यह आकाशवाणी नहीं, हम विलुप्त होते असुरों की आवाज है

विशद कुमार बता रहे हैं झारखंड के सुदूर गुमला और लातेहार के पठारी इलाकों में रहने वाले असुर आदिम जनजाति के लाेगों के द्वारा शुरू किए गए सामुदायिक रेडियो के बारे में। ये वही हैं जिन्हें हिंदू धर्म ग्रंथों में खलनायक बताया गया है। जबकि वे भी अन्य सभी के जैसे इंसान हैं और अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं

‘नोआ हाके असुर अखड़ा रीडियो, एनेगाबु डेगाबु सिरिंगेयाबु दाहां-दाहां तुर्रर….धानतींग नातांग तुरू…।’ लातेहार व गुमला जिले के हर साप्ताहिक बाजार में ढोल-मांदर और दूसरे वाद्य यंत्रों से एक शानदार संगीत के साथ कुछ महिलाओं की सामूहिक आवाज यानी मोन्टाज लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है।

हिंदी में उपरोक्त सामूहिक आवाज का अर्थ है – “यह है असुर अखड़ा रेडियो, नाचेंगे…खेलेंगे…गाएंगे…।” इसके साथ ही शुरू होता है मोबाइल रेडियो का प्रसारण। उसके बाद असुर भाषा में शुरू होती है पुरखाें की कहानी। पुरखाें की कहानी के बाद पुन: बजता है – “नोआ हाके असुर अखड़ा रीडियो एनेगाबु डेगाबु सिरिंगेयाबु दाहां-दाहां तुर्रर….धानतींग नातांग तुरू…”। ठीक वैसे ही जैसे रेडियो पर एक कार्यक्रम के बाद दूसरे कार्यक्रम की शुरूआत के पहले बजने वाला मोन्टाज। ऐसे ही असुर अखड़ा रेडियो पर कार्यक्रमों का सिलसिला जारी रहता है। इनमें नये-पुराने गीत, सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श, समाचार एवं सरकारी योजनाओं आदि की जानकारी देने वाली रिपोर्टें शामिल होती हैं।

असुर रेडियो की उद्घोषिका सुषमा असुर (दाएं) और रोशनी असुर (बाएं)

भले ही भारत में सामुदायिक रेडियो की यह पहली परियोजना नहीं है, लेकिन सुदूर गुमला और लातेहार जिले के वाशिंदों के लिए यह प्रथम अनुभव जरूर है कि उनकी आवाज भी दूर बैठे लोग सीधे सुन सकते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस रेडियो का प्रसारण सीधे हाट-बाजारों में किया जाता है। इस रेडियो को यहां क्लिक कर ऑनलाइन सुना जा सकता है। इसके अलावा इसे असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन के नामक फेसबुक पेज के माध्यम से भी एक्सेस किया जा सकता है। 

दरअसल, यह सामाजिक-सांस्कृतिक उद्यम विलुप्त हो रही असुर जनजाति समुदाय के लोगों को बचाने के लिए है। वे इसके जरिए अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

असुर अखड़ा रेडियो की शुरूआत 19 जनवरी 2020 को गुमला जिले के घाघरा प्रखंड व चैनपुर प्रखंड के कोटेया के साप्ताहिक बाजार में हुई। जिले के विशुनपुर प्रखंड के सखुआपानी गांव की सुषमा असुर, अजय असुर, विवेकानंद असुर एवं जोभीपाट गांव के मिलन असुर व रोशनी असुर की टीम ने इसे अमलीजामा पहनाया है।

