फुले-आंबेडकर की कला दृष्टि

फुले और आंबेडकर की कला-साहित्य दृष्टि भी इन्हीं चारों सूत्रों पर आधारित है। यही कारण रहा कि प्रचलित सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यता की संरचना को वे प्रभावी तरीके से भेदने में सफल हुए। साथ ही वैचारिक सर्जनशीलता के नये मार्ग भी प्रशस्त किये। बता रहे हैं सतीश पावड़े

भारतीय समाज में व्याप्त वर्चस्ववादी भेदभाव को सबसे अधिक चुनौती जोतीराव फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दी है। पहले जोतीराव फुले ने अपने विचारों से सदियों से शोषित और उत्पीड़ित शूद्र व अतिशूद्र समुदाय के लोगों को प्रेरणा दी और फिर डॉ. आंबेडकर ने उनके विचारों को आगे बढ़ाते हुए एक ऐसे भारत की नींव डाली जिसकी बुनियाद मनु संहिता नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष समतामूलक संविधान है। इन दोनों महापुरूषों ने समाज की हर बारीकी को समझा और उसमें शामिल विभाजनकारी तत्वों की पहचान करने के बाद लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। जाहिर तौर पर इनमें उनकी कला दृष्टि भी शामिल रही।

साहित्य, रंगमंच व कला के अन्य विधाओं के संबंध में फुले-आंबेडकर के विचार जमीन से जुड़े हुए थे। मसलन वे शोषितों-उत्पीड़ितों से जुड़े साहित्य के अधिक से अधिक प्रसार को बढ़ावा देते थे। मराठी ग्रंथकार सभा को लिखे एक पत्र में जोतीराव फुले लिखते हैं, ‘‘कुल मिलाकर सभी मानवों में परस्पर अक्षय भातृ-भाव किस प्रकार बढ सकता है, ऐसे बीजों की हमें खोज करनी चाहिए। उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना चाहिए। ऐसे समय अपनी आंखे बंद करना उचित नही है।”

वहीं 1956 में नागपुर के विदर्भ साहित्य संघ द्वारा आयोजित लेखक सम्मेलन में भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर कहते हैं, “जीवन में किसी प्रकार के भेदभाव के लिए कोई जगह नही होनी चाहिए। हमेशा जागरूक रहकर मनुष्य के कल्याण के बारे में सोचा जाना चाहिए। इसी प्रकार के साहित्य के सर्जन की समाज को आवश्यकता है। उदात्त जीवन मूल्य तथा सांस्कृतिक मूल्यों को साहित्य विधा से अविष्कृत करना और दीन-दलितों की व्यथा और वेदना को समझकर अपने साहित्य के माध्यम से उनका जीवन उन्नत करने के लिए प्रयासरत होने में ही सच्ची मानवता है।”

कला के क्षेत्र में सामंतवादी आचरणों पर टिप्पणी करते हुए “सत्सार-1” में फुले लिखते हैं, ‘‘नाटक या तमाशे में किसी लड़के को लुगाई वाली साड़ी पहनाकर, उसे स्त्रियों के गहनों से सजाकर उसे पूरी नारी की मूरत बना देते हैं। उसे नचवाते, भद्दे गाने गवाते, रंडी के समान नाज-नखरे करवाते, एक-दूसरे की गोद में बैठाते हैं, अगर इस तरह गाने-बजाने का अधिकार पुरुषों के लिए है, तो फिर यह अधिकार स्त्रियों को क्यों नहीं?’’ 

जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890) व डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956)

दोनों महानायकों के कलात्मक दृष्टिकोण में खास यही है कि वे हाशिए के सवालों को विषय बनाने पर जोर देते हैं। दो महत्वपूर्ण उदाहरणों द्वारा उनकी कलादृष्टि में निहित समता और बंधुता की भावनाओं को समझा जा सकता है। विश्व प्रसिद्ध नीग्रो उपन्यासकार हेरिएट एलिजाबेथ बिचर स्टोव ने अपने ‘अंकल टाम्स केबिन’ में नीग्रो समुदाय के लोगों पर किए जा रहे अमानवीय अत्याचार, उत्पीड़न तथा शोषण का चित्रण किया है। यह उपन्यास उस समय फुले के संग्रह में था। इस उपन्यास के संबंध में फुले लिखते हैं, “यह उपन्यास पढ़ा जाना चाहिए। यह आदमी को झकझोर कर रख देता है।’’ फुले ‘ब्लैक लिटरेचर’ (नीग्रो साहित्य) के गंभीर पाठक थे। वे नीग्रो समाज पर हो रहे अन्याय, अत्याचार , उत्पीड़न, शोषण एवं उनके विद्रोह से परिचित थे। इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ नीग्रो समाज को समर्पित की है।

