पियदसि लाजा मागधे : मगध का प्रियदर्शी राजा 

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं अशोक के बारे में। उनके मुताबिक, अशोक ने भारतवर्ष के लिए क्या कुछ विशेष किया, यह तय करना मुश्किल है। हाँ, बौद्ध धर्म के विकास और प्रचार-प्रसार में उसकी भूमिका उल्लेखनीय जरूर कही जाएगी। हालांकि वह इतना धर्म-केंद्रित हो चुका था कि अपने राजनैतिक कर्तव्यों की उसने उपेक्षा की

जन-विकल्प

चन्द्रगुप्त के बाद उसका बेटा बिन्दुसार 298 ईस्वी पूर्व में मगध का शासक बना। उसमें कुछ ऐसा नहीं था, जिसकी ख़ास तौर से चर्चा की जाय। उसके पिता ने साम्राज्य का अच्छा खासा विस्तार कर दिया था और मगध का एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा भी विकसित हो चुका था। इसलिए कहा जा सकता है कि उसके करने के लिए बहुत कुछ रह नहीं गया था। हालांकि करने वालों के लिए हमेशा ही कुछ न कुछ शेष होता है। उसे विरासत में प्रशस्त मार्ग अवश्य मिला था, लेकिन प्रशस्त-पथ पर चलने के लिए भी योग्यता की जरुरत होती है। इसके अभाव में बड़ी व्यवस्थाएं भी लड़खड़ा सकती हैं। निःसंदेह बिन्दुसार में यह योग्यता थी। कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि उसने साम्राज्य को किसी स्तर पर कमजोर किया हो। दरअसल उसके पिता और फिर उसका बेटा इतने महान हो गए कि बिन्दुसार नाम महत्वहीन बन कर रह गया। इसका एक कारण उसके राजकाल में किसी उल्लेखनीय घटना का नहीं होना भी है। अनुल्लेखनीय घटनाओं के बीच रह कर चुप-चाप काम करते जाना एक अलग तरह की योग्यता होती है, जिस पर हमें विचार करना चाहिए। ऐसे राजा या शासक प्रायः सनक से दूर और अधिक मानवीय होते हैं। हम कह सकते हैं कि बिन्दुसार में मानवीय तत्व अन्य मौर्य राजाओं की अपेक्षा अधिक थे। वह लड़ाई-झगड़ों और साम्राज्य विस्तार की सनक से लगभग दूर रहा। कुल मिला कर वह शान्ति-पसंद, थोड़ा शौक़ीन और चिंतन-पसंद था। उसकी इस प्रवृति को सीरिया के राजा एंटियोकस से मांगी गयी उसकी सामग्रियों से समझा जा सकता है। उसने उक्त राजा से अंगूर की मीठी वाइन (सुरा ), सूखे अंजीर और एक दार्शनिक की मांग की थी और इन्हें भेंट स्वरुप नहीं, क्रय करके भेजने की बात की थी। एंटियोकस ने अंजीर और मीठी वाइन तो भिजवा दी। लेकिन दार्शनिक नहीं भेजा, क्योंकि वहां के कानून और रिवाज के मुताबिक किसी दार्शनिक का क्रय-विक्रय और बाहर भेजना मना था। यह बहुत छोटी बात है। लेकिन इससे यह तो ज्ञात होता ही है कि बिन्दुसार का मन-मिजाज कैसा था। उसने किसी सुंदरी या किसी खास दौलत या गहनों की नहीं, एक दार्शनिक को बुलाना चाहा था। कहा जा सकता है कि अवचेतन में कुंडली मार कर बैठी उसकी इन आकांक्षाओं का प्रस्फुटिकरण अशोक में हुआ। बिन्दुसार की आध्यात्मिक प्रवृत्ति का प्रकटीकरण उस साँची अभिलेख से भी होता है, जिसमे उसके उस बौद्ध संस्थान से जुड़ाव की बात दर्ज है। जो हो, बिन्दुसार एक भद्र सम्राट के रूप में बना रहा। हालांकि उसके अंतिम दिन शांतिपूर्ण नहीं थे। उत्तराधिकार के सवाल पर गृह-कलह का आरम्भ हो गया था और इसी के बीच 273 ईस्वीपूर्व में उसकी मृत्यु हो जाती है।

