नंद वंश : एक शूद्र ने सत्ता संभाली

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं नंद वंश के बारे में। उनके मुताबिक, वह महापद्मनंद ही थे, जिन्हें पुराणों ने सर्व-क्षत्रान्तक (सभी क्षत्रियों का अंत करने वाला) कहा है। संभव है, ब्राह्मण पौराणिकता ने इन्हें ही परशुराम के रूप में चित्रित किया हो

जन-विकल्प

पहले बता चुका हूं कि महाजनपदीय राजतंत्रों में सत्ता पलट के लिए हिंसा और विश्वासघात धीरे-धीरे साधारण चीजें होती गयीं। सभी राजा हर समय हिंसा और विश्वासघात से डरे-सहमे रहते थे। यह डर उन्हें अपने भाई-बंधुओं, पुत्रों, अधिकारियों से लेकर बाहरी दुश्मनों तक से था। मगध के प्रथम वृहद्रथ राजवंश के तीसरे राजा रिपुंजय की हत्या उसके मंत्री पुलिक ने कर दी थी। बिम्बिसार का हर्यंक वंश तो पितृहन्ता वंश ही कहा जाता है, जिसमें लगातार दो राजकुमारों ने अपने पिता राजाओं को वध कर सत्ता झपट ली। इस राजवंश ने लम्बे समय तक शासन किया, लेकिन इसके एक राजा महानन्दिन को शिशुनाग नाम के एक व्यक्ति ने अंततः उखाड़ फेंका और मगध की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। यह घटना ईसापूर्व 412 में हुई थी। हर्यंक वंश ने कुल मिला कर 133 वर्षों तक राज किया। लेकिन 412 से 344 ईसापूर्व तक मगध पर शिशुनाग अथवा शैशुनाग वंश का राज रहा। शिशुनाग ने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र से वैशाली में स्थानांतरित किया और इसके बेटे कला-अशोक के शासनकाल में 383 ईस्वीपूर्व में बौद्धों की दूसरी महासंगीति अथवा महापरिषद वैशाली में आयोजित हुई। इसके पश्चात मगध की राजधानी को पुनः पाटलिपुत्र में ला दिया गया, क्योंकि व्यापार और प्रशासन के ख्याल से यह अधिक उपयुक्त था। कला-अशोक के बेटे नन्दिवर्धन के राजकाल (366-344 ईसापूर्व) में एकबार फिर खूनी-खेल हुआ। इस राजा के एक अधिकारी ने राजकाज और दरबार में खास रुतबा बना लिया और अंततः धोखे से राजा की हत्या कर दी। हत्या करने वाला अधिकारी महापद्मनंद था, जिसका कहीं-कहीं महापद्मपति, उग्रसेन, अग्रसेन और यूनानी ग्रंथों में अग्रेमिस के रूप में भी उल्लेख मिलता है। वह निश्चित रूप से चालाक, कुटिल और महत्वाकांक्षी था। लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि इन सब के साथ वह स्वप्नदर्शी था और उसमें राज-प्रबंधन और शासन करने की अद्भुत क्षमता थी। उसने जल्दी ही शिशुनाग-राजतन्त्र को अपने काबू में कर लिया और स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। यह घटना 344 ईसापूर्व की है। इस महापद्मनंद के नाम से ही इस पूरे राजवंश को नन्द वंश कहा जाता है। इस वंश के अंतिम राजा धननंद को ही अपदस्थ कर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य राजवंश की स्थापना की थी। धननंद 322 ईसापूर्व में अपदस्थ हुआ और इसके साथ ही मौर्य काल का आरम्भ हो गया ,क्योंकि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सत्ता संभाल ली।

