आदिवासी कॉलम नहीं, तो जनगणना नहीं, जंतर-मंतर से गूंजी आदिवासियों की ललकार

देशभर से आए आदिवासी समुदाय के लोगों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्र सरकार को ललकारा। उनकी मांग यह है कि उनके लिए जनगणना में पृथक धर्म का कॉलम हो। फारवर्ड प्रेस की खबर

दिल्ली के जंतर मंतर में 18 फरवरी 2020 को आदिवासी समुदायों द्वारा एकदिवसीय धरना प्रदर्शन का आयोजन किया गया। देश भर से सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग एकजुट हुए और “आदिवासी कॉलम नहीं, तो जनगणना नहीं” का नारा बुलंद किया। इस प्रदर्शन में झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, मेघालय, दिल्ली, अंडमान निकोबार द्वीप और दादर नगर हवेली के आदिवासी समुदायों के लोग शामिल हुए। प्रदर्शन का आह्वान “राष्ट्रीय आदिवासी इंडीजीनस धर्म समन्वय समिति भारत” ने किया था।

ज्ञात हो कि 6 फरवरी, 2020 को भोपाल में आयोजित एक बैठक में मोहन भागवत ने कहा था कि 2021 की जनगणना में आदिवासी अपना धर्म हिंदू लिखवाएं। और इस मुहिम में आरएसएस के जुटने के भी उन्होंने संकेत दिए थे। इसके खिलाफ़ आदिवासी समुदायों  ने तीव्र प्रतिक्रियाएं दी थी।

आदिवासियों की मांग है कि जनगणना प्रपत्र में उनके लिए एक पृथक “आदिवासी/इंडिजीनियस धर्म” का कॉलम हो। इसकी वजह यह है कि आदिवासी लोग स्वयं को हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई या पारसी धर्मों में विलय नहीं चाहते। उनका कहना है कि उन्हें लंबे समय से हिंदू धर्म का हिस्सा बताया जाता रहा है, जो गलत है। जबकि अंग्रेजों के समय आदिवासियों के लिए अलग से आदिवासी धार्मिक कोड था। 

जंतर-मंतर पर जुटे आदिवासी

विरोध प्रदर्शन एवं राष्ट्रीय आदिवासी इंडीडिनस धर्म समन्वय समिति के संयोजक अरविंद उरांव ने कहा कि 1980 के दशक से आदिवासी अपने लिए अलग धर्म की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने अब तक उनकी नहीं सुनी। हमारी भारत सरकार से मांग है कि इस जनगणना के लिए भारत के संपूर्ण आदिवासियों के लिए जनगणना प्रपत्र में अलग कोड और कॉलम प्रदान करे। अगर प्रपत्र में ये कोड और कॉलम नहीं लगा तो हम जनगणना का बहिष्कार करेंगे। 

वहीं पुरुषोत्तम मीणा ने कहा कि आजादी के बाद हमें ज़बरदस्ती हिंदू धर्म के अंदर शामिल कर लिया गया। जबकि इससे पहले हमारा अलग आदिवासी धर्म का कॉलम होता था। उसे मनमाने तरीके से समाप्त कर दिया गया। उन्होंने कहा कि, आजादी से पहले हमारी जनगणना जिस कोड और कॉलम के तहत होती थी उसे बहाल किया जाए। संविधान का अनुच्छेद 13 (3A) कहता है कि हमारी परंपराएं, कायदे कानून और प्रथाएं अलग होंगी और जितने भी हिंदू कानून हैं उनके धारा 2 में साफ तौर पर लिखा है कि आदिवासी पर हिंदू कानून लागू नहीं होगा। जब कानून लागू नहीं होगा तो हिंदू कॉलम में हमारी गणना क्यों की जा रही है? सत्ता में आज जो सरकार है इसने हमें हिंदू धर्म में शामिल करने की साजिश के तहत सरकारी नौकरियों के फॉर्म से “अदर्स” यानी अन्य का कॉलम खत्म कर दिया गया, जिससे विवश होकर हम आदिवासियों के बच्चों को अपने धार्मिक पहचान के तौर पर “हिंदू” धर्म पर क्लिक करना पड़ता है। हम कहते हैं कि व्यवस्थाएं हमारे हिसाब से होनी चाहिए। जब देश का संविधान ही कहता है कि आदिवासियों के रिवाज ही सब कुछ होंगे तो सरकार ज़बरदस्ती अपने कानून हमारे ऊपर क्यों थोप रही है। पांचवीं एवं छठी अनुसूची क्षेत्रों में भी यह संवैधानिक व्यवस्था है कि आदिवासियों के मामले में भारत सरकार का हस्तक्षेप नहीं होगा, लेकिन भारत सरकार इसी संविधान और उसके अनुच्छेदों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर रही है। इसलिए हमारी आजादी के पहले वाली स्थिति को बहाल किया जाए।