उसके बाद उसका बेटा अशोक मौर्य साम्राज्य की सत्ता संभालता है। लेकिन अशोक के राज्याभिषेक और बिन्दुसार की मृत्यु के बीच चार साल का अंतर है। यह अंतर गृह कलह के कारण हुआ प्रतीत होता है। बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान के अनुसार बिन्दुसार की इच्छा अपने बड़े बेटे सुसीम को उत्तराधिकार देने की थी। लेकिन दरबार में कुटिल राजनीति चल रही थी। मंत्रिपरिषद के कुछ लोग चाहते थे कि अशोक राजा बने। तत्कालीन घटनाओं के जो विवरण दिव्यावदान, दीपवंश और महावंश में मिलते हैं, वे अत्यंत नाटकीयता-पूर्ण और कई जगह लोमहर्षक हैं। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मुग़ल सम्राट शाहजहां के जीवन में औरंगजेब ने जैसी परिस्थितियाँ पैदा कर दी थीं, लगभग वही हालत अशोक ने की हुई थी। औरंगजेब ने अपने तीन भाइयों को क्रूरता से मारा था; अशोक ने निन्यानबे को मारा। कहते हैं एक भाई तिस्स को छोड़ कर शेष सब का उसने क़त्ल कर दिया। बिन्दुसार के प्रिय सुसीम की स्थिति दारा शिकोह की तरह हुई। इन विवरणों से अशोक की किस प्रवृत्ति का परिचय मिलता है, उसे स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। क्रूरता और सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने की व्यावहारिक नीति का उसने पालन किया। लेकिन इतना ही नहीं था। अशोक के पीछे दरबार की ताकतें भी काम कर रही थीं। दरबारियों में से एक राधगुप्त, जो संभवतः कई अमात्यों में से एक था, गहरी साजिश कर रहा था। यह राधगुप्त कौन था और इसकी सक्रियता का कारण क्या था, इसका अध्ययन-विश्लेषण अभी पूरी तरह नहीं हुआ है; लेकिन इतना स्पष्ट है कि केवल अशोक की इच्छाएं ही काम नहीं कर रही थी, कोई व्यवस्थित कुचक्र भी तत्कालीन दरबार में चल रहा था। मगध में राजसत्ता के लिए खूनखराबा कोई नयी बात नहीं थी, यह पहले भी कई दफा हो चुका था। लेकिन इस बार का यह खूनी खेल सबको पीछे छोड़ने वाला था। 

सांची, भोपाल में बना स्तूप। इस स्तूप के अभिलेखों में बिन्दुसार के बारे में उल्लेख है

राजसिंहासन पर आये अशोक की कौन-सी तस्वीर उभरती है, इस पर बात करना ही बेमानी है। उसे लोगों ने क्रूर माना होगा और तत्कालीन दरबार और समाज में उसका आतंक होगा, इसमें कोई दो राय नहीं। सत्ता में आये कोई आठ साल हुए थे कि उसने कलिंग पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण-प्रत्याक्रमण तो उस ज़माने में होते रहते थे। ऐसे में कलिंग-युद्ध उस ज़माने के अनेक युद्धों में एक होता। लेकिन नहीं। क्रूरता, कत्लेआम , हिंसा की सघनता आदि को लेकर उस ज़माने का यह महासंग्राम था। कहते हैं, कोई डेढ़ लाख लोग मारे गए और इतने ही युद्ध बंदी बना कर लाये गए। अपंग हुए लोगों की संख्या अलग थी। संभव है, संख्या को लेकर कुछ बढ़ा-चढ़ा कर बातें हों। लेकिन यह तो माना ही जाना चाहिए कि उस युद्ध में अशोक ने अपनी क्रूरता का खुला प्रदर्शन किया होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि कलिंग वासियों ने अपनी स्वायतत्ता और आज़ादी के लिए कड़ा संघर्ष किया था। 


