भारतीय फिल्मों में आदिवासी: जगजाहिर होती द्विजों की दोहरी मानसिकता

भारतीय फिल्म जगत में अब भी आदिवासी समाज और उसकी संस्कृति को नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। उन्हें असभ्य और हिंसक दिखाया जाता है। रोमांस और आइटम डांस के दृश्यों में कभी-कभार जो आदिवासी संस्कृति नजर आती भी है, उसका स्वरूप विद्रूप ही होता है। बता रहे हैं राहुल खड़िया

साहित्य की तरह फिल्में भी समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं| भारतीय सिनेमा ने भी अपने सौ वर्षों के इतिहास में समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदिवासी समुदाय की भारतीय आबादी में करीब 7.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी हैं| इस समुदाय की अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराएं हैं, जिनका आधार प्रकृति है। उनके अपने लोक गीत और लोकनृत्य हैं। परंतु, भारतीय फिल्मों में उन्हें हमेशा दोयम दर्जे का दिखाया जाता है। उनकी संस्कृति को असभ्य और उन्हें जंगली कहकर अपमानित किया जाता है। 

सभी जानते हैं कि “कमर्शियल” या “पॉपुलर” सिनेमा का मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक सफलता अर्जित करना होता है इसलिए यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि कोई नामचीन फ़िल्मकार आदिवासियों और उनके विषयों को बड़े परदे पर दिखायेगा| 

फीचर फिल्मों की तुलना में डाक्यूमेंट्री फिल्में कल्पना से दूर और सत्य के ज्यादा करीब होती हैं| इसके साथ ही डाक्यूमेंट्री बनाने का उद्देश्य फिक्शन या फीचर फिल्म से सर्वथा भिन्न होता है जैसे व्यावसायिक सफलता की चिंता किए बगैर समाज के अनछुए पहलुओं को टटोलना, सरोकारों और व्यवस्था की बात करना आदि| इसलिए बड़े पैमाने पर तो नहीं परन्तु व्यक्तिगत स्तर पर और सरकार के प्रोत्साहन के चलते डाक्यूमेंट्री फिल्मों में आदिवासी समाज कहीं न कहीं नज़र आता है और उनकी समस्याओं, उनकी समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं को डाक्यूमेंट्री के रूप में एक मंच मिलता रहा है| जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा  कोइतूर समुदाय का वीडियो दस्तावेजीकरण डाक्यूमेंट्री फिल्मों के द्वारा किया गया है, जो यूट्यूब पर उपलब्ध हैं|

सौ वर्ष से जारी है रूपहले पर्दे पर आदिवासियों के साथ भेदभाव

आदिवासी समाज को फिल्मों में दिखाने या कहें कि फिल्माने की कहानी फिल्मों की शुरूआत के साथ ही शुरू हो गयी थी| हिंदी सिनेमा का जनक धुंडीराज गोविंद फाल्के को माना जाता है, जिन्हें हम दादा साहेब फाल्के नाम से भी जानते हैं। विडम्बना यह है कि उनकी दो फिल्मों ‘सत्यवान सावित्री’ (1914) और ‘बुद्धदेव’ (1923) को छोड़ दिया जाय तो उनकी ज़्यादातर फिल्मों में आदिवासी समाज को जंगल में रहने वाले असभ्य मनुष्यों, लगभग राक्षसों, के रूप में दिखाया गया है। यह हकीकत है कि सौ वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी आज तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है| हाल के वर्षों में लोकप्रिय फिल्म ‘बाहुबली’ (2015, 2017) में कालकेय समुदाय का भयावह चित्रण एक बहुत ही ताज़ा उदाहरण है। यह इसके बावजूद कि फिल्म तकनीकी और विषयों के मामले में पूर्व की तुलना में ज़मीन-आसमान का अंतर आ गया हैं,  परंतु फिल्मकारों के लिए आदिवासी पहले भी असभ्य थे और आज भी असभ्य  हैं| 

कई फिल्मों में आदिवासियों को नाचते-गाते तो कभी अर्धनग्न और कभी-कभी पत्ते लपेटे हुए तक दिखाया जाता है। इन फिल्मों में जो गीत परोसे जाते हैं और नाच दिखाया जाता है, उनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। आदिवासी असभ्य हैं, इस नज़रिए से इस विशाल समुदाय को देखने और दिखाने वाले उस यथार्थ को नज़रअंदाज़ करते हैं कि आदिवासी समुदाय के लोग आज भी प्रकृति के सबसे करीब हैं और यह इसके बावजूद कि उनका जीवन अभावग्रस्त है। वे प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते हुए साधारण विकास के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं|

