पत्थलगड़ी : संविधान की रक्षा के लिए आदिवासियों का विद्रोह

लम्बे समय से राज्य द्वारा आदिवासियों के विरुद्ध उठाये जा रहे असंवैधानिक क़दमों के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध का रास्ता तलाशते हुए आदिवासी परगनाओं और पंचायतों ने गंभीर चर्चा के बाद पत्थलगड़ी को चुना. पत्थलगड़ी के ज़रिए आदिवासियों ने अपने संवैधानिक अधिकारों का उद्घोष किया और ज़मीन के भूखे कॉर्पोरेट्स का प्रतिरोध करने के लिए स्वयं को सशक्त किया

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के बुटूंगा गाँव के विजय मिंज कहते हैं, “अपने पूर्वजों की स्मृति में पत्थर गाड़ना, हम आदिवासियों की परंपरा रही है. भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची हमें अपने पारंपरिक कानूनों का पालन करने का अधिकार देती है. ऐसे में हमारे लिए यह समझना मुश्किल है कि पत्थलगड़ी क्यों और कैसे अपराध है?”

पत्थलगड़ी को लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक बवंडर खड़ा कर दिया गया है. ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि पत्थलगड़ी, दरअसल, माओवादी आन्दोलन का हिस्सा है; इसमें ईसाई मिशनरियों की भूमिका है; इसके पीछे विदेशी षड़यंत्र है और इसके बहाने गैर-कानूनी ढंग से अफीम की खेती जा रही है. इन्हीं आरोपों के चलते पिछले कुछ महीनों में, झारखण्ड सरकार ने बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं, ग्रामवासियों, लेखकों और पत्रकारों के विरुद्ध देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किए हैं. सर्व आदिवासी समाज (एसएएस) के अनिमा एक्का कहते हैं, “ये सभी आरोप बेबुनियाद हैं और इनका लक्ष्य आदिवासियों में अपने भविष्य का स्वयं निर्धारण करने की बढ़ती चेतना को कमज़ोर करना है. पत्थलगड़ी में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है, परन्तु स्थानीय मीडिया, गैर-आदिवासी मध्यमवर्ग और राजनीतिक दल इसे असंवैधानिक सिद्ध करने पर आमादा हैं.

बछराव में एक पत्थलगड़ी

बीहड़ इलाके की उबड़-खाबड़ सड़कों पर लगभग आधे दिन यात्रा करने के बाद, बरसात की एक शाम मैं बुतुन्गा पहुंचा. यह गाँव सन 2018 की शुरुआत से छत्तीसगढ़ में पत्थलगड़ी पर विवाद और बहस का केंद्र रहा है. इसके पहले, जब सन 2015 में आदिवासियों ने पत्थर के स्तम्भ गाड़ कर अनुसूचित क्षेत्रों में अपने अधिकारों का उद्गोष करना शुरू किया था, तब यह विमर्श मुख्यतः झारखण्ड-केन्द्रित था. अप्रैल 2018 में एक पूर्व आईएएस अधिकारी और ओएनजीसी के एक सेवानिवृत्त महाप्रबंधक सहित आठ आदिवासियों की गिरफ़्तारी के साथ, छत्तीसगढ़ इस विवाद के केद्र में आ गया. 

जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें शामिल थे जोसफ तिग्गा (सेवानिवृत्त महाप्रबंधक, ओएनजीसी), हरमन किंडो (सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी), मिलियन मिंज, सुधीर एक्का, फुल्जेनिस एक्का, डेविड कुजूर, पीटर खेस और जगदेव मिंज. इन सब को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 427, 120(बी), 505, 332 और 352 के तहत गिरफ्तार किया गया. कुल मिलकर 47 लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया गया. आरोपियों में कुछ अज्ञात व्यक्ति भी थे, जिनके बारे में बताया गया कि वे फरार हैं. 

जशपुर में अप्रैल 2018 में क्या हुआ था?

