जानें, बौद्ध गुरु घंटापा के बारे में, जिनके नाम को विद्रूप किया गया है

हिन्दू धर्म के द्विजों ने बौद्ध धर्म से जुड़े प्रतीकों, मान्यताओं को नकारात्मक तरीके से लोगों के सामने रखा है। मसलन बुदधू शब्द के पीछे बुद्ध को नीचा दिखाना है। ऐसा ही एक उदाहरण गुरु घंटाल का है, जिन्हें हिमाचल के लाहौल में बौद्ध धर्मावलम्बी गरु घंटापा भी कहते हैं। लेकिन मैदानी इलाकों में इसका मतलब ही बदल दिया गया है। लाहौल के युवा पर्यटन-व्यवसायी विक्रम कचोट से प्रमोद रंजन की खास बातचीत

[जून, 2017 की यात्रा में किन्नौर के बाद हमने कुंजूम दर्रे को पार कर लाहौल में प्रवेश किया। इस दौरान हमने दर्जनों कस्बों–गांवों में पड़ाव डाला तथा वहां की बहुत कम ऑक्सीजन, कम पानी और मौजूदा भौतिक सुविधाओं से रहित कठिन जीवन–स्थितियों का साक्षात्कार किया। इस जिले में हमारा अंतिम पड़ाव केलंग के पास तांदी गांव में था। 

तांदी में मैंने युवा पर्यटन–व्यवसायी विक्रम कटोच से बौद्ध धर्म की परंपराओं में हो रहे बदलाव पर बातचीत की। तांदी में ही गुरु घंटापा का गोम्पा है। मैदानी इलाकों में इस विख्यात विद्वान की उपलब्धियों का मजाक उड़ाने के लिए ‘गुरु घंटाल’ शब्द को ऐसे व्यक्ति की संज्ञा बना दिया गया, जिसके पास कोई ज्ञान न हो, लेकिन वह ज्ञान बांटता फिरे। दरअसल, इन बौद्ध गुरुओं का दर्शन उन दुनियावी छल–प्रपंचों से दूर था, जिसे हिंदुत्व की सिरमौर जातियां अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं बुद्ध के नाम से भी बुद्धू अर्थात मूर्ख शब्द गढ़ डाला। बहरहाल, विक्रम कटोच से इस बातचीत में पिछले कुछ वर्षों से यहां हो रहे परिवर्तनों का भी पता मिलता है- प्रमोद रंजन]


लाहौल घाटी में अवलोकितेश्वर, गुरु घंटापा, शिव और काली

  • एफपी टीम की भारत यात्रा

23 जून, 2017 

प्रमोद रंजन : आपका क्या नाम है? कहां के रहने वाले हैं आप?

युवा पर्यटन–व्यवसायी : मेरा नाम विक्रम कटोच है। मैं तांदी गांव का रहने वाला हूं। जिला लाहौल स्पीति, हिमाचल प्रदेश।

प्र. रं. : आप क्या करते हैं?

वि. क. : मैं यहां कैंप चलाता हूं। मेरे कैंप का नाम चंद्रभागा कैंप है।

प्र. रं. : आपने कहां तक शिक्षा प्राप्त की है?

वि. क. : मैंने एम.बी.ए. किया है ट्रेवल एंड टूरिज्म में। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म मैनेजमेंट, पूसा (दिल्ली) से।

प्र. रं. : हम इस समय जहां खड़े हैं, इस गोम्पा का क्या नाम है?

वि. क. : नीचे वाली मोनेस्ट्री (गोम्पा) तुपचिलिंग है और ऊपर  वाली (ऊपर की चोटी पर स्थित एक दूसरे गोम्पा की ओर इशारा करते हुए) घंडाड़। वह कठिन तप करने के लिए है। वहां जाने के लिए आपको एकदम खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी। डेढ़–दो घंटे का समय लगेगा। 

प्र. रं. : वह जो ऊपर गोम्पा है, उसके बारे में कुछ और बताएं

वि. क. : उसका संबंध पद्मसंभव से भी है। कहते हैं कि यहां पर गुरु पद्मसंभव आए थे। लेकिन, अभी तक इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। हमारे गांव में लोग कहते हैं कि वह गुरु घंटापा से भी संबंधित है। 

प्र. रं. : गुरु घंटापा बोलते हैं या गुरु घंटाल?

वि. क. : गुरु घंटापा। स्थानीय लोग जो हैं, वे इसे गुरु घंडाल और गुरु घंडाप भी कहते हैं। लेकिन, मैदानों के लोग इन्हें हिंदी में गुरु घंटाल कह देते हैं।

प्र. रं. : कौन थे ये गुरु घंटापा?

