। वर्तमान भारत के राजनैतिक भूगोल का हिस्सा भले यह नहीं हो, हमारे भारतीय इतिहास का अनिवार्य और अटूट हिस्सा है और रहेगा। इसीलिए सिकंदर के भारतीय प्रसंग को हमें देखना ही होगा। क्योंकि उसका भारत आना, यहां की राजनैतिक स्थितियों से जूझना, उसकी लड़ाइयां और सब से बढ़ कर यूनान की सांस्कृतिक-वैचारिक-वाणिज्यिक दुनिया से भारत का परिचय; इतना कुछ है कि इन सब को जाने-समझे बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।

सिकंदर 327-26 ईसापूर्व में भारत आया; शायद एक धूमकेतु की तरह, और कुल लगभग डेढ़ साल (ठीक उन्नीस महीने) तक अपनी करामात दिखा कर लौट गया। यूनानी अभिलेखों, विशेषकर एरियन के एनाबेसिस ऑफ़ एलेग्जेंडर, में उसके भारत प्रवेश के विस्तृत ब्योरे उपलब्ध हैं और उन ब्योरों के उद्धरण से भारतीय इतिहास-ग्रंथों के पृष्ठ-दर-पृष्ठ भरे पड़े हैं। लेकिन पहले हमें सिकंदर के बारे में ही थोड़ी जानकारी लेनी चाहिए।

सिकंदर का मूल नाम एलेग्जेंडर है, एलेग्जेंडर थर्ड अथवा तृतीय, जो भारतीय उच्चारण में घिस कर जाने कब सिकंदर बन गया। वह यूनान के मकदूनिया इलाके के राजपरिवार से था। यूनानी ऐतिहासिक दस्तावेजों में उसका जीवनवृत्त सम्पूर्णता से दर्ज है, जिसके अनुसार 20 जुलाई 356 ईसापूर्व में मकदूनिया के पेल्ला नगर में माता ओलम्पिया की कोख से उसका जन्म हुआ। उसका पिता फिलिप वहां का राजा था। बीस साल की उम्र में, यानी 336 ईस्वीपूर्व में स्वयं सिकंदर मकदूनिया का राजा बन गया। यूनानी दार्शनिकों की विश्वविख्यात त्रयी- सुकरात, प्लेटो और अरस्तू – में से वह अरस्तू का शिष्य था।। अरस्तू ने उसमें विश्वविजय की भावना भरी होगी, इसकी उम्मीद तो नहीं की जानी चाहिए, लेकिन सच्चाई यही है कि सिकंदर अतीव महत्वाकांक्षी था। उसका स्वप्न पूरी दुनिया जीतने का था। ग्रीक देवताओं में उसकी गहरी आस्था थी और उनमें से हरक्यूलस उसे खास पसंद था, जो वह खुद बनना चाहता था। विश्व विजय और साम्राज्य-विस्तार उस ज़माने के ऐसे स्वप्न थे, जिससे कई दूसरे राजा भी प्रभावित थे। भारत में भी नन्द राजाओं और चन्द्रगुप्त मौर्य में इसी तरह की इच्छाएं हिलोरें मार रही थीं।