सन 2017 के अंत में छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के शिक्षित आदिवासी युवकों ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिए निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप, ज़मीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार जताना शुरू कर दिया. झारखण्ड के अपने साथियों से प्रेरणा लेकर, बुटूंगा , कलिया, बछराव और सिहारदंड गांवों के निवासियों ने आदिवासी परंपरा के अनुरूप, पत्थर गाड़ने  का निर्णय लिया. 22 अप्रैल, 2018 को बछराव में पहली पत्थलगड़ी हुई. इसके बाद कलिया में भी यही हुआ. दोनों पत्थरों पर आदिवासियों के संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों का विवरण उत्कीर्ण किया गया. बुटूंगा  में भी पत्थलगड़ी स्थापित की गई, लेकिन पत्थर पर विवरण उत्कीर्ण नहीं किया था. पहली पत्थलगड़ी के समय जोसफ तिग्गा मौजूद थे. 

बुटूंगा में ध्वस्त कर दी गयी पत्थलगड़ी के अवशेष

इसके बाद हुए घटनाक्रम का वर्णन करते हुए गाँव के रहवासियों ने मुझे बताया कि, स्थानीय मीडिया ने इस घटना को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया और स्थानीय दक्षिणपंथी राजनीतिक नेताओं ने इसे ईसाईयों की कारगुजारी बताया. एक सप्ताह के भीतर, 28 अप्रैल, 2018 को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जिला इकाई के नेताओं ने जशपुर की जिला पंचायत के उपाध्यक्ष प्रबलप्रताप सिंह जूदेव, राज्य महिला आयोग की सदस्य रायमुनी भगत, सांसद बिशनुदेव साय, जशपुर के विधायक राजसरा भगत, पूर्व विधायक जागेश्वर भगत और पत्थलगांव के विधायक शिवशंकर साय भगत के नेतृत्व में बछराव से ‘सद्भावना यात्रा’ निकाली. 


विकास के अनुसार, “बछराव में वे कुछ नहीं कर सके. गांववालों ने उन्हें पत्थलगड़ी को छूने तक नहीं दिया. वे कलिया पहुंचे, परन्तु वहां पुलिस पत्थलगड़ी की रक्षा के लिए तैनात थी. करीब 4.30 बजे शाम को प्रदर्शनकारी बुटूंगा  पहुंचे, जहाँ उन्होंने गाड़े गए पत्थर को चूर-चूर कर दिया. सद्भावना यात्रा में लाठियों, हथौडों और कुदालों का भला क्या काम? अगर वे सद्भावना यात्रा निकाल रहे थे तो उन्हें ‘जय जूदेव’, ‘जय श्रीराम, ‘जय बजरंगबली’, ‘गौ हत्या बंद करो’ और ‘विनाश के पत्थर बंद करो’ जैसे नारे लगाने की क्या ज़रुरत थी?” 

पत्थलगड़ी क्यों?

आदिवासियों में अपने पूर्वजों की स्मृति में पत्थर के स्तंभ या पट्टिका लगाने की परंपरा है. भारत मुक्ति मोर्चा के नेता कालेरदान तिर्की कहते हैं, “हम आदिवासियों में प्रथा है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद उसकी कब्र पर एक बड़ा-सा पत्थर लगाया जाता है. पत्थलगड़ी आंदोलन समुदाय के पूर्वजों को सम्मानित करने की इसी परंपरा से प्रेरित है.” इस आंदोलन की शुरूआत पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के मुख्य प्रावधानों को पत्थरों पर उत्कीर्ण करने से हुई. उद्देश्य था आदिवासियों को यह बताना कि इस कानून के अंतर्गत गांव को प्रशासनिक इकाई का दर्जा दिया गया है.  तिर्की कहते हैं, “इसमें कुछ भी गलत नहीं है. कोई भी ऐसा कार्यक्रम असंवैधानिक कैसे हो सकता है, जिसमें जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक, अनुविभागीय दंडाधिकारी व अन्य अधिकारियों को आधिकारिक रूप से निमंत्रित किया जाए? इसका उद्देश्य मात्र यह घोषणा करना है कि यह भूमि आदिवासियों की है और अन्यों को यहां घुसने नहीं दिया जाएगा.”    