1977 में आई मृणाल सेन की फिल्म ‘मृगया’ के एक दूश्य में मिथुन चक्रवर्ती व ममता शंकर

 भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में एक फिल्म बनी ‘रोटी’ (1942) जो पूंजीवादी विचारधारा की मुखालिफत करती है| उसमें भी दर्शकों को आकर्षित करने के लिए आइटम डांस के रूप में आदिवासियों  को फूल-पत्ती लपेटकर रूमानी मुद्रा में नृत्य करते हुए दिखाया गया है|  बिमल रॉय द्वारा निर्देशित व ऋत्विक घटक द्वारा लिखित और दिलीप कुमार, वैजयंती माला, प्राण जैसे बेहतरीन अदाकारों से सुसज्जित 1958 में बनी फिल्म ‘मधुमती’ एक बेहतरीन फिल्म थी, पर उसमें भी आदिवासियों को नाचते-गाते हुए रूमानी अंदाज़ में दिखाया गया है| जबकि ‘मधुमती’ भारतीय सिनेमा के इतिहास के स्वर्णिम युग और समानांतर सिनेमा के उद्भव काल की फिल्म है, जब यथार्थवादी विषय, किरदार, सेट डिज़ाइन और मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती थी| ऐसी ही कई और फिल्मों के नाम गिनाए जा सकते हैं, जिनमें आदिवासी समुदाय और उनके नृत्यों को केवल नयनाभिराम फ्रेम की तरह रखा गया। मसलन, ‘विलेज गर्ल’ (1945), ‘अलबेला’ (1951), ‘दुपट्टा’ (1952), ‘श्रीमतीजी’ (1952), ‘नागिन’ (1954), ‘यह गुलिस्तां हमारा’ (1972), ‘एडवेंचर्स ऑफ टार्जन’ (1985) आदि| 

आदिवासियों की लोक संस्कृति का अपमान क्यों?

भारतीय फिल्म जगत में 1970 के बाद का समय आधुनिक भारतीय सिनेमा के आगाज का काल भी माना जाता है। लेकिन यह भी यथार्थ से दूर रहा।  1983 में आई बालू महेंद्र की फिल्म ‘सदमा’ आदिवासी समुदाय के बारे में मिथकीय चरित्रीकरण का एक और उदाहरण है| कमल हासन और श्रीदेवी के फ़िल्मी करियर की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में से एक, पद्मभूषण इल्लैया राजा द्वारा संगीतबद्ध इस फिल्म का एक गीत और उसके पीछे के विचार गौर करने लायक हैं| फिल्म की दूसरी सहनायिका विजयालक्ष्मी वाडलापति, जो दक्षिण भारतीय फिल्मों में सिल्क स्मिता के नाम से जानी जाती थीं, नायक कमल हसन के साथ एक गाने में रूमानी स्वप्न देखती हैं, जिसके बोल हैं “ये महुआ करे क्या इशारे”| 

निर्देशक ने इस गाने के दृश्य में नायक व नायिका दोनों को आदिवासी समुदाय के सदस्य के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन इसके लिए उसने अर्द्धनग्न दृश्य फिल्माये। गोया कि अगर कोई अंतरंग दृश्यों की कल्पना भी करे तो उसमें आदिवासी ही हों और वे महुआ के फूल से बनी शराब को पीने के बाद होश खो दें| सिर्फ यही नहीं, अनेक अन्य फिल्मों में दिखाया जाता है कि आदिवासी समुदाय कच्ची शराब पीकर असभ्य हरकतें करता है।  फिल्मों में आदिवासी समुदाय का शराब पीकर उद्दंडता करने या होश खो देने वाला चरित्र ही सामान्य वर्ग के सामने आता है क्योंकि वर्षो से सिनेमा और मीडिया के अन्य माध्यमों में यही दिखाया गया है। बाजदफा फिल्मों की शुरूआत में फिल्मकार यह अवश्य लिख देते हैं कि फिल्म में प्रदर्शित घटनाक्रम काल्पनिक हैं, लेकिन इससे किसी समुदाय को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाने की अपनी ज़िम्मेदारी से वे मुक्त नहीं हो सकता है। आख़िरकार फिल्मकार की कल्पना निराधार नही होती, बल्कि प्रच्छन्न विचार या सोच होती है जिसे वह फिल्म के माध्यम से अभिव्यक्त करता है|

