आंबेडकर की सविनय क्रांतिधर्मिता के हामी आनंद तेलतुंबड़े

बीते 14 अप्रैल, 2020 को डॉ. आंबेडकर की 129वीं जयंती के मौके पर आनंद तेलतुंबड़े ने भीमा-कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मान रखते हुए खुद को एनआईए के हवाले कर दिया। तेलतुंबड़े के लेखनों का हवाला देते हुए वी.गीता कहती हैं कि वे उस विकृत और कमज़ोर आंबेडकर के अनुयायी नहीं, जिससे राज्य व सामाजिक व्यवस्था सहजता महसूस करता हो, बल्कि एक संपूर्ण और क्रन्तिकारी आंबेडकर के प्रति उनकी निष्ठा है

सन् 1980 के दशक में पंजाब में युवाओं के रातों-रात “गायब” होने और फिर कभी न मिलने की घटनाओं के बारे में नागरिक अधिकार कार्यकर्ता राम नारायण कुमार ने लिखा था कि राज्य की मौन स्वीकृति से किए जाने वाले इस तरह के भयावह अपराधों का सच जनता को बताना ज़रूरी है ताकि समाज को यह अहसास हो सके कि क्या गलत हो रहा है और निर्दोष व्यक्तियों को क्या भुगतना पड़ रहा है। परन्तु “आधिकारिक सच” को सहज स्वीकार करने की समाज की प्रवृत्ति के चलते “असली सच” को कहना आसान नहीं होता। 

आज “आधिकारिक सच” बहुरुपिया बन गया है। वह अलग-अलग वेश धरकर हमारे सामने आता है और खासकर जब हम मानव अधिकारों के मानक मूल्यों के दृषिकोण से देखते हैं तो हम पाते हैं कि “असली सच” से लोगों को अवगत कराना अधिक कठिन हो गया है। अव्वल तो यह स्वीकार ही नहीं किया जाता कि किसी के मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है और अगर किया भी जाता है तो उसे राज्य की संप्रभुता और उसके मूलभूत हितों की रक्षा के नाम पर औचित्यपूर्ण ठहरा दिया जाता है। आज के दौर में जब राज्य द्वारा नागरिकों की सतत निगरानी और उनकी निजता के उल्लंघन को सामान्य माना जाने लगा है, यह उचित होगा कि नागरिक अधिकारों और सच कहने के बीच के अंतर्संबंधों की पड़ताल की जाय। 

महाड़ से खैरलांजी : जाति व्यवस्था के खिलाफ सतत संघर्ष

सन 2016 में आनंद तेलतुंबड़े की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था महाड़ : द मेकिंग ऑफ़ द फर्स्ट दलित रिवोल्ट  इसमें भारत में राज्य द्वारा नागरिक अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के प्रतिरोध तक सीमित न रखते हुए, 1927 के महाड़ सत्याग्रह को इस परंपरा से जोड़ती है। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में किये गए इस सत्याग्रह के दौरान दलितों (और ऊंची जातियों के कुछ लोगों) ने एक सार्वजनिक तालाब से पानी पीया था। यह सत्याग्रह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध नहीं था, क्योंकि सरकार ने उस तालाब से किसी के पानी पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। उलटे, वह तो विधायिका के एक निर्णय को लागू करवाने के लिए किया गया सत्याग्रह था। महाड़़ सत्याग्रह का उद्देश्य ऊंची जातियों के हिन्दुओं का साक्षात्कार इस सत्य से करवाना था कि प्रत्येक व्यक्ति को एक मनुष्य के सभी अधिकार प्राप्त हैं और समाज के किसी वर्ग को इन अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता। 

महाड़ : दी मेकिंग ऑफ दी फर्स्ट दलित रिवोल्ट (2006) का कवर पृष्ठ

इस सत्याग्रह के ज़रिए डॉ. आंबेडकर न केवल इस “सत्य” की घोषणा करना चाहते थे वरन उसका सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन भी करना चाहते थे। वे दुनिया को बताना चाहते थे कि दलितों ने मनुस्मृति में अपनी आस्था को त्याग दिया है और अब उनकी आस्था “नागरिक अधिकार घोषणापत्र” में है। तेलतुंबड़े के अनुसार एक दस्तावेज को अपनाना और दूसरे को ख़ारिज कर सार्वजनिक रूप से जलाना एक अहम क्रन्तिकारी उद्घोषणा थी। इससे जो नागरिक अधिकार आन्दोलन शुरू हुआ, उसकी तुलना अमरीका के नागरिक अधिकार आन्दोलन से की जा सकती है।  