बुटूंगा के निवासियों से चर्चारत लेखक

यह एक तथ्य है कि अधिकांश राज्य सरकारों ने भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू नहीं किया है. संविधान की पांचवीं अनुसूची की धारा 244 (1) में स्पष्ट कहा गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में जनजाति सलाहकार परिषद (टीएसी) का गठन किया जाएगा, जिसके सदस्य केवल आदिवासी समुदाय के व्यक्ति होंगे. यह परिषद, राज्य के राज्यपाल को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नति से संबंधित विषयों पर सलाह देगी. करीब 80 वर्ष से अधिक उम्र के सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी कहते हैं, “तथ्य यह है कि टीएसी की बैठकें यदाकदा ही होती हैं. इन बैठकों को राज्यों के मुख्यमंत्री बुलाते हैं और वे ही उनकी अध्यक्षता करते हैं. समिति का नियंत्रण राज्य के शासक दल के हाथों में होता है. इस प्रकार टीएसी को एक दंतविहीन संस्था बना दिया गया है. यह आदिवासियों के साथ संवैधानिक छल है.” इसके परिणामस्वरूप आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित किया जा रहा है क्योंकि निजी कंपनियां आदिवासी क्षेत्रों के खनिज संसाधनों पर कब्जा करना चाहती हैं. 

अनुसूचित क्षेत्रों के निवासियों के साथ सरकारों का संवाद न के बराबर है. यह विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के बारे में सही है. बुटूंगा  इस स्थिति का जीता-जागता उदाहरण है. एक वन्य प्राणी अभयारण्य के बीच स्थित यह गांव शेष दुनिया से कटा हुआ है. गांव के एक बुजुर्ग रहवासी कहते हैं, “जब भी हम किसी सुविधा की मांग करते हैं, जैसे- अच्छी सड़कें और विद्युतीकरण, तो हमारी मांग को यह कहकर ठुकरा दिया जाता है कि इससे वन्य प्राणियों का नुकसान होगा. उन्हें जानवरों की फिक्र है, मनुष्यों की नहीं. ऐसा लगता है कि हम इस देश के नागरिक ही नहीं हैं.” 

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अधिकांश आदिवासी विद्रोहों के पीछे इस समुदाय में अलगाव का भाव, उनके साथ विश्वासघात, उनके क्षेत्रों में घुसपैठ व उनके संसाधनों पर कब्जा जैसे मुद्दे रहे हैं. एसएएस की सेवती पन्ना के अनुसार, “पत्थलगड़ी, आदिवासियों की पहचान खत्म करने की कोशिशों के खिलाफ विद्रोह है. हम इसका प्रयोग इसलिए कर रहे हैं ताकि आदिवासी अपने अधिकारों पर जोर दे सकें. इसके जरिए हम एक स्पष्ट संदेश भी देना चाहते हैं. किसी भी गांव में पत्थलगड़ी लग जाने के बाद गांव वाले अपने गांव में प्रवेश करने वाले हर अजनबी को संदेह की निगाह से देखते हैं. वे उसे रोकते हैं और उससे पूछताछ करते हैं.”


बछराव के एक बुजुर्ग रहवासी कहते हैं, “हम संविधान और पेसा कानून के बारे में कुछ नहीं जानते. पत्थलगड़ी के कारण हमें यह पता चला कि हमें एक विशेष दर्जा दिया गया है और संविधान में हमारी सुरक्षा के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं.” बुटूंगा  के विकास कहते हैं, “क्या कोई भी हमारी पत्थलगड़ियों में एक भी ऐसा शब्द बता सकता है जो असंवैधानिक हो? हम संविधान की सीमाओं में रहते हुए अपने अधिकारों के बारे में जानना चाहते हैं. हम केवल यह कह रहे हैं कि हम इस धरती के प्रथम राष्ट्र हैं. हमारा गांव ही हमारा राष्ट्र है. हमने कोई और गांव देखा ही नहीं है.”  