इक्कीसवीं सदी में भी जारी है भेदभाव

यदाकदा आदिवासी समाज को या आदिवासी समाज के किसी व्यक्ति विशेष को भारतीय मुख्यधारा की  फिल्मो में दिखाया भी जाता है तो उसके अपने मायने हाेते हैं। करीब एक दशक पहले 2007 में आई ‘चक दे इंडिया’ फिल्म में भारतीय टीम में चार आदिवासी लड़कियों को हॉकी प्लेयर्स के रूप में दिखाया गया था| वे फिल्म में झारखंड और उत्तर भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनके बिना हॉकी टीम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है| उनकी संख्या तो कम दिखाई ही गयी है फ़िल्म में उन्हें कम पढ़ी लिखी,  कम समझ वाली और हिंदी न बोल पाने वाली प्लेयर्स के रूप में दिखाया गया है| कमाल की बात यह है कि उन्हें फिल्म में भी फाइनल टीम में जगह नहीं मिलती और पूरे समय दरकिनार रखा जाता है| 

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गोया कि आदिवासी समाज को एक काल्पनिक कहानी में भी हाशिए पर रखा गया है| प्रसिद्ध फ़िल्मकार मणिरत्नम द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रावण’(2010) की कहानी आदिवासी समुदाय के बीरा के इर्द-गिर्द घूमती है जो हिंसक उग्रवादी है तथा अपने साथियों के साथ मिलकर समाज का बहिष्कार करता है। वह लोगों का अपहरण करता है| आदिवासी समाज को उग्रवादी, हिंसक, अनपढ़ और समाज विरोधी दिखाने की परंपरा भारतीय फिल्मों में लगातार चली आ रही है| फिल्म ‘टैंगो चार्ली’ (2005) के एक हिस्से में असम में भारतीय सेना के एक बड़े ऑपरेशन को दिखाया गया है। इस हिस्से में एक बोडो जनजाति विद्रोही को एक बंदी का कान काटकर अपनी प्रेमिका को भेंट करते हुए दिखाया गया था| 

एक अन्य फिल्म ‘रेड अलर्ट’ (2009) भी नक्सलवाद के इर्द-गिर्द ही घूमती है और अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी आदिवासियों को सरकार और व्यवस्था विरोधी बताया गया है|  इससे अलावा ‘द नक्सलाइट’ (1980), ‘लाल सलाम’(2002), ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’(2003) और ‘चक्रव्यूह’(2012) में भी आदिवासियों को नकारात्मक तरीके से दिखाया गया है। इन फिल्मों में उनके संगठन, पुलिस के साथ मुठभेड़, मुखबिरी, महिला कैडर की उपस्थिति, प्रेम संबंध वगैरह को चित्रित किया गया है।  

“आपने इस इलाके में आकर बड़ी गलती कर दी। ये आदिवासी न इंसान हैं और ना ही जानवर, ये शैतान हैं” ये डायलॉग है ‘एमएसजी-2’ नामक फिल्म में। यह फिल्म डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह द्वारा निर्मित थी और मुख्य किरदार भी उनके द्वारा ही निभाया गया था| तब इस फिल्म का देश भर में आदिवासी समाज के लोगों ने विरोध किया था और उनके विरोध को देखते हुए इसे कई राज्यों में रिलीज़ होने से रोक दिया गया था| बाद मे गुरमीत राम रहीम ने एक टीवी चैनल को अपनी सफाई देते हुए कहा था कि “फिल्म जब बनी भी नहीं उससे पहले मैं 2000-2002 के बीच छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में आदिवासियों के बीच गया था। वहां मैने देखा कि वे लोग बिल्कुल मध्ययुगीन तरीके से बिना कपड़ों के सिर्फ पत्ते लपेटे रहते हैं। जिंदा जानवर का मांस खाते हैं। ऐसे लोगों को जो जंगली हैं, शैतान हैं, उन्हें हमने इंसान बनाने की बात कही है, जो कहीं से भी गलत नहीं है।”  

जाहिर तौर पर तब आदिवासी समाज व संस्कृति का ऐसा रूप सामान्य दर्शकों के सामने जाएगा तो कहीं न कहीं वह उनकी सोच का हिस्सा बन जाता है। इसी तरह के मिथ्या निरूपण की पराकाष्ठा हमें भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी और व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म ‘बाहुबली’ में भी दीखता है। इसमें नेगेटिव किरदार में कालकेय जनजाति को वीभत्स, खूंखार, हिंसक, बलात्कारी के रूप में दिखाया गया था। दूसरी तरफ उतनी ही क्रूरता से युवा राजकुमार अपने को कुशल प्रशासक क रूप में स्थापित करता है। 