एनाबेसिस ऑफ एलेग्जेंडर पुस्तक के मुख पृष्ठ पर प्रकाशित सिकंदर की पेंटिंग

सिकंदर के पास बहुत समय नहीं था। दुनिया बड़ी थी, लेकिन उसकी आकांक्षाएं उससे कहीं बड़ी थीं। हालांकि यह बतलाना मुश्किल है कि उसके मन में दुनिया का नक्शा कितना बड़ा था, लेकिन उसकी बड़ी चुनौती ईरानी साम्राज्य था, जो मकदूनिया से करीब चालीस गुना बड़ा था। ईरान का पुराना राजा सायरस (558-529 ईसापूर्व), सिकंदर का आदर्श भी था। सिकंदर ने साम्राज्य-विस्तार का काम जल्दी ही आरम्भ कर दिया। आस-पास के इलाकों को मिलाते हुए जल्दी ही मिस्र और सीरिया के इलाकों को उसने अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसकी हिम्मत बढ़ी और 331 ईसापूर्व में वह पर्सिया अथवा ईरान के ख्यात साम्राज्य से जा टकराया। उस वक़्त डेरियस तीसरे का शासन-काल था। डेरियस प्रथम ने ही पर्सिया को एक बड़े साम्राज्य में बदल दिया था। उसकी सीमायें कंधार और कम्बोज तक को समेट चुकी थीं। इस तरह सिकंदर पहला विदेशी नहीं था, जिसने भारत पर आक्रमण किया था। उसके पूर्व ईरानी राजा डेरियस प्रथम ने भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के एक अच्छे-खासे भूभाग को ईरानी साम्राज्य में मिला लिया था। यह ईरानी साम्राज्य का बीसवाँ प्रदेश था। ईरानी अभिलेखों में ‘इंडिया ‘और हिन्दुओं की खास तौर से चर्चा की गयी है। यह बीसवाँ प्रदेश संपन्न था और इसकी चर्चा यूनान तक थी। इसलिए सिकंदर हर हाल में भारत तक पहुँचना चाहता था; जो “शहद और दूध का देश” के रूप में जाना जाता था। लेकिन उसे पहले ईरानी सम्राट डेरियस तीसरे को पराजित करना था। डेरियस तृतीय और सिकंदर के बीच अरवेला-गोगेमेला के इलाके में लड़ाई हुई और इसमें सिकंदर जीत गया। ईरानी साम्राज्य का पतन हो गया। इस जीत ने सिकंदर को आत्मविश्वास से भर दिया। हालांकि डेरियस तृतीय की हार के बाद भी ईरानी जनता के बीच से तीखा प्रतिरोध हुआ और इस पर विजय पाने में उसे कोई पांच साल लग गए। इस विजय के बाद उसे सिकंदर महान (एलेग्जेंडर द ग्रेट) कहा जाने लगा।