इसी प्रकार डॉ. आंबेडकर भी भारतीय दलितों के संघर्ष को अमेरिकन नीग्रो के संघर्ष से जोडते है। “ब्रोकेन मैन” तथा “आय हैव नो माय मदरलैंड” को उन्होंने जरूरी साहित्य करार दिया था। भारतीय दलितों की वेदना भी वे इन्हीं शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त करते है। वर्ण और वर्ग के स्तर पर होने वाले शोषण की फुले-आंबेडकर दोनों ने हमेशा आलोचना की। “मानवता” उनकी कला दृष्टि का आधार है और केंद्र भी।

सर्जनशील लेखक, कलाकार की कलात्मक दृष्टि को समझना हो तो सुप्रसिद्ध मराठी आलोचक रा.ग.जाधव के ‘साहित्य चतुर्सूत्री’ सिद्धान्त पर गौर करना चाहिए। 

  1. मानवीय ज्ञानेंद्रिय जो संप्रेषित करती है वह – ‘संवेदनशीलता’ है।
  2. मानवीय कल्पना-शक्ति जो प्रेरित करती है वह – ‘प्रतिभा शक्ति’ है।
  3. मानवीय बुद्धि जो प्रदान करती है वह- ‘विवेकशीलता’ है।
  4. मानवीय सामंजस्यता को प्रदान करती है वह- ‘मूल्यात्मक अनुभूति’ है।

फुले और आंबेडकर की कला-साहित्य दृष्टि भी इन्हीं चारों सूत्रों पर आधारित है। यही कारण रहा कि वे प्रचलित सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यता की संरचना को वे प्रभावी तरीके से भेदने में सफल हुए। साथ ही वैचारिक सर्जनशीलता के नये मार्ग भी प्रशस्त किये। उन्होने केवल सत्य की खोज ही नहीं की, बल्कि सत्य का मार्ग भी चुना और उस पर अमल भी किया। एक तरह से फुले-आंबेडकर दोनों ही सर्जनशील सत्यशोधक थे। ‘सत्यमेव जयते’ इस वचन का उन्होंने जीवन भर अनुसरण भी किया। ‘सत्यमेव जयते’ यही उनकी कलादृष्टि और कलासृष्टि थी। (फुले तो अपने साहित्य-रचनाओं और चिठ्ठियों की शुरूआत ‘सत्यमेव जयते’ लिखकर ही करते थे)

फुले की कला दृष्टि :

फुले का ज्ञान असीम था। वे ग्रीक, लैटिन, अमेरिकी साहित्य और कला-विषयक विचारों के अध्येता थे। साथ ही उनका अंग्रेजी साहित्य और नाटकों का भी अच्छा खासा ज्ञान था। प्राचीन और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, कला-साहित्य का मूल्य-भाव, मूल्य व्यवस्था को वे समझ चुके थे। इसमें उनके सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्य शामिल थे।। वे मानते थे कि कला-साहित्य प्रबोधन और परिवर्तन का प्रभावी माध्यम है। खुद पाठशाला चलाते वक्त वे इसका ख्याल रखते थे। यहां तक कि शिक्षा नीति के संदर्भ में अंग्रेजी सरकार को सलाह देते वक्त उन्होंने उपयोगी कला/उपायोजित कला विषय अभ्यास-क्रम में रखने का आग्रह किया था।  ‘सत्यशोधक समाज’ के द्वारा चलाए जा रहे पाठशालाओं के लिए जो आर्थिक प्रावधान किए जाते थे, उसमें संगीत, निबंध, वक्तृत्व स्पर्धाओं के लिए विशेष निधि सुरक्षित रखा था। पाठशालाओं में संगीत-गायन के क्षेत्र में छात्राओं की रुचि विकसित करने हेतु स्वरमंडल, हार्मोनियम, मृदंग, ढोलक आदि वाद्यों की खरीद हेतु पैसे खर्च करने के प्रमाण मिलते हैं। इसके अलावा सत्यशोधक समाज के प्रचार-प्रसार के लिए अंभग, दिंडी, भारुड, पोवाडे गानेवालों को पुरस्कार दिया जाता था। फुले खुद कला प्रेमी थे, कला रसिक थे। वे मानते थे कि व्यक्तित्व विकास में कलाएं निश्चित रुप से भूमिका अदा कर सकती हैं।