वि. क. : गुरु घंटापा एक प्रसिद्ध व बहुत ज्ञानी बौद्ध भिक्षु थे। वे लंबे समय तक ध्यान की अवस्था में रहे थे। कल आप लोग (यहां से 45 किमी दूर) उदयपुर गए थे। वहां से ऊपर की पहाड़ी पर उन्होंने तपस्या की थी। हमारी मैथोलॉजी (मिथकीय कथा) में यह सब है। 

एक बार क्या हुआ कि वहां का जो ठाकुर (एक स्थानीय राजा या जमींदार) था, उसने उनको खाने के लिए बुलाया। लेकिन, गुरु घंटापा नहीं गए। उन्होंने कहा कि मैं अब इन चीजों से हट चुका हूं, अपने ध्यान–तपस्या में लीन रहना चाहता हूं। उनके इन्कार से वह ठाकुर चिढ़ गया, उसको बुरा लगा कि मैंने उनको बुलाया और वह नहीं आए। 

तो उस ठाकुर ने एक लड़की को वहीं पहाड़ी पर भेजा। उसके साथ अच्छे-अच्छे पकवान बनवाकर भेजे थे।

प्र. रं. : अच्छा, उनके तप को भ्रष्ट करने के लिए?

वि. क. : हां, उनके तप को भ्रष्ट करने के लिए। धीरे–धीरे उन दोनों को आपस में प्यार हो गया। और फिर उनके दो बच्चे भी हो गए। 

गुरु घंटापा गोनपा में पदस्थापित तेनजिंग लामा (तस्वीर : एफपी ऑन द रोड, 2017)

प्र. रं. : लाहौल–स्पीति की माइथोलॉजी में क्या दर्ज है, क्या उन्होंने विवाह कर लिया था?

वि. क. : नहीं, शादी नहीं हुई। दो बच्चे हुए। तो जो राजा था वहां का–ठाकुर; उसने एक बार फिर से उनको बुलावा भेजा। उसने बहुत बड़ी सभा बुलाई तथा गुरु घंटापा और उनकी संगिनी को उनके बच्चों के साथ आमंत्रित किया। लेकिन, जो गुरु घंटापा थे, वो सिद्ध तांत्रिक थे। तो उनको पता लग गया कि यह मुझे अपनी शक्ति आजमाने के लिए बुला रहा है। हमारी माइथोलॉजी में बताया गया है कि उसके बाद गुरु घंटापा ने अपने दोनों बच्चों को घंटा बनाकर हाथ में ले लिया और अपनी संगिनी पत्नी को गोद में बिठाकर उड़कर आए और घंडाड़ में स्थापित हो गए। वे बहुत बड़े बौद्ध–विद्वान थे।

प्र. रं. : एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि जो गुरु घंटापा की मोनेस्ट्री है; उसके बारे में कुछ रहस्य जुड़ा हुआ है। वहां कोई पेंटिंग थी?

वि. क. : इस मोनेस्ट्री की छत और दीवारों पर थंका शैली की पेंटिंग्स हैं। लोग बताते हैं कि समय के साथ ये पेंटिंग्स खराब हो गई थीं। उन्हें दोबारा से ठीक कराने के लिए एक चित्रकार को बुलाया गया। वह चित्रकार मनाली से या कुल्लू के पास के थे। जब वह आए, तो उन्होंने मोनेस्ट्री के अंदर की सभी पेंटिंग्स कम्पलीट (दोबारा से ठीक) कर दी। वहां गोम्पा की छत पर बनी पेंटिंग मुख्य है, वह बहुत प्राचीन है। तो हुआ यह कि उस चित्रकार ने बाकी पेंटिंग्स सही करके जैसे ही उस मुख्य पेंटिंग पर ब्रश चलाया, तो वह तीसरी मंजिल से नीचे गिर गया। उसको जल्दी से हॉस्पिटल ले जाया गया। एक्स-रे, इलाज सब कुछ कराया गया, लेकिन वह अच्छी तरह ठीक नहीं हुआ। लेकिन, उस चित्रकार ने कहा कि वह उस पेंटिंग को अवश्य ठीक करेगा। थोड़ा स्वस्थ होने पर वह दोबारा यहां आया। लेकिन, जब दोबारा उसने छत वाली पेंटिंग ब्रश चलाने की कोशिश की, तो वह दोबारा से नीचे गिर गया। इस बार वह बेहोश हो गया।

प्र. रं. : एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि गुरु घंटापा मोनेस्ट्री से संबंधित जो सारी सामग्री है, वह यहां (तुपचिलिंग गोम्पा में) लाई गई है। कहां रखी गई है, वह सारी सामग्री? 

वि. क. : (तुपचिलिंग गोम्पा के पास बने एक बंद पड़े कमरे की ओर इशारा करते हुए) यहां लाई गई है। इस कमरे के अंदर हैं, वे सभी चीजें।

प्र. रं. : क्या–क्या चीजें हैं?

वि. क. : यहां पर कुछ मूर्तियां हैं। वे मूर्तियां लाई गई हैं, और मुख्य रूप से (कमरे के बराबर में बने तुपचिलिंग गोम्पा से दाईं ओर इशारा करते हुए) यहां पर नीचे जो चंद्र और भागा नदी का जो संगम है, वहां से सदियों पहले एक अवलोकितेश्वर की मूर्ति भी मिली थी, जो खंडित है। उसको भी यहां लाकर स्थापित किया गया है। 

प्र. रं. : यहां भी मैं अवलोकितेश्वर की मूर्ति देख रहा हूं। बौद्ध–परंपरा में इनका बहुत महत्व है। लेकिन, कल जब मैं त्रिलोकीनाथ गया था, तो मैंने वहां देखा कि अवलोकितेश्वर की मूर्ति को शिव कहकर पूजा जा रहा है। त्रिलोकीनाथ में भी तो अवलोकितेश्वर की ही मूर्ति है न?

