लाल सलाम और जय भीम के नारे के साथ लोगों ने कृष्णन काे दी आखिरी विदाई

केरल के एक उच्च जातीय परिवार में जन्मे पी. एस. कृष्णन ने बतौर आईएएस अधिकारी दलित-बहुजनों के लिए काम किया। उन्होंने यह साबित किया कि नौकरी में रहते हुए वंचित जनता के पक्ष में सरकारी नीतियों का निर्माण व उनका अनुपालन कैसे कराया जा सकता है। बीते 10 नवंबर 2019 को दिल्ली में उनका निधन हो गया

दिल्ली के लोधी  रोड स्थित श्मशान गृह में लाल सलाम और जय भीम का नारा गूंज रहा था। ये नारे किसी राजनेता के लिए नहीं लग रहे थे।दुख की बेला में ये नारे गूंजे भारत सरकार के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे पी. एस. कृष्णन के लिए। कल 10 नवंबर 2019 को सुबह साढ़े पांच बजे 86 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उन्हें हृदय में वाल्व बदलने हेतु सर्जरी के लिए दिल्ली के एक निजी अस्पताल में भर्ती करया गया था।  उनकी अंत्येष्टि के समय बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। इनमें उनकी पत्नी व जेएनयू की सेवानिवृत् प्रोफेसर शांता कृष्णन, पुत्री शुभा शेखर, दामाद चंद्रशेखर आदि के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक व जे. डी. सीलम, वामपंथी नेता वृंदा करात, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद से लेकर दलित और पिछड़े वर्ग के सामाजिक कार्यकर्ता व बुद्धिजीवी शामिल रहे। इस अवसर पर आईएएस अधिकारी डॉ. राकेश कुमार और पी. संपथ कुमार आदि भी मौजूद रहे।

दरअसल, पी. एस. कृष्णन का जीवन  ही भारत के तमाम वंचितों को समर्पित था। आईएएस रहते हुए उन्होंने मंडल कमीशन की अनुशंसओं को लागू करवाने में अहम भूमिका निभायी। इसके पहले सत्तर के दशक में दलितों के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान के साकार होने में भी उनकी भूमिका रही। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 में भी उन्होंने आगे बढ़कर भूमिका निभायी। 

पी एस कृष्णन के इन्हीं योगदानों को लेकर जाने-माने दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय ने फारवर्ड प्रेस पर प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा है – “90 का दशक भारतीय राजनीति में जहां उथल-पुथल का रहा है। इस दौर में समाज में हाशिये से थोड़ा-बहुत केंद्र में आए दलितों को धकेलने के प्रयास भी होने लगे थे। पर इसी दशक में बहुजन समाज के साथियों ने एकजुट होकर जातिवादियों से सीधे टकराने का मन भी बना लिया था। इसी दशक में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर जन्म शताब्दी समारोह समिति का भी गठन हुआ। इस समिति के गठन और उसकी रूपरेखा बनाने के पीछे जो शख्सियत थी, उस शख्सियत का नाम है- पी.एस. कृष्णन। जिनका समिति निर्माण और दलित सवालों को हल करने में प्रतिबद्ध साथियों को समिति सदस्य के रूप में लाने में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सच तो यह है कि खास वर्ग से होने के बावजूद वे आमजन से भी जुड़े थे। उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रयासरत रहे। संभवतः 1978 में वे गृह मंत्रालय में आईएएस के रूप में आए।”

स्मृति शेष पी. एस. कृष्णन (30 दिसंबर 1932 – 10 नवंबर 2019)

30 दिसंबर 1932 को केरल में एक उच्च जातीय परिवार में जन्मे पी एस कृष्णन बचपन से ही भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था नामक बीमारी को समझ गए थे। इस बारे में अपने अनुभवों को उन्होंने 1990 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु की कुलपति डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। जो एक किताब ‘अ क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस (पी एस कृष्णन : बेंडिंग गवर्नेंस टूवार्ड्स दी डिप्राइव्ड’ के रूप में सामने आयी, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस द्वारा इस किताब का हिंदी अनुवाद ‘भारतीय कार्यपालिका में सामाजिक न्याय का संघर्ष, अनकही कहानी : पी.एस. कृष्णन की जुबानी’ शीघ्र प्रकाश्य है। 