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हंटर आयोग को दिये अपने ज्ञापन में उन्होंने व्यावहारिक और प्रगतिशील शिक्षा में यंत्र विद्या, नृविज्ञान, आरोग्य, कृषि कार्य के साथ उपयोगी/उपयोजित कलाओं का समावेश पाठ्यक्रम में करने की मांग की थी। सत्यशोधक विवाह विधि में डाका (डहाका), भराड (भारुड) और गोंधल इन लोक कलाओं का उपयोग करने के बारे में उन्होंने निर्देश दिये थे। उन्होंने स्वयं सत्यशोधकी विवाह के लिए अनेक गीत भी लिखे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन विवाह गीतों के माध्यम से उनकी कलात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका एवं प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है। वधु-वर और सामूहिक गानों के लिए अलग-अलग पद रचना की हैं। समय-समय पर उन्होंने पोवाड़ा, गोधल गीत, लोकगीतों का संकलन भी किया। शिवाजी महाराज पर उनके द्वारा लिखा पोवाड़ा, ‘कुलंबीन’ तो नाट्य-कलात्मकता से भरा है। उनकी लेखन शैली संवादात्मक है, क्योंकि नाट्यात्मक संवाद का प्रभाव इस संवाद शैली से निर्माण हो सकता है, यह उनकी धारणा थी। 

आर्या, दिंडी, वृत्तों के साथ कटाव शैली में भी उन्होंने अंभग रचे हैं। उन्होंने निबंध लेखन की एक नयी शैली विकसित की। कबीर के दोहों का प्रसंगानुसार उन्होंने कई जगहों पर उपयोग किया। पारंपरिक कला परंपरा को भंग करने वाले बहुत से कलात्मक प्रयोग उन्होंने किये। वीर रस में भी अंभगों की रचना उन्होने की है। उन्होंने अपनी अंखडों की रचनाओं को लोकगीत के ढांचे में ढाला। सत्य का शोधन करनेवाली यह एक नयी ‘अंखड’ शैली थी। उस काल में लिखे गये निरर्थक पोवाड़ों पर उन्होंने कड़ी टीका भी की है।। मामा परमानंद को लिखे हुए खत में उन्होंने अन्यत्र लिखे गए बनावट, नकली पोवाड़ों की घोर आलोचना भी की है। ऐसे ‘प्रक्षेप’ और बनावटी पोवाड़े के लिए उनके रचनाकारों का उन्होंने अच्छी खरी खोटी सूनाई। 

इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करनेवाली गैर जरूरी कलाओं के भी फुले घोर निंदक थे। जूलियस सीजर और शेक्सपियर के अन्य नाटकों को उन्होंने पढ़ा था। एक कुशल चिकित्सक की भांति समीक्षा करते हुए उन्होंने भारतीय धर्म का धार्मिक शोषण व्यवस्था से रिश्ता जोड़ा है। वे कहते हैं ‘जूलियस सीजर’ पहले लोकसत्तात्मक शासन का भक्त था लेकिन जैसे ही उसे सत्ता प्राप्त हुई उसने रोम के लोकसत्तात्मक राज्य के नुमाइंदों को गुलाम बनाने की कोशिश की। परिणामस्वरूप ब्रूटस ने उसका खून कर दिया। इस जुलियस सीजर की तुलना वे परशुराम के साथ करते हैं। लेकिन आगे चलकर वे कहते हैं कि परशुराम से भी अक्षम पेशवे थे। इस तरह नयी सर्जक और अन्वर्थक समीक्षा की एक नयी दिशा फुले ने दी।

