रेणु का राष्ट्र और रेणु का समाज

सुरेंद्र नारायण यादव बता रहे हैं कि भारत की प्रगति के सूत्र और प्रगति के मार्ग की बाधाएं दोनों एक साथ और समान स्पष्टता के साथ रेणु को दिखायी पड़ते हैं। रेणु की दृष्टि न तो मोतियाग्रस्त है, न ही कलर ब्लाइंडनेस की शिकार और न तो उनकी निष्ठा राष्ट्र की प्रगति से तनिक भी विपथित हैं

[हिंदी साहित्य में दलित-बहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को प्रभु वर्गों/द्विजों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। इसके बावजूद रेणु ने बिना किसी की परवाह किए कई विषयों को व्यापक विस्तार दिया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। इस संदर्भ में पढ़ें प्रोफेसर सुरेंद्र नारायण यादव का लेख]

फणीश्वरनाथ रेणु (4 मार्च, 1921 – 11 अप्रैल, 1977)

फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में राष्ट्र और समाज का तानाबाना काल्पनिक नहीं है। रेणु की यही खासियत भी रही। जो जैसा दिखा, वह उसी रूप में प्रकट हुआ। मसलन, इस देश के निम्नवर्ग की माली हालत का आलम यह है कि सात माह के बच्चे को बथुआ साग पर निर्भर रहना पड़ता है (रेणु, 1954: 151)। निमोनिया का मरीज गीली धरती के कच्चे फर्श पर सोता है और जहां कड़वा (सरसों) तेल भी स्वर्गोपम भोग में गिना जाता है। देश की बहुत तरक्की हुई पर उस तरक्की को विफल करने के प्रयास भी भीतर-भीतर साथ-साथ चले।

मेरीगंज में मलेरिया सेंटर खुला तो बांकीपुर जैसे शहर में मातृमंगल केंद्र, बाल कल्याण केंद्र, वर्किंग वीमेंस हाॅस्टल जैसी संस्थाएं भी खुलीं। रमला बनर्जी जैसी सहृदय कल्याण का मिनी महिला के अथक प्रयास से ये संस्थाएं खुलीं। इस निर्धन देश की महिलाओं और बच्चों के कल्याणार्थ विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दवाएं, दुग्धचूर्ण आदि सामान भेजे। पर वीमेंस वेलफेयर बोर्ड की ऑनरेरी सेक्रेटरी श्रीमती ज्योत्सना आनंद ने लाभार्थियों के बीच उनका वितरण न कर कालाबाजारी में बेच दिया। आगे कहता है – “जो व्यापार वह छिटपुट तौर पर कर रही थी, उसी को अब बड़े पैमाने पर पार्टनर रखकर कंपनी बनाकर करना होगा” (रेणु, 1972: 44)

सरकार के आला अधिकारी डी. साहब, पी. साहब आदि का वरदहस्त इस कंपनी को प्राप्त है और तब ग्रामीण क्षेत्रों से प्रशिक्षण के लिए आयी हुई लड़कियों के साथ बलात्कार की घटना होती है। “मैला आँचल” की डाॅ. ममता ने डाॅ. प्रशांत को पत्र लिखकर सूचना दी है कि पटना में एक ऐसी दुनिया आबाद हो रही है जहां चांद नहीं चमकता, सूरज नहीं निकलता, जहां माता-पुत्र और पिता-पुत्री जैसे संबंधों का कोई मतलब नहीं है (रेणु, 1954: 160)। एक खुली प्रकट दुनिया के समांतर एक अंधेरी दुनिया विकसित हो रही है। यह क्योंकर संभव हुआ – रेणु इसकी तह में जाते हैं और पड़ताल करते हैं। उन्हें एक चीज साफ नज़र आती है। वह यह कि किसी भी पद पर नियुक्ति के मापदंड जो होने चाहिए, वे नहीं हैं। इस देश में प्रतिभा का मतलब परीक्षाओं में अधिक अंक मान लिया गया। किसी भी पद के लिए शैक्षिक अंकों को एकमात्र वरीयता दी गयी। उनकी निष्ठा की कहीं पड़ताल नहीं की गयी। सरकार राष्ट्रीय हित में पदों का सृजन करती है और चाहती है कि लोग उन पदों पर बैठकर राष्ट्र की सेवा करें। पर निष्ठा को दरकिनार करने का ही परिणाम है बेला गुप्त जैसी समर्पित निष्ठावान समाज-सेविका बोर्ड की सेक्रेटरी नहीं बनायी जाती है। बनायी जाती है श्रीमती ज्योत्सना आनंद। वह अपने रसूख, ऊंचे संपर्क और देहदान की उदारता के कारण वह पद पा लेती है। 