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बताते चलें कि झारखंड के गुमला व लातेहार जिले के विभिन्न क्षेत्रों में असुर जनजाति के लोग रहते हैं जो कि आदिम जनजाति की श्रेणी में शामिल है। इस संबंध में आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ व सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी कुमार पंकज बताते हैं कि झारखण्ड में लगभग 32 आदिवासी समुदाय हैं जिसमें से 9 समुदाय धीरे-धीरे हाशिए के बाहर होते जा रहे हैं, यानी वे ख़तरे में हैं। इनमें से एक असुर समुदाय भी है। वर्ष 2011 में हुए जनगणना के हिसाब से झारखंड में इनकी संख्या लगभग 8000 के क़रीब रह गई है।

पंकज कहते हैं कि किसी भी भाषा के विलुप्त होने का मतलब होता है कि जिस समुदाय की भाषा ख़तरे में है, उस समुदाय की आजीविका से लेकर अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताना-बाना, राजनीति, सब खतरे में है। सबसे बड़ा ख़तरा इनकी जमीन और इनकी विरासत का है। वे कहते हैं कि असुर प्रकृति-पूजक होते हैं। “सिंगबोंगा” उनके प्रमुख देवता है। “सड़सी कुटासी” इनका प्रमुख पर्व है, जिसमें ये अपने औजारों और लोहे गलाने वाली भट्टियों की पूजा करते हैं। असुर महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में दिखाया गया है जिसकी हत्या दुर्गा ने की थी। पश्चिम बंगाल और झारखण्ड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते हैं।

“असुर अखड़ा रेडियो” के उद्देश्य के बारे में ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव, कवयित्री और लेखिका वंदना टेटे बताती हैं कि जब असुर जनजाति आज विलुप्त हो रही हैं, वैसे में उनकी भाषा पर संकट स्वाभाविक है। इसी संकट से उबरने की कोशिश है “असुर अखड़ा रेडियो”। वे बताती हैं कि प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन की इसमें मुख्य भूमिका है। इनके अलावा जोभीपाट गांव के सेवानिवृत प्राचार्य चैत टोप्पो, घाघरा के प्रोफेसर महेश अगुस्टीन कुजूर जैसे लोगों ने इसकी रूपरेखा तैयार करने में मदद की है। उन्होंने बताया कि यूनेस्को द्वारा पिछले सालों में जारी तेजी से लुप्त होने वाली भाषाओं की सूची में हमारी असुर भाषा भी शामिल है। वे कहती हैं कि हम किसी कीमत पर अपनी भाषा को मरते नहीं देख सकते।

असुर अखड़ा रेडियो के एक उद्घोषक रमेश असुर

वे आगे कहतीं हैं कि भाषा व संस्कृति के सवाल के साथ-साथ हमारा मकसद है कि इस रेडियो के माध्यम से असुर समाज के लोगों तक देश की राजनीतिक, सामाजिक घटनाओं की जानकारी पहुंचाना है। यह जनजाति पठारी इलाकों में बसती हैं, तथा वे तमाम तरह के सूचना माध्यमों से महरूम हैं। 

वहीं, असुर रेडियो की उद्घोषिका व कवयित्री सुषमा असुर बताती हैं कि करीब आधे घंटे के प्रसारण के दौरान गीत के साथ कुछ संदेश, कुछ समाचार सहित अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने की बातें की जाती हैं। सुषमा असुर आगे बताती हैं कि इस कार्यक्रम में भारतीय फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान, पुणे के रंजीत उरांव द्वारा इसके तकनीकी पक्ष में सहयोग सहित कृष्ण मोहन सिंह मुंडा और अश्विनी कुमार पंकज द्वारा जरूरी सामान की व्यवस्था कराई गई है। वे बताती हैं कि हम अपने कार्यक्रम को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर भी डालते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हमारे कार्यक्रम का मकसद पहुंच सके।