वि. क. : आप ठीक कह रहे हैं। जो हिंदू धर्म को मानते हैं, वे लोग शिव के रूप में इस मूर्ति की पूजा और संबंधित कर्मकांड करने लगे हैं। आज पूरे भारत में यह मंदिर हिंदुओं के त्रिलोकनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया है; जबकि बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग अवलोकितेश्वर कहते हैं। भारत ही नहीं, बौद्ध धर्म मानने वाले अन्य देशों में भी त्रिलोकनाथ की प्रतिष्ठा बौद्ध–परंपरा के अनुरूप है। बाहर के देशों में त्रिलोकनाथ मंदिर को फाग्फा चिरंज़िग् और गरजा फाकपा कहते हैं। 

त्रिलोकीनाथ में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की प्रतिमा है। यह बौद्ध परंपरा का एक प्रमुख स्थल रहा है। इसके प्रांगण में कर्मकांड करवाते ब्राह्मण (तस्वीर : एफपी ऑन द रोड, 2017)

प्र. रं. : अवलोकितेश्वर सिर के ठीक ऊपर किनकी मूर्ति बनी है? मुझे त्रिलोकीनाथ में पुजारी ने बताया कि वे अन्न देवता हैं, जो शिव के सिर पर विराजमान हैं। 

वि. क. : सर! यह वो लोग (हिंदू) कहते हैं कि नीचे जो मूर्ति है, वह शिव की है और उनके सिर पर कोई अन्य देवता हैं। परन्तु, बुद्धिस्ट मान्यता में यह स्पष्ट है कि यह अवलोकितेश्वर हैं। बौद्धों के अनुसार त्रिलोकनाथ मंदिर में जो अवलोकितेश्वर की मूर्ति है, उसके सिर पर अमिताभ बुद्ध (होद् फाग् मेद्) हैं। इस संबंध में कई किताबें उपलब्ध हैं। यहां घर–घर में यह बात लोग जानते हैं। सच कहिए तो हिंदुओं के पास सिर वाली मूर्ति की कोई व्याख्या नहीं है। अभी वे तुक्के ही लगा रहे हैं। कोई गंगा कहता है। लेकिन, वह स्त्री का फिगर नहीं है। कोई कहता है कि यह बाद में छेड़छाड़ करके बना दिया गया है। यदि कोई बड़ा हिस्टोरियन (या सत्तापक्ष का बड़ा राजनेता भी) डिक्लेअर कर देगा, तो लोग उसी को सच मानने लग जाएंगे।

प्र. रं. : इस संबंध में आपसे और बातचीत करने के लिए इच्छुक हूं; लेकिन अभी मुझे दूसरे गोम्पा के लिए जाना है। क्या कल समय निकाल पाएंगे?

वि. क. : हां, क्यों नहीं। कल सुबह मिलते हैं। कुछ और चीजें भी आपको दिखाऊंगा।

24 जून, 2017 की बातचीत :

प्र. रं. : क्या आप जानते हैं कि बौद्ध–दर्शन में अवलोकितेश्वर का क्या महत्व है?

वि. क. : इतनी जानकारी तो मुझे नहीं है। मैं अभी इन चीजों पर अध्ययन कर रहा हूं। परन्तु, इतना तो स्पष्ट ही है कि यह बौद्ध धर्म का है। अभी मैं भूटान गया था। वहां भी काफी सारे बौद्ध हैं, वहां जो बौद्ध–संप्रदाय हैं, वे भगवान बुद्ध की पूजा नहीं करते। वे पद्मसंभव या अवलोकितेश्वर को ज्यादा मानते हैं।

प्र. रं. : हां, हां। बिलकुल आपने ठीक कहा। किन्नौर कुछ ऐसे बौद्ध–संप्रदाय हैं, जो दलाई लामा को नहीं मानते। क्या लाहौल–स्पीति में भी ऐसे संप्रदाय हैं? आप उनके नाम बता सकते हैं?

वि. क. : ऐसा नहीं है कि यहां लोग दलाई लामा को नहीं मानते। असल में तिब्बती बौद्ध धर्म के चार उप-संप्रदाय हैं– न्यिन्गमापा, सक्यापा, डुग्पा और गेलुगपा। लाहौल में अधिसंख्य डुग्पा संप्रदाय के अनुयायी हैं। दलाई लामा गेलुगपा संप्रदाय के हैं। फिर भी दलाई लामा को लाहौल में पूरी मान्यता है। दलाई लामा को नहीं मानने वाले लोग विश्व में अन्यत्र हैं। यहां नहीं।

प्र. रं. :  लाहौल में कौन–सा बौद्ध–संप्रदाय अधिक सक्रिय है? 