एक तरफ राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्रसेवा के प्रति रमला बनर्जी और बेला गुप्ता की निष्ठा और दूसरी तरफ श्रीमती ज्योत्सना का संपूर्ण उपक्रम को विफल करने का कुत्सित प्रयास। तुर्रा यह कि प्रतियोगिता परीक्षाओं में अधिक अंक लाकर डी. साहब, पी. साहब सरकारी पदाधिकारी हुए हैं, जिन्हें राष्ट्र के खजाने से वेतन दिया जा रहा है। वही पदाधिकारी राष्ट्र आयोजन के प्रयास में पलीता लगा रहा है और उद्देश्यों को प्राप्त करने की जगह उसे विफल करने में जुटा है। ऐसे लोगों की नज़र में “सत्यमेव जयते” केवल लिखकर टांगने वाला वाक्य भर है (रेणु, 1972: 170)। सत्य की उनके अनुसार कहीं विजय नहीं होती। “जहां सभी बालू की दीवार बना रहे हैं, वहां ईंट-सीमेंट का घर कोई पागल ही बना देगा” (रेणु, 1972: 44)

गबन करनेवाली श्रीमती आनंद साफ बच निकलती है और षड़यंत्र पूर्वक निष्ठावती बेला गुप्त को हवालात में जगह दी जाती है। यह केवल रेणु का औपन्यासिक सच नहीं है, भारत देश का ऐतिहासिक यथार्थ है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का बयान कि केंद्र से एक रुपया चलता है तो संबंधित व्यक्ति तक सिर्फ 18 पैसे ही पहुंचते हैं। 82 पैसे कहां चले जाते हैं? यह केवल नौकरशाही की बात नहीं है।

नेपाली लड़कियों की सप्लाई करनेवाला दुलारचंद्र कापरा कटहा थाना कांग्रेस का सेक्रेटरी हो गया है (रेणु, 1954: 134)। छोटन बाबू एम. एल. ए. हो गए हैं (रेणु, 1966: 118), छोआ की कालाबाजारी करनेवाले मिस्टर मंगरू मिनिस्टर हो गए हैं। वे अहिंसा की लाउंड्री में अपने कपड़े धुलवाते हैं। ये सभी रेणु साहित्य के पात्र हैं और उनकी निर्मिति के पीछे यथार्थ का आधार नहीं ही है, ऐसा कौन कह सकता है? जिनके पास पैसे हैं, वे चंदा दे-देकर राजनीतिक दलों में ऊंची हैसियत बना लेते हैं। निष्ठा का झंडा ढोनेवाला गनपत गनपत ही रह जाता है (रेणु, 1967: 164)। 

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राजनीति सेवा की नहीं, शक्ति-संचय और काले कारनामों से सुरक्षा की ढाल बन गयी है। अंकों के पहाड़ के नीचे निष्ठा दबा दी गयी है। निष्ठा हाशिये पर ढकेली जा चुकी है और अंक प्रतिशत प्रतिभा का एक मात्र पैमाना बन चुका है। रेणु की रचनाओं में कई सारे पात्र हैं जिनकी शिक्षा-दीक्षा का स्तर बहुत ऊंचा नहीं है। मसलन बालदेव, कालीचरण, मंगला देवी, रमला बनजम, बेला गुप्त आदि। पर उनकी निष्ठा बड़ी है। 

