दलित पैंथर के स्थापना दिवस पर विशेष : जब दलितों के रक्त में आया था उबाल

बाबासाहेब की मृत्यु के बाद आंबेडकरवादी आंदोलन उनकी रखी नींव पर खड़ा हुआ। हमने उनकी विरासत आंबेडकरवादियों की पुरानी पीढ़ी से उत्तराधिकार में पाई थी और हम कुछ अलग करना चाहते थे। बता रहे हैं दलित पैंथर के सहसंस्थापक ज. वि. पवार

महाराष्ट्र में सन् 1972 में दलितों पर अत्याचार की दो घटनाओं ने दलित युवकों को आगबबूला कर दिया। पहली घटना पुणे जिले के बावडा गांव में हुई, जहां ग्रामवासियों ने दलितों का बहिष्कार कर रखा था। बहिष्कार का आह्वान, शहाजीराव पाटिल ने किया था। उनके भाई शंकरराव पाटिल राज्य मंत्री थे। इसके बाद यह मांग उठी कि इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए, शंकरराव को मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए। इसी बीच महाराष्ट्र के परभणी जिले के ब्राह्मणगांव (ब्राह्मणों के गांव) में दो दलित महिलाओं को नंगा कर घुमाया गया। उनका अपराध यह था कि वे अपनी प्यास बुझाने के लिए ‘ऊंची’ जातियों के कुएं की ओर जा रही थीं। वे घूंट भर पानी भी पी पातीं, उसके पहले ही जातिवादी गांव वालों ने उन्हें देख लिया और उन्हें न केवल नंगा कर गांव में घुमाया वरन उनके नंगे बदन पर बबूल की कांटेदार झाड़ियां भी फेंकी।

अनेक संगठनों ने इस घटना की निंदा की। मुंबई के वरळी में एक बैठक आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता करते हुए, बाबुराव बागूल ने दलित युवकों का आह्वान किया कि वे इस तरह के अत्याचारों के विरुद्ध लड़ने के लिए उठ खड़े हों। परंतु उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे किसी संघर्ष में वे सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगे और न ही किसी ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। हाथों में मशालें लिए हुए युवकों ने 27 मई को चेम्बूर पुलिस थाने तक मार्च निकाला। वी.एम. कदम, रतन साळवे, प्रोफेसर यादवराव गांगुर्डे और डी.एस. राजगुरु ने मार्च का नेतृत्व किया। उन्होंने चीफ इंस्पेक्टर सुरेश माथुरे को एक ज्ञापन सौंपा। युवक क्रांति दल नामक एक संगठन के लगभग 25 युवकों ने सचिवालय के समक्ष धरना दिया। इनमें प्रमुख रूप से हुसैन दलवाई, सुभाष पवार और हीरालाल मुणगेकर जैसे लोग थे। दलितों पर बढ़ते अत्याचारों के लिए प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस को दोषी ठहराया।

हम तीन : राजा ढाले, मैं और नामदेव ढसाळ

युवक आघाडी के नेताओं ने 28 मई को मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया था कि महाराष्ट्र देश का एक प्रगतिशील राज्य है। इसके बावजूद, उनके नेतृत्व वाली सरकार के शासन में सुल्तानपुर, बेलगांव, लोनगांव, बावडा और ब्राह्मणगांव सहित राज्य के कई हिस्सों में बौद्धों पर अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मांग की कि इन घटनाओं की न्यायिक जांच होनी चाहिए, ताकि दोषियों को सजा मिल सके और इन वर्गों की सुरक्षा के लिए एक विशेष शासकीय तंत्र बनाया जाना चाहिए। ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में राजा ढाले, चिंतामण जावळे, वसंत कांबळे, भगवान झरेकर और विनायक रंजने शामिल थे मधुकर धीव्वार, सुधाकर हलवादकर और अर्जुन डांगळे जैसे अन्य लोगों के नाम इसमें शामिल थे, परंतु इन लोगों ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि युवक आघाड़ी को प्रभावित गांवों में अपने प्रतिनिधि भेजकर घटनाओं की सही-सही जानकारी एकत्रित कर उन्हें रिपोर्ट सौंपनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि यद्यपि न्यायिक जांच अक्सर सच तक नहीं पहुंच पाती, परंतु वे इन घटनाओं की न्यायिक जांच करवा लेंगे और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने से पहले दोनों रिपोर्टों की तुलना करेंगे। मैं युवक आघाड़ी का सदस्य नहीं था, परंतु मैं उसके प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्यमंत्री से मिलने गया था। मुलाकात के बाद, वडाला स्थित सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में बैठक का आयोजन किया गया।

