मधुबनी पेंटिंग को नया आयाम दे रही हैं बहुजन महिलाएं

मधुबनी चित्रकला पर शुरू से ही उच्च जातियों का एकाधिकार रहा है. सन् 1960 के दशक में बिहार में पड़े अकाल ने इस कला को व्यवसाय में बदल दिया, जिसके बाद से दलित और अति पिछड़ी जातियों की महिलाओं ने इसे अपनाया और इस पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी

रामायण पर आधारित मौखिक आख्यानों के अनुसार, मिथिला के शासक जनक ने अपने पुत्री सीता के राम के साथ विवाह के अवसर पर मिथिला की महिलाओं को आदेश दिया कि वे चित्रों से पूरे राज्य को सजा दें। तदानुसार महिलाओं ने गाय के गोबर और प्राकृतिक रंगों से अपने घरों की दीवारों पर सुन्दर चित्र बनाए। परन्तु इन आख्यानों से यह पता नहीं चलता कि इन महिलाओं की जाति क्या थी।  

सन् 1960 के दशक के पूर्वार्द्ध में बिहार भयावह अकाल की चपेट में आ गया। चारों ओर भूख और गरीबी का आलम था। सरकार ने अकाल राहत कार्यक्रम के अंतर्गत वंचित तबकों को कृषि से इतर अन्य क्षेत्रों में जीवनयापन के साधन उपलब्ध करवाने का अभियान चलाया। इसी अभियान के अंतर्गत बम्बई के कलाकार भास्कर कुलकर्णी को  50 हजार रुपए का अनुदान उपलब्ध करवाया गया।

कुलकर्णी ने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया। मधुबनी जिले के दक्षिण-पूर्व में स्थित जितवारपुर गांव में उन्होंने मिट्टी की दीवारों पर लोककथाओं पर आधारित चित्र देखे। प्राकृतिक रंगों से बने इन चित्रों की सुन्दरता से अत्यंत प्रभावित कुलकर्णी ने गांव की महिलाओं को इन्हीं चित्रों को कागज़ पर उकेरने के लिए प्रोत्साहित किया। महिलाओं द्वारा बनाए गए ये चित्र 1962 में दिल्ली में आयोजित एक औद्योगिक प्रदर्शनी में रखे गए और 5 रुपए से लेकर 35 रुपए प्रति चित्र की दर पर हाथों-हाथ बिक गए। इस तरह यह कला एक व्यवसाय में बदल गई और गांव की महिलाओं को दुनिया को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। परन्तु क्या यह अवसर सभी समुदायों की महिलाओं को बराबर उपलब्ध था? क्या वे सभी अपनी प्रतिभा से धन कमाने में सक्षम थीं?  

‘हरिजनी’ पेंटिंग

अपने काम में व्यस्त शांति देवी (छायाचित्र memaraki.com के सौजन्य से)

वूमेंस आर्ट जर्नल, वर्ष 11, अंक 1 (वसंत-ग्रीष्म 1990) में प्रकाशित अपने लेख द नैरेटिव पेंटिंग्स ऑफ़ इंडियाज जितवारपुरी वीमेन में जगदीश जे. चावड़ा लिखते हैं कि मधुबनी चित्रों के व्यवसाय में मुख्यतः ब्राह्मण, कायस्थ और दुसाध जातियों की महिलाएं हैं। ब्राह्मण और कायस्थ महिलाएं अपनी कला को एक निश्चित खांचे में अभिव्यक्त करती हैं। वे दुर्गा, काली और गणेश के चित्र बनाती हैं तथा राम-सीता कथा और शिव-पार्वती विवाह से संबंधित प्रसंगों को दर्शाती हैं। दूसरी ओर, ‘हरिजनी’ चित्र मुख्यतः दलित और अन्य पिछड़ी जातियों की महिलाओं द्वारा बनाये जाते हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं दुसाध समुदाय की हैं। ‘हरिजनी’ चित्रों के विषय ज़मीन से जुड़े होते हैं। उनमें आप बकरी, हाथी, मोर और अन्य जानवरों की छवियां देख सकते हैं तो रसोईघर में खाना पकाती महिला के दर्शन भी कर सकते हैं। ये महिलाएं अपनी जातियों के लोकनायक जैसे राजा सलहेस और राहु-केतु के चित्र भी बनाती हैं। क्या उनकी जाति के कारण इन महिलाओं के लिए हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र बनाना प्रतिबंधित है? या फिर वे अपने मन से ऐसा करती हैं?

