निम्नवर्ग की जड़तावादी प्रवृत्ति के सबसे बड़े आलोचक थे रेणु : सुरेंद्र नारायण यादव

प्रेमचंद और रेणु अपने संपूर्ण साहित्य में सबसे रूबरू होते हैं। रेणु का पूरा साहित्य समाज की जीवन स्थितियों, उसकी समस्याओं व सामयिक हलचल को उद्घाटित एवं संबोधित करता है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में सत्य का उद्घाटन करना शुरू किया था जिसे हम “सामाजिक यथार्थवाद” कहते हैं। रेणु समाजवादी थे, लेकिन उन्होंने अपने साहित्य को समाजवादी सिद्धांतों पर नहीं गढ़ा। प्रो. सुरेंद्र नारायण यादव से विशेष बातचीत

हिंदी साहित्य में दलित-बहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को द्विज साहित्यकारों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और उन पर विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। इस कड़ी में पढ़ें यह विशेष परिचर्चा। इसमें मुख्य वक्ता हैं पूर्णिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र नारायण यादव और उनसे नवल किशोर कुमार व अरूण नारायण ने ऑनलाइन प्लेटफार्म “जूम” के जरिए बातचीत की है। प्रस्तुत है इस विस्तृत बातचीत के संपादित अंश 

फणीश्वरनाथ रेणु जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष परिचर्चा 

नवल किशोर कुमार (न.कि.कु.) : अगर फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं को किसी “वाद” के संदर्भ में देखने कोशिश की जाय तो रेणु आपको किस “वाद” के सबसे करीब लगते हैं?

सुरेंद्र नारायण यादव (सु. ना. या.) : फणीश्वरनाथ रेणु के “वाद” का जहां तक सवाल है, उनकी रचनाओं में जीवन के अलग-अलग पहलू और वाद जुड़े हुए हैं। आर्थिकवाद की दृष्टि से देखें तो उनकी रचनाओं में पूंजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद है, और आर्थिक दर्शन में एक गांधीवादी भी है। आर्थिकवाद के नजरिए से घोषित सत्य है कि रेणु समाजवादी थे। समाजवाद के मूल सिद्धांत के अनुसार राष्ट्र के हर एक नागरिक के सुख-दुख, जीवनयापन, समृद्धि एवं प्रगति की चिंता करना राष्ट्र का मूल दायित्व है। रेणु समाजवाद के इस आधारभूत वाक्य को आधारभूत सिद्धांत मानते थे। सन् 1935 में वैश्विक स्तर पर फ्रांस में पहली बार प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी। उसी का अनुसरण करते हुए सन् 1936 में लखनऊ में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन हुआ था, जिसकी अध्यक्षता कथा सम्राट प्रेमचंद ने की थी। उनका कथन था- “हमें साहित्य को नायक-नायिकाओं की अदाओं से अलग करना है, बुलबुल और चमन से अलग करना है, हमें श्रम का सौंदर्य और श्रमिकों के सौंदर्य को चित्रित करना है, उनकी जीवन-स्थितियों का चित्रण करना है। समाज के वास्तविक समस्याओं से हमें टकराना है, साहित्य को उस दिशा में निरंतर अग्रसर होना है।”

 

प्रेमचंद और रेणु अपने संपूर्ण साहित्य में सबसे रूबरू होते हैं। रेणु का पूरा साहित्य समाज की जीवन स्थितियों, उसकी समस्याओं व सामयिक हलचल को उद्घाटित एवं संबोधित करता है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में सत्य का उद्घाटन करना शुरू किया था जिसे हम “सामाजिक यथार्थवाद” कहते हैं। रेणु समाजवादी थे, लेकिन उन्होंने अपने साहित्य को समाजवादी सिद्धांतों पर नहीं गढ़ा। समाजवादी सिद्धांत हमेशा समाज को शोषक और शोषित दो वर्गों में विभाजित रूपों में देखता है। रेणु ने भारतीय समाज को शोषक और शोषित वर्ग के नजरिए से नहीं देखा है। उन्होंने समाज के वास्तविक सत्य, जो ऐतिहासिक रूप से सत्य था, को देखा और उसे चित्रित किया।

फणीश्वरनाथ रेणु के अनुसार, समाजवाद का ‘द्विवर्गीय समाज का सिद्धांत’ ऐसे समाज पर ज्यादातर लागू होता है, जहां एक ही जाति, धर्म, रंग और नस्ल के लोग हों। भारत में भाषायी, सांस्कृतिक, जातीय और धार्मिक विविधता ज्यादा है। यहां विविधताओं की बहुलता है। हमारे देश में आजादी की लड़ाई के दौरान हमारा संपर्क वैश्विक स्तर पर शेष दुनिया से हुआ। अनेक सिद्धांत भारत में आए। उन सिद्धांतों का भारत में प्रचार हुआ, जिनमें समाजवाद भी था। यह बाहरी संपर्क के कारण संभव हुआ। इसलिए यह भारतीय सिद्धांत नहीं है।

रेणु जी ने मैट्रिक की परीक्षा पास (विराटनगर से परीक्षा पास की थी) करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दाखिला लिया। वहां उनका परिचय समाजवाद से हुआ। उन दिनों बीएचयू समाजवाद का गढ़ था। समाजवाद के बड़े आचार्य वहां उपस्थित थे। उन्हें समाजवाद से परिचित एवं प्रभावित होने का मौका मिला था। रेणु को वैश्विक सूचनाओं का केंद्र भी बीएचयू में ही मिला था। रेणु की रचनाओं में आए विचारों एवं सूचनाओं के स्रोत का केंद्र आश्चर्यजनक रूप से बीएचयू ही था। रेणु हमेशा विश्व की साहित्यिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक गतिविधियों से रू-ब-रू रहा करते थे। उनके साहित्य में शोषक और शोषित के समाजवादी द्विवर्गीय विभाजन को हम नहीं देखते हैं।

हम देखते हैं कि भारत में जब स्वतंत्रता आंदोलन प्रारंभ हुआ, गांधीजी अफ्रीका से 1915 में भारत आए। 1917 में वे पहली बार चंपारण गए थे। उन्होंने अपने सिद्धांत और तौर-तरीकों से स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ाया। रेणु गांधी के दर्शन से भी खासा प्रभावित थे। गांधी के अहिंसात्मक प्रतिरोध, सविनय अवज्ञा, धरना, प्रदर्शन आदि चीजों से रेणु बहुत प्रभावित थे। लेकिन कई मामलों में वे उतने प्रभावित भी नहीं थे। वे अपनी असहमति खुलकर अभिव्यक्त करते थे। उन्होंने गांधी के आर्थिक दर्शन चरखा के संदर्भ में दो पंक्तियां उद्धृत की है, जो उस समय समाज में कहावत के रूप में प्रचलित था- ‘चरखा हमार भतार पूत, चरखा हमार नाती / चरखा के बदौलत मोरा द्वार झूले हाथी।’

प्रो. सुरेंद्र नारायण यादव व फणीश्वरनाथ रेणु की तस्वीर

अनुभवों के आधार पर देखें तो अगर चरखा पर आश्रित हमारा समाज होता तो अच्छे-अच्छे लोगों के शरीर पर वस्त्र नहीं होते। पॉलिस्टर और प्लास्टिक ने जन क्रांति की, जिसके कारण लोगों के शरीर पर वस्त्र की उपलब्धता सुनिश्चित हुई। रेणु में हम एक आलोचनात्मक भाव भी देखते हैं। वे किसी चीज का बिल्कुल अंधानुकरण भी नहीं करते हैं, बल्कि किसी वाद में जो चीजें उपयोगी लगती हैं, बिना किसी संकोच के एवं दुराग्रह को खारिज करते हुए, उनको वे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। ये रेणु की सबसे बड़ी खासियत है कि उन्हें भारतीय समाज की तरक्की के लिए जो उपयोगी एवं व्यवहारिक सिद्धांत लगे, उसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया।