इस आन्दोलन की एक विशिष्टता यह थी कि वह सार्वभौमिक सामाजिक अधिकारों को पाने का संघर्ष था। हालांकि दलितों ने ऐसे अधिकारों की मांग की जो दूसरों के लिए सहज रूप से उपलब्ध थे। उन्होंने इन्हीं मांगों के दायरे को बढ़ा दिया क्योंकि उनके आन्दोलन से यह साफ़ था कि अधिकार न केवल किसी व्यक्ति को दमनकारी राज्य से, बल्कि समान रूप से एक अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था से भी लड़कर लेना आवश्यक है। इस मामले में राज्य की भूमिका अधिकारों को दिलवाने व उसके विस्तार करने की है, न कि उन्हें निरस्त करने की। तेलतुंबड़े लिखते हैं कि महाड़़ सत्याग्रह के संदर्भ में आंबेडकर ने कहा था कि धारा 144 को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए कि उसका उपयोग लोगों को सजा देने के लिए नहीं, बल्कि लोगों के कानूनी और संवैधानिक अधिकार के इनकार को रोकने हेतु किया जाना चाहिए। 

तेलतुंबड़े इस आन्दोलन के बाद के घटनाक्रम का भी वर्णन करते हैं। वे उस सार्वजनिक विमर्श की चर्चा करते हैं जिसकी शुरुआत आंबेडकर ने “बहिष्कृत भारत” में अपने सम्पादकीय लेखों के जरिए की थी। “बहिष्कृत भारत” एक मराठी साप्ताहिक था, जिसकी स्थापना आंबेडकर ने 1927 में की थी। दलितों के जीवन से संबंधित सच को समाज के सामने लाना आसान नहीं था। क्योंकि समाज इस सच को सुनना ही नहीं चाहता था। आंबेडकर के तर्क प्रभावी, विद्वतापूर्ण और तीखे होते थे। वे पूरे जोश और ताकत से लोगों के सामने अपने तर्क रखते थे। परन्तु उन्हें तिरस्कार का सामना करना पड़ता था और उनके तर्कों को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता था।

परसिसटेंस ऑफ़ कास्ट: द खैरलांझी मरडरर्स एंड इंडियास हिडन अपारथायिड (2010) का कवर पृष्ठ

इस विषय पर आंबेडकर के लेखन को एक सदी गुज़र चुकी है, परन्तु आज भी हमारे लिए यह कहना मुश्किल है कि बीते सौ सालों में कुछ बदलाव आया भी है या नहीं। सच को सच बताने की हिम्मत करने वाले दलित को संदेह की दृष्टि के अलावा कुछ हद तक घृणा से भी देखा जाता है। केवल राज्य ही नहीं, बल्कि नागरिक समाज भी दलितों पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। इससे दलितों के खिलाफ अपराधों के संबंध में राज्य की उदासीनता सहज हो जाती है है। दलितों की पीड़ा और उन्हें पहुंचने वाले आहत की सामाजिक मान्यता नहीं होने के वजह से ऐसे मामलों में जो क़ानूनी कार्रवाई होती भी है तो उससे दलितों को सामुदायिक रूप में कोई लाभ नहीं होता। दलितों के विरुद्ध हुए अपराध, एक सामाजिक अपराध के बजाय केवल एक व्यक्तिगत घटना मानी जाती हैं। इसी विषय पर तेलतुंबड़े की एक अन्य पुस्तक की थीम है, जिसमें उनका गुस्सा और उनकी सूक्ष्म नज़र दोनों झलकती हैं। यह पुस्तक है “द परसिसटेंस ऑफ़ कास्ट : द खैरलांझी मरडरर्स एंड इंडियास हिडन अपारथायिड”

जाति का गणतंत्र और नागरिक अधिकार का सवाल

दलितों पर अत्याचार के मामलों में हम क़ानूनी न्याय और सामाजिक अस्वीकृति दोनों कैसे हासिल कर सकते हैं? दूसरे लक्ष्य को हासिल करना असंभव सा है क्योंकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि ऊंची जातियों के हिन्दू स्वयं की निंदा करने के लिए आगे आएंगे। एक जातिवादी समाज में न ही इस बात की नैतिक स्पष्टता है और न ही इस तरह की आत्मनिंदा उन लोगों के भौतिक और बौद्धिक हितों पर कोई फर्क डालेगा जो स्वयं समाज के कर्ताधर्ता हैं। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के सामने यह एक उलझन है कि वे इस बात पर तो जोर दे सकते हैं कि राज्य, संवैधानिक प्रावधानों का पालन करे परन्तु वे नागरिकों को संवैधानिक नैतिकता का पालन करने पर मजबूर नहीं कर सकते। तेलतुंबड़े कई मानव अधिकार आंदोलनों में शामिल रहे हैं। उन्हें यह समझ थी कि भारतीय गणतंत्र को आकार और दिशा उसकी परंपरागत “रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट” (जाति का गणतंत्र) दे रहा है। यही वजह रहा कि बिना किसी आश्चर्य के वे राज्य और सामाजिक व्यवस्था के बीच के आपराधिक तानाबाना की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।