इस तरह बहुत लम्बे समय तक नन्द वंश का शासन नहीं चला। 344 से 322 ईसापूर्व तक, यानि कुल जमा बाईस वर्षों तक। जनश्रुतियों और इतिहास में नौ नंदों की चर्चा है। माना जाता है कि ये सभी राजा थे। इनके नाम जान लेना बुरा नहीं होगा। ये थे – उग्रसेन, पाण्डुक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गोविश्नक, दाससिद्धक, कैवर्त तथा धननंद। लेकिन यह भी कहा जाता है कि नन्द बस दो पीढ़ियों तक राज कर सके। उग्रसेन – जिसे महापद्मनंद भी कहा जाता है के आठ पुत्र थे। इन आठों में धननंद ही राजा हुआ। शेष नन्द संभव है सत्ता में भागीदार हों, और इसलिए सब मिलकर नौ-नन्द कहा जाता होगा। महापद्मनंद इतना होशियार था कि अपने पुत्रों के बीच एकता बनाये रखने हेतु एक तरकीब के तहत नौ-नन्द की पहल की होगी, ताकि सब संतुष्ट रहें। हालांकि यह एक अनुमान ही है। हमारा काम तो इतने भर से है कि नन्द वंश का राज बाईस वर्षों तक रहा। 

तत्कालीन अभिलेखों से मिली सूचना के के अनुसार महापद्मनंद की सेना में बीस हजार घुड़सवार, दो लाख पैदल, चार घोड़ों वाले चार हजार रथ और तीन हजार हाथी थे

इस वंश को इतिहासकारों ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया है। इसके अनेक कारण हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्रोतों के अनुसार यह पहला शासक था, जो समाज के निचले पायदान से आया था। महापद्मनंद नापित (नाई ) परिवार से आता था और जन्म तथा तत्कालीन रिवाजों के अनुसार उसकी जाति शूद्र थी, जिसका काम लोगों की सेवा करना निर्धारित था, राज करना नहीं। मगध के समाज में भी ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में थे, जो इस तरह के एक व्यक्ति के राजसत्ता में आ जाने से चकित और चिढ़े हुए थे। इसलिए महापद्मनंद की जितनी भी भर्त्सना संभव थी, उतनी की गयी है। उसे गणिका (वेश्या) पुत्र से लेकर नीच कुलोत्पन्न, अनभिजात, नापितकुमार आदि कह कर अवहेलना की गई है। यह तो निश्चित है कि समाज के तथाकथित ‘बड़े लोगों’ के बीच उसकी मान्यता नहीं थी। चूकि यही ‘बड़े लोग’ पुराण और अभिलेखों के रचयिता होते थे, इसलिए इन लोगों ने अपनी राय महापद्मनंद और पूरे नन्द-काल के बारे में रखी है। लेकिन उनकी इन घृणित टिप्पणियों से ही नन्द राजाओं की प्रकृति और प्रवृत्ति का भी पता चलता है। वह यह कि महापद्मनंद और अन्य नन्द राजा तथाकथित बड़े लोगों अर्थात द्विजों के सामाजिक स्वार्थों के अनुकूल नहीं रहे होंगे। इस आधुनिक ज़माने में भी इसी मगध (बिहार) में कर्पूरी ठाकुर को राजनीति में अपमानित होते देखा गया है। संयोग से कर्पूरी ठाकुर भी उसी नाई समाज से थे, जिससे महापद्मनंद थे।

महापद्मनंद या उसके पुत्र धननंद ने भी द्विज समाज से समझौते की कोई पहल नहीं की और तथाकथित बड़े लोगों के ठसक की अवहेलना ही की। ऐसा भी कोई संकेत-साक्ष्य नहीं मिलता कि नंदों ने इन प्रश्रय-प्राप्त लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो, जैसा कि हम आगे विचार करेंगे कि किस प्रकार नंदों ने वृहद परिप्रेक्ष्य में राजनीति को देखा और ईर्ष्या-डाह जैसी प्रवृत्तियों को विकसित करने में उनकी कोई रूचि नहीं रही। बावजूद धननंद के शासनकाल में द्विजों का एक कुटिल-विद्रोह हुआ, इसकी सूचना मिलती है। संभवतः इस विद्रोह का नेता चाणक्य था, जिसकी आज भी द्विज समाज में काफी प्रतिष्ठा है। कथा और इतिहास यही है कि चाणक्य ने एक दूसरे शूद्र युवक चन्द्रगुप्त को आगे किया और धननंद को सत्ताच्युत कर दिया गया। ऐतिहासिक स्रोत बतलाते हैं कि शूद्र चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मण कौटिल्य का शिष्यत्व स्वीकार किया। विवरणों के अनुसार कौटिल्य ने ऐसी पहल धननंद से भी की थी। उसके इंकार को कौटिल्य चाणक्य ने अपना अपमान माना और प्रतिज्ञा की कि हर हाल में नन्द वंश का नाश कर दूंगा। अंततः शूद्र चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु की यह प्रतिज्ञा पूरी की। किसने किसका इस्तेमाल किया, यह एक पहेली है और शायद रहेगी भी।