वे स्वामी विवेकानंद से भी प्रभावित थे। विवेकानंद का मानना था कि संपूर्ण ज्ञान का आधार उपनिषद हैं। सभी उपनिषदों में बल को विशेष रूप से महत्त्व प्रदान किया गया है। उनका बल पर विशेष रूप से जोर था। बल की उपादेयता के संदर्भ में वे इतने आग्रही थे कि उनका मानना था कि बल संपूर्ण भाव-रोगों की दवा है। अनुभव से हम जानते हैं, जहां केवल गरीब लोग होते हैं, वहां अगर एक या दो अमीर या शक्तिशाली लोग होते हैं, वहां अन्याय और उत्पीड़न ज्यादा होता है। जहां सामान्य बल के लोग ज्यादा होते हैं, वहां अन्याय, उत्पीड़न और टकराहट उतनी नहीं होती है।

भारतीय समाज शक्तिसंपन्न एवं निर्बल गरीब लोगों में विभाजित है। यहां गरीब लोगों की संख्या शक्तिशाली सामंतों से ज्यादा थी, इसलिए सामाजिक स्तर पर यहां टकराहटें बहुत ज्यादा थीं। हम ‘मैला आंचल’ में देखें तो हरगौरी सामंती मिजाज का (राजपूत जाति का) है। एक स्थान पर बालदेव को कहता है- ‘ग्वाला होकर लीडरी!’। बालदेव समाज के लिए उपयोगी कार्य करना चाहता था। वह गांव में मलेरिया सेंटर की स्थापना के लिए वहां के लोगों से समर्थन एवं सहयोग जुटाने के लिए गांव-गांव घूम रहा था। उसकी लीडरी अपने हित में नहीं बल्कि समाज के हित में थी। लेकिन हरगौरी को इस बात से आपत्ति थी कि ग्वाला क्यों लीडरी करेगा? आगे चलकर हम उसी उपन्यास में देखते हैं, बालदेव की लीडरी ही चलती है और हरगौरी को नेपथ्य में जाना पड़ता है। रेणु बताते हैं कि ऐसा बल के कारण हुआ। जब यादवों के पास यह संदेश गया कि बालदेव को हरगौरी ने अपमानित किया है तो वे लोग लाठी-भाला, हरवे-हंसेरी आदि हथियार ले कर पहुंच जाते हैं। 

मैंने अपनी रचनाओं में रेणु को ‘जीतते हुए प्रतिरोध’ का रचनाकार बताया है। प्रतिरोध के लिए बल होना चाहिए। बल सिर्फ आर्थिक बल या अस्त्र-शस्त्र का ही बल नहीं होता, बल्कि आत्मबल, न्याय का बल और तरह-तरह के बल होते हैं। कालीचरण ने बहुत मजबूती से बालदेव का समर्थन किया। यहां तक कि कालीचरण और उसकी मां कुटाई-पिसाई करती थी। कुटाई-पिसाई करनेवाले का बेटा कालीचरण समाज का नेतृत्व कर रहा है।

हम “मैला आंचल” उपन्यास में ही देखते हैं कि जब सहदेव मिसिर ने फुलिया का यौन शोषण किया तो उस पंचायत में कालीचरण की शक्ति का ही बल था कि वह सहदेव मिसिर के चंगुल से मुक्त होती है और उसका विवाह एक खलासी पैटमान जी से कराया जाता है। रेणु जी को बल की अहमियत की अवधारणा स्वामी विवेकानंद से मिली थी।

सन् 1963 में फ्रांसीसी विचारक देरिदा ने साहित्य में संरचनावाद का सिद्धांत दिया। इस अवधारणा के अनुसार- समाज में जो लोग केंद्रीय सत्ता में काबिज हैं, जिन्हें समाज में पहले से वरीयता एवं प्राथमिकता प्राप्त है, साहित्य को ऐसे लोगों की चिंता नहीं करनी चाहिए। अब उनका जमाना लद चुका है। हम पुराने संस्कृत-साहित्य या महाकाव्य में देखते हैं कि उस रचना का नायक कोई राजा होता था या देवता। आम आदमी वहां आपको नायक के रूप में नहीं मिलेगा। प्रेमचंद द्वारा अधिवेशन में कही गई बातें उनके लेखन में चरितार्थ होती हैं। आप देखें कि 1925 में प्रेमचंद का उपन्यास ‘रंगभूमि’ प्रकाशित होता है। उसका नायक सूरदास होता है। वह भिखमंगा होता है, न ही राजा, न ही देवता। विश्वस्तरीय महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ का नायक होरी है, जो कि सामान्य किस्म का किसान है, जिसके पास दो-चार बीघा जमीन है। इस तरह से नायकत्व बड़े लोगों से छीन कर सामान्य लोगों तक आ गया है। देरिदा ने जिस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था- परिधि या हाशिए पर जो लोग हैं, जिनकी चिंता आज तक नहीं की गई है, उनकी अस्मिता और पहचान को महत्व प्राप्त नहीं हुआ, साहित्य में हमें ऐसे महत्वहीन, पहचान से मरहूम लोगों की चिंता करनी है- उस सिद्धांत को चरितार्थ होते हुए हम प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं में देख सकते हैं। उनका साहित्य ऐसे लोगों की चिंता से भरा पड़ा हुआ है। 

देरिदा के ‘संरचनावाद के सिद्धांत’ (1963) का उद्भव तब होता है जबकि भारत में ऐसे साहित्य की रचना हो चुकी होती है। रेणु के दोनों महत्वपूर्ण उपन्यास “मैला आंचल” और “परती परिकथा” देरिदा के संरचनावाद के सिद्धांत (1963) के पूर्व ही प्रकाशित हो चुके थे। रेणु के इन उपन्यासों में देरिदा का संरचनावाद का सिद्धांत पूर्णतया चरितार्थ होते हुए हमें दिखाई देता है। इस प्रकार रेणु की रचनाओं में जीवन के अलग-अलग क्षेत्र में, अलग-अलग वाद अलग-अलग रूपों में, लेकिन भारतीय समाज की जरूरत के हिसाब से गृहित एवं स्वीकृत हैं।

अरुण नारायण (अ. ना.) : हिंदी आलोचकों ने रेणु की “तीसरी कसम” कहानी को एक रोमांस की संज्ञा दी है। आपने अपनी पुस्तक “अलक्षित गौरव : रेणु” में तीसरी कसम को सबाल्टर्न पाठ प्रस्तुत किया है। उसके संदर्भ में हम आपसे जानना चाह रहे हैं।