ईरान साम्राज्य के फतह के बाद वह पूरब-दक्षिण की तरफ मुड़ा जो भारत था। उसने अपनी सेना को दो हिस्सों में बाँट दिया और अलग-अलग सेनापतियों के नेतृत्व में उसकी सेना ने दो तरफ कूच किया। ऐसा प्रतीत होता है आक्रमण किये जाने वाले इलाकों की सिकंदर पूरी खबर रखता था। इसका अर्थ यह हुआ कि उसके पास ख़ुफ़िया तंत्र ,इंजिनियर और दूसरे तकनीशियन पर्याप्त संख्या में थे और निश्चय ही वे दक्ष भी थे। भारतीय इलाकों की राजनैतिक स्थिति अजीबो-गरीब थी। यहाँ छोटे-छोटे राज्य थे, जिनमें से कुछ में राजतंत्रीय और कुछ में जनतंत्रीय हुकूमतें काम कर रही थीं। ये लोग बड़ी लड़ाइयों के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे। इनके सामर्थ्य की सीमा थी। वे मजबूत सैन्य-बल कैसे रख सकते थे। सिकंदर के लिए यह अनुकूल स्थिति हो जाती थी। कुछ इतिहासकारों ने जनतंत्रीय व्यवस्था को सैन्य दृष्टि से कमजोर माना है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि जनतंत्रीय व्यवस्था वाले इलाकों में ही सिकंदर को जबरदस्त प्रतिरोध झेलना पड़ा। यूनानी दस्तावेजों के हवाले से हमें जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार यूसुफजई (पुष्कलावती) क्षेत्र के जनजातीय लोगों ने सिकंदर के छक्के छुड़ा दिए। यदि कहा जाय तो इस इलाके के इन जनजातीय लोगों के अलावा सिकंदर का अन्यत्र कोई बड़ा प्रतिरोध नहीं हुआ, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस जनजातीय सरदार का नाम यूनानी ग्रंथ में एस्टीज लिखा गया है। इन से निबटने में सिकंदर को एक महीना लग गया। आगे स्वात घाटी के इलाके थे। ये सब अभी कबीले थे। इस इलाके में भी उसे जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा। कुछ इलाकों में तो जनविद्रोह जैसी स्थिति हुई और इसमें स्त्रियों तक ने हिस्सा लिया। सिकंदर की सेना ने क्रूरता से इन तमाम विद्रोहों को दबा दिया। और इन सब के बाद आया तक्षशिला, जहाँ का राजा आम्भी अपने पडोसी पुरु प्रदेश के राजा पोरस के खिलाफ डाह में डूबा किसी ऐसे अवसर की तलाश में था कि उसे सबक सिखाया जाय। सबक सिखाने की कुव्वत स्वयं में न देख वह किसी ऐसे मित्र की तलाश में था, जिसकी सहायता से वह पोरस को मजा चखा सके। सिकंदर के आगमन से उसकी बांछें खिल गयीं। उसने सिकंदर के पास दूत भेज कर अपनी भावनाओं को रखा पता नहीं सिकंदर ने भारत के बारे में क्या सोचा होगा! आम्भी ने अपनी सेना को सिकंदर के स्वागत में उतार दिया। राजौर-जामू का राजा अभिसार भी आम्भी का मित्र और उसके प्रभाव में था। उसने भी आम्भी के साथ सिकंदर का साथ दिया। इस मिली-जुली सेना को लिए दिए सिकंदर झेलम (वैदिक वितस्ता) किनारे पहुंचा। यूनानी जुबान में इस नदी को हाइडेस्पीज कहा गया है। झेलम से लेकर चिनाब के दोआबे -जो कभी कैकेय भी कहा जाता था, में पोरस का राज था। सिकंदर और पोरस के बीच युद्ध के भारतीय विवरणों में संभव है कुछ अतिशयोक्ति हो, लेकिन अतिशयोक्ति तो सिकंदर की महानता बखान करते यूनानी आख्यानों में भी संभव है। जो हो पोरस, आम्भी नहीं था। उसकी सजी सेनाओं को देख कर भी सिकंदर ने सोचा कि ये हमारे स्वागत में बिछ जाएँगी। सिकंदर ने पोरस के पास इस आशय के सन्देश भी भेजे। पोरस का जवाब था-स्वागत होगा, लेकिन युद्ध के रूप में होगा। पोरस में उत्साह की कोई कमी नहीं थी और उसकी सेना भी हर तरह से बुलंद थी। लेकिन सिकंदर ने छल से काम लिया। झेलम नदी के किनारे जहाँ दोनों सेनाएं आमने-सामने थी,वहां से कुछ किलोमीटर दूर सिकंदर ने अपनी घुड़सवार टुकड़ी भेजी। इस टुकड़ी ने नदी पार किया और पीछे से पोरस की सेना पर टूट पड़ी। पोरस जब तक सम्भलता, उसकी सेना में भगदड़ हो गयी। इस भगदड़ का एक और कारण पोरस की सेना में हाथियों का होना भी बताया जाता है। सिकंदर की सेना ने इन हाथियों को जब बुरी तरह घायल किया, तब उन सब में भगदड़ मच गयी। वे अपनी सेना को कुचलते हुए भागे। ब्रिटिश काल के इतिहासकारों ने सिकंदर पर कुछ अधिक जोर दिया, क्योंकि उन्हें यह बतलाना था कि भारतीय विदेशियों से हमेशा से पराजित होते रहे हैं। सच्चाई यह है कि पोरस की सेना की बहादुरी देख सिकंदर, उसके सेनापति और यूनानी सेना स्तब्ध थी। किसी इतिहासकार ने इस बात पर विचार नहीं किया कि इस युद्ध के बाद ही यूनानी सेना थक क्यों गयी? दरअसल इसी युद्ध के बाद यूनानी सेना ने सिकंदर से कह दिया कि अब लौट चलें। इस मनोविज्ञान की मीमांसा किसी भी इतिहासवेत्ता ने नहीं की।

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हम पोरस और सिकंदर के उस संवाद को छोड़ना नहीं चाहेंगे, जो इतिहास-प्रसिद्ध है। पोरस युद्ध क्षेत्र में पकड़ा नहीं गया था। (बल्कि इस युद्ध में सिकंदर का प्रसिद्ध घोडा ही मारा गया था, जिस पर सिकंदर को फख्र था। वह उसे बहुत प्यारा भी था) पोरस युद्ध छोड़ सुरक्षित निकल गया, क्योंकि उसकी सेना अचानक के हमले से बिखर गयी थी। इस परिदृश्य की उसने कल्पना नहीं की थी। जब वह दूर जा चुका था, तब उस को आग्रह कर बुलवाया गया था। कुछ लोगों की मध्यस्थता से वह आया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस मध्यस्थता में चन्द्रगुप्त मौर्य भी था ,जो उन दिनों तक्षशिला में पढ़ रहा था और सिकंदर के संपर्क में था। पोरस जब सिकंदर के सामने आया तो कहते हैं, सिकंदर ने उससे पूछा -तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाय? यह पता नहीं कि सिकंदर का तेवर प्रश्न पूछते वक़्त कैसा था। लेकिन पोरस ने जो जवाब दिया वह उसके वीर व्यक्तित्व को रेखांकित करता है। उसका जवाब था – ‘जैसा किसी राजा के साथ किया जाता है।’ कहते हैं उसके इस बहादुर जवाब पर सिकंदर रीझ गया। उसने पोरस के सामने मित्रता का प्रस्ताव किया और उनका पुरु उसे वापस कर दिया। दोनों मित्र हो गए।


