कोरोना लॉकडाउन: छत्तीसगढ़ में कैदियों को रिहा करने की उठी मांग

छत्तीसगढ़ के जेलों में क्षमता से दुगने कैदी हैं। इनमें आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों की संख्या अधिक है। इस कारण कोरोना वायरस से संक्रमण की आंशका है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। इसके मद्देनजर भूपेश बघेल सरकार से ठोस कार्रवाई की मांग विभिन् संगठनों के द्वारा की जा रही है। गोल्डी एम. जार्ज की रिपोर्ट

विश्व व्यापी महामारी कोरोना के कारण भारत में 21 दिनों का लॉकडाउन बीते 25 मार्च की आधी रात से जारी है। इसके मद्देनजर छत्तीसगढ़ में सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार प्रदेश के जेलों से उम्रदराज बंदियों को रिहा करे। जेलों में बंद वृद्धजन, बच्चें, महिलायें और बीमारी से ग्रसित लोगों को कोरोना से उनकी जान को खतरा है, इसलिए इन्हें प्राथमिकता देने की बात अपील में सामने आई। 

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की छत्तीसगढ़ इकाई ने इस आशय का आग्रह राज्य सरकार व सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति को ईमेल से 3 अप्रैल, 2020 को भेजा। संगठन ने इसकी प्रतिलिपि छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अलावा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, गृह एवं जेल मंत्री, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष, अतिरिक्त मुख्य सचिव और अतिरिक्त महानिदेशक कारागार एवं जेल को को भी भेजा है। 

बताते चले कि चीन के वुहान शहर से फैले नावेल कोरोना वायरस आज पूरी दुनिया में भयानक रूप से फ़ैल चुका है। यह सघन आबादी वालो इलाकों और भीड़ के बीच बहुत तेजी से फैलता है। भारत में चिंता की एक मुख्य वजह यह भी है। खासकर भारत के जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे गए हैं। उनकी जान को खतरा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।पीयूसीएल के प्रांतीय अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान के अनुसार, अभी छत्तीसगढ़ राज्य में प्रभावितों की संख्या कम है। परंतु सावधानी नहीं बरतने से तमाम कोशिशों के बावजूद हालात बिगड़ सकती है। कई दशको से क्षमता से अधिक कैदी रखे गए हैं। इस कारण इनके बीच कोरोना वायरस के फैलने की अधिक आशंका है।

सुप्रीम कोर्ट की दिशा निर्देशिका

कोविड-19 के कारण देश में मौजूदा विषमताओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीते 23 मार्च, 2020 को भारत सरकार सहित सभी राज्य सरकारों को को दिशा निर्देशिका जारी किया। इसके अनुसार, जेलों और अन्य हिरासती केंद्रों मसलन, डिटेंशन सेंटर, सुधार गृहों आदि में लोगों की संख्या कम करने के उद्देश्य से एक हाईपावर कमेटी का गठन हो, जो विचाराधीन कैदियों और बंदियों की रिहाई के मामले में  कारगर कदम उठाए। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश के अनुरूप छत्तीसगढ़ में भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया। 

जेलों में बंद कैदियों के जान पर संकट

सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त न्यायिक दिशा-निर्देश संविधान की अनुच्छेद-21 के मद्देनज़र जेलों में रहनेवाले दोषसिद्ध कैदियों और विचारादीन बंदियों पर दिशा-निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा  इस बात पर भी चिंता प्रकट की गयी कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी क्यों हैं। विशेषकर मौजूदा हालात में जब कोरोना वायरस एक महामारी का रूप धारण कर चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन का निर्देश जारी किया है, उसमे (i) राज्य विधिक सेवा समिति के अध्यक्ष, (ii) प्रधान सचिव (गृह / कारागार) जो भी पदनाम के रूप में जाना जाता है, (iii) महानिदेशक जेल हों। समिति के दायित्व के बारे आदेश में बताया गया है कि यह समिति यह निर्धारित करने के लिए होगी कि किस श्रेणी के कैदियों को कितने समय अंतराल के लिए पैरोल पर रिहा किया जा सकता है या अंतरिम जमानत प्रदान किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश उन कैदियों की रिहाई पर विचार कर सकता है, जो विचाराधीन हैं या फिर उन्हें सुनाई गई सजा की अवधि सात साल से कम है।इन्हें जुर्माना के साथ या बिना जुर्माना के साथ रिहा करने का निर्णय भी यह समिति तय कर सकती है। 