सु. ना. या. : प्रेमचंद ने साहित्य को समाज के वास्तविक सवालों से टकराने की बात की थी। रेणु के लिए यह कैसे संभव था कि समाज के प्रति जो इतने आग्रही थे, वे निरर्थक प्रेमकथा लिखते। पहली बात, रेणु की “तीसरी कसम” कथा को एक प्रेमकथा की संज्ञा देने की बात मैं सिरे से खारिज करता हूं। दूसरी बात, किसी भी महान रचना का पाठ एवं अर्थ-निर्धारण कई तरीके से होता है। संभवतः प्रेम कहानी के रूप में भी उसका अर्थ हो सकता है। लेकिन मेरी दृष्टि में यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है। इसीलिए मैंने उस कहानी की विस्तार से समीक्षा अपने एक आलेख ‘निम्न वर्ग के वर्ग चरित्र की कहानी’ में किया है। निम्न वर्ग का वर्ग चरित्र से आशय समाज के उस वर्ग से है जिसे अपने अधिकार की चेतना नहीं होती। अगर उसे अपने अधिकार की चेतना हो जाए तो वह चैतन्य हो जाएगा। अपने अधिकार की प्राप्ति के लिए सतर्क रहेगा। कुछ न कुछ संघर्ष अथवा कोशिश जरूर करेगा। उस कहानी में हीरामन को अपने अधिकार की चेतना नहीं है। वह उस वर्ग का प्रतिनिधि पात्र है।

हीरामन को अपने अधिकार की चेतना नहीं है, इस बात को हम कुछ उदाहरण के माध्यम से समझ सकते हैं। अगर प्रेम दोनों ओर से हो तो युवती पर युवक का एवं प्रेमी का प्रेमिका पर अधिकार स्वभावतः बनता है। हीराबाई हीरामन से प्रेम करती है, यह बात हीरामन खूब समझता है, और हीरामन हीराबाई से प्रेम करता है, यह बात हीराबाई भी खूब समझती है। हीराबाई एक जगह कहती भी है- “हीरामन सचमुच हीरा है, ऐसा मनुष्य उसको मिला नहीं जो हृदय से इतना सच्चा हो।” इस कहानी में कई सारे स्पष्ट संकेत हैं, जिनसे स्पष्ट है कि दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रेम में स्वभावतः यह अधिकार बनता है कि विवाह के सूत्र में उन्हें बंध जाना चाहिए। लेकिन हीरामन ने एक बार भी नहीं कहा कि तुम पर मेरा अधिकार है, तुम मेरे घर चलो। यह बात हीराबाई कह सकती थी कि हीरामन तुम मुझे अपने घर ले चलो। लेकिन हीराबाई यह बात नहीं कहती है। यह भी सकारण है। रेणु अपनी रचना में बहुत ही आलोचनात्मक एवं तार्किक रहे हैं। उनका लेखन अन्वेषणात्मक है, उन्हें पूर्णतया सही-गलत, उचित-अनुचित का संज्ञान रहता है। हीराबाई अगर प्रस्ताव करती तो सोचिए क्या होता! स्त्री को हमेशा पुरुष एवं प्रेमिका को हमेशा प्रेमी अपने घर ले जाता है। इस प्रकार हीराबाई को ले जाना तो हीरामन का कार्य है। अब वही अनुत्साह दिखा रहा है तो हीराबाई कैसे कह दे कि हीरामन तुम मुझे ले चलो।

इस कहानी में हीराबाई यथार्थ की कसौटी है। हीराबाई की जीवन स्थितियां एवं हीरामन की जीवन स्थितियां, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। हीराबाई इत्र का प्रयोग इतना ज्यादा करती है कि उसके साड़ी के धोवन में जब लहसनवा अपनी गमछी डूबो देता है तो वह मह-मह करने लगता है। हीराबाई के पास तोसक-तकिया, बनाव-शृंगार के साधन सभी कुछ है। जबकि हीरामन गाड़ीवानी करता है, वह अपनी कमाई अपनी थैली में रखता है, जिसे वह हीराबाई को दे देता है। वह हीराबाई को ये भी नहीं कहता कि लो, ये तुम्हारी संपत्ति है, तुम अपने लिए इसको खर्च करो। वह अपना पैसा सिर्फ सुरक्षित रखने के लिए हीराबाई के पास रखता है। उसने अपनी कमाई का एक भी पैसा न तो हीराबाई पर खर्च कर रहा है  न ही हीराबाई को ऐसा कुछ देने का प्रस्ताव ही कर रहा है। हीराबाई को हीरामन के सच्चे मन की पहचान है। वह उसके साथ जा सकती थी, वह दुख भी उठा सकती थी, शर्त सिर्फ एक थी कि ये कम से कम पहल तो करता, आह्वान तो करता, आरजू करता कि तुम चलो मेरे साथ। उसने कुछ भी नहीं किया हीराबाई के लिए। हीरामन ऐसा जड़ पात्र है कि उसके हाथ में आकर एक तोता बैठा था, वह तोता भी उड़ भी जाता है, वह उसको पकड़ भी नहीं पाता है। वह चालीस साल का नौजवान है, उसकी बचपन में शादी हुई थी। उस जमाने में शारदा एक्ट का उल्लंघन करके भी बाल-विवाह हुआ करते थे। उसकी भी शादी ऐसे ही हुई थी। उसकी पत्नी मर गई थी। अब उसकी शादी क्यों नहीं हो रही है? इसकी व्याख्या मैंने की है- निम्न वर्ग यथार्थवादी नहीं होता है, वह विचित्रवादी होता है। अगर वह यथार्थवादी होता तब तो एक स्त्री उसकी यथार्थ जरूरत थी। उसके परिवार, नाते-रिश्तेदार, गांव समाज के लोग कोई तो चिंतित होते उसकी शादी के लिए। लेकिन प्रकृति तो चुप नहीं रहती। जब वह हीराबाई को गाड़ी में बैठाकर ले जाता है तो वह सपनों एवं कल्पनाओं में खोया रहता है कि काश! मेरी भी दुल्हन होती, जो  पान खाती और मेरे पगड़ी में मुंह पोंछती, होंठो की लाली उसके पगड़ी में लग जाती और वह गुड़ का टिकिया लेकर बच्चों को बांटती और बच्चे खुश होते। हीराबाई की उपस्थिति से हीरामन में संवेद उत्पन्न होता है, उस संवेद को वह विचार के धरातल पर समझ नहीं पाता है। जबकि उसे यह बात समझनी चाहिए थी कि यह स्त्री उससे प्रेम करती है, मुझे क्या करना है, वह कुछ तो करता। लेकिन ऐसा वह कुछ भी नहीं करता है। यहां तक कि न ही खुलकर आह्वान करता है न ही आरजू। आखिरकार हीराबाई किस उम्मीद पर कहती या चली जाती हीरामन के साथ। वह नहीं जा सकती थी। उसका यथार्थ उसको बाध्य कर रहा है, हीरामन का यथार्थ उसको बाध्य कर रहा है। वह हीरामन के अनुत्साह से मेला जाने के लिए बाध्य हुई है।

निम्न वर्ग के वर्ग चरित्र की एक विशिष्टता यह भी है कि वह अपनी प्राकृतिक जरूरतों की अपेक्षा परंपरा और सामाजिक नियंत्रण जैसे रुढ़ अभिकरणों के प्रति ज्यादा समर्पित होता है। अगर यही उच्च जाति का हीरामन होता तो वह इस मामले में जाति-धर्म नहीं देखता। अगर स्त्री सहजता से उपलब्ध हो रही होती तो वह उसे प्राप्त कर लेता। लेकिन उसकी भाभी ने जिद कर रखी है कि उसकी शादी कुंवारी लड़की से ही की जाएगी। यहां भाभी सामाजिक अभिकरण का एक प्रतीक है। इसलिए रेणु ने इस प्रसंग को अनिवार्य रक्त संबंध से नहीं जोड़ा है। भाभी किसी के लिए अनिवार्य रक्त संबंध का द्योतक नहीं है। वह विवाह के संबंध से आकस्मिक रूप से आई है। आकस्मिक संबंध और अनिवार्य संबंध की चिंता, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। हीरामन की शादी को लेकर उसके भाई को ज्यादा चिंतित होना चाहिए था, लेकिन भाई भी चिंतित नहीं है। उसके नाते-रिश्तेदार, गांव समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी शादी को लेकर चिंतित नहीं है। हीराबाई के उस पर अधिकार की उसे जरा भी वैचारिक समझ नहीं है। हीराबाई की क्या स्थिति है, उसका उस पर अधिकार है, उसे क्या करना चाहिए, उसे इस बात की जरा भी चिंता नहीं है।

