लॉकडाउन में ये दलित-बहुजन बुद्धिजीवी कर रहे बौद्धिक पूंजी का निर्माण

कंवल भारती, भंवर मेघवंशी, प्रो. अर्जुन पटेल, अनिता भारती और संदीप मील आदि दलित-बहुजन लेखक व विचारक लॉकडाउन की अवधि का उपयोग बौद्धिक पूंजी के निर्माण में कर रहे हैं। उनके मुताबिक, लॉकाडाउन को एक अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट

कोविड-19 के फैलाव को रोकने के लिए राष्ट्रीय लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाकर 3 मई तक कर दिया गया है। इससे पहले, 24 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी। कुल  करीब 42 दिनों के इस लॉकडाउन के दौरान अधिकांश लोग अपने घरों में ही रह रहे हैं। इसी दौरान दलित-बहुजनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण दो जयंतियां मनायी गयीं – 11 अप्रैल को जोतीराव फुले और 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती। इन दोनों मौकों पर दलित-बहुजन समाज के लोगों ने पूरे धैर्य व अनुशासन का परिचय दिया। सोशल मीडिया पर इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई। 

जिज्ञासु पर किताब लिखने में व्यस्त हैं कंवल भारती

लॉकडाउन के दौरान अनेक दलित साहित्यकार लेखक व विचारक बौद्धिक पूंजी के निर्माण में जुटे हैं। मसलन, उत्तर भारत में सबसे अधिक सक्रिय लेखक व विचारक कंवल भारती “हिंदी साहित्य की समालोचना व चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु” पुस्तक लिखने में व्यस्त हैं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि उनका पूरा जोर इस अवधि का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने पर है। इस दौरान वे अपनी इस परियोजना को पूर्ण कर लेना चाहते हैं जो कि तीन खंडों में होगी। उनके मुताबिक, पहले खंड का कार्य पूर्ण हो चुका है। 

बाएं से कंवल भारती, भंवर मेघवंशी, अनिता भारती, प्रो. अर्जुन पटेल और संदीप मील

उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों जैसे फेसबुक पर समय नष्ट होता है। इसलिए उन्होंने फेसबुक से दूरी बना ली है। उन्होंने कहा कि दलित-बहुजन लेखकों को समय का महत्व समझना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके पास एक अवसर है जब वे अपने घरों में हैं और वे वंचित समाज के हितार्थ अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण लेखन पर पूरा फोकस कर सकते हैं।

अनिता भारती का फोकस दलित साहित्य और दलित स्त्री पर 

वहीं जानी-मानी दलित लेखिका अनिता भारती इन दिनों अपनी एक खास किताब को अंतिम रूप देने में रत हैं। उन्होंने बताया कि वे लंबे समय से  स्त्रियों के नजरिए से दलित साहित्य का दस्तोवजीकरण करने की इच्छुक रहीं हैं। इसी क्रम में वे इन दिनों दलित साहित्य व स्त्री रचनाकारों पर केंद्रित एक किताब लिख रही हैं। इसमें वे पहली पीढ़ी, जिनमें सावित्री बाई फुले की समकालीन दलित कवयित्रियों व साहित्यकारों की जीवनी को कलमबद्ध कर रही हैं। उनका कहना है कि लोगों को यह जानकारी ही नहीं है कि सावित्रीबाई फुले के निधन के उपरांत भी दलित महिलाओं का साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप बना रहा। लेकिन यह भी सच है कि इन सबका दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है।