इस साक्षात्कार में अपने प्रारंभिक अनुभवों को साझा करते हुए पी. एस. कृष्णन ने कहा है कि “उन दिनों मैं अपने पिता के साथ प्रत्येक सुबह श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर जाया करता था। जब मुख्य मंदिर और सहायक मंदिरों की पूजा-अाराधना का दौर समाप्त हो जाता था, तो मंदिर के अहातों में गलियारों से होकर एक लंबा चक्कर लगाते थे। इस तरह का चक्कर लगाने के दौरान मैं अपने पिता से विभिन्न सामाजिक विषयों पर बातें करता था। यह बहुत ही उथल-पुथल का समय था, इस समय को हम स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और सामाजिक क्रांतिकारी आंदोलनों के समय के रूप में जानते हैं। इन सामाजिक-क्रांतिकारी आंदोलनों में समाजवादी और साम्यवादी आंदोलन भी शामिल हैं। इन आंदोलनों से जुड़े मुद्दों में मेरी रूचि थी। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में आंबेडकर के कथन के प्रकाशन के अगली सुबह मैंने अपने पिता से पूछा, “आंबेडकर कौन हैं और उन्होंने यह क्यों कहा कि प्रत्येक सात भारतीय में से एक भारतीय ‘अछूत’ है, और कैसे कोई भी ‘अछूत’ हो सकता है?

फारवर्ड प्रेस के दसवें वर्षगांठ के मौके पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते पी. एस. कृष्णन

मेरे पिता ने बताया कि छुआछूत भारतीय समाज में मौजूद है। मैं अपने पिता के प्रति कृतज्ञ हूं कि उन्होंने मुझे बिना लाग-लपेट के सच्चाई से अवगत कराया। उनसे यह सुनने के बाद कि जिन जातियों पर अमानवीय जीवन थोप दिया गया है, उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया जाता है। मैंने उनसे पूछा क्या यह अन्याय नहीं है? बिना किसी हिचकिचाहट के उन्होने कहा कि यह अन्याय है। यह संवाद और उस समय का वातावरण एवं परिवेश ही, वह जिस चीज है जिसके चलते मैने ‘छुआछूत’ के खिलाफ खड़ा होने का निर्णय लिया।”

डॉ. आंबेडकर के विचारों से प्रभावित होने के संबंध में उन्होंने डॉ. वासंती देवी को विस्तार से बताया है। उनके मुताबिक, “डॉ. आंबेडकर का कथन और इस संदर्भ में मेरे पिता के स्पष्टीकरण वह पहले प्रभाव थे, जो मुझे छुआछूत की मुखालफत की ओर ले गए थे और इन्हीं चीजों ने मुझे बाद में पूरी जाति व्यवस्था के खिलाफ खड़ा कर दिया। मैं खुशकिस्मत था कि बचपन में मेरे साथ खेलन-कूदने वाले और मेरे दोस्त विभिन्न समुदायों के लड़के थे। इसमें उन समुदायों के भी लड़के थे, जिन जातियों के साथ अछूतों का व्यवहार किया जाता था या उन जातियों में जिन जातियों ने इसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, लेकिन उनके साथ भी अछूतों जैसा ही व्पवहार किया जाता था। इन लड़कों में मुझे करूणाकरन और फर्नांडिज का नाम याद है, हालांकि 1941 के बाद मेरा उनसे मेरा कोई संपर्क नहीं है। आंबेडकर के कथन के संबंध में जब मैने अपने पिता से बात सुनी थी, तो मुझे अपने बचपन के मित्रों का ख्याल आया। कोई ऐसा तर्क नहीं हो सकता था, जिसके आधार पर उनके साथ अछूतों की तरह व्यवहार किया जाय या अन्य लोगों और उनके बीच कोई अन्तर हो। मुझे एक महिला की भी याद आती हैं, जिनके पैरों को लकवा मार गया था। उनकी झोपड़ी हमारे घर के पास थी। स्कूल से आने के बाद कभी-कभी शाम को मैं उनके घर जाता था और उनसे मलयालम कविताएं सुनता था। मैं उनकी जाति नहीं जानता हूं, लेकिन वे जरूर या तो दलित या गैर-दलित ‘निम्न जाति’ की रही होंगी। यह सभी स्मृतियां मेरे भीतर समाहित हो गई थीं, इन्होंने मेरे लिए यह असंभव बना दिया था कि मैं छुआछूत या समाज में जाति आधारित  भेदभावों को स्वीकार करूं।” 