वि. क. : लाहौल में हीनयानी बौद्ध नहीं हैं। सभी महायानी हैं। यहां  तिब्बती तांत्रिक लामावादी बौद्ध धर्म है, जो कि महायान की एक शाखा वज्रयान से विकसित हुआ।

प्र. रं. : त्रिलोकीनाथ मंदिर के बारे में थोड़ा बताइए। कल मैं वहां गया था, तो मंदिर प्रांगण में ब्राह्मण पुजारी कर्मकांड करवा रहे थे; लेकिन लामा नहीं मिले थे। वहां जो लामा हैं, वो कहां के रहने वाले हैं? 

वि. क. : यहां पर जितने भी लामा नियुक्त होते हैं, सब लद्दाख के होते हैं। 

प्र. रं. : सारे लोग (लामा) लद्दाख से आते हैं?

वि. क. : हां, वो सारे लद्दाख से आते हैं। अभी हाल में मैं भी त्रिलोकीनाथ गया था। दरअसल, आजकल वहां कोई लामा है ही नहीं। कोई दूसरा बंदा वहां पर है। वहां लामा कोई नहीं है आजकल।

प्र. रं. : मैंने वहां देखा कि जो गर्भगृह है; वहां हिंदू पुरोहित बैठता है। और गर्भगृह के बाहर एक सीट बौद्ध धर्मगुरु–लामा के लिए निर्धारित है। ऐसा लगता है कि वहां कभी बौद्ध और ब्राह्मण पुरोहितों में संघर्ष हुआ होगा और किसी समझौते के तहत ब्राह्मणों ने गर्भगृह में जगह बना ली और लामा की जगह बाहर सुनिश्चित कर दी गई। हालांकि, वहां आपसी सामंजस्य और भाईचारा है। दरअसल, पूरे किन्नौर-लाहौल में आज बौद्ध-हिन्दू के बीच भेद करना कठिन है। वहां मुख्य है देवता-लामावाद के मिश्रण की अपनी विशिष्ट संस्कृति। बहरहाल, त्रिलोकनाथ में  जो हिंदू पुरोहित होता है, क्या वह ब्राह्मण होता है?

वि. क. : त्रिलोकीनाथ मंदिर के गर्भगृह में पुरोहित को बैठते हुए मैंने नहीं देखा। अब बैठने लगा हो, तो मैं नहीं जानता। वहां लामा बैठता है और उसकी नियुक्ति कुछ बौद्ध संगठनों के माध्यम से होती है। प्रायः कारगिल के जंस्कर से ही लामा नियुक्त होते रहे हैं। अभी हाल ही में डुगपा संप्रदाय के हेडक्वार्टर ने वहां अपना एक शिष्य नियुक्त किया है। वह शिष्य लाहौल से ही है। हां, कुछ विशेष लोक–उत्सवों और लोकाचार में वहां के हिंदू पुजारी की विशेष भूमिका रहती है। तब वहां आदिम शमनिस्टिक अनुष्ठान होते हैं। मंदिर से बाहर बलि भी चढ़ती है। और पुजारी और गुर (गुर उस व्यक्ति को कहते हैं, जिस पर देवता अवतरित होते हैं) पर देवता अवतरित होते हैं। स्थानीय भाषा में इस देवता को भ्यार भी कहते हैं। इसका मौजूदा हिंदू एवं बौद्ध मान्यतााओं कोई सीधा संबंध नहीं दिखता। यह प्राचीन आदिवासी अनुष्ठान हैं। लेकिन, दोनों धर्मों के लोग इसमें शामिल होते हैं। 

त्रिलोकीनाथ में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की प्रतिमा। (तस्वीर : एफपी ऑन द रोड, 2017)

प्र. रं. : इस इलाके में ब्राह्मण हैं? वे कहां से आए? इन इलाकों में तो ब्राह्मण थे नहीं।

वि. क. : इस इलाके में हिंदू हैं। जो पटन घाटी है; आप आगे जाएंगे, वहां ब्राह्मण हैं। वहां हिंदुओं में ब्राह्मण के अतिरिक्त राजपूत और दो शूद्र वर्ग के लोग भी रहते हैं। वहां सभी अपर कास्ट हिंदू को स्वांगला नाम से पुकारा जाता है। वहां अपर कास्ट की भाषा पटनी है। उस इलाके के बुद्धिस्ट भी पटनी ही बोलते हैं। लेकिन, उनके और हमारे उच्चारण में थोड़ा–बहुत अंतर है। वहां के अपर कास्ट हिंदुओं का सरनेम शर्मा आदि है; पंडित कहते हैं उन्हें हम! पहले वे लोग अपने आपको बहुत ऊंची जाति का मानते थे तथा अन्य हिंदुओं के साथ भी ज्यादा घुलते–मिलते नहीं थे। बहुत छुआछूत रखते थे। लेकिन, अब वे चीजें बहुत कम हुई हैं। मगर, थोड़ा–बहुत तो अभी भी है ही यह सब। 

प्र. रं. : तो ये  ब्राह्मण निचले इलाकों से आए हैं?