जैसा कि पहले बता चुका हूँ, सिकंदर सब मिला कर उन्नीस महीने भारत भूमि पर रहा। उसकी सेना लम्बे सैन्य अभियान के कारण थक चुकी थी और सैनिक अपने वतन और घर लौटना चाहते थे, जहाँ अपने परिवार से मिल सकें। भारत के बहादुर कबीलों ने अपने प्रतिरोध से उन्हें खूब परेशान किया था। आम्भी ने स्वागत किया तो पोरस ने करारा जवाब। कहते हैं कुछ भारतीय साधु -दार्शनिकों से भी उसकी मुठभेड़ हुई, जिनके आड़े-तिरछे सवालों ने उसे अपने प्रसिद्ध गुरु अरस्तू की याद दिलाई होगी। सिकंदर युवा भी था और स्वप्नदर्शी भी। अभी वह तीस -इकतीस की उम्र में था। उसके मन में पता नहीं कितने तरह के सवाल घुमड़े होंगे। दार्शनिकों में से किसी एक ने उसके विश्व-विजय पर भी सवाल उठाये थे। ‘तुमने तो स्वयं पर विजय नहीं पायी है, दुनिया को क्या जीतोगे!” तो यह जीत इन दार्शनिकों की दृष्टि में कोई अर्थ नहीं रखता। यहाँ के पराजित लोग भी पोरस जैसे निर्भीक हो सकते हैं। कबीलाई इलाकों के जनप्रतिरोध, जिनमें स्त्रियां भी शामिल थीं ,उसने याद किया होगा। और सब से बढ़ कर व्यास नदी के पार नन्द साम्राज्य की वह मजबूत अवस्थिति, जिसकी विशाल सैन्य शक्ति के बारे में सुन वह शिथिल हो गया। उसने तय कर लिया कि अब हर हाल में लौटना है। उसने कुछ नगर बसाये थे और व्यास नदी के तट पर बारह की संख्या में वेदियां या विजय स्तम्भ बनवाये। पोरस और आम्भी को उनके इलाके मिल गए। एक ने अपनी कायरता और दूसरे ने अपनी बहादुरी से सिकंदर के दिल में जगह बनाई थी। शेष जीते हुए प्रदेशों में अपने क्षत्रप नियुक्त कर, वह उस समुद्री रास्ते से स्वदेश लौटा जिस रास्ते से हड़प्पा काल में बेबीलोन से व्यापार हेतु आवाजाही होती थी। बेबीलोन में वह बीमार हुआ और 11 जून 323 ईसापूर्व में चुपचाप मर गया। मरना तो सबको होता है। लेकिन लगता है सिकंदर को इसमें भी जल्दी थी। तैंतीस की उम्र मरने की नहीं होनी चाहिए थी।

सिकंदर के पूरे कारनामे को भारत का एक नौजवान, जो तक्षशिला के विख्यात अध्ययनशाला का विद्यार्थी था, देख रहा था। उसने भारतीय चतुरंगिणी सेना की कमजोरी को चिह्नित किया। तलवार, तीर-धनुष और दूसरे भारतीय हथियारों से यूनानी सेना के हथियार बेहतर थे। उसने सिकंदर का चातुर्य देखा। उसके साथ विद्वानों की टीम थी, जिसमें दुभाषिये, वैद्य, भूगोल और तकनीक के जानकर, शिल्पी सब थे। उसकी सैन्य शक्ति मगध की सैन्य शक्ति से बहुत कम थी, लेकिन उसकी सेना चुस्त-दुरुस्त थी। चन्द्रगुप्त ने देखा कि किस तरह बहादुरी से डटे पोरस की सेना को पीछे से घात लगा कर सिकंदर ने पराजित कर दिया। उसने पोरस की बहादुरी देखी और आम्भी की कायरता। सिकंदर के विजय स्तम्भों को देखा और समुद्री रास्तों के बारे में जाना। बस तीन साल बाद ही वह मगध पर इन सबका इकट्ठे प्रयोग करता है और ठीक उसी तरह उस विशाल नन्द साम्राज्य को उखाड़ फेंकता है, जैसे विशाल ईरानी साम्राज्य को कभी सिकंदर ने उखाड़ फेंका था। सिकंदर भारत में अपना प्रतिरूप छोड़ गया था।

(संपादन : नवल)


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