 वे तानसेनी संगीत से लेकर सर जोन्स विलियम, कालीदास के शाकुंतलम्, गीत गोविंद के भाषांतर से मैक्समूलर, टामस पेन, मैकियावेली, निकालो, थियोडोर पार्कर, साक्रेटिस, ग्रांट जुफ, जार्जरिसो, जार्विस, जार्ज वाशिंग्टन, हेनरी विल्सन के विचारों एवं साहित्य से परिचित थे। इन रचनाकारों के कला-साहित्य के अध्ययन से वे मानवता की खोज कर रहे थे। 

फुले की कला-दृष्टि को समझने के लिए उनके एकमात्र नाटक ‘तृतीय रत्न’ का यहां विशेष उल्लेख करना आवश्यक है। वर्ष 1855 में उन्होंने यह नाटक लिखा था। इस नाटक के द्वारा उनकी कला-दृष्टि प्रभावी रूप से अविष्कृत होती है।

  1. जिस काल में केवल मनोरंजन के लिए नाट्य रचे जाते थे, उस काल में उन्होंने मनोरंजन के द्वारा प्रबोधन करने वाला ‘तृतीय रत्न’ नाटक लिखा।
  2. शूद्र, अतिशूद्र, बहुजनों के प्रश्नों को रखते हुए तृतीय नेत्र या रत्न को उन्होंने शिक्षा को कहा है।
  3. इस नाटक के विषय, आशय, कथानक, शैली, शिल्प, संवाद, पात्र-रचना, भाषा आदि को लेकर उन्होंने कई प्रयोग किये।
  4. उन्होंने सामाजिक रंगमंच की नींव रखी। उनके नाटक में शिक्षा-नाटक, मुक्त नाटक, प्रयोगधर्मी नाटक, विचार प्रधान नाटक की दृष्टियाँ मौजूद हैं।
  5. सूत्रधार के रूप में इस नाटक में वह स्वयं को खड़ा करते हैं।
  6. विश्वप्रसिद्ध नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त ने दूरी-भाव या अलगाव के सिद्धांत को नाट्य सिद्धान्तों में स्थापित किया। फुले के नाटक में यह सिद्धांत तत्व के रुप में ब्रेख्त के 75 साल पहले ही प्रकट हो चुका था।
  7. फुले की वैचारिक दृष्टि इस नाटक में कलात्मक रूप में अभिव्यक्त होती है। हमें सामाजिक दायित्व की प्रेरणा इस नाटक से मिलती है।
  8. इस नाटक में कलात्मक कृति का उद्देश्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
  9. गीत-संगीत, वेश-भूषा, रंगभूषा, बड़े-बड़े संवाद, मेलोड्रेमेटिक सिचुएशन, दैवी या राजा-महाराजा वाले पात्रों के बिना भी नाटक हो सकता है, यह बात उन्होंने ‘तृतीय रत्न’ के माध्यम से सिद्ध किया।

अंततः हम यह कह सकते है कि ‘तृतीय रत्न’ नाटक फुले की कला दृष्टि का एक प्रतीक है।

डॉ.आंबेडकर की कलादृष्टि

डॉ. आंबेडकर की कला-दृष्टि से प्रभावित महान साहित्यकार, लोकशाहीर, लोकगायक अन्नाभाऊ साठे कहते हैं- ‘‘जब लेखक सदैव अपने जनता के साथ होता है, तभी जनता उसके साथ होती है। विश्व के सभी कलाकारों ने कला-साहित्य को विश्व की तीसरी आँख माना है और वह हमेशा लोगों के साथ होना चाहिए।’’ वहीं प्रसिद्ध दलित लेखक डॉ. दामोदर मोरे कहते हैं- ‘‘लेखकों का जीवन के बारे में जो दृष्टिकोण होता है, वह उसके कला-कृति का स्वरूप निश्चित करता है, यानी लेखक के जीवन-विषयक दृष्टि का उसके साहित्य पर भी परिणाम होता है।”

फिर जैसा कि प्रसिद्ध दलित साहित्यकार ,डॉ. शरणकुमार लिंबाले कहते हैं, ‘‘प्रस्थापितों के साहित्य में आम आदमी कभी भी नायक के रूप में प्रस्तुत नही हुआ। क्योंकि प्रस्थापित लेखकों को आम आदमी में कभी नायक दिखा ही नहीं। लेकिन दलित और मार्क्सवादी साहित्य ने आम आदमी को भी एक  नायक के रुप में पहली बार खड़ा किया।”