गृहिणी से चित्रकार 

शांति देवी मिथिला के दुसाध जाति से आती हैं और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मधुबनी चित्रकार हैं। गृहिणी से चित्रकार बनने की अपनी यात्रा के अनुभव उन्होंने फोकार्टोपीडिया  के साथ एक साक्षात्कार में साझा किए। उन्होंने बताया कि एक दलित जाति में पैदा होने के कारण उन्हें शिक्षा से दूर रखा गया। बचपन में ऊंची जातियों की लड़कियों को स्कूल जाते देख उन्हें भी पढ़ाई करने की इच्छा होती थी, परन्तु उनकी खेतिहर मजदूर मां की इतनी हैसियत कहों थी कि वे उनकी पढ़ाई का खर्च उठा सकें। उसके अलावा, उनकी मां दलितों के शिक्षा ग्रहण करने पर जो सामाजिक प्रतिबंध थे, उन्हें  तोड़ने से डरती भी थीं।

इस सबके बावजूद एक दिन शांति देवी स्कूल पहुंच ही गयीं। परन्तु वहां उनका सामना जातिवाद से हुआ। उनके शिक्षक छुआछूत में विश्वास रखते थे और कक्षा में उन्हें दूसरों से अलग बिठाया जाता था। उच्च जातियों के शिक्षक उन्हें अपमानित करते थे। इन सारी कठिनाईयों के बावजूद वह मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने में सफल रहीं। जब वे 15 साल की थीं तब उनका विवाह कर दिया गया। उनके पति के परिवार के पास न तो रहने को ढंग का घर था और न खाने को पर्याप्त भोजन।  

‘लड़ते हुए हाथी’, 1981, शांति देवी (छायाचित्र मिथिला आर्ट इंस्टिट्यूट के सौजन्य से)

शांति देवी ने अपनी मां को घर की दीवारों पर चित्र बनाते देखा था। उनके ससुर भी चित्रकार थे परन्तु शांति देवी को यह अंदाज़ा ही नहीं था कि चित्र बनाकर वे जीविकोपार्जन भी कर सकती हैं। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि किसी दिन वे एक व्यावसायिक चित्रकार बनेंगी।

उनके गाँव लहेरियागंज में उनके बनाए चित्रों को कभी प्रशंसा हासिल नहीं हुई। कला पर उच्च जातियों का एकाधिकार था। वह तो भला हो एक अमरीकी शोधार्थी का जो उनके गांव आया और उनके काम को देख कर चमत्कृत रह गया। उसने शांति देवी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोत्साहित किया।

उन्होंने मधुबनी चित्रकला के इस विशेष शैली को क्यों चुना? उनका कहना है कि दलितों को हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र बनाने की अनुमति नहीं थी। उन्हें याद है कि एक बुजुर्ग ब्राह्मण ने उन्हें और उनके पति को यह चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने काली, दुर्गा, शिव या पार्वती के चित्र बनाना जारी रखा तो उन्हें गंभीर परिणाम भोगने पड़ेंगे। इसके बाद उन्होंने गांव के पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के चित्र बनाने शुरू कर दिए। बाद में वे अपनी जाति के नायक-नायिकाओं जैसे राजा सलहेस, मचर्कंद और मैना सती के चित्र भी बनाने लगीं।

शांति देवी ने बताया कि जब भी मधुबनी चित्रकला के बारे में जानकारी हासिल करने कोई व्यक्ति उनके गांव आता है, ऊंची जातियों के लोग उसे अपनी जाति के चित्रकारों के पास भेजते हैं। दलितों को अपनी कला को बढ़ावा देने का अवसर नहीं मिलता।

शांति देवी ने उन्हें प्राप्त राष्ट्रीय पुरस्कार को राष्ट्रपति को लौटते हुए लिखा, “मेरे पास इस पुरस्कार को रखने के लिए घर नहीं है। ऐसे में यह मेरे किस काम का है।” इसके बाद सकते में आई सरकार ने घर बनाने के लिए उन्हें 62 हजार रुपए का अनुदान दिया। इससे गांव के ऊंची जातियों के लोग जलभुन गए और उन्होंने शांति देव के घर के निर्माण में बहुत अड़ंगे लगाए।

