h n

कोरोना आर्थिक संकट : द्विजों के बदले बहुजनों को केंद्र में रख सरकार करे विचार

जब से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू हुई है, हर 25-30 वर्षों में उसे किसी न किसी रूप में मंदी के दौर से गुजरना पड़ा है। अपने खुशनुमा दौर में बड़े उद्यम, पूंजीपति सरकार को जितना कराधान आदि के रूप में देते हैं, एक अंतराल के बाद या समय-समय पर, सरकार को बेल-आउट पैकेज के रूप में उन्हें लौटाना पड़ता है। कोरोना के मद्देनजर उत्पन्न स्थितियों की विवेचना कर रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

उम्मीद है, कोरोना का प्रकोप दो-तीन महीनों में या तो चला जाएगा या फिर सीमित हो जाएगा। तब संभव है दुनिया पुराने दौर की वापसी का स्वप्न देखने लगे। क्या वह आसान होगा? शायद नहीं! क्योंकि कोरोना भले चला जाए, उसका घाव भुलाने में वर्षों लगेंगे। इस महामारी का सबसे बुरा असर मजदूरों पर पड़ा है। दुनिया-भर से श्रम-शक्ति का पलायन हुआ है। भारत के संदर्भ में कहें तो यह आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन है। सड़कों और राजमार्गों से पलायन के ऐसे-ऐसे दर्दनाक चित्र सामने आ रहे, जैसी कभी कल्पना नहीं की थी। किसे पता था कि जिन राजमार्गों को भारत की प्रगति का आइना बताया जा रहा है, उनपर उसके विकास के खोखलेपन की चलती-फिरती मूरतें नजर आने लगेंगी। विभाजन की त्रासदी की तरह संभव है इस महामारी द्वारा दिए गए जख्मों को भुलाने में भी हमें दशकों लग जाएं। विशेषरूप से उन्हें जिन्होंने इस महामारी के कारण अपनों को खोया है या अपनी जमी-जमाई गृहस्थी के साथ पलायन से गुजरना पड़ा है।

भारत में पूंजीवादी दुश्चक्र

असल में कोरोना के बाद उत्पन्न हुईं परिस्थितियों ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर निर्णायक सवालों को जन्म दिया है। इस लिहाज से भारत सरकार भी बेहतर स्थिति में नहीं है। भारत में ज्यादातर जीवनरक्षक दवाएं सस्ती हैं। इसलिए अंबानी, अडाणी दवा उद्योग में निवेश से कतराते हैं। एक और बात है।  भारत में दो तरह की दुनिया बसती है। पहली वह दुनिया जो अमेरिकी उद्योगपतियों की तरह केवल और केवल मुनाफे के लिए काम करती है। जिसका देश के अधिकांश संसाधनों तथा शासन-प्रशासन पर कब्जा है। दूसरी ओर वह दुनिया जो विपन्न एवं साधनविहीन है। पूंजीपतियों द्वारा बनाई गई अर्थव्यवस्था के अनुसार ढल जाना जिसकी मजबूरी है। इसमें किसान, मजदूर, शिल्पकार सभी शामिल हैं। बावजूद इसके सरकार का हर नारा पूंजीपतियों के हक में होता है। वर्तमान सरकार की तो यह मजबूरी भी है। कारण है कि उनका सारा टैलेंट, सारी बौद्धिक क्षमता, हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने में लगी रहती है। महत्त्वपूर्ण पदों पर ऐसे आदमियों को बिठाया हुआ है जो उनके सांप्रदायिक हितों के अनुसार काम कर सकें। इसी तरह के मामलों में उनका दिमाग चलता है। इसलिए वास्तविक चुनौती के समय वे कोई सार्थक समाधान नहीं खोज पाते। इस मामले में अधिकांश ठेठ परंपरावादी हैं। सोचते हैं कि जैसे वर्ण-व्यवस्था में व्यापार करना, रुपया कमाना वैश्यों का काम था, वैसे ही आधुनिक समाज में यह जिम्मेदारी पूंजीपतियों और व्यापारियों की है। उन्हीं की सिफारिश पर पूंजीपतियों के लिए समय-समय पर राहत पैकेज का ऐलान किया जाता है। पिछले छह वर्षों में सरकार ने करीब दस लाख करोड़ रुपए की राहत प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बड़े उद्योगपतियों और बकायेदारों को प्रदान की है। इसमें छह लाख लाख करोड़ रुपए की ऋण-माफी भी शामिल है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण : हाशिए पर बहुजन श्रमिक