इस निर्देश के आधार पर छत्तीसगढ़ में गठित उच्चाधिकार समिति में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा, सुब्रत साहू, और संजय पिल्ले शामिल किए गए हैं। समिति की एक बैठक टेलिकांफ्रेंसिंग के माध्यम से हुआ। इस बैठक में, यह फैसला हुआ कि कोविड-19 के संक्रमण के मद्देनज़र कुछ कैदियों को अधिक भीड़-भाड़ वाली जेलों से कम भीड़-भाड़ वाली जेलों में स्थानांतरित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निदेशानुसार जो पात्र व्यक्ति होंगे उन्हें चिकित्सीय आपातकाल के मद्देनजर अंतरिम जमानत या पैरोल की अनुमति दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों में एक यह भी है कि रिहा किए जाने वाले बंदी या कैदी छत्तीसगढ़ के निवासी हों।

छत्तीसगढ़ के जेलों व दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग

छत्तीसगढ़ की जेलें देश की सबसे भीड़भाड़ वाली जेलों में शामिल हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 में प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया का प्रकाशन किया है, जिसके मुताबिक 31 दिसंबर 2018 को, छत्तीसगढ़ की जेलें देश की चौथी सबसे अधिक भीड़ वाली जेलें थीं। प्रतिवेदन में कहा गया कि छत्तीसगढ़ की जेलों में 18494 कैदी थे, जबकि इन जेलों की आवास क्षमता केवल 12,063 कैदियों की थी। इसका मतलब यह हुआ कि प्रदेश के जेलों में 153.3 फ़ीसदी कैदी हैं। पांच केंद्रीय जेलों – बिलासपुर, रायपुर, अंबिकापुर, दुर्ग, जगदलपुर  – की स्थितियां सबसे अधिक भयावह हैं। इन पांचों केंद्रीय जेलों में 31 दिसंबर, 2018 के अनुसार औसतन 196.1 फ़ीसदी कैदी हैं, जो भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक है। राष्ट्रीय जेल सूचना पोर्टल पर वर्तमान में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन पांचों केंद्रीय जेलों में कुल कैदियों की संख्या 13016 है। यानी इन जेलों की क्षमता से अधिक यहां 194.1 फ़ीसदी रहवासी हैं।

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एनसीआरबी के द्वारा 2018 में जारी भारत की सबसे अंतिम जेल सांख्यिकी रिपोर्ट ने इस बार कैदियों के जाति और धर्म जैसी सामाजिक वास्तविकताओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। इस तरह का विश्लेषण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें निरंतर सामाजिक दरार और संस्थागत पूर्वाग्रहों को समझने में मदद करता है जो हमारे लोकतंत्र में मौजूद हैं। अंतिम बार 2015 के रिपोर्ट में जेलों के सामाजिक विश्लेषण किया गया था। सरकार को यह बताना चाहिए कि इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। 

क्या हुकूमत दलितों, आदिवासियों  और पिछड़े वर्ग के लोगों से संबंधित आंकड़ों के सार्वजनिक होने से डरने लगी है? क्या उन्हें इसका भय सता रहा है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों की संख्या सामने आने से द्रोह की स्थिति बन जाएगी?। या फिर क्या दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के कैदियों की संख्या और अनुपात इस कदर बढ़ गया है कि सरकार को उन्हें सार्वजनिक करने में ही दिक्कत हो रही है? हमें भी इसका उत्तर नहीं पता है। लेकिन आंकड़ों को छिपाये जाने से खतरे की घंटी बजती जरूर है। 