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इतिहासकारों और इतिहास समीक्षकों ने नंदों की भूमिका का सम्यक आकलन नहीं किया है। मौर्य भी शूद्र थे। लेकिन मौर्यों को आवश्यकता से अधिक प्रशस्ति मिली। इसके कारण वही हैं जिसकी चर्चा मैंने ऊपर में की है। मौर्यों और नंदों में अंतर यही था कि एक ने द्विज नेतृत्व को स्वीकार लिया था और दूसरे ने इंकार दिया था। नंदों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। लेकिन हम फिलहाल नंदों की भूमिका पर ही विचार करना चाहेंगे, क्योंकि इधर-उधर जाना विषयांतर होना होगा।

मैं जोर देकर कहना चाहूंगा, महापद्मनंद ऐसा राजा या शासक नहीं था, जिसकी हम उपेक्षा करें। उसकी चुनौतियाँ चन्द्रगुप्त से कहीं अधिक कठिन थी। उसने किसी मजबूत और यशस्वी राजा को नहीं, बल्कि एक पिलपिले कठपुतली चरित्र वाले राजा को अपदस्थ किया था। यह उसके अपने हित से अधिक समाज और देश हित के लिए उचित था।

यह ठीक है कि उसकी सामाजिक औकात कमजोर थी और यह भी मान लिया कि वह “नीच -कुलोत्पन्न” था। वह किसी राजा का बेटा नहीं, एक फटेहाल नाई का बेटा था, जैसा कि कर्टियस ने लिखा है कि ‘उसका पिता नाई था, जो दिन भर अपनी कमाई से किसी तरह पेट भरता था।’ ऐसे फटेहाल व्यक्ति का बेटा यदि एक बड़े निरंकुश राजतन्त्र का संस्थापक बनता है, तब इसे एक उल्लेखनीय घटना ही कहा जाना चाहिए। हमें इस बात की खोज भी करनी चाहिए कि इसके कारण तत्व क्या थे और पूरे इतिहास-चक्र पर इस घटना का कोई प्रभाव पड़ा या नहीं?

महापद्मनंद के इस तरह उठ खड़े होने के पीछे उसके व्यक्तिगत गुण तो निश्चय रूप से थे, लेकिन सामाजिक कारण भी रहे थे। मगध में, जैसा कि पहले ही कहा है, वर्ण धर्म के आधार कमजोर रहे हैं। इसी कारण वैदिक ऋषि इस इलाके से इतने रुष्ट रहते थे कि ज्वर से उस कीकट (मगध का पुराना नाम) में जाने की प्रार्थना करते हैं, जहाँ उसके विरोधी रहते हैं। यह अकारण नहीं था कि बौद्धों को यहां आधार मिला था। उनलोगों ने भी स्थिर समाज में थोड़ी हलचल पैदा की थी। बुद्ध की मृत्यु के कुछ ही समय बाद प्रथम बौद्ध परिषद्, जो राजगीर के सप्तपर्णी गुफा में हुई थी, की अध्यक्षता एक नाई उपालि ने की थी। उपालि के निदेशानुसार ही विनय पिटक के अधिकांश भाग रचे गए। उपालि के इस सांस्कृतिक-सामाजिक स्वीकार और इसी प्रकार की अन्य प्रवृत्तियों का अंगड़ाई लेना और इन सब के रूपांतरित होकर एक नए राजनैतिक बदलाव की पृष्ठभूमि बन जाना संभव है। जो हो, महापद्मनंद का सत्ता में आना एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना तो थी ही। हालांकि यह सब राजतन्त्र के बीच हुआ था। लेकिन राजतांत्रिक परिवेश में सम्पन्न राजनैतिक घटनाओं के कुछ न कुछ सामाजिक आधार तो होते ही हैं।