कोरोना महामारी की सबसे बुरी मार मजदूरों तथा छोटे कारोबारियों पर पड़ी है। इनमें बहुलांश बहुजन हैं। मगर केंद्र सरकार ने बड़े पूंजीपतियों को राहत पहुंचाने के लिए श्रम-कानूनों में ढील देने की शुरुआत कर दी है। मजदूरों को मिलने वाली दूसरी अनिवार्य सुविधाओं पर कैंची चलना भी तय है। दैनिक कार्यघंटों में वृद्धि श्रमिकों से कुछ घंटे ज्यादा काम लेने का मुद्दा-भर नहीं है। मनुष्य और मशीन में भेद बनाए रखने का मामला भी इससे जुड़ा है। कारखानों में काम करने वाले हर श्रमिक का अपना जीवन है। उसकी जरूरतें हैं। एक इंसान की तरह उसे भी दिन के कुछ घंटे अपनी तरह, अपने लिए, आजादी के साथ जीने का अधिकार है। इसी से 8 घंटे के कार्यदिवस की संकल्पना बनी थी। उस अधिकार को प्राप्त करने के लिए मजदूरों को लगभग सौ वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था। हजारों को जान तक देनी पड़ी थी। सरकारें जैसे श्रम कानूनों में ढील दे रही हैं, उससे लगता है कि लॉकडाउन के दौरान पूंजीपतियों पर आए डेढ़-दो महीने के संकट ने उनकी सारी कुर्बानियों और संघर्ष पर पानी फेर दिया है।

आर्थिक मंदी : स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक लक्षण

अब सवाल यह है कि मजदूर क्या करें? उसके पास महामारी के टलने का इंतजार करने, और जैसे ही कारखाने खुलें वापस लौटकर मालिकों के आगे समर्पण कर देने के अलावा रास्ता भी क्या है! देखा जाए तो यही सबसे आसान काम होगा। अनेक के लिए निर्विकल्प भी। इसके लिए सरकार उनकी सराहना करेगी। देश-निर्माण में सहयोग बताकर पीठ थपथपाएगी। यदि मजदूर वर्ग ऐसा नहीं करता है तो उसके पास खुद को संभालने का क्या विकल्प हो सकता है? 

अगर हम ध्यानपूर्वक देखें तो दुनिया में जब से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू हुई है, हर 25-30 वर्षों में उसे किसी न किसी रूप में मंदी के दौर से गुजरना पड़ा है। हर बार सरकारें राहत पैकेज जारी करके उसे उबारती आई हैं। अपने खुशनुमा दौर में बड़े उद्यम, पूंजीपति सरकार को कराधान आदि के रूप में जितना देते हैं, एक अंतराल के बाद या समय-समय पर, सरकार को बेल-आउट या राहत पैकेज के रूप में उन्हें वापस लौटाना पड़ता है। हाल के वर्षों में औद्योगिक मंदी की बारंबारता में वृद्धि हुई है। इकीसवीं शताब्दी की ही बात करें तो 2008, 2012 और 2020 मंदी के तीन बड़े दौर वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं झेल चुकी हैं। महामारी न भी होती, तो भी अर्थव्यवस्थाओं पर मंदी का दौर जारी रहता। पिछले छह वर्षों में सरकार ने पूंजीपतियों को सहारा देने के लिए श्रम-कानूनों में कई बार संशोधन किया है। कोरोना संकट के बहाने, इस बार श्रम-कानूनों में बड़े पैमाने पर कतर-ब्योंत का इरादा है।  

विकल्प और भी हैं 

श्रम-कानूनों में किए गए हस्तक्षेप को अस्थायी मान लें तो भी उत्पन्न संकट आसानी से टलने वाला नहीं है। अव्वल तो कोरोना की आशंका के चलते सरकार श्रमिकों को वापस बुलाने के लिए जल्द कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाएगी। दूसरे जो मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर, धक्के खाते हुए अपने गांव-घरों तक पहुंचे हैं, वे भी आसानी से लौटने को तैयार नहीं होंगे। स्थिति से निपटने के लिए कुछ समर्थ उद्यमी स्वचालित मशीनीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं, इससे प्रौद्योगिकीय संपन्न देशों में नई तकनीक की मांग बढ़ेगी। परंतु औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है, फैला हुआ बाजार और संपन्न उपभोक्ता। ऐसा न होने पर नई प्रौद्योगिकी भी उद्योगों को अपेक्षित लाभ नहीं पहुंचा पाएगी! ऐसे में सरकार क्या करे? मजदूर क्या करें? और अभी तक जो बेरोजगार थे, वे क्या करें?