भगवान झरेकर और राजा ढाले, विद्यार्थी थे। ये लोग सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में रहते थे। नामदेव ढसाळ और मैंने मुख्यमंत्री के इस सुझाव को ख़ारिज कर दिया कि हम पीड़ितों से मिलकर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। हमारा मानना था कि इस काम के लिए सरकार के पास मशीनरी और गुप्तचर तंत्र है। हमारा तर्क था कि घटनाओं की जांच करना और अपने निष्कर्षों को सरकार को बताना हमारा काम नहीं है। हम दोनों ने इस मुद्दे पर बैठक का बहिष्कार कर दिया। 

ढसाळ और मैं एक ही इलाके में रहते थे। ढसाळ का घर जयराज भाई लेन में था। हालांकि यह नाम केवल नगर निगम के रिकॉर्ड में था। जयराज लेन को लोग, वहां बनने और बिकने वाले कबाबों की वजह से उस इलाके को ढोर चाल के नाम से जानते थे। उसे नवाब चाल भी कहा जाता था। पोस्टमैनों के अलावा, इस इलाके का सही नाम बहुत कम लोग जानते थे। ‘ढोर’ का अर्थ होता है मवेशी। इस शब्द का इस्तेमाल एक जाति विशेष के लिए किया जाता था। यह अत्यंत अपमानजनक था। मैं ढसाळ के घर के नज़दीक, कमाठीपुरा की फर्स्ट लेन में म्युनिसिपल सफाई कर्मियों को आवंटित घर में रहता था।  उसे सिद्धार्थ नगर के नाम से जाना जाता था। ढसाळ और मैं लगभग रोज़ मिलते थे। उनकी कविताओं का पहला श्रोता मैं ही होता था। मेरे घर में सुबह मुझसे मिलने के बाद भी, वे अक्सर मेरे कार्यालय आ जाते थे। मेरे घर की रोटियां और कैंपस कार्नर में स्थित ‘आप की दुकान’ रेस्टोरेंट की दाल हमारा लंच हुआ करती थी। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक कि मेरा दफ्तर चरनी रोड पर नहीं चला गया।   

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एक दिन सिद्धार्थ विहार से लौटते वक्त हमने सोचा कि दलितों पर अत्याचार करने वालों को सबक सिखाने के लिए क्यों न हम एक भूमिगत आंदोलन शुरू करें। हमने तय किया कि हम पीड़ितों से मिलेंगे और उनके पीड़कों से तुरत-फुरत निपटेंगे। परंतु इसमें एक समस्या थी और वह यह कि हमारा समाज इस तरह के आन्दोलनों को समर्थन नहीं देता और वह हम पर उल्टा पड़ जाता। इसके अलावा हम चर्चा में रहने के आदी हो गए थे।

इसके बाद कुछ समय तक हमनें कुछ भी नहीं किया। मैं हमेशा ही गर्मियों के अप्रैल और मई महीनों में बीमार पड़ जाता था। जब मैं नवीं क्लास में था, तभी से मैं काम और पढ़ाई दोनों एक साथ करता आ रहा था। उस साल के अप्रैल में भी मुझे टाइफाइड हो गया और मुझे पूरी तरह से आराम करने की सलाह दी गई। मैंने इस समय का उपयोग अख़बार पढ़ने में किया। फरवरी 1972 में मैंने मुंबई टेलीफोन विभाग से इस्तीफा देकर, बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी कर ली। यह इसलिए संभव हो सका, क्योंकि 1969 में इंदिरा गाँधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। मैं एमए की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। परंतु मेरी बीमारी और दलित आंदोलन में मेरी व्यस्तता के चलते मैं परीक्षा नहीं दे सका। अंततः स्नातकोत्तर डिग्री हासिल कर शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर शुरू करने का विचार त्यागकर मैंने आम्बेडकरवादी आंदोलन से जुड़ने का निर्णय किया।   