और फिर कथा यह बनती है कि अशोक का ह्रदय परिवर्तन हो गया। इतने सारे क्रूर कृत्य के बाद तो किसी का भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है। विडंबना यह है कि बौद्ध ग्रंथों ने अशोक के बारे में जो कुछ टिप्पणी की, या विवरण दिए उसे हमने चुपचाप बिना किसी समीक्षा के स्वीकार लिया। शायद यह सही नहीं था। हमें इतिहास से प्रश्न करना ही चाहिए कि अशोक की महानता के आधार क्या हैं? क्या स्वयं अशोक द्वारा खड़े किये गए वे स्तूप, जिस पर एक राजा अपनी ही महिमा का विज्ञापन देश के कोने-कोने में करता है। इस शाही खर्च की कड़ी आलोचना होनी चाहिए थी, लेकिन हमारे इतिहासवेत्ता उनकी गिनती और उन पर खुदे अभिलेखों के अध्ययन से आगे नहीं बढे। सब मिला कर निष्कर्ष यही है कि अशोक भारतीय इतिहास में महानता का पर्याय बन गया है। उस पर जितना लिखा गया है, उतना शायद ही किसी शासक पर लिखा गया हो। लेकिन इस महानता के अवयवों की हम खोज करेंगे तब एक उदासी भी हाथ आ सकती है। यह संभव है कि कलिंग युद्ध के बाद युद्ध और लड़ाई-झगड़ों से उसे विरक्ति हुई होगी। यह भी संभव है कि अपराध-बोध से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म के शरण में जाना उसे उचित महसूस हुआ हो। उसके द्वारा धर्माचरण अपना लिया जाना भी स्वाभाविक लग सकता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इस तरह परिवर्तित चेतना का व्यक्ति अंतिम समय तक सत्ता से कैसे चिपका रहता है? जबकि सत्ता से विमुख हो सन्यास लेने का उदाहरण स्वयं परिवार में ही था। उसके दादा चन्द्रगुप्त ने तेईस वर्षों तक राज करने के बाद स्वेच्छा से सत्ता छोड़ थी और दक्षिण के कर्नाटक देस जाकर अन्न-जल त्याग कर सल्लेखना विधि से अपना जीवन समाप्त कर लिया था। चन्द्रगुप्त को किसी चीज के लिए प्रायश्चित नहीं करना था। उसकी सल्लेखना उसकी गहरी आध्यात्मिकता और संसार-विमुखता की अभिव्यक्ति थी, प्रकटीकरण था। गहराई से देखें तो अशोक के पिता बिन्दुसार का जीवन अधिक बौद्धमय प्रतीत होता है; क्योंकि वह मध्यमार्गी रहा। लेकिन अशोक तो दो अतियों पर चला। जीवन के पूर्वार्द्ध में जम कर हिंसक रहा, और फिर उतना ही अहिंसक। लेकिन इस अहिंसक चेतना से अपरिग्रह के भाव नहीं प्रस्फुटित हुए। वह मृत्युपर्यन्त सत्ता से चिपका रहा। उसके परिवार में बेटे-बेटियों की कमी नहीं थी। उसने बेटे महेंद्र और संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भिक्षु-भिक्षुणी बना कर श्रीलंका भेज दिया। बच्चों को सत्ता सौंप वह स्वयं भी श्रीलंका जा सकता था। और तब वह सचमुच महान होता। लेकिन उसकी जीवनगाथा के मौजूदा ढाँचे में वास्तविक महानता के तत्व कहाँ हैं, मुझे पता नहीं चलता। 