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एक शासक के रूप में महापद्मनंद की विशेषता है कि उसने मगध को एक बड़े साम्राज्य में तब्दील कर दिया। बिम्बिसार ने उसे एक वृहद महाजनपद बनाया था। उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे मगध-राज में तब्दील कर दिया। लेकिन उस राज को साम्राज्य में परिवर्तित करने वाला महापद्मनंद था, न कि चन्द्रगुप्त मौर्य। पूरब में चंपा, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में व्यास और उत्तर में हिमालय तक उसने मगध साम्राज्य की सीमा रेखा खींच दी थी। लगभग सभी महाजनपद इसमें समाहित हो गए थे। वह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसने महाजनपदीय व्यवस्था का अंत कर दिया था। यह सब उसने बिना किसी चाणक्य या कौटिल्य और उसके ‘अर्थशास्त्र’ के निदेश के बिना किया था।


महापद्मनंद की राजव्यवस्था अत्युत्तम थी, क्योंकि उसके समय मगध का राजस्व इतना पुष्ट था कि वह एक बड़े सैन्य बल का गठन कर सकता था। तत्कालीन अभिलेखों से मिली सूचना के के अनुसार उसकी सेना में ‘बीस हजार घुड़सवार, दो लाख पैदल, चार घोड़ों वाले चार हजार रथ और तीन हजार हाथी थे।’ नन्द पहला शासक था, जिसने सेना को राजधानी में रखने के बजाय सीमा क्षेत्रों में रखना जरुरी समझा था। सब से बढ़ कर यह कि जिस राष्ट्र की आजकल बहुत चर्चा होती है, उसकी परिकल्पना पहली दफा महापद्मनंद ने ही की थी। एक-राट (एक राष्ट्र ) को उसने साकार किया था। वह स्वयं उसका प्रथम सम्राट बना। हिमालय से लेकर समुद्र तक एक राष्ट्र की उसकी योजना थी। एक जैन ग्रन्थ के अनुसार –

समुद्रवसनांशेम्य आसमुद्रमपि श्रियः ,

उपायहस्तैराकृष्य ततः सोSकृत नन्दसात।

यह वही महापद्मनंद था, जिसे पुराणों ने सर्व-क्षत्रान्तक (सभी क्षत्रियों का अंत करने वाला) कहा है। संभव है, ब्राह्मण पौराणिकता ने इसे ही परशुराम के रूप में चित्रित किया हो। उसने अपने समय के सभी क्षत्रिय राज-कुलों, जिसमें कुरु, इक्ष्वाकु, पांचाल शूरसेन, काशेय, हैहय, कलिंग, अश्मक, मैथिल और वीतिहोत्र थे, को पराजित कर नष्ट कर दिया था। उसके विजय अभियान अपने विशद वर्णन के लिए आज भी किसी समर्थ इतिहासकार का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दिशा में इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री ने थोड़ा-सा प्रयास किया है। 