विश्वासघात और तोड़े गए वादों का इतिहास

भारत में आदिवासियों के साथ न केवल ऐतिहासिक वरन् सांस्कृतिक विश्वासघात भी हुआ है. कई अध्ययनों से  पता चलता है कि विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वालों में से 40 से 50 प्रतिशत आदिवासी होते हैं. नेगी और गांगुली (2011) के मुताबिक, भारत में विकास परियोजनाओं के कारण अब तक लगभग 2.1 करोड़ लोगों को अपने घरों से बेघर होना पड़ा है. यद्यपि आदिवासी देश की कुल आबादी का केवल 8 प्रतिशत हैं परंतु विस्थापित व्यक्तियों में उनका प्रतिशत 40 से अधिक है. विस्थापित आदिवासियों को अलग-अलग तरह की कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है और इससे ज़मीन से बेदखली की उनकी मूल समस्या और गंभीर हो जाती है.

डायस (2000) के अनुसार, वाशिंगटन स्थित वर्ल्ड वाच इंस्टीट्यूट ने खनन के पारिस्थितिक और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों का अध्ययन किया है. इनमें विस्थापन, संस्कृति को क्षति, सामुदायिक स्वायत्ता को क्षति, भूमि, जंगलों और पानी पर अधिकार खो देना और पारिस्थिकी तंत्र और खाद्य सुरक्षा को क्षति शामिल हैं. इसके अतिरिक्त, खनिज संपदा वाले क्षेत्रों के लोग गरीबी और बीमारी के शिकार बन रहे हैं और उन्हें मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं.

पेसा ने पहली बार आदिवासियों के स्वशासन का रोडमैप और ढ़ांचा निर्मित किया. आदिवासियों के अपने निर्णय स्वयं लेने के अधिकार के लिए एक लंबे संघर्ष के बाद इस अधिनियम द्वारा पहली बार यह स्वीकार किया गया कि आदिवासियों में ग्रामसभा के जरिए स्वशासन की एक लंबी और समृद्ध सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा रही है. पेसा ने आदिवासियों और अन्य मूल निवासियों के कल्याण व उन्नति से संबंधित मामलों में ग्रामसभाओं को महत्वपूर्ण अधिकार दिए. आदिवासी समता मंच की इंदु नेताम कहती हैं, “अगर आदिवासियों को पेसा के अंतर्गत उन्हें दिए गए अधिकारों का समुचित उपयोग करने दिया गया होता तो अधिकांश समस्याएं उपजती ही नहीं. अधिकारी किसी भी मामले में आदिवासियों की सहमति लेना ही नहीं चाहते.” 

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने समय समय पर अपने अनेक निर्णयों में आदिवासियों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए कई उपायों को लागू करने का आदेश दिए. सन् 1997 के ‘समता’ निर्णय में आदिवासियों की भूमि पर किसी भी तरह के खनन को प्रतिबंधित किया गया. यह एक बड़ी राहत थी. पेसा के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा से विचार-विमर्श करना और उसकी सहमति लेना अनिवार्य है. परन्तु अधिकारी इस तरह के निर्णयों को नज़रअंदाज़ करते हुए, औपनिवेशिक ‘लॉ ऑफ़ एमिनेंट डोमेन’ के आधार पर अन्य सभी प्रावधानों को परे रख कर आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से बेदखल कर रहे हैं और कारपोरेट्स द्वारा उनकी बेशकीमती खनिज सम्पदा को लूटने की राह प्रशस्त कर रहे हैं.    

