दलित पैंथर आंदोलन : जैसा मैंने पाया

मोहनदास नैमिशराय बता रहे हैं कि दलित पैंथर की सफलता में दलित साहित्य की अहम भूमिका रही। मसलन नामदेव काव्य संग्रह ‘गोलपीठा’ जो कि 1972 में प्रकाशित हुआ। जिसके आने पर मराठी साहित्य जगत में एक भूचाल सा आ गया। बहुत से सवर्ण लेखकों और समीक्षकों को बुरा लगना लाजमी था

वर्ष 1956 में डॉ. बी. आर. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के उपरांत 1970 के दशक में महाराष्ट्र में दलित पैंथर का अस्तित्व में आना ऐतिहासिक परिघटना रही। इसके संबंध में सह-संस्थापक रहे ज. वि. पवार द्वारा लिखित व फारवर्ड प्रेस बुक्स द्वारा प्रकाशित आधिकारिक इतिहास को दलित अस्मिता से स्वयं दलित लेखकों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं का रू-ब-रू कराने की एक जरूरी कवायद कहा जा सकता है। कहना न होगा कि भारत का दलित पैंथर और अमेरिका का ब्लैक पैंथर दोनों सामाजिक संगठनों ने विश्व को ऐसे आलोकित किया था, जैसे बरसात की अंधेरी रात में आकाशीय बिजली करती है। दलित पैंथर संगठन ने अपने कार्यकर्ताओं की जुझारूपन व प्रतिबद्धता के बल पर सरकारी मशीनरी को हिला कर रख दिया था और स्वयं दलितों को उनकी नींद से जगाकर उन्हें तत्कालीन हालातों पर सोचने के लिए मजबूर किया था। फिर भी दलित पैंथर का आंधी की तरह आना और तूफान की तरह चले जाना अपने पीछे कई सवाल खड़े करता है। दलित पैंथर की आंदोलनात्मक गतिविधियों का विश्लेषण करते हुए कहा जा सकता है कि इसके आंदोलन काल की अवधि दलितों के लिए महत्वपूर्ण तो थी ही, साथ ही प्रभावपूर्ण भी।

वैसे तो हर आंदोलन की उम्र होती है। किसी भी आंदोलन से आंदोलनकारी जुड़ते हैं और अलग होते हैं। दलित पैंथर संगठन में भी जुड़ने और अलग होने की प्रक्रिया अंत तक बनी रही। पर खेद की बात यह रही कि दलित पैंथर के उगने और अस्त होने के बीच फासला बहुत कम रहा। 

आंबेडकर के उपरांत दलित आंदोलन के सूत्रधार बने इस जुझारू संगठन से जुड़े इतिहास के पन्नों का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि इसका जन्म 29 मई, 1972 को हुआ था। और बाद में सिर्फ 5 साल बाद 7 मार्च, 1977 को मुंबई में आयोजित एक प्रेस वार्ता में इसे भंग करने की घोषणा कर दी गई। जाहिर सी बात है कि संगठन के सूत्रधारों में मतभेद हुआ। मंजिल तक पहुंचने के लिए उनके रास्ते अलग-अलग रहे। जिन पर वे अकेले नहीं अपने समर्थकों को भी चलने के लिए प्रेरित किया। उनके बीच गहराया मतभेद बंद कमरों से सड़क पर भी आया। कहा जा सकता है कि मतभेदों का अलग-अलग चरण में विस्तार भी हुआ। पर इतना तो हुआ कि दलितों के भीतर अस्मिता बोध हुआ। वे जागरूक भी हुए।

इस संदर्भ में मैं ज. वि. पवार द्वारा लिखित पुस्तक “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” में भूमिका का एक अंश उद्धृत करना चाहता हूं। इसमें उन्होंने लिखा है –

“मुझे लगता है कि केवल तीन ही लोग दलित पैंथर आंदोलन का इतिहास लिख सकते हैं- राजा ढाले, नामदेव ढसाल और ज.वि.पवार [मैं]। मैं दलित पैंथर का संगठनकर्ता और बाद में उसका महासचिव था। इसलिए मेरे पास इससे संबंधित संपूर्ण दस्तावेज और पत्राचार हैं।”

पवार जी अगले पृष्ठ पर लिखते हैं-  “मैंने और मेरे कवि मित्र नामदेव ढसाल ने 1972 में दलित पैंथर की स्थापना की।”