वि. क. : नहीं, पुराने लाहौल में भी ब्राह्मण मौजूद थे। 1974 से पहले थिरोट तक लाहौल की सीमा थी। परंतु उसके बाद चंबा के कई गांवों को लाहौल में शामिल कर दिया गया, जिसमें हिंदू लोग अधिक थे। लाहौल काफी समय तक लद्दाख के अंतर्गत रहा। उसके बाद यह पंजाब में चला गया। जब हिमाचल प्रदेश बना, उसके बाद लाहौल–स्पीति घाटी को एक जिला बना दिया गया। आप देखोगे कि लाहौल स्पीति की भी ज्योग्राफी बिलकुल अलग है। आप (यहां) लाहौल में देखोगे कि बुद्धिज्म का ज्यादा दबदबा है। हिंदुइज्म बिलकुल नहीं है। तो यहां पर जो तोद बेल्ट है, तोद वैली (तोद घाटी) और तिनन वैली है, यहां सारे (लोग) बुद्धिज्म को मानते हैं। परन्तु, यहां पर जहां से पटन वैली शुरू होती है, वहां पर हिंदुइज्म और बुद्धिज्म दोनों ही घुलमिल गए हैं। यहां दोनों ही मान्यताओं के लोग रहते हैं। न तो वो पूरी तरह से हिंदू हैं और न ही पूरी तरह से बुद्धिस्ट हैं। 

प्र. रं. : त्रिलोकनाथ के निकट ही स्थित उदयपुर गांव में एक मृकुला देवी मंदिर है। उस मंदिर में पुरोहित कौन होता है; ब्राह्मण होते हैं? वह मंदिर भी प्राचीन बौद्ध परंपरा है। वहां लगे एक बोर्ड में यह लिखा भी है।

वि. क. : हां, वहां भी ब्राह्मण होते हैं। वह शक्ति पीठ है। वहां जो मूर्ति है, हिंदू उसे महिषासुर मर्दिनी कहते हैं।

प्र. रं. : मैंने कल उदयपुर में मृकुला मंदिर के सामने लगे बोर्ड की एक तस्वीर अपने मोबाइल–कैमरे से उतारी थी। वह बोर्ड वहां हिमाचल प्रदेश सरकार के पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन विभाग के सौजन्य से लगाया गया है। मैं उस बोर्ड में लिखी बातें आपको पढ़कर सुनाता हूं। बोर्ड पर ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा है – ‘हर गांव की कहानी’, शायद इस तरह के बोर्ड इस  विभाग ने अनेक गांवों में लगाए होंगे। उसके बाद लिखा है ‘मृकुला देवी मन्दिर, गांव उदयपुर, लाहौल–स्पीति’ (मैंने उन्हें उस बोर्ड में लिखी बातें पढ़कर सुनाईं) उसके नीचे बोर्ड पर लिखा है कि– “जिला लाहौल–स्पीति के मुख्यालय केलांग से 56 किलोमीटर दूर स्थित है, खूबसूरत गांव उदयपुर। इस गांव में मृकुला देवी का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसे सातवीं शताब्दी में बनाया गया है। यह मंदिर प्राचीन काष्ठ कला का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर में स्थापित मूर्ति को मां महिषासुरमर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह मूर्ति अष्टधातु से बनी है। 

श्रद्धालु यहां मंदिर में श्रद्धा अनुसार पूजा–अर्चना करते हैं। कोई महिषासुरमर्दिनी मां के नाम से, तो कोई नवदुर्गा भवानी के नाम से पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां काली खप्पड़ वाली कलकत्ते से आई हैं, जिसका प्रमाण मंदिर प्रांगण में शिला पर बने पैरों के निशान हैं। उसके बाद ऐसा निशान (कापुंजी) नामक स्थान पर है। ऐसा निशान चिनाब नदी के पार भी है तथा उसी सीध में पहाड़ी पर भी चरण चिह्न हैं। ऐसा भी बताया जाता है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी इन्हें (दोरजेफामो) के नाम से पूजते हैं। यहां चिरकाल से एक गोम्पा रहा है। ऐसी मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव ने प्रवास के दौरान यहां गोम्पा में पूजा–अर्चना एवं सिद्धियां की होंगी। बौद्ध धर्म ग्रंथों में उदयपुर में चिना एवं मियाडवाला नदी के संगम स्थल को तान्दी संगम से भी पवित्र माना गया है। उदयपुर गांव कभी मारूल या मर्गुल कहलाता था। 

इसके नामकरण के बारे में ऐसा बताया जाता है कि एक बार चम्बा नरेश राजा उदयसिंह प्रवास पर आए। राजा ने मां मृकुला के मंदिर में दर्शन करने के उपरान्त वहां प्रांगण के साथ (सहो) नामक स्थान पर आकर आदेश जारी किया कि आज के बाद यह गांव उदयपुर कहलाएगा। तबसे यह गांव उदयपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

इस गांव के उत्तर दिशा में मंदिर के साथ एक चरणामृत–सा चश्मा (पानी का स्रोत) है। एक अन्य प्राचीन चश्मा गांव की पूर्व दिशा में है, जो कोईडी मूर्ति के नाम से प्रसिद्ध है। यह संयोग ही है कि दोनों चश्मों के साथ–साथ विशालकाय कायल के पेड़ हैं, जो आज भी मौजूद हैं। उदयपुर गांव के दक्षिण–पश्चिम से चिनाब नदी बहती है।”