वर्ष 2006 में वनाधिकार अधिनियम पारित किया गया. इसे एक ऐसे कानून के रूप में देखा गया जो भारतीय राज्य सत्ता द्वारा वनवासियों के अधिकारों को मान्यता न देने के ऐतिहासिक अन्याय को दूर करेगा. इस अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक वनवासी परिवार को चार एकड़ वन भूमि पाने का अधिकार मिला. भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वार्षिक रपट के अनुसार, दिनांक 28 फरवरी, 2017 की स्थिति में अनुसूचित क्षेत्र वाले नौ राज्यों में 41,65,395 दावे (जिनमें 40,26,970 व्यक्तिगत और 1,38,425 सामुदायिक दावे शामिल हैं) दायर किए जा चुके थे. इनमें से केवल 17,90,624 (17,27,655 व्यक्तिगत और 62,969 सामुदायिक) दावों को स्वीकार कर भू-अधिकार पट्टे बांटे गए थे. लगभग 24 लाख (57 प्रतिशत) दावे या तो विचाराधीन थे या खारिज कर दिए गए थे. 

अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय (सुप्रीम कोर्ट: दीवानी अपील संख्या 4549 वर्ष 2009) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि “हमारी यह राय है कि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो जमीन के नीचे की खनिज संपदा पर राज्य को पूर्ण अधिकार देता हो. बल्कि, भूगर्भीय खनिज संपदा पर अधिकार, सामान्यतः, संबंधित भूमि पर अधिकार से जुड़ा हुआ होना चाहिए जब तक कि भूमि के मालिक को किसी वैध प्रक्रिया से भूमि पर उसके अधिकार से वंचित न कर दिया गया हो.”

उच्चतम न्यायालय ने देश के 219 में से 214 कोल ब्लाकों को गैर-कानूनी घोषित करते हुए उन्हें बंद करने का आदेश दिया और कोयले के गैर-कानूनी खनन पर जुर्माना भी लगाया. परंतु केन्द्र और राज्य सरकारों ने इन अवैध कोल ब्लाकों को फिर से आवंटित करने का रास्ता ढूंढ लिया. इस आवंटन को कानूनी जामा पहनाने के लिए सरकार ने यह निर्णय किया कि कोल ब्लाकों की नीलामी की जाएगी. 

पिछले कुछ दशकों में केन्द्र सरकार के अनुमोदन से राज्य सरकारों ने ‘लैंड बैंकों’ के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की है. एसएएस के राजीव लकड़ा कहते हैं, “लैंड बैंक हमारी जमीनों पर कब्जा करने का तरीका है.” इस प्रक्रिया में संविधान, पेसा, वनाधिकार अधिनियम, विधिक संस्थाओं और अन्य प्रावधानों के अंतर्गत आदिवासियों को दिए गए अधिकारों की अवहेलना होती हैं. हर राज्य सरकार की योजना कम से कम 20 लाख एकड़ भूमि का अधिग्रहण करने की है जिसमें से कम से कम 10 लाख एकड़ उद्योगों को आवंटित की जाएगी. इसमें ‘सार्वजनिक भूमि’ जैसे जल स्त्रोत, नदियां, नाले, पहाड़ियां, पहाड़, ग्रामीण सड़कें, सरना और मसना शामिल है. यह सब संबंधित व्यक्तियों और ग्राम सभाओं की जानकारी और सहमति के बगैर किया जा रहा है.”   

ताज़ा घटनाक्रम 

एसएएस के अनूप टोप्पो कहते हैं, “आदिवासियों के शोषण के अनेक उदाहरण हैं. भारतीय राज्य आदिवासियों को नागरिक तक नहीं मानता.” सन् 2014 में सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद, भाजपा सरकार ने ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापन अधिनियम, 2013’ में संशोधन हेतु एक विधेयक संसद में प्रस्तुत किया. इस अधिनियम के अंतर्गत, अपनी भूमि से विस्थापित किये जा रहे व्यक्तियों को उससे असहमत होने के अतिरिक्त, बेहतर मुआवजा और पुनर्वास पाने का अधिकार दिया गया था. लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के विरोध और राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों की असहमति के बावजूद, सरकार इस विधेयक को संसद की स्वीकृति दिलवाने पर आमादा थी. इस विधेयक का देश भर के जनसंगठनों ने कड़ा विरोध किया और लाखों आदिवासी इसके खिलाफ सड़कों पर उतरे. डेमे ओराम कहते हैं, “दिसंबर 2014 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा आदिवासियों के अधिकार सीमित करने के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में प्रस्तुत करते ही हम लोग सचेत हो गए. हमने ओडिशा, झारखण्ड और अन्य राज्यों में इसका जबरदस्त विरोध किया.” मजबूर हो कर सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े.