स्पष्ट है कि निम्न वर्ग के वर्ग चरित्र के पात्र को अपने अधिकार की चेतना नहीं होती है। जब अधिकार की चेतना नहीं है तब संघर्ष कहां से होगा, वह अपने अधिकार की मांग कैसे कर सकता है? हीरामन गाड़ीवानी करता है, जो कमाता है वह अपनी भाभी को दे देता है। कोई भी कमाने वाला अपनी कमाई अपने पत्नी एवं बच्चे को देता है एवं उन पर खर्च करता है। लेकिन हीरामन अपनी कमाई भाभी को दे देता है। भाभी उसका लाभ उठाती है। उसे खुद पता नहीं है कि वह क्यों कमा रहा है, किसके लिए और क्यों जी रहा है। वह इस अधिकार की मांग भी नहीं करता है, जब अधिकार की चेतना नहीं है तो वह उसकी मांग कहां से करेगा। वह अपने भैया और भाभी से भी शादी कराने के लिए मांग कर सकता था। वह उसकी शादी क्यों नहीं करा रहे हैं। इस कहानी में एक भी उदाहरण नहीं है कि हीरामन ने अपने भाई और भाभी का विरोध किया है, जबकि करना चाहिए था। क्योंकि यह वास्तविक जीवन की उसकी जरूरत थी। ऐसा भी नहीं है कि उसका भाई कमाऊ नहीं है। अगर उसकी शादी होती तो खर्च का भार भी उसके भैया और भाभी पर नहीं पड़ने वाला था।

निम्न वर्ग के वर्ग चरित्र की तीसरी विशेषता है- अधिकार के लिए संघर्ष करना। इस कहानी में अधिकार के लिए संघर्ष कहीं से कहीं तक नहीं है। अगर संघर्ष होता तो हीरामन हीराबाई को कहता कि तुम मेरे घर चलो।  वह बैलगाड़ी वहीं स्टेशन पर छोड़ देता, गाड़ी में सवार होकर हीराबाई के साथ चला जाता। लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि उल्टे कसम खाई- मैं भविष्य में कभी कंपनी की किसी औरत को अपनी गाड़ी पर नहीं चढ़ाऊंगा।

कई बार जब आप कल्पना करते हैं या चाहते हैं तो देर-सवेर उसे प्राप्त भी कर लेते हैं। उसे दूसरी बार भी हीराबाई मिल सकती थी, लेकिन उसने तो कसम खा ली कि आगे किसी कंपनी की किसी औरत को गाड़ी पर नहीं चढ़ाना है। उसने अपने भविष्य के दरवाजे को हमेशा के लिए स्वयं बंद कर लिया है।

स्पष्ट है कि यह कहानी निम्न वर्ग के वर्ग चरित्र को प्रदर्शित कर रही है। कुछ आलोचक रेणु पर यह आक्षेप लगाते हैं कि जिस तरह का चैतन्य पात्र ‘बलचनमा’ में नागार्जुन ने गढ़ा है, उस तरह का पात्र रेणु ने अपनी कहानी में नहीं गढ़ा है। मैं इस आरोप से सहमत नहीं हूं। “मैला आंचल” का पात्र बलदेव और कालीचरण पूरी तरह से चैतन्य है। “परती परिकथा” का पात्र लुत्तो, बालगोबिन मोची, जयमंगल तांती, ताजमनी, मलारी आदि कई सारे ऐसे पात्र पूरी तरह से चैतन्य हैं। “नैना जोगिन” कहानी की पात्र रत्नी अपने अधिकार के प्रति चैतन्य है। ऐसे बहुत सारे पात्र हैं जो निम्न वर्ग में चैतन्य हैं। हीरामन निम्न वर्ग के उस हिस्से को प्रतिनिधित्व करता है, जिस हिस्से में चेतना नहीं आई थी। रेणु की कहानी “तीसरी कसम” में इस बेसिक फर्क को समझना होगा – यह निम्न वर्ग के उस हिस्से की कहानी है जिस हिस्से में चेतना नहीं आई थी।

फणीश्वरनाथ रेणु का लेखन-काल साहित्य में संक्रमण-काल के नाम से जाना जाता है। उनके जमाने में भारतीय समाज बदल रहा था, जिसको संक्रमण कहते हैं। संक्रमण पर मेरी एक किताब है “संक्रमण काल और रेणु की औपन्यासिक नारियां”। जब समाज बदलना शुरू होता है तो पूरा का पूरा समाज एक बार में नहीं बदल जाता है। इस संक्रमणशील स्थिति पर गौर करें तो निम्न वर्ग के कुछ पात्रों में चेतना आ गई थी और इस वर्ग के शेष पात्रों में अभी चेतना नहीं आई थी। यही उस युग का सत्य है। “तीसरी कसम” उस वर्ग के हिस्से की प्रतिनिधि कहानी है, जिस हिस्से में अभी चेतना नहीं आई थी।

अगर कोई रेणु पर यह प्रश्न करता है कि वे निम्न वर्ग की निंदा करना चाहते हैं। ऐसा कतई नहीं है। जब तक निम्न वर्ग को उसकी वास्तविक स्थिति के स्वरूप का संज्ञान न कराया जाए तब तक वह अपने अधिकारों को पाने के लिए प्रयत्नशील कैसे हो सकता है? रेणु ने यह कहानी निम्न वर्ग की निंदा करने के लिए नहीं लिखी है, बल्कि उस वर्ग को जगाने के लिए लिखी है- तुम्हारा वास्तविक स्वरूप यही है, इस स्वरूप को तुम्हें छोड़ना पड़ेगा।

निराला जी ने “भिक्षुक” कविता में भिक्षुक से क्या कहा है- “अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम”। उन्होंने उस भिक्षुक को वास्तविकता से बोध कराया है, ‘दाता भाग्य विधाता से तुम क्या पाते’। जिसको तुमने भाग्य विधाता/दाता समझ रखा है, उनके कारण ही तुम्हारी ऐसी स्थिति है कि तुम आज भीख मांग रहे हो। तुम इस मुगालते से बाहर निकलो कि वह तुम्हारा दाता या भाग्य विधाता है। जब तक निम्न वर्ग को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं होगा तब तक वह उसके लिए संघर्ष कैसे करेगा? जो कार्य निराला जी ने किया है, समान रूप से वह कार्य रेणु ने “तीसरी कसम” कहानी में भी किया है।  जब तक उसे अधिकारों का बोध नहीं होगा तब तक उसे आगे की बात नहीं समझाई जा सकती है। निराला ने जो कार्य अपनी कविता “भिक्षुक” में किया वही कार्य रेणु ने अपनी कई रचनाओं में निम्न वर्ग को वास्तविकता से बोध कराकर किया है- तुम अपने अधिकार के प्रति चैतन्य बनो। हीराबाई पर अगर तुम्हारा अधिकार है तो तुम उसकी मांग क्यों नहीं करते? तुम उस अधिकार की प्राप्ति के लिए संघर्ष क्यों नहीं करते हो?