इस बोर्ड की भाषा से साफ मालूम चलता है कि हिंदू–परंपरा को जानबूझकर बौद्ध–परंपरा पर आरोपित किया जा रहा है और यह सरकारी स्तर पर किया जा रहा है। वह पुरातात्विक महत्व का स्थल है। पुरातत्व विभाग ने उसे संरक्षित घोषित किया है, उनका भी एक बोर्ड मंदिर के बाहर लगा है, लेकिन उस बोर्ड में उन्होंने अपनी पुरातात्विक फांईडिंग्स को दर्ज नहीं किया है। सिर्फ इतना लिखा है कि यह पुरातात्विक महत्व का है तथा जो कोई भी इसे क्षतिग्रस्त करेगा, उस पर 5000 रुपए का जुर्माना किया जाएगा। 

लेकिन, नागरिक उड्डयन विभाग का बोर्ड बिना किसी पुरातात्विक साक्ष्य के एक पूरी कहानी आरोपित कर रहा है। वह दबे स्वर में यह स्वीकार करता है कि “बौद्ध धर्म के अनुयायी इन्हें (दोरजेफामो) के नाम से पूजते हैं। यहां चिरकाल से एक गोम्पा रहा है। ऐसी मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव ने प्रवास के दौरान यहां गोम्पा में पूजा–अर्चना एवं सिद्धियां की होंगी। बौद्ध धर्म–ग्रंथों में उदयपुर में चिना एवं मियाडवाला नदी के संगम स्थल को तान्दी संगम से भी पवित्र माना गया है।” लेकिन, उसका [सरकारी तंत्र का] मुख्य जोर तांदी संंगम को अधिक पवित्र बताने तथा मृकुला देवी के गोम्पा को महिषासुर–मर्दिनी के मंदिर के रूप में स्थापित करने पर है। मैंने उस मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की कथित मूर्ति भी देखी। दरअसल, बौद्ध परंपराओं–विशेषकर महायानी तिब्बती परंपरा से अनेक चीजें हिंदू परंपराओं ने ग्रहण की हैं और उन्हें नई कथाएं गढ़कर विकृत किया है। उन्हीं में एक यह मूर्ति भी है। बौद्ध परंपराओं में इसकी कोई और कथा रही होगी। आपको क्या लगता है?

वि. क. :  हां, शायद ऐसी ही है। मैंने उस बोर्ड पर ध्यान नहीं दिया। बौद्ध उसे मरीचि वज्रवाराही (दोरजे फाग् मो) मानते हैं।

प्र. रं. : लाहौल के इस क्षेत्र में जातियां कौन–कौन सी होती हैं?

वि. क. : इस क्षेत्र में चार जातियां हैं– बौद्ध, ब्राह्मण, चिनाल और लोहार। चिनाल और लोहार लोअर कास्ट के हैं।

प्र. रं. : लोहार क्या करते हैं? मैदानी इलाकों की भांति लोहे का काम ही? 

वि. क. : लोहारों का काम कुदाल आदि, कृषि में जो भी औजार काम आते हैं, उन्हें बनाना था। लेकिन, अब ये लोग भी मशीनों से खेती के चलते दूसरी नौकरियों–पेशों में जाने लगे हैं।

प्र. रं. : मुझे किन्नौर में बताया गया कि वहां लोहार दोनों काम करते हैं, लोहे का भी और सोने का भी? 

वि. क. : हां, बिलकुल; बिलकुल। यह सही बोला आपने, बिलकुल। 

प्र. रं. : और चिनाल, यह कौन–सी जाति होती है?

वि. क. : चिनाल, चिनाल। यह लोग वाद्य यंत्रों में भी माहिर होते हैं। जो स्थानीय वाद्य यंत्र होते हैं, उनको बजाने में माहिर होते हैं। 

प्र. रं. : तो देवताओं की पूजा में भी?

वि. क. : हां, देवताओं की पूजा में वे ही लोग वाद्य यंत्र बजाते हैं। कुछ ने यह पेशा छोड़ भी दिया है।

प्र. रं. : बौद्ध लोग भी उन्हें बुलाते हैं?

वि. क. : हां, हर पूजा–अर्चना में। जैसे, शादी–विवाह में, यहां पर कोई भी समारोह होगा, तो वाद्य यंत्रों में माहिर इन लोगों को बुलाया जाता है।

प्र. रं. : बौद्ध गोम्पाओं में भी होता है वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल?

वि. क. : हां, बिलकुल; बिलकुल। लेकिन, वो जो वाद्य यंत्र (गोम्पाओं में बजने वाले वाद्य यंत्र) होते हैं, वो सिर्फ लामा ही बजाते हैं।

प्र. रं. : वो (चिनाल) नहीं बजाते हैं?

वि. क. : उसके लिए उनको नहीं बुलाया जाता है।

प्र. रं. : चमङ जाति के लोग नहीं हैं यहां?