पारंपरिक वेशभूषा में भी शरीक हुए आदिवासी

सोहन भील के अनुसार 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि आदिवासी लोग रूढ़िवादी हैं। यदि हमारे लिए जनगणना प्रपत्र में धर्म का कॉलम नहीं जोड़ा गया तो हमारे 83 आदिवासी समुदाय के लोग मिलकर जनगणना का बहिष्कार करेंगे। 

मनोज ने कहा कि आज देश की जनसंख्या करोड़ से अरब में पहुंच गई और हमारी जनसंख्या लाखों में आ गई। इसका क्या कारण है? क्यों ये लोग हमें मिटाना चाहते हैं? क्यों हमें सुख सुविधाओं से वंचित करना चाहते हैं?

हाल ही में  मोहन भागवत ने बोला कि आदिवासियों को हिंदू की श्रेणी में लाना है क्योंकि हिंदुओं की संख्या कम हो रही है। जब हम खुद को हिंदू नहीं मानते हैं, तो हम उस श्रेणी में क्यों रखा जाए? 

प्रदर्शनकारियों के अनुसार वे अपनी अलग धार्मिक श्रेणी मांगने के लिए यहाँ आए हैं। “हमें अलग धर्मकोड का कॉलम मिले। हमें यह कतई बर्दाश्त नहीं है कि कोई दूसरा व्यक्ति आकर हमें बताए कि तुम ये नहीं ये हो। ये सब चीजें आपको समझाने की ज़रूरत है,” अधिकाँश प्रदर्शनकारियों ने इस बात को दोहराया। 

दिल्ली यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर नीतिशा खलखो ने कहा कि जनगणना प्रपत्र में आदिवासी धर्म का कॉलम देना होगा, वर्ना 2020 की जनगणना का पूरा आदिवासी समुदाय विरोध करेगा। हम अपनी अलग धार्मिक पहचान के लिए आवाज़ उठाने यहां एकजुट हुए हैं।

आदिवासी सरना महासभा के बिरसा ओरांव ने कहा कि आदिवासी समुदाय के लोग हिंदू नहीं है। उन पर हिंदू विवाह अधिनियम 1955 लागू नहीं होता हैं। आदिवासियों की अपनी अलग संस्कृति, परंपरा, पहचान, वेशभूषा, रीति-रिवाज, भाषा, रूढ़ियां, इतिहास, इत्यादि है। मातृसत्तात्मक-पितृसत्तात्मक समान व्यवस्था हैं, इसलिए हम यहां इस मांग के साथ आए हैं कि आगामी जनगणना में हम आदिवासियों की अलग पहचान के लिए जनगणना प्रपत्र में अलग कोड और कॉलम दिया जाए।

कवियित्री हीरा मीणा ने कहा कि हम प्रकृति पूजक लोग हैं। किसी भी दृष्टि से आदिवासी हिंदुओं, या किसी भी धर्म का अनुसरण नहीं करता हैं। फिर चाहे सरना हो या गोंडी हमें आदिवासी कॉलम के तहत अलग पहचान दी जाए। 

प्रदर्शन को तरुण नेताम, आदिवासी केंद्रीय परिषद की महिला शाखा की निरंजना हेरेंज टोप्पो, झारखंड आदिवासी गोंड महासभा के शशि प्रधान, आदिवासी छात्र मोर्चा के अजय टोप्पो, एजेंला टुड्डू, कैली तिर्की, गीता लकड़ा आदि ने भी संबोधित किया। इसके बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्री व रजिस्ट्रार जनरल और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष के नाम ज्ञापन भी सौंपा गया। 

(संपादन : नवल/गोल्डी)

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