रेणु की कहानियों और उपन्यासों में हम बहुतायत में देखते हैं कि उनमें एक अंतरकथा जरूर रहती है। “तीसरी कसम” कहानी में महुआ घटवारिन की कथा है। महुआ घटवारिन को सौदागर ने उसकी सौतेली मां से खरीद लिया है। रुपए के आधार पर स्त्री का विनिमय नहीं होना चाहिए। अगर हीराबाई का विनिमय हीरामन के साथ होता तो रुपए के आधार पर नहीं होता, बल्कि प्रेम के आधार पर होता। यही प्रकृति का नियम है। रुपए के आधार पर महुआ घटवारिन का विनिमय होना गलत है। अब महुआ उस गलती से संघर्ष करती है और नदी में कूद जाती है। रेणु इस कहानी के माध्यम से संदेश देना चाहते हैं कि जब महुआ नदी में कूदती है तब उसी सौदागर का नौकर उतनी ही तत्परता से महुआ को बचाने के लिए बहती नदी में छलांग लगा देता है। जितनी देर तक उस जहाज पर महुआ रही है, उतने ही देर में उसको उससे प्रेम हो गया है। अपने प्रेम-पात्र को पाने के लिए वह उमड़ती नदी में छलांग लगा देता है। वह महुआ को पुकारता है- महुआ! तुम मेरा यकीन क्यों नहीं करती, मैं तुम्हें पकड़ने नहीं आ रहा हूं, तुम्हारे साथ जीना-मरना है। हीराबाई, हीरामन को एक जगह अपना गुरु कहती है। ऐसा क्यों है? आखिर महुआ घटवारिन की कहानी हीरामन ने सुनाई है। जिस कहानी को हीरामन सुनाता है, उस कहानी को वह अपने ऊपर आचरित क्यों नहीं करता है? जब महुआ का  सौदागर का नौकर महुआ को बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा सकता है तो हीरामन क्यों नहीं रिस्क ले सकता है। जो रिस्क लेता है, उसे ही उपलब्धि हासिल होती है। सुविधाजनक जोन में रहनेवाला उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता है।

‘महुआ घटवारिन’ कहानी के माध्यम से रेणु निम्न वर्ग को यह संदेश देते हैं कि तुम कहानी कहते-सुनते हो, गीत गाते हो लेकिन उस पर तुम आचरण नहीं करते। हीराबाई और हीरामन की जब स्टेशन पर भेंट होती है तो हीराबाई क्या कहती है- हमारा जी उदास हो गया है, महुआ को सौदागर ने खरीद जो लिया है।

कहानी हर तरह से समान हो आवश्यक नहीं है। कुछ समानताएं हैं तो कुछ असमानताएं भी हैं। महुआ का विनिमय रुपये के आधार पर हुआ था लेकिन हीराबाई का विनिमय रुपए के आधार पर नहीं हुआ है। वह तो नाटक में काम कर जीविकोपार्जन करती है। वह कोई देह व्यापार नहीं करती है। उसे किसी सौदागर ने नहीं खरीदा है। समस्या सिर्फ हीरामन की ओर से है, वह हीराबाई के प्रति उत्साह नहीं दिखा रहा है और न ही रिस्क ले रहा है। ना ही कोई आरजू या प्रस्ताव आदि करते दिख रहा है। एक बार भी वह हीराबाई से प्रस्ताव करता कि तुम मेरी हो और तुम मेरे घर चलो। हीराबाई अवश्य रूक जाती। लेकिन हीरामन के अंदर अनुत्साह है। जिसके कारण हीराबाई जहां से आई थी वहां चली जाती है। वह आजीविका के क्रम में घूम रही है। वह दूसरी जगह जाने के लिए बाध्य हुई है।

हीराबाई उच्चतर जीवन स्थितियों की प्रतीक है। उच्चतर जीवन स्थितियां क्या होती हैं? केवल कमाना, खाना या पेट भरना यह उच्चतर जीवन स्थितियां नहीं हो सकती। कला, साहित्य, मनोरंजन, सिनेमा, संगीत आदि ये सब जीवन की उच्च स्थितियां हैं। क्या हीरामन उच्चतर जीवन स्थितियों का प्रतीक है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात निम्न वर्ग के लिए उच्चतर जीवन स्थितियों के द्वार खुलने वाले थे या फिर स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान भी वह इन चीजों को प्राप्त कर सकता था क्योंकि अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान भी सबके लिए शिक्षा एवं नौकरी हासिल कर उच्चतर जीवन स्थितियों को प्राप्त करने के लिए समान रूप से दरवाजे खुले हुए थे। उनके लिए किसी चीज पर प्रतिबंध नहीं था। आखिर आंबेडकर के लिए दरवाजे बंद होते तो वह पढ़-लिखकर इतने बड़े पद पर कैसे आते। निम्न वर्ग को चाहिए था कि वह अपनी योग्यता और क्षमता बढाता एवं उन उच्चतर जीवन स्थितियों को प्राप्त करता।

रेणु के साहित्य को समझने में आलोचक-समीक्षक प्रायः चूक जाते हैं। रेणु बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें इशारों में, छोटे-छोटे प्रसंगों में कहकर आगे बढ़ जाते हैं। सामान्यतः लोगों का ध्यान उन छोटी चीजों पर नहीं जाता है। इसी “तीसरी कसम” कहानी में एक छोटा-सा पात्र लहसनवा है। वह हीराबाई के कंपनी में नौकर हो गया है। वह हीराबाई की साड़ी की धोवन में अपनी गमछी धोता है और हीरामन को जाकर कहता है- काका, आजकल मैं बड़े मौज में हूं। हीराबाई जिस कठौते में अपनी साड़ी धोती है, मैं अपना गमछा उसी में डूबो देता हूं। मेरा गमछा गम-गम करता है, लो तुम भी सूंघो। इस छोटे से पात्र के माध्यम से रेणु क्या कहना चाहते हैं?  वह कहना चाहते हैं कि निम्न वर्ग को जब तक उच्च स्तरीय जीवन स्थितियों के स्वाद से परिचय नहीं होगा, वह प्रेरित नहीं होगा। लहसनवा इत्र कहां से खरीदेगा और उसका कहां से प्रयोग करेगा। यह संभव ही नहीं है। रेणु यह कहना चाहते हैं- शुद्ध-अशुद्ध किसी भी माध्यम से अगर तुम्हारा परिचय उच्च स्तरीय स्वाद से होता है तो तुम उस स्वाद को प्राप्त कर लो एवं उसे अपनी प्रेरणा बना लो।

नागार्जुन के उपन्यास “बलचनमा” में बलचनमा कहता है कि मैंने जीवन में जो कुछ भी अच्छा खाया सब जूठा ही खाया। वह घी से बघाररा हुआ चावल, दाल, तरकारी, चटनी, पापड़, आचार, दही शुद्ध एवं उच्छिष्ट माध्यम से कहां से प्राप्त कर सकता है। ऐसे स्वाद से वह कैसे परिचित होता। उसने अशुद्ध माध्यम से ये सब प्राप्त किया है, आखिरकार उसका स्वाद से परिचय तो हुआ! नागार्जुन और फणीश्वरनाथ रेणु दोनों ही लेखक निम्न वर्ग के लोगों को कहते हैं कि स्वाद तुम्हें जहां से भी मिले। उस उच्चस्तरीय स्वाद को प्राप्त करो। उसे अपनी प्रेरणा बना लो। 