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हम अशोक के जीवन पर एक विहंगम नजर डालें। श्रीलंका से प्राप्त बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान का एक भाग अशोकावदान है, जिसमें अशोक की कथा है। इसके अलावा दीपवंश और महावंश में भी अशोक कथा है। पुराणों में अशोकवर्द्धन के रूप में उसकी कथा है। लेकिन सभी वृतांत-विवरण यह संकेत देते हैं कि ये ग्रंथ उसके प्रति उदार होकर लिखे गए हैं। हालांकि ये ग्रंथ अशोक के जीवनकाल में नहीं लिखे गए, लेकिन बौद्ध धर्म और अन्य धर्मों के भी पुजारी वर्ग के प्रति उसकी उदारता ने लेखक तबके में उसके प्रति एक लगाव विकसित किया था, जिसका लाभ उसे मिलता रहा। वह नंदों की तरह न क्षत्रान्तक था, न बाद के शुंग राजाओं की तरह बौद्ध-विरोधी। उसने सबको पाला-पोसा। आजीवकों से लेकर परिव्राजकों और ब्राह्मणों तक को। यही उसकी सहिष्णुता थी और कहें तो सर्वधम्मसमभाव भी। वह निश्चित रूप से बौद्ध हो चुका था और पुरानी दुनिया का पहला शासक था जिसने किसी धर्म के प्रचार के लिए राज-खजाने को खोल दिया था। उसने जनकल्याण और उत्पादन में विकास के लिए, शिक्षा-संस्थानों, या अस्पतालों के लिए व्यापक रूप से कुछ किया, इसकी विस्तृत व ठोस जानकारी नहीं मिलती, लेकिन धर्म प्रचार, तीसरी बौद्ध संगीति, अपने संदेशों के प्रचार के लिए स्तम्भों के निर्माण आदि पर उसने राज-खजाने से खूब खर्च किया। यह उसकी ऐसी मनमानी थी, जिसकी सराहना नहीं की जानी चाहिए थी। लेकिन यथार्थ है कि इसकी खूब सराहना हुई। 

अशोक को उसके अभिलेख ‘देवानांपियस’ या ‘पियदसि’ कहते हैं। मास्की के अभिलेख में उसे ‘देवानांपियस असोकस ‘ कहा गया है। कोलकाता-बैराट के अभिलेख उसे ‘पियदसि लाजा मागधे’ के रूप में चिह्नित करते हैं, वहीं रुद्रदामन के अभिलेख में उसे मौर्य अशोक कहा गया है। दीपवंश में उसे ‘पियदसि’ और ‘पियदस्सन’ कहा गया है। अशोकावदान की कथा में उसके लिए पूर्वजन्म की एक दिलचस्प गाथा गढ़ी गयी है। इस कथा के अनुसार अशोक पूर्वजन्म में जय नामक एक चंचल बालक था। एक बार जब वह गली-कूचे में खेल रहा था, तो गौतम बुद्ध अपना भिक्षा पात्र लिए उधर से गुजरे। बालक जय ने कौतूहलवश बुद्ध के कटोरे में एक मुट्ठी धूल डाल दी। बुद्ध, जिन्हें किसी बात का क्रोध नहीं आता था, इस शिशु के धूल दान पर मुग्ध हो गए और आशीर्वाद दिया कि एक समय यह बालक राजा और मेरा अनुयायी बनेगा। बुद्ध के वचन को पूरा करने हेतु अशोक राजा भी बना और उनके धम्म का अनुयायी भी। लेकिन इस पूरे प्रकरण पर यह सवाल तो उठता है कि बुद्ध ने क्या उसे इतनी हिंसा के भी निमित्त गढ़ा था? अथवा उनके आशीर्वाद में ही कुछ दोष था कि इतने हिंसक रास्ते से गुजर कर वह राजा और बुद्धानुयायी बनता है। 

बिहार के वैशाली जिले के कोल्हुआ नामक स्थान में अशोक द्वारा बनवाया गया एक स्तंभ, तस्वीर : नवल किशोर कुमार