महापद्मनंद के व्यक्तित्व का आकलन हमें इस नतीजे पर लाता है कि व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है, जात और कुल नहीं। उसके समय तक मनु की संहिता भले ही नहीं बनी थी, लेकिन वर्णव्यवस्था समाज में अपनी जड़ें जमा चुकी थीं और उसी के दृष्टिकोण से वह अनभिजात और नीचकुलोत्पन्न था, शूद्र था। उसने इन तमाम उलाहनों को अपने व्यक्तित्व विकास में बाधक नहीं बनने दिया। किसी भी आक्षेप की परवाह किये बिना उसने राजसत्ता अपने बूते हासिल की। उसने एक राज, एक देश को अपने राजनैतिक चातुर्य और पराक्रम से एक राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया। कुलीनता की पट्टी लटकाये राजन्यों को मौत के घाट उतार दिया, या किनारे कर दिया और अपने द्वारा निर्मित राष्ट्र को व्यवस्था से बाँधने की पूरी कोशिश की। ऐसा नहीं था कि नंदों ने विद्वानों की कद्र नहीं की; जैसा कि चाणक्य ने अपने अपमान को लेकर ऐतिहासिक कोहराम खड़ा कर दिया था। चाणक्य कितना विद्वान था, यह अलग विमर्श का विषय है और उसके अपमान की कहानी एकतरफा है। लेकिन सच यह है कि नंदों ने विद्वानों को राज्याश्रय देने का आरम्भ किया था। उसने उत्तर पश्चिम इलाके से व्याकरणाचार्य पाणिनि को राजधानी पाटलिपुत्र में आमंत्रित किया। इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री के अनुसार पाणिनि नन्द दरबार के रत्न और राजा के मित्र थे। व्याकरण और भाषा विज्ञान की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक ‘अष्टाध्यायी’ की रचना महापद्मनंद के संरक्षण में पाटलिपुत्र में हुई, जिस पर भारत हमेशा गर्व कर सकता है। कात्यायन, वररुचि, वर्ष और उपवर्ष जैसे प्रकांड विद्वान न केवल इसी युग में हुए बल्कि इन सब से नन्द राजाओं के मधुर रिश्ते रहे और इन सब को राज्याश्रय मिलता रहा। हालांकि कौटिल्य अथवा चाणक्य की ऐतिहासिकता पर प्रश्न उठते रहे हैं, लेकिन उसे लेकर जो आख्यान हैं उससे यही पता चलता है कि नंदों द्वारा विद्वानों को प्रोत्साहन देने की परंपरा से ही आकर्षित होकर आश्रय पाने की अभिलाषा से वह नन्द दरबार में गया और जैसी कि कथा है अपमानित हुआ। अभिलाषा गहरी होती है, तब अपमान भी गहरा होता है। कथा से जो सूचना मिलती है, उससे उसके अपमान का भी अनुमान होता है। लेकिन कथानुसार भी चाणक्य इतना विद्वान तो था ही कि उसने सम्पूर्ण परिदृश्य का जज्बाती नहीं, बल्कि सम्यक विश्लेषण किया। उसने पुष्यमित्र शुंग की तरह मौर्य वंश को ध्वस्त कर द्विज शासन लाने की कोशिश नहीं की। महापद्मनंद ने शूद्र जनता के मनोविज्ञान को झकझोर दिया था। इसकी अहमियत चाणक्य समझता था। उसकी शायद यह विवशता ही थी कि उसे एक दूसरे अनभिजात शूद्र चन्द्रगुप्त को नंदों के विरुद्ध खड़ा करना पड़ा। 