अब देखिए कि लहसनवा नौकरी में बहाल हो गया है। अब हम उसका भविष्य देखें, गाड़ीवानी का क्या भविष्य है? गाड़ीवानी करके कोई ट्रैक्टर नहीं खरीद सकता है। वह बैलगाड़ी ही खरीद सकता है। लेकिन लहसनवा कंपनी में गया है, आज वह साड़ी धोता है, कल पर्दे की डोर खींचेगा। उसके अगले दिन हो सकता है कि वह जी हुजूरी करने वाला पात्र बने या फिर अगले दिन हो सकता है कि वह अपनी योग्यता और क्षमता को बढ़ाकर उसी नाटक में नायक हो जाए और ज्यादा विकास करेगा तो वह अपनी नाटक कंपनी खोल सकता है। फणीश्वरनाथ रेणु इस छोटे से पात्र के माध्यम से निम्न वर्ग को यह संदेश देते हैं कि तुम अपने विकास एवं प्रगति के लिए संभावनाशील उद्यमों से जुड़ो। गाड़ीवानी जैसे उपक्रमों से मत जुड़े रहो, जिसकी सीमा निर्धारित है। हीरामन पिछले 20 सालों से गाड़ीवानी का काम कर रहा है और जब तीसरी कसम खाता है तो उसमें भी गाड़ीवानी की ही बात करता है। स्पष्ट है, आज के बाद भी वह गाड़ीवानी ही करेगा। इस आजादी से उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वह अपनी बारे में जरा भी चैतन्यता नहीं दिखाता है, उसे अपने अधिकार का बोध नहीं है और न ही चेतना। इसलिए “तीसरी कसम” सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है। अगर प्रेम कहानी होती तो वह अपनी प्रेमिका हीराबाई को प्राप्त करने का संघर्ष एवं दायित्व का निर्वहन जरूर करता।

न.कि.कु. : रेणु अपनी रचनाओं में निम्न वर्ग की महिलाओं एवं शूद्रों के प्रति उदार नजर नहीं आते हैं। मैं “नैना जोगिन” का उदाहरण देना चाहता हूं। इस कहानी में नैना जोगिन का नायकत्व पुरुष पात्र के आगे पराजित होता दिखता है?

सु. ना. या. : रेणु ने पुरुष पात्रों के साथ-साथ बहुत सारे महत्वपूर्ण स्त्री पात्रों की रचना की है। केवल उच्च जातियों से ही नहीं, बल्कि निम्न जातियों से भी। आप मलारी और ताजमनी को भूल जाते हैं। आप रतनी के संघर्ष को जरा ठीक से देखें…। मैं बार-बार कहता आया हूं कि रेणु आलोचना के सरलीकरण के शिकार हो गए। “मैला आंचल” में जब स्वतंत्रता की प्राप्ति हो जाती है, जब जुलूस निकलता है, तो एक युवक नारा लगाता है- यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है। रेणु ने लिख दिया- यह युवक औराही हिंगना का है। सिर्फ इसी समानता के आधार पर लोग ले उड़े कि ये नारा लगानेवाला कोई और नहीं खुद फणीश्वरनाथ रेणु हैं। जिस आजादी के लिए रेणु ने इतना संघर्ष किया था वे ऐसा कैसे कह सकते थे। 1942 में उनके एक मित्र के विश्वासघात के कारण वे गिरफ्तार हो गए थे। यदि उनका मित्र विश्वासघात नहीं करता तो वे नहीं पकड़े जाते। उस समय अंग्रेज क्रांतिकारियों से बहुत खौफजदा रहते थे। जब वे पकड़े गए तो अंग्रेजों ने उनको बहुत प्रताड़ित किया। छाती पर चढ़कर उनकी छाती को इतना कुचला कि इनके नाक-मुंह से खून आ गया था। उन्हें रस्सी से बांधकर घोड़े से घसीटते हुए अररिया तक ले जाया गया। जिस व्यक्ति ने आजादी की प्राप्ति के लिए इतने कष्ट सहे , वह आदमी नारा लगाएगा! ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है। नारा लगाने वाला कम्युनिस्ट था। कम्युनिस्ट के चरित्रों पर पूर्णिया में एक प्रसिद्ध कथाकार हुए हैं- सत्यनाथ भादुड़ी। रेणु पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने ढोढईचरितमानस उपन्यास का अनुवाद मैला आंचल के रूप में किया है। उसका खंडन सत्यनाथ भादुड़ी ने स्वयं किया था। ऐसी दिखने वाली समानता के आधार पर लोग कई तरह के अर्थ निकालने लगते हैं। एक बार “तीसरी कसम” कहानी पर जब चर्चा चली थी, तब एक पाठक ने तपाक से कह दिया कि हीरामन तो खुद रेणु हैं। हीरामन जैसा जड़ पात्र रेणु जैसे चैतन्य लेखक कैसे हो सकते हैं।

“नैना जोगिन” में माधव बाबू भी रेणु की तरह कलम घिसाई करते हैं। लेकिन केवल इस समानता के आधार हम नहीं कह सकते कि माधव बाबू स्वयं रेणु हैं। निष्क्रिय समाज में माधव बाबू पैसिवनेस के प्रतीक हैं। बेटी समाज में किसी एक की नहीं होती है, खासकर, उस समाज में जिसके मां-बाप ना हो। रतनी की मां है, पिता नहीं है। रतनी का यही प्रश्न है- आपको दिखाई नहीं पड़ता कि आपके गांव-समाज की एक लड़की इतनी तड़-तड़ जवान हो गई है, उसकी शादी क्यों नहीं होती? “तीसरी कसम” में भी हीरामन की शादी नहीं होती, तो उसमें भी समाज का पैसिवनेस झलकता है। माधव बाबू खुद पैसिवनेस के प्रतीक हैं। रेणु स्त्री के संघर्ष को कहीं से भी कुंठित नहीं करते। उन्होंने रत्नी के चरित्र को उभारने के लिए ऐसा किया है। रतनी में अधिकार की चेतना है, इसलिए उसमें उग्रता है। रतनी में एक और महत्वपूर्ण चीज है, जिसे हम प्राकृतिक रूप से समझ सकते हैं कि प्रकृति ने हर स्त्री को अपनी संभावना को चरितार्थ करने की क्षमता एवं ऊर्जा दे रखी है। वह जवान है, अगर उसकी शादी हुई रहती तो उसके बच्चे होते, आज वह उसका भरण-पोषण कर अपने स्त्रीत्व के अधिकार को चरितार्थ करती, अपने संभावनाओं को साकार करती। वह विवाह के अभाव में यह सब कर नहीं पा रही है। आखिर, उसकी ऊर्जा कैसे निकले? उसके भीतर की ऊर्जा के निकलने का कुछ तो द्वार चाहिए! इसलिए लोगों को गाली देना, झगड़े करना, रिश्ते तोड़ना जैसे हरकतें करती है। वह अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने का मनोवैज्ञानिक तरीका अपना रही है। इसी तरीके को रतनी ने अपनाया है। उस कहानी की एकमात्र नायिका रतनी है, माधव बाबू नायक कहीं से नहीं हैं। यह बात हम कथा-शिल्प की दृष्टि से भी समझ सकते हैं। जो फल की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है उसे ही नायक कहा जाता है। रतनी का फल क्या है? वह पटना जाना चाहती है, क्यों जाना चाहती है? इसलिए कि विवाह के दो-तीन साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ और वह बच्चा प्राप्त करना चाहती है। इसलिए वह पटना जाना चाहती है, यही उसका फल है। रतनी इस कहानी में संघर्ष करती है। कहानी में बहुत आगे जाकर माधव बाबू उस संघर्ष में सहयोगी बने हैं। माधव बाबू पर रतनी का दबाव है। उसके दबाव पर माधव बाबू पटना जाते हैं। अगर माधव बाबू नायक होते, कथा का नेतृत्व आगे बढ़कर करते, नेतृत्व करने का मतलब है, पहल करना। इस कथा में माधव बाबू पहल करते हुए नहीं दिखाए पड़ेंगे। इसलिए इस कथा की नायिका रतनी ही है। जबकि माधव बाबू उसके चरित्र के ठीक विपरीत हैं, वे निष्क्रिय समाज के पैसिवेनेस के प्रतीक हैं। ये माधव बाबू रेणु कतई नहीं हो सकते हैं। अगर इस तरह का चरित्र रेणु का होता तो वे मलारी एवं ताजमनी जैसा जीवंत पात्र नहीं रचते। ऐसे ढेर सारे उदाहरण रेणु-साहित्य में मिलेंगे।