अशोक के जीवन के बारे में कुछ और जानना चाहिए, क्योंकि इससे उसके मन-मिजाज को समझने में सुविधा होगी। अशोकावदान के अनुसार वह अपने पिता बिन्दुसार की ब्राह्मण-रानी, जो आधुनिक भागलपुर और पुरानी चंपा नगरी की थी और जिसका नाम शुभद्रांगी था, की कोख से पैदा हुआ। जैसा कि मैंने पहले ही बतलाया है। उसकी स्थिति बहुत कुछ मध्यकालीन इतिहास के औरंगज़ेब जैसी थी। उसे पाटलिपुत्र में नहीं रहने दिया गया। यहां उसका भाई सुसीम था, जो बिन्दुसार के राजकाज में सहयोग करता था। अशोक को उपराज के पद पर तक्षशिला और विदिशा को संभालने की जिम्मेदारी दी गयी थी, जहां उसने कुशलता पूर्वक राजकाज को सम्पादित किया था। तक्षशिला में उसके द्वारा एक जन विद्रोह को कुचलने की भी सूचना है। ये जन विद्रोह दरअसल साम्राज्य से आज़ादी के लिए होते थे। मगध साम्राज्य और उसके सम्राट अपने राजत्व से जनपदीय गणतंत्रात्मक सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्थाओं को निरंतर कुचल रहे थे। इस विद्रोह को कुचलने का अर्थ अस्पष्ट नहीं है। निश्चय ही बड़े स्तर पर खूनखराबा-हिंसा हुई होगी। यह सब अशोक के निदेश से हुआ होगा। क्रूरता और हिंसा का यह अभ्यास बाद के दिनों में सत्ता हासिल करने के लिए हुए पारिवारिक युद्ध और कलिंग युद्ध में काम आया। कहते हैं बिन्दुसार की पसंद यानी वास्तविक उत्तराधिकारी यानि सुसीम को, अशोक ने जलते हुए कोयले के गड्ढे में जीवित डाल दिया। इस घटना के बाद उसे चंडाशोक कहा जाने लगा। उसकी यह क्रूर छवि राजनीति में बड़े काम की रही होगी, क्योंकि इससे उसका एक आतंक बना होगा। यह आतंक बौद्ध धर्म के प्रचार में कितना सहायक हुआ, इस पर विमर्श होना चाहिए। लेकिन जिन ग्रंथों में उसकी क्रूरता के विवरण हैं, उनमें ही ऐसे विवरण भी हैं जिसके अनुसार इस चंडाशोक का दिल मुहब्बत करना भी जानता था। विदिशा में एक श्रेष्ठि कन्या, जिसका नाम देवी कहा गया है, से उसकी आँखें चार हुईं और उस से उसे एक पुत्र और पुत्री की प्राप्ति हुई। महिंद और संघमित्रा, जिन्हें धम्म प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा गया, इसी देवी से जन्मे थे। अशोक की अन्य पत्नियों में से कुछ मुख्य के नाम तिस्सरखिता (तिष्यरक्षिता), असंधिमित्ता (असंधिमित्र) और पद्मावती है।