2015 में जारी रिपोर्ट में अंतिम बार जाति और धर्म के आधार पर एनसीआरबी ने जेल में बंद कैदियों के संबंध में आंकड़े सार्वजनिक किया था। इस रिपोर्ट के के अनुसार कुल दोषसिद्ध कैदियों और विचारादीन बंदियों में 21.4 फ़ीसदी दलित थे, जिनकी जनसंख्या 2011 के जनगणना के अनुसार 16.6 फ़ीसदी है। इसी तरह, 12.8 फीसदी आदिवासी थे, जबकि इनकी आबादी में मात्र 8.6 फ़ीसदी हिस्सेदारी थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय जेलों में 55 फ़ीसदी से अधिक विचाराधीन बंदी मुस्लिम, दलित और आदिवासी हैं। इसी तरह भारत में हर तीसरा विचाराधीन कैदी एक दलित या आदिवासी होता है। भारत के सभी कैदियों में मुस्लिम, दलित और आदिवासी 53 फ़ीसदी हैं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के अधिवक्ता रजनी सोरेन के मुताबिक 2015 में जो आंकड़े दर्शाए गए हैं, उसे एक वर्ष पूर्व में लिए जाते हैं। इस तरह देखा जाए तो यह रिपोर्ट लगभग 6 साल पहले का है और इस आकडे में काफी अंतर आया हैं, जिस कारण वर्तमान के हाल का अनुमान लगाना हमारे लिए संभव नहीं है क्योंकि इन 6 सालों में माओवादी विरोधी अभियान के अंतर्गत कई अनगिनत लोगों को जेलों में डाला गया है, खासकर बस्तर में। इनमें से बहुत से लोग आज भी जेल में ही हैं।

एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में छत्तीसगढ़ के आंकड़े

दर्ज/ वर्गअनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिपिछड़ा वर्गअन्यकुल
दोषसिद्ध कैदी1379226932798477774
विचाराधीन बंदी25322919304813719870
कुल391151886327221817644

एनसीआरबी के 2015 के रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में आदिवासी कैदी आबादी अनुपात में हैं, जबकि दलित कैदियों की संख्या उनके जनसंख्या के अनुपात से दोगुनी हैं। 

कुल दोषसिद्ध कैदियों में से 18 फ़ीसदी दलित, 29 फ़ीसदी आदिवासी, 42 फ़ीसदी पिछड़ा वर्ग और 11 फ़ीसदी अन्य हैं इसी तरह कुछ विचाराधीन बंदियों में 26 फ़ीसदी दलित, 30 फ़ीसदी आदिवासी, 31 फ़ीसदी पिछड़ा वर्ग और 14 फ़ीसदी अन्य हैं। यदि दोनों को मिलकर देखा जाय तो छत्तीसगढ़ के सभी जेलों के रहवासियों में में 22 फ़ीसदी दलित, 29 फ़ीसदी आदिवासी, 36 फ़ीसदी पिछड़ा वर्ग और 13 फ़ीसदी अन्य हैं। इसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों की संख्या शामिल नहीं है, इसके बावजूद दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के कुल जेलवासियों की हिस्सेदारी 87 फ़ीसदी हैं, जो  किसी भी लोक कल्याणकारी जनतंत्र के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। इस तथ्य पर प्रामाणिक सामाजिक बहस की आवश्यकता है कि किन वजहों से कुछ सामाजिक और धार्मिक समूह अपनी आबादी से अधिक अनुपात में कैदियों की श्रेणी में शामिल हैं। 

बंदियों की रिहाई क्यों?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 सभी को जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। यद्यपि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर संविधान यह मानती है कि राज्य को भी नागरिकों के जीवन जीने के अधिकार से वंचित करने का अधिकार नहीं हैं। पीयूसीएल के प्रदेश सचिव शालिनी गेरा कहती हैं कि कोविड-19 से जेल इन्मेट्स अतिरिक्त खतरे में रहने के लिए मजबूर होंगे, जो एक तरह से मौत की सजा के समतुल्य हैं। लिहाजा यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इस जोखिम को यथासंभव कम करे। खासकर तब जब अधिकांश दुर्बल-कमजोर समुदायों के हों। 

बहरहाल, यह भी सच है कि महामारियेां के  आसान शिकार बूढ़े, बच्चे, महिलाएं, शारीरिक और मानसिक रूप से असामान्य, व समाज के निचले तबके के लोग होते हैं। पीयूसीएल के अलावा कई संगठनों ने यह मांग की है कि नाबालिग, रोग-ग्रस्त वृद्धजनों, दिव्यांगजनों, महिलाओं (खासकर गर्भवती और बच्चों के साथ कारागृह में रह रही हों), और मनोवैज्ञानिक दुर्बलता वालों को प्राथमिकता दी जाए। अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय यह है कि क्या प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार मानवता और उदारता का उदाहरण पेश करेगी?

(संपादन : नवल)

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