न. कि. कु. : रेणु की रचनाओं में जाति-विमर्श की अभिव्यक्ति कभी-कभार मुखर होकर होती है, कई बार ऐसा भी लगता है कि वे कुछ छुपा भी लेते हैं। उनके कहानियों में समानांतर रूप से जाति को लेकर एक अंतरद्वंद्व चलता रहता है। 

सु. ना. या. : निःसंदेह ‘जाति’ भारतीय समाज का एक यथार्थ है, बल्कि रेणु ने अपनी रचनाओं में कहीं भी इससे इंकार नहीं किया है और न ही वे जाति को लेकर भ्रम, मोह या दबाव में हैं। “रसप्रिया” कहानी में रेणु ने खुलकर जाति का उल्लेख किया है। जब ब्राह्मण बच्चे कहते- बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा! मारो साले को, मृदंग फोड़ दो। इससे स्पष्ट है कि कुछ बच्चे जाति से ब्राह्मण हैं और पंचकौड़ी में मृदंगिया बहरदार है। इस कहानी में उन्होंने जाति को कहां छुपाया है? रेणु इस संघर्ष के माध्यम से यह बताते हैं कि पंचकौड़ी में मृदंग बजानेवाले का व्यवसाय ब्राह्मणों के ही भरोसे चलता है। विद्यापति ब्राह्मण, उसके गानेवाले प्रायः ब्राह्मण होते हैं। इन मंडलियों को ब्राह्मण ही बुलाया करते थे। इसलिए ऐसी स्थिति में दसद्वारी लोग स्वाभिमानी हो नहीं सकते। यह एक व्यावसायिक तकाजा है। जैसे मारवाड़ी जितना भी धनी हो जाए झगड़ालू नहीं हो सकता। वह लाठी, भाला, बंदूक-गोली नहीं चला सकता, यह उसका व्यावसायिक तकाजा है। जाति को लेकर दब्बूपने जैसा भाव उसके व्यावसायिक तकाजे के कारण है। रेणु की दूसरी रचनाओं में भी जाति को लेकर किसी तरह का दबाव नहीं है। “मैला आंचल” में हरगौरी बलदेव को बोलता है- ग्वाला होकर लीडरी। आगे के प्रसंग में हम देखते हैं कि बलदेव और कालीचरण ने जब मेरीगंज में हड़ताल करवा दी। नाई, धोबी सभी जातियों को अपने साथ में कर लिया। यही हरगौरी जो कि जाति का राजपूत है, तहसीलदार विश्वनाथ के आगे हाथ जोड़कर कहता है- काका, क्या आप चाहते हैं कि हम नाई धोबी के आगे हाथ जोड़ करके गिरगिड़ाएं। रामकृपाल काका देखिए, नाई लोगों ने हम लोगों का हजामत बनाना, दाढ़ी बनाना सब छोड़ दिया है। गांव में गाय मरी पड़ी है। चमारों ने उठाने से मना कर दिया है। कालीचरण की हड़ताल बहुत सफल होती है। तहसीलदार एक उपाय निकालते हैं। उन्होंने इस मामले को रफा-दफा करने के लिए पंचायत बुलाई। आप देखेंगे, इस पंचायत में कितना क्रांतिकारी काम होता है! तहसीलदार नीची जाति के सभी लोगों को एक ही सफे (दरी) पर बैठने के लिए बुलाते हैं। तहसीलदार कहता है- प्यारेलाल (धोबी), आओ, ऊंचे सफे पर बैठो। इस तरह सभी टोली के छोटे लोगों को बुलाते हैं। तीन-चार महीने पहले की बात है कि हरगौरी ने यादव जाति (यादव जाति बहुत ही जाग्रत एवं मिलिटेंट जाति होती है) के बलदेव को कहा था कि उठ जाओ दरवाजे पर से। सभी लोग ऊंचे सफे पर बैठो। मुझे नहीं लगता कि जाति को लेकर रेणु जी इतने दब्बू हैं, बल्कि उन्होंने साफतौर पर जाति का उल्लेख करते हुए लिखा है- दो यादवों के बीच में बैठा है हरगौरी राजपूत, एक बगल में कालीचरण और दूसरे बगल में ग्वाला बलदेव। इतना ही नहीं, रेणु वहां पर एक मार्के की बात लिखते हैं- हरगौरी इन दोनों से ऐसे हंस-हंसकर बातें कर रहा है मानो दोनों एक प्याले का दोस्त हो। कहां वो अकड़, कहां एक प्याले का दोस्त!

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मैंने अपनी किताब “अलक्षित गौरव : रेणु” में रेणु के बारे में लिखा है- रेणु जीतते हुए प्रतिरोध के रचनाकार हैं। कालीचरण ने जातिवाद के इस सामंती मिजाज का प्रतिरोध किया था, उसका प्रतिरोध विजयी हुआ, हरगौरी को झुकना पड़ा, हरगौरी को उसी सफे पर बैठना पड़ा, जहां यादव लोग और अन्य जातियां बैठी हुई थीं। यह हरगौरी की पराजय है और कालीचरण की विजय। 