ऐसा नहीं था कि धननंद के समय मगध की राज-व्यवस्था ख़राब थी। 326 ईसापूर्व में जब सिकंदर भारत आया तब कई कारणों से वह झेलम किनारे से ही लौट गया7 यह सही है कि उसकी सेना एक लम्बी लड़ाई के कारण थक चुकी थी और अपने वतन लौटना चाहती थी। लेकिन यह भी था कि पश्चिमोत्तर के छोटे-छोटे इलाकों में जो राजा थे उन्हें अपेक्षाकृत बड़ी सेना से भयभीत कर देना और पराजित कर देना तो संभव था, लेकिन उसने जैसे ही नन्द साम्राज्य की बड़ी सेना का विवरण सुना तो उसके हाथ-पांव काँप गए। सिकंदर का हौसला पस्त हो गया। सिकंदर मौर्यों से नहीं, नंदों से भयभीत होकर लौटा। इतिहासकारों ने इस तथ्य पर भी कम ही विचार किया है, परवर्ती मौर्य साम्राज्य की शासन-व्यवस्था का मूलाधार नंदों की शासन व्यवस्था ही थी, जिसका ढाँचा महापद्मनंद ने तैयार किया था। चन्द्रगुप्त के समय में इसमें कुछ सुधार अवश्य हुए, लेकिन उसका मूल ढाँचा पहले जैसा ही बना रहा। संस्कृत नाटककार विशाखदत्त की कृति ‘मुद्राराक्षस’ से भी यह बात स्पष्ट होती है कि स्वयं चाणक्य नन्द राज के मंत्री राक्षस को ही क्यों चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाने के लिए उत्सुक था। अंततः उसे सफलता भी मिलती है। इससे स्पष्ट होता है मौर्य काल में केवल राजा बदला था, व्यवस्था और राज-नीति नहीं। चन्द्रगुप्त ने नन्द राजाओं की साम्राज्य-विस्तार की नीति को जारी रखते हुए उसे पश्चिमोत्तर इलाके में हिन्दुकुश तक फैला दिया। लेकिन यह विस्तार नंदों की तुलना में बहुत कम था। इन सब के अलावा नंदों ने भारतीय इतिहास और राजनीति को एक और महत्वपूर्ण सीख दी है, जिसका आज भी महत्व है और दुर्भाग्य से जिसकी चर्चा भी नहीं होती है। आज भी भारतीय राष्ट्र की वैचारिकता की तलाश होती है। इस विषय पर परस्पर विरोधी कई विचार हैं। नंदों ने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया था कि ऊंच-नीच वाली वर्णव्यवस्था को आधार बना कर छोटे-छोटे जनपद तो कायम रह सकते हैं, लेकिन इस सामाजिक आधार पर कोई वृहद राष्ट्र नहीं बन सकता। और यह भी कि जो चीज वृहद होगी उसका वैचारिक आधार लचीला और उदार होना आवश्यक है। नंदों ने किसी धर्म को विशेष प्रश्रय नहीं दिया। हम कह सकते हैं वह धर्मनिरपेक्ष राज्य था। यह वही समय था, जब बौद्ध और जैन धर्म के प्रचारक मगध के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते होते थे। नंदों के पूर्व के हर्यंक राजाओं ने बौद्धों को काफी सहूलियतें दी थी। स्वयं बिम्बिसार ने बुद्ध को वेणुवन प्रदान किया था। लेकिन नंदों ने किसी धर्म विशेष के लिए कुछ किया हो इसकी सूचना नहीं मिलती। इसकी जगह विद्वानों को राज्याश्रय देकर ज्ञान क्षेत्र को विकसित करना उसने जरुरी समझा। पाणिनि को राजदरबार में रखना मायने रखता है। नन्द की चिंता थी कि मागधी भाषा से काम नहीं चलने वाला। एक बड़े राष्ट्र को एक ऐसी जुबान चाहिए, जिससे एक छोर से दूसरे छोर तक संवाद किया जा सके। इसीलिए पाणिनि ने संस्कृत के इलाकाई रूपों को आत्मसात करते हुए एक ऐसी भाषा को विकसित करने का आधार तैयार किया, जहाँ वैविध्य कम हों, एकरूपता अधिक हो। यह काम इतना महत्वपूर्ण है, जिसका अनुमान कर ही हम दंग हो जाते हैं। इन सब के साथ नन्द राजाओं ने अपने नाम-काम के प्रचार हेतु राज खजाने का अशोक की तरह दुरुपयोग नहीं किया। न ही उन्होंने अपने नाम के स्तम्भ लगवाए, न भाड़े के पंडितों को रख अपनी प्रशस्ति लिखवाई। 

कुल मिला कर मैं इस बात पर पुनः जोर देना चाहूंगा कि नंदों, खास कर महापद्मनंद के साथ इतिहास ने न्याय नहीं किया है। आज इस ज़माने में जब हमने इतिहास को नीचे से देखने का सिलसिला आरम्भ किया है, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि महापद्मनंद की भूमिका पर समग्रता और ईमानदारी पूर्वक विचार करें। उसे अनभिजात और नीचकुलोत्पन्न कह कर हम उसकी अब और अधिक अवहेलना नहीं कर सकते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लगभग सभी मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भी उसकी उपेक्षा की। कोसंबी और नेहरू सरीखे इतिहास-समीक्षकों ने भी उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। इतिहासकार के. एल. नीलकंठ शास्त्री की हम सराहना करना चाहेंगे कि उन्होंने पहली दफा स्वतंत्र रूप से नन्द राज वंश पर काम किया और महापद्मनंद की भूमिका को रेखांकित किया। शास्त्री के शब्दों में “नंदों के उत्थान को निम्न वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक माना जा सकता है। पुराणों में इस राजवंश को शूद्रों के शासन का अगुआ और इसी कारण अधम कहा गया है।” 

(संपादन : नवल)

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  2. Saurabh Reply
  3. Samarveer singh Reply
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  5. तुषार राजोरिया Reply
  6. ANIL KUMAR NAI Reply
  7. kishor kumar Thakur Reply
  8. Thakur Vikas Kumar Reply
  9. जीवन कुमार Reply
  10. Ravi thakur Reply
  11. नंदवंशी प्रमोद कुमार Reply
  12. Dnyaneshwar ghodke Reply

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