वि. क. : चमङ, कौन–सी जाति है; मैं समझा नहीं।

प्र. रं. :  मैदानी इलाकों में इससे मिलता–जुलता पेशा करने वाली जाति चमार है। किन्नौर में चमङ जाति के लोग हैं?

वि. क. : नहीं, नहीं; वो यहां लाहौल–स्पीति में, कम–से–कम इस इलाके में तो नहीं हैं।

प्र. रं. : यह कपड़ा बुनने का काम कौन–सी जाति करती है? किन्नौर के कुछ इलाकों में चमङ यह काम करते हैं।

वि. क. : कपड़ा बुनने का काम यहां पर, जैसे– पुराने समय में गर्मियों में ऊन (बाल) काटते थे भेड़ों की, और सर्दियों में बुनने का काम होता थाय यह सब काम हम लोग अपने घरों में खुद ही करते रहे हैं। हालांकि, अब तो बाजार में सब कुछ मिल जाता है।

प्र. रं. : मैदानी इलाकों में गंदगी साफ करने वाली कई जातियां पैदा हुईं। जैसेभंगी, मेहतर; वैसी कोई जाति यहां है या नहीं?

वि. क. : नहीं, नहीं; यहां ऐसी कोई जाति नहीं है।

प्र. रं. : क्या कारण रहा होगा इसका?

वि. क. : मेरे खयाल से सबसे पहले तो यहां जनसंख्या बहुत कम है। आप देखेंगे कि इस बहुत बड़े क्षेत्रफल वाले इलाके में बहुत कम लोग हैं। जनसंख्या का घनत्व यहां पर बहुत कम है। शायद इसलिए ऐसे कामों की जरूरत ही नहीं पड़ती। परंतु, दस साल पहले तक ये काम घर की महिलाओं द्वारा किया जाता था। वर्तमान में ये सारे काम दूसरे राज्यों से आए मजदूर करते हैं। 

प्र. रं. : यहां पहुंचने से पहले हम लोगों ने कई दिन किन्नौर और लाहौल–स्पीति के विभिन्न कस्बों–गांवों में बिताए हैं। मैंने महसूस किया कि इस बौद्ध–क्षेत्र में आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा की गतिविधियां बहुत तेज हैं। आपके इलाके में क्या गतिविधियां हैं इन संगठनों की?

वि. क. : आप ठीक कह रहे हैं। अभी इन लोगों ने यहां संगम पर्व शुरू किया है। अभी हाल में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल के निधन के बाद उनकी अस्थियां यहां चंद्रभागा नदी के संगम में बहाई गईं। जबकि इस इलाके उनका कोई जुड़ाव नहीं था। वो लोग मेरे खयाल से अपने स्पष्ट एजेंडे को यहां पर लेकर आ रहे हैं। पर, हमें जो भी नए एजेंडे आदि आ रहे हैं, हमें उससे कोई प्रॉब्लम नहीं है; जब तक कि वो पुरानी चीजों को चैलेंज नहीं कर रहे हैं।

प्र. रं. : पुरानी चीजें जैसे क्या?

वि. क. : पुरानी चीजें, जैसे– पुरानी मान्यताएं हैं; पुरानी मोनेस्ट्रीज हैं; बौद्ध धर्म से और हमारी परंपरा से संबंधित जो भी पुरानी चीजें हैं। 

प्र. रं. : उनको भी चैलेंज कर रहे हैं, वो लोग?

वि. क. : हां, इन चीजों को इन लोगों ने चैलेंज किया है। खास करके हमारे पत्रकार जो हैं; उन्होंने काफी कुछ लिखा। तो मैंने फेसबुक पर रिएक्शन भी दिया था।

प्र. रं. : किस अखबार में छपा यह?

वि. क. : अखबार का नाम मुझे याद नहीं है; पर मैं आपको (उन खबरों की) कतरनें वगैरह भेज सकता हूं।

प्र. रं. : कौन–कौन से अखबार यहां पर आते हैं?

वि. क. : यहां पर दिव्य हिमाचल, अमर उजाला और दैनिक भास्कर हैं। तो हम किसी भी नई चीज के लिए ओपन (खुले मस्तिष्क वाले) हैं। उन्हें इन चीजों को यहां के लोगों पर छोड़ देना चाहिए कि यहां के लोग कितना स्वीकार करते हैं इन चीजों को; कितना नहीं करते हैं। मगर, पुरानी चीजों को जबरन उखाड़कर नई चीजों की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। 

प्र. रं. : (चंद्रा और भागा नदी के संगम पर जाकर) यही तांदी संगम है न? (उस समय भी हम एक ऐसी ऊंची जगह पर खडे़ थे, जहां से संगम दिखता था)

वि. क. : हां, यही संगम है। 

प्र. रं. : इसमें कौन–सी नदी चंद्रा है और कौन–सी भागा?

वि. क. : राइट हैंड साइड (दाएं हाथ की ओर) से जो आ रही है, वह चंद्रा है और इधर से लेफ्ट हैंड साइड (बाएं हाथ की ओर) से जो आ रही है, वह भागा है।

प्र. रं. : तो यहीं पर अशोक सिंघल की अस्थियां उन्होंने विसर्जित की थीं? उसके लिए पूरी सभा हुई होगी?

