सामाजिक न्याय के धर्म योद्धा थे पी. एस. कृष्णन : उपराष्ट्रपति

गत 10 नवंबर 2019 को भारत सरकार  में सचिव रहे पी. एस. कृष्णन का निधन हो गया था। उनकी स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को उपराष्ट्रपति  वेंकैया नायडू ने संबोधित किया और उन्हें सामाजिक न्याय का चैंपियन व धर्म-योद्धा बताया

बीते 23 नवंबर, 2019  को दिल्ली के लोधी रोड स्थित चिन्मया भवन का सभागार खचाखच भरा था। मौका था भारत सरकार  में सचिव रहे पी. एस. कृष्णन की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि स सभा का। कृष्णन का 10 नवंबर 2019 को दिल्ली में निधन हो गया था।  

कार्यक्रम में देश के कई राज्यों से उन्हें जानने वाले लोग आए थे। यह पी. एस. कृष्णन का प्रभाव ही था कि उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचने वालों में विभिन्न राजनीतिक दलों के  प्रतिनिधि भी थे। इस मौके पर अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने उन्हें सोशल जस्टिस का चैंपियन और ‘क्रूसेडर’ (धर्मयोद्धा) की संज्ञा दी।

केरल के एक उच्च जातीय परिवार में जन्मे पी. एस. कृष्णन ने बतौर आईएएस अधिकारी, दलित-बहुजनों के कल्याण के लिए कई नीतियों के निर्धारण एवं अनुपालन में  केंद्रीय भूमिका निभायी। उन्होंने यह साबित किया कि शासकीय नौकरी में रहते हुए वंचित जनता के पक्ष में नीतियों का निर्माण व उनका अनुपालन कैसे किया जा सकता है। 

चिन्मया भवन में आयोजित श्रद्धांजलि समारोह का मंच पी. एस. कृष्णन को समर्पित था। मंच  के दायीं ओर कृष्णन की मुस्कराती हुई तस्वीर थी और प्रोजेक्टर के जरिए उनके विचारों और उनसे जुड़ी खबरों, विभिन्न गणमान्यों के द्वारा दिए गए शोक संदेश दिखाए जा रहे थे। मंच की बायीं ओर वक्ताओं के लिए माइक की व्यवस्था थी, जबकि नीचे की पहली पंक्ति में पी.एस. कृष्णन की पत्नी शांता जी और उनके अन्य परिजन बैठे थे। 

बाएं से – श्रद्धांजलि सभा में सीतराम येचुरी, डी. राजा, शांता जी, भारत सरकार के पूर्व सचिव व पी. एस. कृष्णन के मित्र भूपिंदर सिंह व अन्य

पी. एस. कृष्णन को श्रद्धांजलि देने वालों में  प्रारंभिक वक्ता मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी  थे। उन्होंने संक्षेप में अपनी बात रखते हुए कहा कि कृष्णन हरदिल अजीज इंसान थे। उन्होंने अपने जीवन के मूल्य निर्धारित किए और उन मूल्यों के लिए आजीवन संघर्ष किया। नौकरशाही  में ऐसे विरले ही हैं, जिन्होंने अपना जीवन समाज के वंचितों और शोषितों के कल्याणार्थ समर्पित किया हो। येचुरी ने कहा कि यूनाईटेड फ्रंट की सरकार , जिसमें वामपंथी पार्टियां भी शामिल थीं, का  न्यूनतम साझा कार्यक्रम जब बनाया जा रहा था तब उसमें अनुसूचित जातियों के लिए विशेष योजनाएं तय करने की जिम्मेदारी पी. एस. कृष्णन को दी गयी थी। इसी दरमियान उनसे संपर्क बढ़ा। 

येचुरी ने सभी के दिल को छू लेने वाली बात कहते हुए  अपना वक्तव्य समाप्त किया. उन्होंने कहा कि हम सभी को पी. एस. कृष्णन के निधन पर दुख नहीं, बल्कि उनके जीवन का उत्सव मनाना चाहिए।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा ने पी. एस. कृष्णन के योगदानों पर प्रकाश डाला। वे एकमात्र वक्ता  थे जिन्होंने मंडल कमीशन की अनुशंसाओं के लागू करवाने में पी. एस. कृष्णन की भूमिका के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कृष्णन ने अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना की शुरूआत करवाई। साथ ही अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के  निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा, पी. एस. कृष्णन को मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू करवाने में महती हिस्सेदारी रही। इस कारण भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लोगों को 27 फीसदी आरक्षण का लाभ मिला।

पी. एस. कृष्णन की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करते उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू

श्रद्धांजलि समारोह के मुख्य अतिथि थे देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू। उन्होंने अपने संबोधन में पी. एस. कृष्णन को एक शानदार व्यक्तित्व का स्वामी बताया। उनका कहना था कि कृष्णन ने ब्यूरोक्रेट रहते हुए समाज के  अंतिम व्यक्ति को आगे बढ़ाने के लिए काम किया और उनके लिए कानून बनवाने से लेकर लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपराष्ट्रपति ने कहा कि कृष्णन को जब भी लगता कि दलितों और वंचितों के पक्ष में कुछ करने की आवश्यकता है अथवा  कुछ गलत हो रहा है तो वे उन्हें फोन करते। कई बार तो वे उनसे मिलने उनके दफ्तर तक आ जाया करते थे। 

सभा में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री योगेंद्र मकवाना का संबोधन सबसे खास रहा। उन्होंने वह प्रसंग सुनाया, जब देश में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए विशेष घटक योजना की शुरुआत की गई। मकवाना ने बताया कि  तत्कालीन वित्त मंत्री ने साफ मना कर दिया था कि सरकारी खजाने में कोई पैसा नहीं है। इस संबंध में कई बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी बात हुई। यह सब जब चल रहा था तब कृष्णन गृह मंत्रालय में सचिव थे और अनुसूचित जाति प्रभाग देखते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि विभागीय बजट में पूर्व के आवंटन के  5 करोड़ रुपए शेष हैं। वह मार्च का महीना था और यदि राशि का उपयोग न किया जाता तो वह लैप्स हो सकती थी। मकवाना ने कहा कि मैंने इंदिरा गांधी से दुबारा अनुरोध किया कि विशेष घटक योजना लागू हो सकती है और इसके लिए अलग से राशि आवंटित करने की आवश्यकता नहीं है। तब उन्होंने हरी झंडी दिखाई और कैबिनेट में प्रस्ताव लाने को कहा। कृष्णन मुस्तैद थे ही। उन्होंने संशेधित प्रस्ताव बनाया और इस प्रकार भारत में अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना की शुरुआत हुई।

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समारोह को जब पूर्व सचिव भूपिंदर सिंह ने संबोधित करना शुरु किया, तब सबकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने बताया कि वे और कृष्णन दोनों 1956  बैच के आईएएस अधिकारी थे। गृह मंत्रालय में उनकी नियुक्ति के उपरांत कृष्णन ने अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों के लिए काम किया तो मैंने अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए । हम दोनों के अलावा एस. आर. शंकरन और बी. डी. शर्मा भी थे। इस प्रकार हम चार दोस्त थे। जब शंकरण और बी. डी. शर्मा का निधन  हुआ तो मुझे लगता कि मैं आधा बचा हूं। अब जब कृष्णन भी नहीं रहे तो मैं अपने आपको पूर्णत: रिक्त पा रहा हूं।

बीपीएस महिला विश्वविद्यालय, खानपुर कलां की कुलपति प्रो. सुषमा यादव अंतिम वक्ताओं में एक रहीं। उन्होंने पी. एस. कृष्णन की कार्यशैली व विचारों के प्रति उनकी दृढता का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जब वे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, नई दिल्ली में आंबेडकर चेयर की प्रोफेसर बनीं तब एक व्याख्यानमाला के क्रम में उनकी मुलाकात पी. एस. कृष्णन से हुई। प्रो. यादव ने बताया कि भले ही कृष्णन एक आईएएस अधिकारी रहे थे, लेकिन उनकी समझ अकादमिक जगत के लोगों से कहीं अधिक थी। एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि एक बैठक को कृष्णन संबोधित कर रहे थे। एक आईएएस अधिकारी ने उन पर सवाल उठाया तो कृष्णन ने उन्हें दो-टूक शब्दों में कहा कि उन्हें यदि उनके विचार सुनने हैं तो सुनें और नहीं तो वे बैठक से बाहर जा सकते हैं। 

श्रद्धांजलि समारोह में गायक वेंकटेश्वर व उनके साथियों ने पी. एस. कृष्णन को संगीतमय श्रद्धांजलि दी। 

आरएसएस के दिल्ली प्रांत के कार्यवाह भरत और  विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी पी. एस. कृष्णन को श्रद्धांजलि दी. इन दोनों संगठनों के प्रतिनिधियों ने पी एस कृष्णन को श्रद्धांजलि देने के बहाने उन्हें ऊंची जाति का उदार ब्यूरोक्रेट बताया। सनद रहे कि कृष्णन ने अपने जीवन में ऊंची जाति की अपनी  पहचान को कभी हावी नहीं होने दिया। फारवर्ड प्रेस से एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात का खुलासा किया है कि बचपन में ही उन्हें भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बीमारी यानी जातिगत भेदभाव का अहसास हो गया था। यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा है कि किशोरावस्था में ही वे आंबेडकर और पेरियार के विचारों से प्रभावित हो गए थे। यही वजह रही कि 1956 में बतौर आईएएस अधिकारी अपनी पहली नियुक्ति के साथ ही उन्होंने दलितों के जमीन पर अधिकार को लेकर उल्लेखनीय कार्य किए। 

(कॉपी संपादन : अमरीश/अनिल)


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