यही समीक्षा की सच्ची आंबेडकरवादी दृष्टि है। इसलिए डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि आम आदमी का जीवन उन्नत करने के लिए कला, साहित्य के द्वारा साहित्यकारों को, कलाकारों को कार्य करना चाहिए, उसी में सच्ची मानवता है। स्वातंत्र्य, समता, बंधुता के माध्यम से इस मानवता की प्रतिष्ठा एवं सम्मान रखा जा सकता है।” इसी मानवता में डॉ. आंबेडकर को सौंदर्य की अनुभूति होती है। मानवता का, सर्वहारा वर्ग का सौंदर्यशास्त्र नयी समीक्षा के साथ डॉ. आंबेडकर रखते हैं। ‘ब्रोकेन मैन’ और ‘आय हैव नो माय मदर लैंड’ जैसा वैश्विक सत्य उन्हें चुभता है। ऐसे ही सत्य की खोज वह करते हैं। उनकी कला-दृष्टि का परिचय उनके अत्यल्प नाट्य-समीक्षा के द्वारा होता है। अपनी समीक्षा के माध्यम से वे एक नवीन सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का सृजन करते हैं। मानव जीवन में इन सांस्कृतिक मूल्यों का परीक्षण करना चाहिए, ऐसा आग्रह वे रचनाकारों से करते हैं।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एक अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। नेता, कार्यकर्ता, चिंतक, दार्शनिक, लेखक, वक्ता, संपादक, विधिज्ञ, समाज सुधारक, संशोधक आदि भूमिकाओं में उनके द्वारा किया गया कार्य बहुश्रूत है। साथ ही वह काव्यात्मक प्रवृत्ति के वाचक, रसिकाग्रणी तथा संवदेनशील कलाकार भी थे। उनके जीवन संघर्ष ने उन्हें प्रखर और आक्रामक बनाया था। उन्होंने अपनी कलम को हर पल समाज के हित में उपयोग में लाने हेतु प्राथमिकता दी। अपनी कलम को उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का बिम्ब बनाया। इस बिम्ब के द्वारा ही उन्होंने अपनी लेखन शैली का आदर्श प्रस्थापित किया।

उन्होंने प्रासंगिक तौर पर नाटकों की समीक्षा भी की है। इस समीक्षा लेखन में भी बाबासाहेब की वैचारिक भूमिका स्पष्ट रूप से उजागर होती है। उनकी यह नाट्य समीक्षा सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन का मानदंड है। जब नाट्य समीक्षा लिखनी हो तब कौनसी बातें महत्वपूर्ण होनी चाहिए, इसके बारे में भी उनकी समीक्षा मार्गदर्शक है। उनके द्वारा संचालित ‘जनता’ पत्र में प्रबोधनकार ठाकरे लिखित ‘खरा ब्राह्मण’(सच्चा ब्राह्मण) नाटक की समीक्षा उन्होंने की है। साथ ही यशवंत टिपणीस द्वारा लिखित ‘दख्खन चा दिवा’ (दख्खन का दीया) नाटक में राम शास्त्री के चरित्र के बारे में जो भूमिका बाबासाहेब ने लिखी  है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। तत्कालीन नाटककार मण्डली ‘अस्पृश्यता निर्मूलन’ के प्रश्न को किस नजरिये से देखते हैं, इस पर प्रकाश डालने का कार्य बाबासाहेब ने अपनी इस समीक्षा के द्वारा किया है। नाटक की रूपरेखा, सज्जा, पात्रों के गुण-अवगुणों से लेकर नाटककार की विचारधारा और उसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। नाट्य लेखन का मूल उद्देश्य क्या होना चाहिए? इस प्रश्न की चर्चा भी उन्होने इस समीक्षा के माध्यम से की है।

