सरकारी कंपनियां बेचने को सरकार तैयार, आरक्षण को लेकर उठ रहे सवाल

मामला सार्वजनिक लोक उपक्रमों के निजीकरण का है। क्या निजीकरण के बाद इन उपक्रमों में आरक्षण लागू होगा? एक सवाल यह भी कि इन उपक्रमों में काम करने वाले आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलेगा? इन सवालों को लेकर पीएमओ की असंवेदनशीलता सामने आयी है। नवल किशोर कुमार की खबर

केंद्र सरकार देश के 33 सार्वजनिक लोकउपक्रमों को बेचने को तैयार है। इसकी औपचारिक घोषणा बीते 10 दिसंबर 2019 को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब देने के दौरान की थी। इस तरह देश के सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर जनता के प्रति एक कल्याणकारी राज्य के संवैधानिक जिम्मेदारी से सरकार अपना हाथ छुड़ाती नज़र आ रही है। यदि दलित, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के दायरे से देखा जाए तो इसमें दो बुनियादी सवाल हैं। पहला तो यह कि निजीकरण होने के बाद क्या इन उपक्रमों में आरक्षण लागू होगा और दूसरा यह कि इन उपक्रमों में आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को क्या आरक्षण का लाभ मिल सकेगा?

दरअसल, सरकार के इस फैसले का असर अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों पर पड़ेगा। इसे लेकर देश भर के कई संगठनों ने सवाल खड़ा किया है। 

एक खास जानकारी यह कि बीते 1 जनवरी 2020 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुद को इन उठते सवालों से जोड़ा है। उसने दिपम (डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक असेट्स मैनेजमेंट) को पत्र भेजकर कहा कि वह पूरे मामले की जांच करे कि यदि निजीकरण हुआ तो आरक्षण कैसे लागू होगा। भेजे गए पत्र में यह भी कहा गया कि यदि निजीकरण हुआ तो इन उपक्रमों में काम करने वाले आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को मिलने वाले आरक्षण का क्या होगा।

पीएमओ, दिल्ली में एक बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

अब एक सवाल यह भी कि क्या पीएमओ इसके पहले संवेदनशील क्यों नहीं था कि निजीकरण से आरक्षित वर्गों के हितों पर कुठाराघात होगा? क्या प्रधानमंत्री मोदी इन बातों से वाकई अनभिज्ञ हैं? जब पूर्व के युपीए सरकार के दौरान निजीकरण के सवाल उठे थे, तब भाजपा ने मनमोहन सिंह सरकार के उस नीति का कड़ा विरोध किया था। तो फिर सरकार में आने के बाद स्वयं भाजपा के प्रधानमंत्री इतने महत्वपूर्ण विषय को कैसे भूल गए?

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दरअसल, पीएमओ को अपनी संवेदनशीलता का अहसास भी तब हुआ जब देश भर के कई संगठनों द्वारा इस पर आवाज उठाये जाने लगे। कुछेक ने पीएम को पत्र भी लिखा। पत्र भेजने वालों में से एक राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्नेहलता सांखला हैं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि अब तक वह पीएमओ, नीति आयोग व दिपम को पांच बार पत्र लिख चुकी हैं कि कैसे सरकार सार्वजनिक लोकउपक्रमों में आरक्षण को लेकर उदासीन है। उनके मुताबिक यह तो साफ है कि यदि सार्वजनिक लोक उपक्रमों का निजीकरण हुआ तो आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं होगी। इसकी वजह यह कि निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर सरकार द्वारा कोई नीति नहीं बनाई गई है। 

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यह स्थिति समाज के हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए बेहद चिंताजनक है। सार्वजनिक लोकउपक्रमों के निजीकरण के बाद आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसका एक उदाहरण भारी उद्योग व लोक उपक्रम मंत्रालय ने पहले ही दे दिया है। दरअसल, मंत्रालय द्वारा 25 अक्टूबर 2017 को जारी कार्यालय ज्ञापन (डीपीई-जीएम/0020/2014-जीएम-एफटीएस-1740) के जरिए इसका प्रावधान किया गया था कि पदों की समतुल्यता के आधार पर सार्वजनिक लोकउपक्रमों में काम करने वाले आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। लेकिन बाद में जब निजीकरण की प्रक्रिया को केंद्र सरकार ने हरी झंडी दे दी तब मंत्रालय ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। 16 दिसंबर, 2019 को जारी कार्यालय ज्ञापन में यह कहा गया कि 25 अक्टूबर 2017 को जारी कार्यालय ज्ञापन केवल सार्वजनिक लोक उपक्रमों के लिए ही लागू होगा। उन उपक्रमों पर नहीं, जिनका निजीकरण हो गया है। 

(संपादन : गोल्डी एम. जार्ज)

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