ऐसा लगता है पिता की उपेक्षा, स्त्री-प्रेम के अभाव और सत्ता प्राप्त करने की उद्दाम लालसा ने उसे पूरी तरह क्रूर बना दिया था। हत्या करने में मानों उसे आनंद मिलता था। अशोकावदान के अनुसार उसने उस तरह के यातना शिविर का निर्माण करवाया हुआ था, जैसे नरक में होते हैं। यातना-शिविरों का निर्माण फासिस्ट हिटलर ने जर्मनी में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किया हुआ था। अपने राज्यारोहण के आठवें साल में उसने कलिंग पर आक्रमण कर उसे तबाह कर दिया। इसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। हमारे लोक मानस में भी अशोक का यह युद्ध, उसकी भयावहता और उस भयावहता के अशोक पर प्रभाव की पर्याप्त चर्चा होती रही है। लेकिन प्रश्न है कि क्या अशोक सचमुच इतना बदल गया था? अथवा यह उसकी राजनीति का हिस्सा था? इस प्रश्न का जवाब निश्चित करना किसी के लिए भी कठिन होगा। यह तो तय है कि राज्यारोहण के आठवें साल तक उसके दरबारी और पारिवारिक शत्रु समाप्त हो चुके होंगे। कलिंग अभियान के खूनखराबे ने यदि उसे प्रभावित किया तो उसका बौद्ध धम्म की तरफ आकर्षित होना भी स्वाभाविक था। हालांकि उसका यह पक्ष भी पर्याप्त विवादित है. पूरी कथा यह है कि अशोक ने विधिवत बौद्धधर्म की दीक्षा ली। उनके दीक्षागुरु प्रतिभावान तिस्स मोग्लिपुत्त थे। तिस्स मोग्लिपुत्त ब्राह्मण परिवार में जन्मे ऐसे प्रतिभा-पुरुष थे, जिनके ज्ञान और विवेक की उस समय खूब चर्चा होती थी। उनकी सलाह से अशोक ने पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति आयोजित करने की योजना करवाई। यह संगीति महास्थविर पक्ष की होनी थी, जिसका उद्देश्य स्थविरवादियों के भिन्न शाखाओं में एकरूपता स्थापित करना और विवादित मुद्दों को सुलझाना था। इस संगीति या सम्मलेन के आयोजित होने की खबर और सम्राट अशोक के इस धर्म में रूचि लेने से बड़ी संख्या में विद्वत लोग बौद्ध मत की ओर आकर्षित हुए। राजकीय संरक्षण से संघों की आय में बढ़ोत्तरी भी हुई होगी। आकर्षण का एक कारण यह भी होगा। बड़ी संख्या में लोगों के आने से बौद्ध संघ और विहारों में अराजकता की स्थिति होने लगी। यहां तक कि विहारों के तय धार्मिक कार्य जैसे उपोसथ भी अनियमित होने लगे। कहते हैं इसे देख मोग्लिपुत्त को क्षोभ हुआ और वह एकांतवास करने एक पहाड़ी इलाके में चले गए। अपने गुरु की इस स्थिति से चिंतित हो अशोक ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि धार्मिक कार्य समय पर सुनिश्चित किये जाएँ और गलत लोगों को दण्डित किया जाय। राज्य के अधिकारी धार्मिक कार्यों के लिए अलग तो थे नहीं। जो अधिकारी राजस्व वसूलते थे, या युद्ध-प्रबंध देखते थे, अब संघ का कार्य भी देखने लगे थे। इन लोगों ने देखा संघ के भिक्षुओं में बड़े स्तर पर अराजकता है, कोई किसी की बात स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है। अधिकारी वही थे जिन्होंने कलिंग फतह किया था। ये निहत्थे भिक्षु उनके सामने किस खेत की मूली थे। अधिकारियों ने बलपूर्वक राजाज्ञा पूरी की। अधिकारियों ने कोई सात सौ भिक्षुओं को गाजर-मूली की तरह काट डाला। शान्ति तो होनी ही थी। संघ दुरुस्त हो गया। लेकिन अशोक को जब यह मालूम हुआ, तो कहते हैं वह दुखी हुआ। शायद दुखी होने का उसे अभ्यास होता जा रहा था। बौद्धों के बीच अशोक के इस कृत्य की आलोचना होने लगी। वह स्वयं महसूस कर रहा था कि अपराध किया जा चुका है। भिक्षुओं में विद्रोह की स्थिति हो गयी। उनकी मांग थी कि केवल तिस्स मोग्लिपुत्त की बात वह मानेंगे। विचलित सम्राट ने एक बार फिर अपने गुरु मोग्लिपुत्त को याद किया। आरज़ू-मिन्नत की। गुरु पाटलिपुत्र लौटे। बौद्धों की सभा हुई। सम्राट ने गुरु के सामने बातें रखीं कि ‘क्या इतनी संख्या में भिक्षुओं के वध से उनसे कोई अक्षम्य अपराध हुआ है? अधर्म हुआ है?’ गुरु अपने शिष्य की पीड़ा समझ रहे थे। वह साधारण गुरु नहीं, अशोक के गुरु थे। उन्होंने कहा ‘आपने जो किया उसका उद्देश्य बुरा नहीं था, इसलिए आपसे कोई अधर्म नहीं हुआ।’ राजाओं को हमेशा ऐसे पुरोहित और धर्मगुरु अच्छे लगते रहे हैं। अशोक की बौद्ध धर्म और उसके गुरुओं के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ गया। उसने पूरे उत्साह से संगीति करवाई। कोई नौ महीने तक यह चलता रहा। त्रिपिटकों की गहरी समीक्षा हुई। बौद्ध धर्म राज्य धर्म की तरह हो गया। अशोक ऐसा सम्राट हुआ, जिसका मुख्य कार्य धर्म-प्रचार हो गया। किसी शासक का इस प्रकार से धर्म-प्रचारक बनना कितना सही था, इसकी समीक्षा इतिहासकारों ने नहीं की है।