इसके बाद, केंद्र और कई राज्यों में सत्ता पर काबिज़ भाजपा ने राज्यों के भूमि सम्बन्धी कानूनों से छेड़छाड़ शुरू कर दी. इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है भाजपा द्वारा झारखण्ड में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट को संशोधित करने के प्रयास. ये दोनों अधिनियम आदिवासियों की भूमि को गैर-आदिवासियों, विशेषकर निजी उद्योगों, को हस्तांतरित करने की राह में क़ानूनी बाधा हैं. नबम्बर 2016 में झारखण्ड विधानसभा ने संशोधन विधेयक पारित कर उन्हें स्वीकृति के लिए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को भेज दिए. छह माह बाद, मई 2017 में राज्यपाल ने यह विधेयक बिना स्वीकृति के लौटा दिए. आदिवासियों ने इसे एक चेतावनी के रूप में लिया. इसी तरह के प्रयास अन्य ऐसे राज्यों में किए गए जहाँ आदिवासियों के लिए विशेष प्रावधान थे, विशेषकर ज़मीनों के सम्बन्ध में.

कबतक सहते रहेंगे आदिवासी?

घटनाओं की इस श्रृंखला के चलते, आदिवासी परगनाओं और पंचायतों ने देश के प्रथम राष्ट्रों को हाशिए पर धकेले जाने से निपटने और अलगाव की राजनीति का सांस्कृतिक स्तर पर मुकाबला करने का रास्ता तलाशने के लिए गंभीर विचार-विनिमय किया. उसी का नतीजा यह है कि आदिवासी, पत्थलगड़ी के ज़रिये स्व-शासन के अपने अधिकार का उद्गोष कर रहे है. यही पेसा की मूल आत्मा भी है. 

इसलिए पत्थलगड़ी आन्दोलन को कानून और व्यवस्था की समस्या मानना या उसे देशद्रोह बताना बहुत बड़ी भूल है. ऐसा करने वाले यह चाहते हैं कि राज्य अपनी असीमित शक्ति इस आन्दोलन के नेताओं को कुचलने में झोंक दे.  पत्थलगड़ी आन्दोलन, दरअसल, आदिवासियों के दिलों में दसियों पीढ़ियों से धधक रहे आक्रोश और उनकी कुंठा और निराशा की अभिव्यक्ति है. पत्थलगड़ियों में जो कुछ लिखा है, उससे हम असहमत हो सकते हैं, परन्तु इस संघर्ष में शामिल आदिवासियों और उनका साथ देने वालों को अपराधी घोषित करने की बजाय हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि आखिर आदिवासी वह क्यों लिख रहे हैं. तब हमें अपने प्रश्न का उत्तर मिलेगा. पत्थर में उत्कीर्ण पंक्तियों में यह मांग निहित है कि सरकार संविधान का आदर करे. ऐसा लगता है कि इन दिनों यह माँगना भी शायद बहुत ज्यादा माँगना है. 

संदर्भ :

Dias, X. (2000). Mining Today – An Overview of mining in India. Background Paper for the first Mines, Minerals & PEOPLE Convention. Hyderabad: Samatha. 

Negi, N.S. and S. Ganguli (2011). Development Projects vs. Internally Displaced Populations in India: A Literature Based Appraisal. Bielefeld: COMCAD, Working Paper, 103.

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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