भारत आज के दिन भी निष्ठा बनाम प्रतिभा का संघर्ष झेल रहा है। जिस देश और समाज में निष्ठा का मूल्य कम हो और अंक प्रतिशत का ज़्यादा, उस राष्ट्र की तरक्की भारत जैसी गति से ही हो सकेगी। ज़माना (भारतेतर विश्व) ज्येष्ठ जहाज पर और बंदा (भारत) बैलगाड़ी पर। “येन केन प्रकारेण आत्मोन्नति का कामी” राष्ट्रकामी नहीं हो सकता। राष्ट्र-सेवा वही कर सकता है जो अपनी उन्नति को पीछे रखेगा, जैसा डाॅ. प्रशांत ने किया है। विदेश जाने के सुनहरे अवसर को लात मारकर ग्रामवासिनी भारतमाता की सेवा करने का संकल्प ले लिया। उसकी प्रतिज्ञा है – “एक भी चेहरे पर मुस्कान ला सका तो अपनी साधना को सफल मानूंगा।” पर आत्मोन्नति को तरजीह देनेवाले डाॅ. तरफदार की टिप्पणी है – “भावुकता का दौरा भी एक खतरनाक रोग है” (रेणु, 1954: 53)। निष्ठावानों की भावना की कद्र करने की जगह उसे रूग्ण मानसिकता का शिकार बताना राष्ट्र-निर्माण के जज्बे को निरूत्साहित करना है। इसे राष्ट्रीय समस्या माना जाना चाहिए।

रेणु एक अद्भुत विलक्षण कलाकार हैं। उतने ही जितने कि वे एक गंभीर समाजशास्त्री भी हैं। राष्ट्र और राष्ट्रसेवक पदाधिकारी एवं नेता (सभी रूपों को मिलाकर) के बीच अगर पति-पत्नी का रूपक कल्पित किया जाय तो हम देखते हैं कि श्रीमती आनंद अपने हित को पतिहित से अलग कर देखती है। किसी पत्नी का अपने हित को पतिहित से अलग कर देखना मर्म को हिला डालनेवाली घटना है (रेणु, 1972: 46)

श्रीमती आनंद की मानसिकता वाले नौकरशाह और नेता राष्ट्रहित से अलग अपने व्यक्तिहित की समानांतर दुनिया विकसित कर लेते हैं। जो नेता पदाधिकारी, कार्यकर्ता आत्मोन्नति के द्वीप नहीं सिरजता, जैसे गनपत, डाॅ. प्रशांत आदि उन्हें रूग्ण मानसिकता का शिकार मान लिया जाता है। डाॅ. ममता आश्चर्य से भौंचक रह जाती है, और अकेले दम पर अंधेरी दुनिया से जूझती रहती है। कालीचरण और बेला गुप्त को जेल की हवा खानी पड़ती है, गनपत झंडा ढोते हुए ही जीवन के ढलान पर पहुंच जाता है। 

सामंती मानसिकता से निबद्ध नेता जैसे राजा कामरूप नारायण सिंह, कुबेर सिंह, छोटन बाबू आदि सुनहरे नारे देकर और लोक-लुभावन वायदे कर सत्ता के केंद्र में स्थापित होना चाहते हैं। राजा कामरूप नारायण सिंह का नारा है – “रेंट फ्री लैंड, बगैर किसी खजाना के ज़मीन।” वे जितेंद्र से कहते हैं – दे सकी है आज तक कोई पार्टी ऐसा क्रांतिकारी नारा? (रेणु, 1957: 301)। पर राजा कामरूप के चाल-चरित्र, जिस वैचारिक परिवेश में वे जन्मे और पले-बढ़े हैं, उससे उनके अपने नारे के प्रति साफ-साफ अगंभीरता झलकती है। नारे सुनहरे हों और उनके प्रति गंभीरता भी हो तो क्या कहने? पर नारे देनेवाले किसी से भी ज़्यादा बेहतर समझते हैं कि नारे सिर्फ नारे लगाने के लिए हैं। लोगों को गुमराह कर अपने लिए समर्थन जुटाने से अधिक उनकी कोई अहमियत नहीं है। जिन देशों और समाजों के नारेवालों ने नारों के प्रति वास्तविक निष्ठा और गंभीरता दिखायी, वह देश-समाज ज्येष्ठ जहाज की गति से तरक्की कर गया। नकली निष्ठा और अगंभीरता से बरते हुए नारों का यह देश बैलगाड़ी की गति से रेंगकर आगे बढ़ पा रहा है। एक वर्ष बाद सन 1948 में आज़ाद हुए चीन की भारत की प्रगति से तुलना करने पर यह स्पष्ट तौर पर लक्षित किया जा सकता है।