एक अधिकारी के रूप में पी. एस. कृष्णन का अंतिम योगदान भले ही मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को संसद में पारित करवाने से लेकर उसे लागू करवाना रहा, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी वे हमेशा अपने मिशन में लगे रहे। भारत सरकार की नीतियों के निर्धारण में अपना योगदान देते रहे। यहां तक कि जब कभी सरकार कोई ऐसी नीति बनाती जिससे दलितों और वंचितों को नुकसान होने की संभावना होती या अहित होने की संभावना होती, पी. एस. कृष्णन आगे बढ़कर उसका न केवल विरोध करते बल्कि सरकार को सलाह भी देते। 

मसलन, इसी वर्ष जब भारत सरकार ने आर्थिक आधार पर गरीब लोगों को दस फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया, कृष्णन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि “यह यथार्थ है कि गैर ओबीसी, गैर एसी और गैर एसटी जातियों में भी गरीब हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। वैसे तो सबसे ज्यादा गरीब अनुसूचित जातियों में हैं, अनुसूचित जनजातियों में हैं और ओबीसी में भी गरीब हैं। जो सामान्य वर्ग है, उसमें भी गरीबी है। उन्हें मदद दी जानी चाहिए। अब सवाल उठता है उन्हें कैसी मदद दी जानी चाहिए। मेरे हिसाब से उनकी जैसी समस्या है, उन्हें वैसी ही मदद दी जानी चाहिए। इसे ऐसे समझिए कि यदि किसी रोगी को टीबी की बीमारी है तो उसे टीबी की दवा दी जानी चाहिए। यदि किसी को विटामिन की समस्या है तो विटामिन की दवा दी जानी चाहिए। जाहिर तौर पर सबके लिए एक दवा नहीं हो सकती है। अलग-अलग समस्याओं का हल अलग-अलग निकाला जाना चाहिए और जो हल हो वह संविधान के बुनियादी ढांचे के अनुरूप हों। उसके खिलाफ नहीं हो।”

फारवर्ड प्रेस से बातचीत करते पी. एस. कृष्णन

आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर अधिकार के संबंध में पी एस कृष्णन स्पष्ट राय रखते थे। वासंती देवी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा है “आदिवासियों के अधिकारों और देश के आर्थिक विकास में कोई विरोधाभास नहीं है और दोनों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। भूमि की ऊपरी सतह पर आदिवासियों के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को प्रभावित किए बगैर, भूमि के गर्भ से खनिज निकालने की प्रक्रिया का निर्धारण इस तरह से किया जाना चाहिए कि इसका अधिकतम लाभ इलाके में रहने वाले आदिवासियों को मिले। इसके लिए खनन परियोजनाओं के निर्माण और उनके संचालन के लिए आवश्यक कौशलों की पहचान कर युवा आदिवासियों को इनमें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, खनन कंपनियों के आर्थिक सहयोग से इलाके में उच्च गुणवत्ता वाले आवासीय विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों इत्यादि की स्थापना भी की जानी चाहिए। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। आदिवासियों के प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल मजदूर के रूप में उन्हें रोजगार देना नहीं होना चाहिए। उन्हें तकनीकी, पर्यवेक्षी और प्रबंधकीय कार्य करने के लिए भी शिक्षित व प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। अगर आदिवासी क्षेत्रों में इस तरह की परियोजनाओं के लिए आवश्यक समस्त मानव संसाधन उसी इलाके से जुटा लिए जाएंगे और इसके लिए बाहर से कर्मियों को नहीं लाना पड़ेगा तो इससे आदिवासियों के शोषण और इससे जनित तनाव और टकराव को रोकने में मदद मिलेगी।”

बहरहाल, पी. एस. कृष्णन के निधन से भारतीय शासन-प्रशासन में दलित-बहुजनों के पक्ष में उठने वाली एक आवाज खामोश हो गयी है। परंतु, उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह से जातिगत सीमाओं को पार कर कृष्णन ने अपने जीवन में जिन मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष किया और उन्हें अंजाम तक पहुंचाया, वे उन लोगों के पथ प्रदर्शक बने रहेंगे, जो जातिगत और तमाम भेदभावों से रहित एक आदर्श समाज में विश्वास रखते हैं।

 

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/अनिल)


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