पुस्तक के एक शुरूआती पृष्ठ में बतौर सबूत इतिहास को रखा गया है, जहां आठ कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर हैं। इनमें राजा ढाले, ज. वि. पवार, दयानंद म्हस्के, अरुण कांबले, रामदास आठवले, के.बी. गमरे, (लंदन) गंगाधर गाडे, नामदेव ढसाल और अविनाश महातेकर हैं।

दलित पैंथर का प्रभाव क्षेत्र केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। महाराष्ट्र के बाहर भी दलित पैंथर का विस्तार हुआ। इस क्रम में रमेश चंद्र पवार और बापुराव परिखड्डे के विशेष रूप में नाम लिये जा सकते हैं। गुजरात के साथ दिल्ली और उत्तर प्रदेश, हरियाणा आदि में दलित पैंथर तेजी के साथ दलित समाज के युवकों को प्रभावित किया। यह आंदोलन 70 के दशक से लेकर 80 के दशक तक इन राज्यों में चला। बाद के दौर में धीरे-धीरे समाप्त हो गया। 

हालांकि दलित पैंथर का अवसान बहुत जल्दी हो गया, लेकिन इसके कारण दलित समाज बहुत अधिक प्रभावित हुआ। विशेष रूप से कहा जाए तो दलित साहित्य का तेजी के साथ उद्भव और विकास हुआ। आम आदमी के बीच दलित साहित्य रचा बसा। उसी साहित्य ने अपनी जड़ें जमाई। जिसकी कोंपलें आज भी फूट रही हैं। शाखाएं बढ़ रही हैं।

महाराष्ट्र के बाहर दलित साहित्य के लेखकों/पाठकों/शोधार्थियों/समीक्षकों के भीतर 70 और 80 के दशक में दलित पैंथर के साथ नामदेव ढसाल को जानने की उत्सुकता कहें या उत्तेजना बरकरार रही। या फिर उस विद्रोही पैंथर कवि से मिलने की बेचैनी उनके भीतर रही, जिसकी कविता पढ़ते हुए हर किसी की भावनाएं उत्तेजित हो ही जाती थी। दलित पैंथर का यह ऐतिहासिक दौर था। जब सनातनी परंपराएं टूट रही थीं और दलित साहित्य, संस्कृति पर पूरे देश में जोरदार विमर्श होने लगा था। दलित आंदोलन अपने चरम पर था। दलितों के भीतर चेतना का सूरज तेजी के साथ उगने लगा था। महाराष्ट्र में विशेष रूप से दलित आंदोलन आंधी बनकर उभरने लगा था।

यह तो साफ था कि दलित पैंथर की सफलता में दलित साहित्य की अहम भूमिका रही। मसलन नामदेव काव्य संग्रह ‘गोलपीठा’ जो कि 1972 में प्रकाशित हुआ। जिसके आने पर मराठी साहित्य जगत में एक भूचाल सा आ गया। बहुत से सवर्ण लेखकों और समीक्षकों को बुरा लगना लाजमी था। उसका कारण नामदेव के शब्द थे, जो उन पर उनकी संस्कृति पर हथौड़े की तरह वार करते थे। दलित लोगों की जिंदगी जिस अभिव्यक्ति की मांग कर रही थी, वही सब कुछ नामदेव की कविताओं में जोरदार तरीके से उभरे।

मुझे दलित पैंथर के संस्थापकों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और उनसे जुड़ी यादें मेरे लिए किसी धरोहर से कम नहीं। मैंने “जानें, विद्रोही दलित कवि नामदेव ढसाल के बारे में” शीर्षक अपने एक लेख में इसका वर्णन किया है। नामदेव के बारे में एक बात फिर से उद्धृत कर रहा हूं – 