अशोक ने भारतवर्ष के लिए क्या कुछ विशेष किया, यह तय करना मुश्किल है। हाँ, बौद्ध धर्म के विकास और प्रचार-प्रसार में उसकी भूमिका उल्लेखनीय जरूर कही जाएगी। उसके पास जो भी शक्ति थी, वह सब कुछ उसने धम्म के विकास में लगा देने की कोशिश की। एक दफा जब वह धर्म-विस्तार में लगा तो उस पर जुनून सवार हो गया। उसने सभी बौद्ध तीर्थों की यात्रा की। बुद्ध की जन्मभूमि को उसने कर-मुक्त किया और वहां अपना स्तम्भ खड़ा करवाया। उसने साम्राज्य-विस्तार को धम्म-विस्तार में परिवर्तित कर दिया। जैसे-जैसे उसकी उम्र ढलती गयी, उसकी धार्मिकता प्रगाढ़ होती गयी। यह कहना मुश्किल है कि उसकी इस धार्मिकता से प्रशासन कितना प्रभावित हुआ और देश की राजनीति को कितना लाभ हुआ। उसकी धार्मिकता की विशेषता थी कि वह बौद्ध मत का अनुयायी या प्रचारक अवश्य था, लेकिन इसे किसी पर थोपे जाने की कभी बात उसने नहीं की। उसने अन्य धर्मावलम्बियों को समान रूप से नागरिक अधिकार दिए, बल्कि उन्हें भी राजकीय सहायता संभव कराई संभव है यह खासियत अशोक से अधिक उस धम्म की हो, जिसका अनुयायी वह हो चुका था। लेकिन कोई विचार अथवा धम्म व्यक्ति की चेतना को ही प्रभावित करता है। बौद्ध मत ने उसे जीव हिंसा और जनता के कल्याण के लिए सचेत किया। अपने कुल छत्तीस साल के शासन काल में लगभग आधे समय तक तो निश्चित रूप से वह धम्म नीति पर चला। अपने राज्याभिषेक के बीसवें साल में वह बुद्धभूमि रुम्मिनदेई गया था। उसके बाद वह निरंतर और अहर्निस धम्म-विस्तार में लगा रहा। उसने स्वयं को बदला और प्रशासन के चरित्र को बदला। वह निरंतर प्रयोग करता रहा।

तथागत बुद्ध राज-परिवार में जन्मे और घर-बार छोड़ कर बौद्ध धर्म संघ की स्थापना की। अशोक ने न राज छोड़ा और न परिवार छोड़ा। एक ने संघ की स्थापना की और परिश्रमपूर्वक पैंतालीस वर्षों तक विचरण करते हुए अपने मत का प्रचार किया। उनकी मृत्यु से कोई दो सौ साल बाद एक राजा स्वयं परिव्राजक हो, अपने को धम्म प्रचार के लिए समर्पित कर देता है। उस ज़माने में, जब राजतंत्र में राजा का मतलब युद्ध और विलासिता हुआ करती थी उसने एक नयी कार्यसूची को अपने हाथ में लिया और उसे बहुत अंशों में पूरा भी कर दिया। उस पर प्रश्न उठने चाहिए और उठेंगे भी, लेकिन वह सचमुच इन अर्थों में महान है कि कोई भी इंसान पूरी तरह बदल सकता है, जैसे कि अशोक। लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि धर्म को लेकर एक राजा की वैसी व्याकुलता ठीक नहीं है। वह इतना धर्म-केंद्रित हो चुका था कि अपने राजनैतिक कर्तव्यों की उसने उपेक्षा की। उसका समय तो शांति का था या कम से कम लोगों को उसके पिछले क्रूर आचरण की जानकारी थी, जिसके दबदबे से उसके समय में और कुछ बाद तक सब कुछ ठीक ढंग से चलता रहा, लेकिन विदेशी शक्तियों की इस राजनैतिक शैथिल्य पर नजर थीं। मगध का राजनैतिक दबदबा घटता चला गया। नतीजतन आगे के समय में विदेशी आक्रमण शुरू हो गए। मौर्यों की शांति नीति की प्रतिक्रिया में पुष्यमित्र शुंग ने जो किया वह एक और अतिवाद था।

(संपादन : नवल)


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  1. omprakash kashyap Reply

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