“कितनी कठपुतलियां” लिख रहे हैं भंवर मेघवंशी

कंवल भारती और अनिता भारती की तरह ही युवा दलित लेखक भंवर मेघवंशी भी बौद्धिक पूंजी के निर्माण में जुटे हैं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इन दिनों एक उपन्यास लिख रहे हैं, जिसका नाम “कितनी कठपुतलियां” हैं। यह  उपन्यास वरिष्ठ रंगकर्मी और आरटीआई मूवमेंट के जाने-माने कार्यकर्ता शंकर सिंह की जीवनी पर आधारित है। इस संबंध में मेघवंशी विस्तार से बताते हैं कि शंकर सिंह बहुत जबर्दस्त कम्युनिकेटर हैं। जब उनके हाथ में कठपुतलियां थिरकती हैं तो जीवंत हो जाती हैं और जब वे सामाजिक परिवर्तन की बात करते है तब बहुत बड़ी संख्या में हर वर्ग के लोग उनसे प्रभावित होते हैं। 

मेघवंशी ने बताया कि पिछड़े वर्ग के एक साधारण ग्रामीण कलाकार ने किस तरह सूचना के अधिकार और पारदर्शिता व जवाबदेही के आंदोलन में अपनी सांस्कृतिक प्रतिभा का उपयोग लोक चेतना के जागरण हेतु किया,यह कहानी इस उपन्यास की विषयवस्तु है।

मेघवंशी ने बताया कि उनके जिले भीलवाड़ा में कर्फ्यू लगाए जाने और राजस्थान में लॉकडाउन लागू होने के बाद वे कहीं भी नहीं निकले हैं और लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं। इस दौरान उपन्यास लेखन के साथ ही वे सोशल मीडिया के जरिए एक विशेष कार्यक्रम “आओ किताब पढ़ें” का संचालन भी कर रहे हैं। इसके तहत 11 अप्रैल को जोतीराव  फुले की जयंती पर उनकी प्रसिद्ध क़िताब ‘गुलामगिरी’ का वाचन तथा 14 अप्रैल को डॉ. आंबेडकर की जयंती के मौके पर उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘जाति का विनाश’ का ऑनलाइन वाचन किया गया।

सोशल मीडिया पर विमर्श कर रहे प्रो. अर्जुन पटेल

गुजरात के सूरत में फुले-आंबेडकरी आंदोलन चलाने वाले प्रो. अर्जुन पटेल का पूरा फोकस कोरोना के संबंध में जागरूकता फैलाने पर है। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे व्हाट्सएप ग्रुप व फेसबुक के जरिए यह काम कर रहे हैं। इसके तहत वे विभिन्न विषयों पर टेलीफोनिक विचार-विमर्श करते हैं और इसके बाद ग्रुप में ऑडियो शेयर करते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक भयावह दौर है। उनका कहना है कि सरकारें श्रमिकों की कोई परवाह नहीं कर रही है जबकि कोरोना उनके लिए काल बनकर आया है। रोजी-रोजगार बंद हैं और उनके पास राशन-पानी नहीं है। ऐसा लगता है मानों सरकार उन्हें मृत्यूदंड दे रही है। 

संदीप मील सुना रहे हैं “रोज एक नई कहानी” 

राजस्थान के युवा कहानीकार संदीप मील लॉकडाउन की अवधि में एक खास प्रयोग कर रहे हैं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्होंने “रोज एक नई कहानी” सीरीज की शुरूआत की है। ये कहानियां दरअसल लघुकथाएं हैं जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की छोटी कहानियों की विशेषता यह होती है कि इन्हें अत्यंत ही कम समय में पढ़ा जा सकता है और इनके जरिए वे लोगों को समाज में घट रही विभिन्न परिस्थितियों के मद्देनजर उपयुक्त कदम उठाने का आह्वान भी करते हैं। इसके अलावा वे इन दिनों डॉ. आंबेडकर की शिक्षा दृष्टि पर एक विस्तृत शोधपरक लेख लिख रहे हैं, जिसका मकसद आज की पीढ़ी को डॉ. आंबेडकर की उस चेतना से परिचित कराना है जो वे भारतीय समाज को देना चाहते थे।

(संपादन : अमरीश)

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  1. Rameshwar Dangriwal Reply
  2. johndicosta Reply
  3. Arjun patel Reply

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