फणीश्वरनाथ रेणु

व्यक्ति की योग्यता और निष्ठा के महत्व को जिन समाजों में सर्वोपरि महत्ता प्राप्त है, उन समाजों से भारतीय समाज भिन्न प्रकार का है। यही कारण है कि फुटंगी झा महतो से पूछता है, “कितने में लालटेन खरीद हुआ महतो?” (रेणु, 1969: 71)। वर्ग और जाति को योग्यता और प्रतिभा का प्रमाण मानने के चलन से परिचालित मानसिकता से सवंमित फुटंगी झा महतो के पंचलैट का अवमूल्यन कर रहा है। रेणु आज होते तो फुटंगी झा से अवश्य पूछते – “पंचलैट आपको लालटेन दिखायी पड़ता है, इसे आपकी प्रतिभा के स्तर का प्रमाण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?”

आंखें मोतिया से आक्रांत तो नहीं हो गयी हैं; रूग्णताग्रस्त दृष्टि और हेय, तुच्छ साबित करने की अस्वस्थ मानसिकता किसी भी वस्तुस्थिति के ऊपर फतवे जारी करने का अधिकार नहीं रखती और वैसी कोई टिप्पणी विश्वास के लायक नहीं मानी जा सकती। पर मनुष्य मनुष्य है। न तो वह हमेशा मिट्टी का माधो रहता है और न पत्थर की प्रतिक्रियाशून्य मूर्ति। महतो अंदर तक आहत हो जाता है। कहां तो भले आदमी को प्रशंसा करनी चाहिए थी, कल तक जिसके पास पंचलाइट नहीं था, आज उसने वह अर्जित कर लिया है। कहां तो वह पंचलाइट को लालटेन के स्तर तक अवमूल्यन कर रहा है। प्रशंसा न भी करते, पर सच को स्वीकार ही कर लेते कि हां वह पंचलाइट ही है, लालटेन नहीं है तो क्या बिगड़ जाता? पर फुटंगी यह कैसे गवारा कर ले कि उसके पास पंचलाइट न हो और महतो के पास वह हो जाय? पंचलाइट से वंचित करना तो उसके वश की बात नहीं रही, पर अवमूल्यन तो वह करा ही सकता है। शब्दों की बाज़ीगरी और फतवे जारी करने का परंपरा से प्राप्त अधिकार उसके पास है ही है। 

पिछड़ों और दलितों के पास भी प्रतिभा और निष्ठा है। इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा। यह सरकारों का विशेषकर समाजवादी, साम्यवादी और सामाजिक न्याय की संविदा के सहारे सत्ता में आयी सरकारों का विशेष दायित्व है। पर 21 वीं सदी के भारत में भी शासन-प्रशासन में उनकी पर्याप्त संख्या का न होना प्रमाणित करता है कि ऐसी सरकारें भी इस मामले में बहुत सफल नहीं रही है। जिन समीक्षकों और विद्वानों ने रेणु को आंचलिक कहकर उछाला है, उन्हें भी आंचलिकता से इतर रेणु का कोई महत्व नहीं दिखता। रेणु वैज्ञानिक समाजवादी हैं, शिल्प उनका अवश्य कलाकारोचित है। भारत की प्रगति के सूत्र और प्रगति के मार्ग की बाधाएं दोनों एक साथ और समान स्पष्टता के साथ रेणु को दिखायी पड़ते हैं। रेणु की दृष्टि न तो मोतियाग्रस्त है, न ही कलर ब्लाइंडनेस की शिकार और न तो उनकी निष्ठा राष्ट्र की प्रगति से तनिक भी विपथित ही।

राष्ट्रभक्ति के मामले में विरल किस्म के रचनाकार हैं रेणु। भारतीय समाज की प्रगति में मुख्य बाधा श्रेय पर एक मात्र अपना ही अधिकार मानने की सामंतवादी मानसिकता है। जगह-ज़मीन और धन-संपत्ति वाला सामंतवाद ही सामंतवाद नहीं है। उसके अनेक रूप-रंग हैं और ज़माने के बदलते स्वरूप के समानांतर यह भी अपने रूप-रंग को बदलता रहता है। किसी अधिकारी के वास्तविक मूल्य को मान्यता न देना भी सामंतवाद के निकट की सगोत्रीय मानसिकता है।