“जिन दिनों नामदेव के भीतर दलित साहित्य के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, उन दिनों पूरे देश में दलितों पर उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही थीं। महाराष्ट्र भी इससे अछूता नही रहा था। 24 मई, 1972 को समाजवादी चिंतक मधु लिमये द्वारा यह ज्वलन्त सवाल लोकसभा में उठाया गया। इस तरह से जैसे यह सब परिस्थितियां दलित पैंथर के गठन की तैयारी कर रही थी। रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं की उदासीनता भी एक कारण था। जो राजनीति के टुकड़ों में बंटे थे। स्वयं रिपब्लिकन पार्टी अनगिनत टुकड़ों में बंटी थी। ज. वि. पवार के अनुसार इस स्थिति से निबटने और सरकार पर दबाव डालने के उद्देश्य से हम लोग जिनमें दया पवार, अर्जुन डांगले, नामदेव ढसाल, राजा ढाले और प्रह्लाद चन्द्वन्कर दादर के ईरानी होटल में मिले। और दलित उत्पीड़न के खिलाफ ज्ञापन तैयार कर उस पर हस्ताक्षर करने की बात हुई। बाद में उमाकांत रणधीर, भीमराव शीरे वाले, गंगाधर गाड़े आदि ने उस पर हस्ताक्षर किए। संभवतः दलित पैंथर की पहली बैठक बम्बई के सिद्धार्थनगर में 9 जुलाई 1972 को हुई। इस बैठक का प्रारम्भ दलित पैंथर संगठन के निर्माण को घोषित करने वाले परचे से हुआ। नामदेव की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। अगर यह कहा जाए कि उन्होंने दलित पैंथर को अपने खून से सींचा तो गलत नही होगा। 70 के दशक में ही नामदेव के साथ अन्य दलित पैंथर्स ने जुझारू तरीके से संगठन को आगे बढ़ाया। किसी भी रूप में उन्होंने हार नही मानी थी। उन्होंने कुछ माह टैक्सी भी चलाई। इस तरह आम आदमी से परिचित होते चले गए।”

दलित पैंथर के आंदोलन के एक और सूत्रधार राजा ढाले रहे। उन्होंने 70 से लेकर 80 के दशक और 80 के दशक से 90 के दशक तक दलित समाज और उसके मानस को गहराई से प्रभावित किया। राजा ढाले को हम कवि और लेखक के साथ बौद्ध चिंतक के रूप में देख सकते हैं। वे हमेशा खुली किताब की तरह रहें और अंतिम समय तक साहित्य सृजन करते रहें। उन्होंने ‘धम्मलिपि’ मासिक पत्रिका का संपादन भी किया। वे पुस्तकों के कवर पेज भी बनाते थे। ज. वि. पवार की कविता संग्रह ‘नाकेबंदी’ (मराठी) का कवर पेज भी उन्होंने 1976 में बनाया था। उससे पहले 1968 में उन्होंने नारायण सर्वे के कविता संग्रह ‘माझे विद्यापीठ’ की समीक्षा भी लिखी। पहले दलित साहित्य सम्मेलन (नागपुर) के 1974 में वे अध्यक्ष भी रहें।

राजा ढाले की सर्वाधिक प्रसिद्धि जो हुई, वह 15 अगस्त, 1972 को साधना पत्रिका में ‘काला स्वातंत्र्य दिन’ नाम से आलेख छपने से। जिससे संपूर्ण महाराष्ट्र में हल्ला मचा। विशेष रूप से उन दिनों शिव सैनिक उन्हें मारने को दौड़े। 10 नवंबर, 1972 को ढाले को कथित तौर पर राष्ट्रीय ध्वज के प्रति असम्मान प्रदर्शित करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। 

जहां तक ज. वि. पवार की बात है, वे एक गंभीर कार्यकर्ता रहे हैं। लंबे समय से संघर्षशील रहे। आंबेडकर के उपरांत दलित आंदोलनों के दस्तावेजीकरण के संबंध में उनका प्रयास इतिहास के अध्येताओं के लिए महत्वपूर्ण काम है। उनका श्रम दलित आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए खास मायने रखता है। उन्होंने “आंबेडकरोत्तर आंबेडकरवादी चळवळ” सीरीज के रूप में इसका प्रकाशन भी किया है। “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” इसी सीरीज की उनकी चौथी किताब है, जो मूलरूप से मराठी में 6 दिसंबर, 2010 को प्रकाशित हुई।

बहरहाल, आज 21वीं सदी का दूसरा दशक अपने अवसान पर है और एक नए दशक की शुरूआत होने वाली है, तो दलित पैंथर जैसे आंदोलन के इतिहास का महत्व बढ़ जाता है। यह इस कारण से भी कि आज भी दलितों के हक-हुकूक के सवाल सुलझे नहीं हैं। अत्याचार व उत्पीड़ण की घटनाएं आम हैं। राजनीतिक मोर्चे पर दलितों के साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। ऐसे हालात में यह उम्मीद तो बनती ही है कि दलित पैंथर के सदस्यों ने जो त्याग और कुर्बानियां अतीत में दीं, वह बेकार नहीं जाएंगी। आज की युवा पीढ़ी को उस अल्पजीवी आंदोलन के बारे में जरूर जानना चाहिए, जिसने भारत में हाशिए पर रहने वालों को एक सूत्र में बांध दिया था और सरकारों को सोचने के लिए बाध्य कर दिया था।

(संपादन : नवल)

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