यह भी पढ़ें : कोरोना काल में सामंतों व सूदखोरों से गरीबों को निजात दिला सकता है मनरेगा

इसके लिए इतिहास में झांककर देखने की है। भारतीय समाज भले ही जाति के आधार पर बंटा हुआ, बिखरा हुआ समाज रहा हो मगर आर्थिक दृष्टि से यह देश हमेशा ही आत्मनिर्भर देश रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य के बाद औरंगजेब के शासनकाल तक वह चीन के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश रहा है। जबकि दो बार वह चीन को पछाड़कर विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्था वाला देश बनने में कामयाब रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल तक स्वतंत्र व्यापारी वर्ग का उदय नहीं हुआ था। उत्पादक सीधे उपभोक्ताओं तक माल पहुंचाते थे। इस काम के लिए उनके अपने संगठन थे। जुलाहा, बुनकर, कसाई, राजमिस्त्री, बढ़ई, नाई, दर्जी यहां तक कि लुटेरों के भी अपने संघ थे। रमेशचंद मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘को-ऑपरेट लाइफ इन एन्शीएंट इंडिया’ (पृष्ठ 15-17) में 31 प्रकार के संघों की सूची दी है। सत्तिगुंब जातक (जातक संख्या-503) में 500 चोरों के एक गांव का उल्लेख है। वे संगठन इतने शक्तिशाली थे कि उनके आंतरिक कार्यकलापों में हस्तक्षेप करने का अधिकार राज्य को भी नहीं था। हर्षवर्धन के शासनकाल तक उन संघों की उपस्थिति बनी रही। उसके बाद जैसे-जैसे भारत में बिखराव शुरू हुआ, सहकारी संगठन भी अपनी आब खोने लगे थे। मुगलों के शासनकाल में एक बार फिर विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का दौर आया जिसमें छोटे-छोटे उद्यम खूब फले-फूले।

क्या उस दौर की वापसी संभव है? दो शताब्दियों से जबसे पूंजीवाद ने रफ्तार पकड़ी है, उसे निर्विकल्प मान लिया गया है। ऐसे में जब वह अपने ही बोझ से हांफने लगा है, मजदूरों और शिल्पकारों के पास अवसर होगा कि वे इस अवधारणा को चुनौती दे सकें। मनरेगा जैसी योजनाएं आजीविका का सीमित और अस्थायी विकल्प हो सकती हैं, परंतु उनके लिए अच्छा होगा कि अपनी अपने अनुभव और हुनर को उत्पादकता में बदलें। सामान्य हितों की पहचान कर एकजुट हो जाएं। वे चाहें तो लंदन के उन 28 बुनकरों से भी प्रेरणा ले सकते हैं, जिन्होंने 1844 में ‘रोशडेल पार्यनियर्स’ की स्थापना कर, विश्व के सबसे पहले और सर्वाधिक कामयाब सहकारी संगठन की शुरुआत की थी।

सरकार क्या कर सकती है

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर होने का नारा दिया था। यदि सरकार सचमुच इस बारे में गंभीर है तो उसे चाहिए कि तकनीकी एवं प्रौद्योगिकीय शोध, जिसपर अभी तक पूंजीपतियों का कब्जा है, उसे उनके चंगुल से मुक्त करे। नए शोध क्षेत्रों में लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्यमों से जुड़े आविष्कारों को प्राथमिकता दी जाए। राजनीतिक दृष्टि से हम चीन की चाहे जितनी आलोचना करें, लेकिन देश और समाज की आत्मनिर्भरता उद्योगों के विकेंद्रीकृत चीनी मॉडल के जरिये ही प्राप्त की जा सकती है।

(संपादन : नवल)

लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

संबंधित आलेख

अयोध्या में राम : क्या सोचते हैं प्रयागराज के दलित-बहुजन?
बाबरी मस्जिद ढहाने और राम मंदिर आंदोलन में दलित-बहुजनों की भी भागीदारी रही है। राम मंदिर से इन लोगों को क्या मिला? राम मंदिर...
सरकार के शिकंजे में सोशल मीडिया 
आमतौर पर यह माना जाने लगा है कि लोगों का ‘प्यारा’ सोशल मीडिया सरकार का खिलौना बन गया है। केंद्र सरकार ने कानूनों में...
जातिवादी व सांप्रदायिक भारतीय समाज में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता
डॉ. आंबेडकर को विश्वास था कि यहां समाजवादी शासन-प्रणाली अगर लागू हो गई, तो वह सफल हो सकती है। संभव है कि उन्हें यह...
किसान आंदोलन के मुद्दों का दलित-भूमिहीनों से भी है जुड़ाव : मुकेश मलोद
‘यदि सरकार का नियंत्रण नहीं होगा तो इसका एक मतलब यह भी कि वही प्याज, जिसका वाजिब रेट किसान को नहीं मिल रहा है,...
कह रहे प्रयागराज के बहुजन, कांग्रेस, सपा और बसपा एकजुट होकर चुनाव लड़े
राहुल गांधी जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के क्रम में प्रयागराज पहुंचे, तब बड़ी संख्या में युवा यात्रा में शामिल हुए। इस दौरान राहुल...