अब जब महतो के पास पंचलाइट है तो फुटंगी झा से मान्यता के लिए गिड़गिड़ाया नहीं बल्कि उसके भीतर जो विचार पहले से पक रहा था, उसकी और पुष्टि हो रही है। वह फुटंगी झा के दृष्टिदोष को उजागर करके रहेगा – “देखते नहीं हैं, पंचलैट है।” “ये बामन टोली के लोग ऐसे ही ताब करते हैं। अपने घर की ढिबरी को भी बिजली बत्ती कहेंगे और दूसरों के पंचलैट को लालटेन” (रेणु, 1969: 71)। राष्ट्र की प्रगति के लिए जिसके पास प्रतिभा और निष्ठा है, वही अलम है, जाति और वंश नहीं। पर यहां तो प्रतिभा को मान्यता नहीं दी जा रही है, क्योंकि वह महतो के पास है और दावेदार वे हो रहे हैं जिनके पास ढिबरी ही है। वह आज भी महतो को मान्यता देने को तैयार नहीं हैं। सरकारें भी विफल हैं।

कुल मिलाकर हम यह देखते हैं कि रेणु के पास राष्ट्र-निर्माण और उसकी प्रगति के लिए एक व्यापक साथ ही सर्वांगीण विचार और कार्य योजना है। इससे जुड़े सभी पक्षों यथा – पक्ष और विपक्ष, विधायी और विरोधी – सभी अपेक्षित और संबद्ध कार्यकलापों को अपने संज्ञान में लेते हैं और राष्ट्र-निर्माण संबंधी अपनी विचारणा को समग्रता प्रदान करते हैं। जो लोग रेणु को आंचलिक रचनाकार से अधिक नहीं मान पाए, मानना पड़ेगा कि वे उतने ही अहमक हैं जितना कि “तीसरी कसम” का हीरामन है। ऐसे ही लोग “तीसरी कसम” कहानी को एक रोमांटिक प्रेम कहानी भर मानते हैं। वे लोग रेणु के लेखकीय महत्व के मामले में बहुत सुजान और सयाने नहीं हैं और अगर वे रेणु के महत्व को अंदर-अंदर महसूस कर रहे हैं, पर फिर भी आंचलिक और रोमांटिक कहे जा रहे हैं तो मानना पड़ेगा कि वे अवमूल्यन की फुटंगी झा वाली कुटिल मानसिकता से ग्रस्त, प्रेरित और परिचालित हैं।

राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्र की प्रगति के मामले में रेणु ने जिस समग्रता और वैज्ञानिकता के साथ अपनी विचारणा, अपनी रचनाओं के माध्यम से हमारे समक्ष रखी है, वह उन्हें एतदर्थ अप्रतिम रचनाकार घोषित करती है। हमें उस दिन का इंतजार है जब साहित्य जगत् उनके इस अवदान को ठीक-ठीक समझ सकेगा और सरकारें उनकी विचारणा को कार्यान्वित करती दिखेंगी। रेणु के इस पाठक को उस दिन का भी इंतजार रहेगा, कोई दूसरा रचनाकार प्रगति संबंधी विचारणा के क्षेत्र में उनके द्वारा स्थापित कीर्तिमान को तोड़ेगा।

संदर्भ:

रेणु, फणीश्वरनाथ. (1954). मैला आँचल. पटना: समता प्रकाशन.
यायावर, भारत. (1984). श्रुत अश्रुत पूर्व. (समपदित) दिल्ली: राजकमल प्रकाशन
रेणु, फणीश्वरनाथ. (1957). परती परिकथा. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन
रेणु, फणीश्वरनाथ. (1969). ठुमरी. पटना: बिहार ग्रन्थ कुटीर
रेणु, फणीश्वरनाथ. (1966). जुलूस. नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ.
रेणु, फणीश्वरनाथ. (1967). आदिम रात्री की महक. पटना: बिहार ग्रन्थ कुटीर.
रेणु, फणीश्वरनाथ. (1972). कलंक मुक्ति. नई दिल्ली: राजकमल.

(संपादन : नवल/गोल्डी)

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