नायक-नायिका आदिवासी, फिर भी द्विज संस्कृति अहम

पीरियड फिल्मों में आदिवासी समाज का चित्रण तो एक अलग मुद्दा है पर सच्चाई पार आधारित बायोपिक फिल्मो में ऐसे व्यक्तित्व के चित्रण में उसके समाज को पूरी तरह से भुला दिया जाता है। जबकि एक व्यक्तित्व  के निर्माण में उसकी परवरिश और उसके समाज के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। जैसे वर्ल्ड चैंपियन बॉक्सर और ट्राइब्स इंडिया की ब्रांड एम्बेसडर मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम पर बनी फिल्म ‘मैरी कॉम’ में व्यावसायिक मापदंडों के चलते उत्तर पूर्वी राज्य की समृद्ध संस्कृति, लोकगीतों और भाषा को दरकिनार कर दिया गया था फिल्म की मुख्य अभिनेत्री प्रियंका चोपडा जिन्होंने मैरी कॉम का किरदार निभाया था, उन्हें मैरी कॉम जैसा दिखने के लिए प्रोस्थेटिक और मेकअप का इस्तेमाल करना पड़ता था जिसमें फिल्म प्रोडक्शन की दृष्टि से काफी समय और पैसा खर्च हुआ  इसकी जगह मैरी कॉम के जैसे चेहरे और डीलडौल वाली उत्तर पूर्व की किसी मूल निवासी को लेकर भी यह फिल्म बनायी जा सकती थी, जिससे न केवल बजट कम होता, बल्कि किसी नये चेहरे को हिंदी सिनेमा में परिचय करवाया जा सकता था सोनम वांगचुक, जो कि लद्दाख की पहचान के रूप में जाने जाते है और आजकल चीन के घुसपैठ के विरोध में और चीन के उत्पादों के बहिष्कार का मुख्य चेहरा बनकर सामने आये हैं, उनसे प्रेरित था फिल्म ‘3 इडियट्स’ का मुख्य किरदार जो कि आमिर खान द्वारा अभिनीत किया गया था। इन दोनों फिल्मों में आदिवासी व्यक्तित्व और संस्कृति को केवल अमुख्य प्लॉट का हिस्सा ही बनाया गया। अगर नये भारत के ये दो आदिवसी आदर्श व्यक्तित्व सिनेमा के माध्यम से अपनी बात नही कह पाएंगे तो सामान्य लोगों को मुख्यधारा आने में तो बरसों लग जाएंगे| 

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काश कि कोई मृणाल सेन जैसा दिखाता साहस

भारतीय सिनेमा में आदिवासियत को यथार्थ से परे दिखाने वाली अनेक फिल्मों से अलग कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो घनी काली घटाओं में उम्मीद की किरण के समान हैं जैसे यथार्थवादी फिल्मकार मृणाल सेन की वर्ष 1977 में आयी फिल्म ‘मृगया’ एक देखने योग्य फिल्म है जो एक संथाली युवक की कहानी है। इस फिल्म में वह अंग्रेज हुक्मरानों  द्वारा अपनी पत्नी के यौन शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाता है जानने योग्य बात यह है कि फिल्म में बेहतरीन अभिनय के लिये मिथुन चक्रवर्ती को उनकी पहली ही फिल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था आदिवासी विषयों को विश्वसनीयता के साथ फिल्माने वाली ‘मृगया’ में पद्मभूषण, पद्मविभूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़े गए निर्देशक मृणाल सेन ने यह दिखाने का प्रयास किया कि फ़िल्म में वास्तविक शिकारी धूर्त साहूकार है। फिल्म में उसी समाज को दिखाया गया जो कि वास्तव में है और जिसके बहुजन शोषित और उत्पीड़ित हैं। वैसे ही गोविन्द निहलानी की 1998 में आई नेशनल अवार्ड प्राप्त फिल्म ‘हजार चौरासी की मां’ हैं। जया बच्चन, अनुपम खेर, जोय सेनगुप्ता, सीमा बिस्वास, नंदिता दास और मिलिंद गुनाजी जैसे मंजे हुए कलाकारों से सुसज्जित और नक्सलवाद का एक अलग कोण से दिखाती इस फिल्म का निष्कर्ष है कि क्रांति की समाप्ति तभी संभव है, जब शासक और शासक वर्ग गरीबों और शोषितों को मूलभूत अधिकारों के साथ ही सम्मान भी देगा। 

बहरहाल, आदिवासी समुदाय व समाज स्वचैतन्य है और धीरे-धीरे प्रकृति के साथ चलते हुए भी निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। फिल्म निर्माताओं के साथ ही दर्शक भी अपनी विचारधाराओं को व्यापक उड़ान भरने दें। वर्षों से परोसे गए पूर्वाग्रहों, एकतरफ़ा विचारधाराओं और मानसिकताओं को विराम दें ताकि फिल्मों में आदिवासी खलनायक नहीं प्रकृति प्रेमी मनुष्य के रूप् में दिखें।

(संपादन : नवल/अमरीश)


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