शांति देवी की आपबीती से साफ है कि जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह, कला का क्षेत्र भी जाति के दंश से मुक्त नहीं है। वे कहती हैं, “लोग आज भी छुआछूत मानते हैं। आज भी दलितों के अवसरों को ऊंची जातियों के लोग हथिया लेते हैं।” वे दुखी और नाराज़ हैं कि सरकार ने 1980 के दशक से लेकर अब तक मधुबनी चित्रों की अनेक प्रदर्शनियां लगाईं परन्तु अधिकारियों ने कभी यह प्रयास नहीं किया कि इन आयोजनों की पूर्व जानकारी दलित कलाकारों तक पहुंचाई जाय। उनमें से अधिकांश अशिक्षित होने के कारण प्रदर्शनियों के बारे में प्रकाशित होने वाले विज्ञापन ही नहीं पढ़ पाते थे।

मजदूर से चित्रकार

दुलारी देवी को वर्ष 2013 के बिहार सरकार द्वारा स्थापित उत्कृष्टता पुरस्कार से सम्मानित किया गया ( छायाचित्र मिथिला आर्ट इंस्टिट्यूट के सौजन्य से)

दुलारी देवी ने सायराक्यूज आर्ट्स साइंसेज चैनल से बातचीत में अपने संघर्ष की कहानी सुनाई। वे मछुआरा (एक अति-पिछड़ी जाति) समुदाय से आती हैं। वे ऊंची जाति के एक चित्रकार के घर पर घरेलू कामकाज करती थीं। घर की युवा महिलाओं को चित्रकारी करते देख उनके मन में चित्र बनाने की इच्छा जगी। परन्तु वे अपनी इच्छा को व्यक्त करने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। आखिर एक दिन उन्होंने घर के मुखिया से बोल ही दिया कि वे किसी कला प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला लेकर चित्रकला सीखना चाहती हैं। उस परिवार ने उनका दाखिला एक केंद्र में करवा दिया जहां उन्होंने चित्रकला सीखी। परन्तु वह अपने दम पर यह नहीं कर सकती थीं। उन्हें ऊंची जाति के धनी परिवार की मदद लेनी ही पड़ी।

दुलारी देवी अब एक मास्टर पेंटर हैं और मिथिला आर्ट इंस्टिट्यूट में प्रशिक्षक हैं। उन्हें 2013 में बिहार सरकार के कला उत्कृष्टता पुरस्कार से नवाज़ा गया। वे मिथिला की ऐसी पहली चित्रकार हैं जिन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी है। उनकी आत्मकथा फॉलोइंग माय पेंट ब्रश (तारा बुक्स, 2010) को पुरस्कार भी मिला है।

शांति देवी और दुलारी देवी के अनुभव से साफ़ है कि दलित और ओबीसी कलाकारों को अपनी कला से जीवनयापन करने का अवसर नहीं मिलता। पारंपरिक रूप से ऊंची जातियों की महिलाएं ही मधुबनी चित्रकार रहीं हैं और दलित और ओबीसी महिलाओं को अपना काम आगे बढ़ाने के लिए लैंगिक और जातिगत वर्जनाओं का सामना करना पड़ता है। अपना व्यवसाय प्रारंभ करने में उन्हें आर्थिक परेशानियां आती हैं और ब्राह्मण और कायस्थ अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उनकी राह में रोड़े अटकाते हैं।

आज कई दलित और ओबीसी महिलाएं, शांति देवी और दुलारी देवी से प्रेरणा लेकर मधुबनी चित्रकार बनने की इच्छुक हैं। मधुबनी चित्रकला की नयी शैली केवल एक कला नहीं है। वह महिला सशक्तिकरण का उपकरण भी है। दलित और अति पिछड़े वर्गों की महिलाओं का भी यह स्वप्न है कि वे देश-विदेश में होने वाली बड़ी प्रदर्शनियों में भाग लें और नाम कमाएं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से उनकी मदद करने और उनकी कला को मान्यता देने की अपील की है। वे जानती हैं कि पुरस्कारों से पेट नहीं भरता।

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया संपादन : नवल)

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