‘सच्चा ब्राह्मण’ नाटक में प्रबोधनकार ठाकरे ने ‘विठू महार’ नामक एक चरित्र का निर्माण किया है। इस चरित्र को लेकर बाबासाहेब ने नाटककार के समक्ष परोक्ष रूप से कई सवाल खड़े किये। इन प्रश्नों के द्वारा ‘अस्पृश्यता निर्मूलन’ के लिए आवश्यक संघर्ष, विद्रोह और ठोस भूमिका आदि का अभाव नाटककार की भूमिका में कैसे परिलक्षित होता है, इसे स्पष्ट किया है। नाटककार मूल प्रश्नों को किस तरह से अनदेखा करते है, इस पर भी वे प्रकाश डालते है। विठू महार अस्पृश्यता के यथार्थ को न स्वीकारते हुए उसे गौरवन्वित करता है। विठू महार, महार होकर भी अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष, विद्रोह क्यों नहीं करता? ये सवाल बाबासाहेब अपनी समीक्षा द्वारा खड़ा करते हैं। नाटककार का विठू महार परिस्थितिशरण, दैववादी है, उसे वह गुलामी मान्य है। इसलिए विठू ‘प्रतिरोध’ नहीं करता, न ही इसे ‘नकार’ देता है। वह परिस्थिति का ‘गुलाम’ है। लेखक द्वारा निर्मित ‘विठू महार’ का यह चरित्र बाबासाहेब को स्वीकार नहीं है। साथ ही डॉ. आंबेडकर संत एकनाथ महाराज की अस्पृश्यता निर्मूलन की भूमिका पर भी आक्षेप खडे करते है। उसकी बात भी इस नाट्य समीक्षा में बाबासाहेब ने की है।  वे अस्पृश्यता के प्रश्न को किस गहराई से तथा गंभीरता से देखते हैं ,ये बात भी यहां उजागर होती है। अस्पृश्यता निर्मूलन की भूमिका लेने वाले संत एकनाथ विठू महार की विधवा बहू के प्रतिरोध, विद्रोह, संघर्ष को कैसे रोकते हैं। उसका भी भंडाफोड़ बाबासाहब करते है। एकनाथ महाराज कहते हैं- ‘‘फिरा पाहू मागे, क्षेत्रस्थ ब्राह्मणाशी असे वर्दळीवर येऊ नये।’’ (लौट जाओ, ब्राह्मण्णों से मुंहजोरी/प्रतिवाद मत करो। पीछे जाओ, लौट जाओ) 

जब विठू महार पर ब्राह्मणों के मार्ग में आने का आरोप लगाकर उसे कोतवाल मारता-पीटता है, तब भी एकनाथ महाराज उसका कोई विरोध, प्रतिरोध नहीं करते। बस ब्राह्मण कैसे ज्येष्ठ है, श्रेष्ठ है, यही वे बार-बार कहना चाहते हैं। इतना ही नहीं, ब्राह्मणों ने शुद्रों को बहिष्कृत करने का जो कृत्य किया है उसका वह समर्थन करते हैं। इस बात पर बाबासाहेब ने प्रकाश डालकर सत्य को उजागर किया है।यह डॉ. आंबेडकर की सत्यान्वेषी, सत्यशोधकी नाट्य समीक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि आंबेडकर जब छात्र थे, तभी उन्होंने शेक्सपियर के “किंग लियर” नाटक का भाषांतर और दिग्दर्शन किया था। इस नाटक का मंचन भी उन्होंने अपनी चाॅल में किया था। कुल मिलाकर रंगमंच, नाटक से बाबासाहेब का निकट संबंध था। जब वे विदेश में थे तब वे भारत से नाटकों की पुस्तकें वहां मंगवाया करते थे। म.भि. चिटणीस लिखित ‘युगयात्रा ‘नाटक की परिकल्पना और शिल्प भी बाबासाहब का था। वे नाटक की बारिकियों को बखूबी समझते थे। इसलिए नाट्यसमीक्षा करते समय अपनी मीमांसा, युक्तिवाद को बहुत अभ्यासपूर्ण पद्धति से उन्होने रखा है। कला के माध्यम से संपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन ही बाबासाहेब का दर्शन था। एक नये आधुनिक विश्व के निर्माण में उनका यह चिंतन, दर्शन बहुत ही अमूल्य और महत्वपूर्ण है। हर कलाकार , साहित्यिक कार्यकर्ताओं को बाबासाहेब की इस भूमिका को आदर्श मानना चाहिए, उसको स्वीकार करना चाहिए और साथ ही उसका पालन भी करना चाहिए।

(मराठी से अनुवाद: डॉ. स्मिता वानखेडे, अतिथि अध्यापक, मराठी विभाग(साहित्य विद्यापीठ)म.गा.अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

(lसंपादन : नवल/इमानुद्दीन/अमरीश)

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