कार्यक्रम की रिकार्डिंग कैसे और कहां की जाती है, पूछने पर सुषमा असुर बताती हैं कि हम सारा कार्यक्रम मैदान में ही रिकार्ड करते हैं, तथा उसे पेनड्राइव में लेकर प्रसारण स्थल पर चलाते हैं। यह सब हम सौर ऊर्जा के सहारे करते हैं। वे बताती हैं कि इस इलाके में गुरूवार, शनिवार और रविवार को विभिन्न स्थलों पर हाट लगता है। हम इन्हीं साप्ताहिक हाटों में “असुर अखड़ा रेडियो” का प्रसारण करते हैं। इन हाटों में मुर्गा, बकरा-सूअर, साग-सब्जियां, दाल-चावल, बीड़ी-सिगरेट, हड़िया (चावल से बना एक तरह का पेय पदार्थ), टोकड़ियां, फल, बिंदी-चूड़ी, सिंदूर, लूंगी-साड़ी, खुरपी-कुल्हाड़ी, मूढ़ी-घुघनी, पाउडर-क्रीम, माश्चाराइजर-शैंपू-साबुन, चप्पलें, आयुर्वेदिक दवाएं और फलों की दुकानें लगती हैं। इन्हीं हाटों में ऑटो रिक्शा से साउंड सिस्टम लेकर हम पहुंचते हैं और जब भीड़ जमा होती है, तब पेन ड्राइव में रिकार्ड कर लाई गई साउंड क्लिप से प्रसारण शुरू होता है।

सुषमा असुर बताती हैं कि अभी हम दूसरा एपिसोड का प्रसारण कर रहे हैं, जिसमें रमेश असुर ने न केवल “असुर अखड़ा रेडियो” के दूसरे एपिसोड का संचालन किया, बल्कि उसने आलेख भी लिखा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रमेश ने मात्र 7वीं तक पढ़ाई की है और आजीविका के लिए दिहाड़ी मजदूरी भी करता है। 

बहरहाल, विलुप्त होते असुर समुदाय के लोगों द्वारा शुरू किया गया यह सामाजिक उद्यम उनकी जीवटता का उदाहरण है, जिसकी अभिव्यक्ति सुषमा असुर की कविता “हम जरूर जीयेंगे तुम्हारी तरह” में भी होती है –

पठारी क्षेत्र में तुमने

हमें (असुरों) को जन्म दिया

पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया

पठारी क्षेत्र में तुमने

हमें (असुरों) को मजदूर बनाया

पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया

हमें आगे बढ़ने के लिए रास्ता नहीं बतलाया

अब तो हमारे पास भाषा नहीं है

हमारे पास संस्कृति नहीं है

हम तुम्हें कैसे पुकारें

हम तुम्हें किस विधि से याद करें।

 

हे धरती के पुरखों, हे आसमान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया

तुम्हारे भोजन की जिम्मेवारी जंगल की थी

तुम्हार मजूरी खेत की जिम्मेवारी थी

यहां से वहां तक फैला पठार ही तुम्हारी पाठशाला थी

पहाड़-झरने तुम्हें रास्ता बताते थे।

 

हे धरती के पुरखों, हे आसामान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया

तुम सब नहीं जानते थे कचिया-ढिबा (रुपया-पैसा)

तुम सब नहीं जानते थे परजीविता

हम तुम्हें दोष नहीं देते

हम तुम्हें अपनी सहायता के लिए

कोर्ट-कचहरी नहीं करते।

 

पर जब कंपनी धम धम आती है

पर जब सरकार दम दम बेदम करती है

हम किसको गोहरायें

हम किस छाती में आसरा ढूंढें?

 

हे धरती के पुरखों, हे आसामान के पुरखों

ओ हमारे माता-पिता ओ सभी असुर बूढा-बुढिया।

 

हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना

हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना

हम करेंगे शिकार तुम्हारी तरह

उन सभी जानवरों का

जो असुरों का घर खोद रहे हैं

जो हमारे झरनों को फुसला-बहला रहे हैं

जिन्हें धरती और इंसान खाने की लत है

हम जरूर जियेंगे तुम्हारी तरह ही

पठार की तरह निश्चिंत निश्छल

तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में।

(संपादन: नवल/गोल्डी)

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