राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में ओबीसी आरक्षण का नहीं हो रहा अनुपालन, 23 एनएलयू को नोटिस

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने देश के सभी 23 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों को नोटिस भेजा है। इसकी वजह यह कि इन विश्वविद्यालयों में ओबीसी आरक्षण को लागू नहीं किया जा रहा है। फारवर्ड प्रेस की खबर

राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों यानि एनएलयू में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने देश के सभी 23 एनएलयू को आरक्षण नीति लागू करने के लिए नोटिस जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि इन तमाम संस्थानों के उप-कुलपति आयोग में ख़ुद हाज़िर होकर बताएं कि वो आरक्षण नीति का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं। 

बताते चलें कि विधि विश्वविद्यालयों में दाख़िला राष्ट्रीय स्तर की क्लैट परीक्षा के माध्यम से होता है। इनमें से 18 में आरक्षण के राज्य कोटा की व्यवस्था लागू है। इसके आधार पर जिस राज्य में सबंधित विश्वविद्यालय है वहां के छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। परंतु विधि की शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट संस्थान माने जाने वाले इन संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण का स्पष्ट उल्लेख ही नहीं है। 

उदाहरण के लिए इस वर्ष होने वाले नामांकनों को ही देखें। इस बार देश भर के 23 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में विभिन्न कोर्सों के तहत 2175 सीटों पर नामांकन होने हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों में सामान्य वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। परंतु ओबीसी का नामोनिशान तक नहीं है। एक उदाहरण नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बैंगलोर का है। यहां इस वर्ष बीए एलएलबी कोर्स के तहत 80 सीटें हैं। इनमें 55 सीटें सामान्य वर्ग के लिए है। अनुसूचित जाति के लिए 12 और अनुसूचित जनजाति के लिए 6, अप्रवासी छात्रों के लिए 5 और 2 सीटें विकलांगों के लिए आरक्षित है।

नालसार, हैदराबाद

ओबीसी के साथ हकमारी नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ हैदराबाद में भी की जा रही है। यहां बीए एलएलबी कोर्स में कुल 105 सीटें हैं। इनमें अखिल भारतीय स्तर पर कोटे के तहत 84 सीटें और तेलंगाना के राज्य कोटे के तहत 21 सीटें तय हैं। अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य वर्ग के लिए 65 सीटें व राज्य स्तर पर 16 सीटें आरक्षित हैं। इस प्रकार 105 में से 81 सीटें केवल सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है। शेष 8 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 16 प्रतिशत अनुसूचित  के लिए सीटें आरक्षित हैं। एक दूसरा उदाहरण भोपाल का नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी का है। ऑल इंडिया कोटा के तहत 75 सीटें तथा मध्य प्रदेश के स्टेट कोटे के तहत 25 सीटें हैं। इनमें ओबीसी के लिए क्रमश शून्य व 7 सीटें हैं।

इन संस्थानों में ओबीसी की हकमारी के खिलाफ नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ हैदराबाद के छात्र ने अदालत में याचिका दाख़िल कर पिछड़ों के लिए आरक्षण की क़ानूनी व्यवस्था कराने की मांग की है। इसकी वजह यही कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में आरक्षण को लेकर काफी अरसे से विवाद रहा है। इनमें कुछ संस्थान आरक्षण लागू करते समय राज्य सरकार की नीति का पालन कर रहे हैं जबकि कुछ जगह पिछड़ों को आरक्षण दिया ही नहीं जा रहा। 

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राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने देश में क़ानूनी शिक्षा से जुड़े इन प्रीमियर संस्थानों से आरक्षण रोस्टर, पिछड़ों की भर्ती के बैकलॉग की जानकारी के अलावा ये भी बताने को कहा है कि आरक्षण लागू करते समय क्या नीति अपनाई गई है। पिछड़ा वर्ग आयोग का कहना है कि ये संस्थान आरक्षण देने के मामले में पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं। इस संबंध में आयोग 20 जनवरी को दिल्ली में सुनवाई करेगा।

जून 2019 में भी पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस मामले में नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ हैदराबाद के वाइस चांसलर प्रोफेसर फैज़ान मुस्तफा को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था। इस मामले में फैज़ान मुस्तफा का कहना है कि नालसार में आरक्षण की व्यवस्था नालसार एक्ट के तहत की गई है और इसमें पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का कोई ज़िक्र नहीं है। कुछ एनएलयू में पिछड़ों के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है जबकि कुछ सिर्फ डॉमिसाइल कोटा की व्यवस्था करते हैं।

भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय यानि एनएलयू स्वायत्तशासी संस्थान हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इन विश्वविद्यालयों के कुलपति हैं। सरकार द्वार स्थापित इन संस्थाओं का संचालन बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अलावा केंद्रीय विधि मंत्रालय के ज़िम्मे है। क़ानून की पढ़ाई और शोध से जुड़े इन संस्थानों को विधि का आईआईटी भी कहा जाता है।

(संपादन : नवल)

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