वि. क. : हां, 29 जून, 2016 को यहीं लाकर विसर्जित कीं। पूरी सभा हुई थी। इसके बाद ही यहां संगम पर्व मनाया जाने लगा है। अब यहां हर साल वे संगम पर्व मनाने आते हैं। राजनीतिक कारणों से कुछ स्थानीय लोग भी उसमें शामिल होते हैं। दरअसल, अशोक सिंघल का निधन 17 नवंबर, 2015 को हुआ। विश्व हिंदू परिषद द्वारा उनके अस्थि अवशेष को अलग–अलग नदियों में विसर्जित किया गया। तांदी में भी करीब सात महीने बाद अशोक सिंघल की अस्थियां विसर्जित की गईं। इस संबंध में हिंदू नेताओं द्वारा कहा गया कि इसी तांदी संगम पर द्रौपदी ने देह त्यागा था, जब वह अपने पांचों पतियों के साथ स्वर्ग जा रही थीं।

प्र. रं. : क्या करते हैं उस पर्व में?

वि. क. : उस पर्व में नाच–गाना होता है। और बाकी जो यहां की प्राथमिक समस्याएं हैं, जैसे– स्वास्थ्य समस्याएं हैं; शिक्षा को लेकर कई समस्याएं हैं; सड़कों को लेकर कई समस्याएं हैं। उन पर कोई बात नहीं होती है इस संगम पर्व में।

प्र. रं. : अच्छा, सिर्फ नाच–गाना होता है?

वि. क. : धर्मों को लेकर बात होती है। कई धर्मों के लोग इकट्ठे होते हैं यहां पर। 

प्र. रं. : तो बौद्ध धर्म के लोग भी शामिल होते हैं इसमें?

वि. क. : हां, बौद्ध धर्म के लोग भी शामिल हो जाते हैं इसमें। सब जाते हैं, काफी भीड़ होती है।

प्र. रं. : कुछ उदाहरण बताएंगे आप, जैसे कि ये लोग किन चीजों को चैलेंज कर रहे हैं? या कुछ जगहों के नाम बदल रहे हैं या मान्यताएं बदल रहे हैं?

वि. क. : नहीं, मैं पर्टिकुलर किसी बंदे को नहीं कह रहा हूं। इनकी एक पूरी टीम है।

प्र. रं. : हां, वो तो पूरा राष्ट्रीय संगठन है उनका।

वि. क. : उन्होंने यह कहा था कि इस मोनेस्ट्री की जगह पर काली माता का मंदिर था।

प्र. रं. : मतलब, उन्होंने कहना शुरू किया है कि ऊपर, जो गुरु घंटापा मोनेस्ट्री है; वहां पर काली मंदिर था?

वि. क. : हां। 

प्र. रं. : काली तो आदिवासियों की देवी हैं।

वि. क. : वहां जो मूर्ति है वह घोड़े पर सवार है। हिंदू धर्म के लोग उसे काली माता की मूर्ति मानते हैं, जबकि बौद्ध धर्मावलम्बी पालदेन लामो कहते हैं। और जैसे उदयपुर में जो मंदिर है, उसके दरवाजे के पीछे दो मूर्तियां लगीं हैं; तो ऐसी मान्यता है कि वो यहां नहाने के लिए आते हैं। 

प्र. रं. : कौन?

वि. क. : वो, जो दो वीर (देवता) रहते हैं। ऐसा पौराणिक कथाओं में लिखा गया है। तो उन्होंने (विश्व हिंदू परिषद वालों ने) कहा कि माता आती हैं, यहां पर नहाने के लिए; जो कि गलत है। 

प्र. रं. : कहां, यहां संगम पर्व में?

वि. क. : हां; तो ऐसी कई सारी चीजें हैं, जो गलत हैं।

प्र. रं. : तो विरोध नहीं हो रहा है, बौद्ध संगठनों की ओर से या गोम्पाओं की ओर से?

वि. क. : प्रत्यक्ष विरोध तो बिलकुल नहीं हो रहा है। अप्रत्यक्ष तरीके से विरोध हो रहा है। 

प्र. रं. : क्या कारण है कि सीधा विरोध नहीं कर रहे हैं लोग?

वि. क. : बुद्धिज्म एक तो शांतिपूर्ण धर्म है। और दूसरा, लोगों के पास इतना समय नहीं है। खेती–बाड़ी में सब लगे रहते हैं। लेकिन, इन गलत चीजों का आने वाले समय में विरोध तो होगा ही। यह भी हो सकता है कि लोग धीरे–धीरे इन चीजों को स्वीकार कर लें और एक दिन भूल जाएं कि वे एक महान संस्कृति के वारिस थे।

लेकिन, मैं यह मानता हूं कि लाहौल का जैसा इतिहास रहा है कि चाहे वे बुद्धिस्ट हों या फिर हिंदू सभी एक–दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करते हैं; आपस में भाईचारा रखते हैं; कोई बाहरी ताकत हमारे लाहौल के इस भाईचारे को बर्बाद न करे। 

 

(लिप्यांतरण : प्रेम बरेलवी/ कॉपी संपादन : नवल/प्रेम)


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