सन् 1972 की 29 मई को मैंने काम शुरू कर दिया। एक दिन ढसाळ मेरे घर आये। टाइफाइड से मुक्ति पाए मुझे बहुत दिन नहीं हुए थे और मुझे कमजोरी महसूस हो रही थी। हम विट्ठलभाई रोड पर अलंकार सिनेमा से होते हुए ओपेरा हाउस पहुंचे। वहां हमने मौसंबी का रस पिया। पैदल चलते-चलते हम दलितों पर अत्याचार से मुकाबला करने के लिए एक जुझारू संगठन बनाने की सम्भावना पर चर्चा कर रहे थे। हमने इस संगठन के लिए कई नाम सोचे और अंततः ‘दलित पैंथर’ को चुना। इस तरह, दलित पैंथर का जन्म तब हुआ, जब हम मुंबई की एक सड़क पर पैदल चल रहे थे। और उसने सड़कों पर उतर कर अपनी लड़ाई लड़ी!   

संगठन बनाने के निर्णय के बाद अगला कदम इसकी घोषणा करना था।  ढसाळ की समाजवादी आंदोलन में सक्रिय लोगों से अच्छी मेल-मुलाकात थी। इस आंदोलन की श्रमिक शाखा का दफ्तर, मेरे कार्यालय के नज़दीक राजा राममोहन रॉय रोड पर था। हम उस दफ्तर में टाइपिस्ट रमेश समर्थ से मिले। मैंने रमेश की कविताओं का संकलन लखलखत्या भाकरी (चमकती हुई रोटी) पढ़ा था। मैं उसे जानता था। रमेश ने दलित पैंथर के गठन की घोषणा करते हुए प्रेस वक्तव्य टाइप किया। पहले ढसाळ और फिर मैंने उस पर दस्तखत किये। ढसाळ ने वक्तव्य की प्रतियां अख़बारों और पत्रिकाओं के दफ्तरों में पहुंचाईं। नवा काळ, नव शक्ति, संध्याकाळ और मराठा ने उसे छापा। उसे दैनिकों में प्रमुखता नहीं मिली। क्योंकि पत्रकारों और पुलिस, दोनों को लगा कि यह एक और छोटा-मोटा संगठन है।

कोई भी व्यक्ति या संगठन अकेले कुछ नहीं कर सकता। उसे एक मज़बूत नींव पर खड़ा होना होता है, उसे दिग्गजों के कन्धों का सहारा चाहिए होता है। डॉ. आंबेडकर, बुद्ध और जोतीराव फुले के कंधों पर खड़े थे। बाबासाहेब की मृत्यु के बाद आंबेडकरवादी आंदोलन उनकी रखी नींव पर खड़ा हुआ।  हमने उनकी विरासत आंबेडकरवादियों की पुरानी पीढ़ी से उत्तराधिकार में पाई थी और हम कुछ अलग करना चाहते थे। दलित पैंथर के गठन के बाद, हमने एक रैली आयोजित करने का निर्णय लिया।  

मैंने एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया था– “महाराष्ट्र में जातिगत पूर्वाग्रह बेलगाम हो गए हैं और धनी किसान, सत्ताधारी और ‘ऊंची’ जातियों के गुंडे जघन्य अपराध कर रहे हैं। इस तरह के अमानवीय जातिवादी तत्वों से निपटने के लिए मुंबई के विद्रोही युवकों ने एक नए संगठन ‘दलित पैंथर’ की स्थापना की है। ज.वि. पवार, नामदेव ढसाळ, अर्जुन डांगळे, विजय गिरकर, प्रह्लाद चेंदवणकर, रामदास सोरटे, मारुती सोरटे, कोंडिराम थोरात, उत्तम खरात और अर्जुन कसबे, मुंबई के अलग-अलग स्थानों पर बैठकें कर रहे हैं, जिन्हें भारी समर्थन मिल रहा है।” 

(फारवर्ड प्रेस बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” से उद्धृत)

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