दी रिपब्लिक ऑफ कास्ट (2018) का कवर पृष्ठ

इसके साथ ही वे हमें यह भी बताते हैं कि एक नागरिक बतौर हम इस अपराधिता की जड़ को कैसे कमज़ोर कर सकते हैं, कैसे हम इस अपराधिता के खिलाफ काम कर सकते हैं। राज्य हमें कई प्रकार की सामाजिक सुरक्षाएं देता है और हमारे कल्याण के लिए बहुत कुछ करता है। राज्य के इस पक्ष की व्यावहारिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए हम तार्किक और आलोचनात्मक व्याख्या से कैसे यह देखें कि दलितों के मामले में हम कहाँ खड़े हैं और हमें क्या करना है? दरअसल उनकी पुस्तक “रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट” इस बात पर जोर देती है कि हम जाति व्यवस्था और वर्ग प्रणालियों के संदर्भ में भारतीय राज्य की प्रकृति और आचरण का निरंतर आकलन और अध्ययन करें। अगर संविधान द्वारा निर्मित राज्य भारत के लोगों की संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करता है तो हम यह देखें कि यह संप्रभुता किस रूप में अभिव्यक्त होती है। जैसे, क्या राज्य सामाजिक न्याय को सार्थक तरीके से लागू करना चाहता है या केवल औपचारिकता का निर्वहन करने का इच्छुक है। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है और तेलतुंबड़े चाहते हैं कि हम इस पर ध्यान दें। सरकार के औपचारिक निर्णयों से भी कुछ परिणाम हासिल किये जा सकते हैं और इन सभी को तिरस्कार की दृष्टि से देखना भी ठीक नहीं है. “रिपब्लिक ऑफ कास्ट” में आरक्षण पर उनका विचारोत्तेजक लेख एक नई बहस की शुरुआत करता है, जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए.

लगभग एक सदी पहले, “पैक्स ब्रिटेनिका” (इंग्लैंड द्वारा वैश्विक पुलिस की भूमिका निभाना) पर टिप्पणी करते हुए आंबेडकर ने कहा था कि क्या एक विदेशी शासन द्वारा स्थापित शांति वांछनीय हो सकती है? हो सकता है कि ब्रिटेन ने युद्ध और हिंसा का अंत किया हो व आधुनिक विकास की नींव रखी हो, परन्तु ठोस सामाजिक और आर्थिक सरोकारों के मामले में ब्रिटेन शासन की क्या भूमिका थी? आज के सन्दर्भ में वे शायद इससे आगे बढ़कर कहते कि राज्य का उद्देश्य केवल टकरावों और संघर्षों को नियंत्रित कर शांति की स्थापना करना नहीं हो सकता। राज्य को यह भी समझना होगा कि टकराव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि समाज में आर्थिक असमानता और सामाजिक संकीर्णता है तथा संस्कृति व इतिहास के क्षेत्रों में द्वंद हैं। इसका हल यह नहीं है कि असहमति के स्वरों के दबाया जाए या टकराव के कारणों पर चर्चा प्रतिबंधित कर दी जाय। राज्य को खुली और जनतांत्रिक बहसों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

आनंद तेलतुंबड़े व बी. आर. आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर शायद यह भी कहते कि नागरिक समाज को दावों और प्रति-दावों को खुले दिमाग से सुनना और समझना चाहिए तथा “जाति के गणतंत्र” की तरह गैर-जनतांत्रिक नहीं बनना चाहिए। हमारे देश में इन दिनों नागरिक अधिकारों को कुचला जा रहा है और मजदूर संगठनों के नेता व नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को जेल की सलाखों के पीछे धकेला जा रहा है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि हम एक राष्ट्र और समाज के बतौर आंबेडकर की सविनय क्रांतिधर्मिता को पुनर्जीवित करें। 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : गोल्डी/नवल)

(आलेख परिवर्द्धित : 28 अप्रैल, 2020 7:28 PM)

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