जाति को लेकर रेणु बिल्कुल भी किसी भ्रम या मोह में नहीं हैं। रेणु अपनी रचनाओं में शिक्षाप्रद संदेश देते हैं। “परती परिकथा” का एक पात्र है- लूत्तो। वह बहुत चैतन्य है, लेकिन वह प्रतिक्रियावादी हो गया है। वह अकारण-सकारण जो मन में आता है, उल-जुलूल बकता रहता है। वह जितेंद्र मिश्र को गाली देता रहता है। उसे कहता है- सड़क से हड़काया हुआ कुत्ता। इसको एक दिन जरूर दागेंगे। रेणु इसे प्रतिक्रियावाद कहते हैं। निम्न वर्ग के प्रतिक्रियावादी हो जाने पर, उसके भीतर की ऊर्जा अनावश्यक संघर्षों में खर्च होने लगती है। फिर वह वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। उसके प्रतिपक्ष में कालीचरण का चरिच देखें। जब फुलिया का यौन शोषण सहदेव मिसिर ने किया था, तब रात में कालीचरण ने उसे रंगे हाथों पकड़ा था। वहां कालीचरण के शागिर्द लोग ही थे, जिन्होंने एक सवर्ण के खिलाफ हिम्मत जुटाई थी और रात भर सहदेव मिसिर को खूंटे में बांधे रखा। उस पंचायत में सभी लोग थे, कालीचरण भी पहुंच गया था। जब वह पंचायत में देखता है कि यह मुंहदेखी बात हो रही है। वह कह उठता है- मुझे भी कुछ पूछने दिया जाए। जब ज्योतिषी जी कहते हैं- हम लोग कालीचरण को पंच नहीं मानते हैं। कालीचरण इस पर आपत्ति करता है- मैं भी इसी गांव का रहनेवाला हूं, आखिर मैं पंच क्यों नहीं हूं, मुझे पंच क्यों नहीं माना जाएगा। तब इसी बात का फैसला हो जाए कि मुझे कितने लोग पंच मानते हैं। गिनती करने पर, 115 लोगों ने हाथ उठा दिया। ज्योतिषी का बेटा रामनारायण भी पंचायत में था, उसने भी कालीचरण के पक्ष में हाथ उठाया था।

यहां हम जाति के प्रश्न पर गौर करें तो कालीचरण अपने संघर्ष से पंच हो जाता है। वहां आपको प्रजातंत्र और गणतंत्र दोनों नजर आएगा। आगे जब आप “पंचलाइट” कहानी के पात्र महतो (कोइरी या कुर्मी- पिछड़ी जाति) को देखें तो उसने एक पंचलाइट (पेट्रोमैक्स) खरीदी है। उसके गांव में घुसने से जरा पहले ही चौराहे पर फुटंगी झा से भेंट हो जाती है। फुटंगी झा कहता है- महतो, यह लालटेन कितने में खरीदे हो। तब महतो कहता है- बाभन लोग ऐसे ही हर बात में ताव रखते हैं, अपने घर की ढिबरी को बिजली बत्ती कहेंगे और हमारे पंचलाइट को लालटेन कहते हैं। महतो की इस चेतना पर गौर करें। अब महतो के पास ढिबरी नहीं है, लालटेन भी नहीं है, अब उसके पास पेट्रोमैक्स है। इस तरह अब वह पेट्रोमैक्स के विस्फोट का प्रतीक है। अब लोगों को चीजें समझ में आने लगी है कि ब्राह्मण और राजपूत लोग उनके साथ क्या करते हैं? इस तरह वे लोग पेट्रोमैक्स के रोशनी में नहा जाते हैं। इसी कहानी में एक और पात्र है- गोधन। गोधन ने पेट्रोमैक्स को जलाया है। अब उसकी बात सुनिए, यह पात्र देखने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन मेरे नजर में वह एक महान पात्र है। वह रेणु जी की महान सृष्टियों में से एक है। गोधन गांव के लड़कों में घुलता-मिलता नहीं है। वह अकेला ही मस्त रहता है। लेकिन गोधन उसके आगे की चेतना से संपन्न है। इसलिए गांव के लोगों से उसका कैसे मेल हो सकता है। यह उच्च चेतना का पात्र है इसलिए वह फिल्मी गीत गाता है। फिल्मी गीत लोकगीत से हमेशा ऊंचा एवं श्रेष्ठ माना जाएगा। फिल्मी गीत गाने पर जाति से प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन जाति की प्रतिष्ठा दाव पर आती है, तब ब्राह्मण लोग कहते हैं- कान पकड़कर उठक-बैठक करो, तब यह पेट्रोमैक्स जलेगा। यह बात इन लोगों को पता नहीं है कि गोधन  पेट्रोमैक्स जलाना भी जानता है। वह उच्च चेतना का पात्र है। उसके पास यह विद्या कहां से आई, कैसे सीखा! लेकिन, यह विद्या तो है ही। उसने पेट्रोमैक्स जला दिया। 

फणीश्वरनाथ रेणु अपनी रचनाओं में ऐसे उदाहरणों से यह संदेश देना चाहते हैं कि राष्ट्र का नेतृत्वकर्ता भीड़ का हिस्सा होगा तो वह राष्ट्र का नेतृत्व नहीं कर सकेगा। जब वह भीड़ से अलग या आगे होगा, उसके पास उच्च स्तरीय चेतना होगी, वही राष्ट्र का नायक हो सकता है और समाज में ऐसे ही लोग नेतृत्व करें तभी समाज को प्रेरणा मिलेगी और और  समाज आगे बढ़ता है। आखिर पेट्रोमैक्स जलाना सबको उसने ही सिखाया। इस कहानी में गोधन अदना-सा पात्र लगता है, लेकिन वह अदना नहीं है बल्कि एक महान पात्र है, उसकी शिक्षा बहुत बड़ी है।

अ. ना. : “तीसरी कसम” कहानी में हीरामन की चर्चा करते हुए आपने निम्न जातियों के प्रति आलोचना के भाव की बात कही, जिसके कारण हीरामन हीराबाई को प्राप्त नहीं कर पाता। आपने ‘अलक्षित गौरव: रेणु’ में एक सर्वसमावेशी समाज की कल्पना की है। हम यह जानना चाहते हैं कि अपर कास्ट और निम्न जातियों में कौन-सी कमियां हैं। संक्षेप में सूत्रबद्ध करके हमें बताएं?

सु. ना. या. :  मेरे सर्वसमावेशी शब्द से आशय है- सबको समाज में स्थान मिलना चाहिए। मगर सामंतवाद में ऐसा नहीं होता। चाहे आपकी जो भी योग्यता हो, अगर सामंत की मर्जी नहीं होगी तो आपको उस भूमिका में नियुक्त नहीं किया जाएगा। सामंतवाद मर्जी से चलने वाला वाद है और गणतंत्रवाद योग्यता से चलने वाला वाद है। रेणु की अपनी इच्छा (जिसे लेखक का विजन कहते हैं) है कि भारत से सामंतवाद मिट जाए और गणतंत्रवाद इस देश में स्थापित हो। इसी को उन्होंने “परती परिकथा” में सूत्रबद्ध किया। इस उपन्यास में विमल मामा जो एक विदूषक के पात्र के रूप में हैं। लेकिन मेरी नजर में वे बड़े महत्वपूर्ण पात्र हैं। वे समय-समय पर बहुत महत्व की बातें करते हैं। वे कहते हैं तांत्रिक का बेटा गणतांत्रिक। यह वाक्य जितेंद्र मिश्र के बारे में कहा गया है। जितेंद्र मिश्र के पिता सामंत थे। वहां तांत्रिक का मतलब पूजा-पाठ करने से नहीं है, समाज को हांकने के तंत्र से है। समाज को हांकने का तंत्र शिवेंद्र मिश्र के पास था। यह तंत्र सिपाही रामपखारन लठैत और मुंशी जलधारी लाल (शिवेंद्र मिश्र के लिए कलम की जोर से संपत्ति हड़पता है) के रूप में है। वहां तंत्र शब्द सामंतवाद के लिए आया है।

रेणु की इच्छा है कि सामंती शिवेंद्र का बेटा गणतांत्रिक हो अर्थात् जो सामंती हैं, उनके बाल-बच्चे यानी भारत की अगली पीढ़ी सामंतवाद को धीरे-धीरे छोड़ दें। उसको गणतंत्रवादी हो जाना चाहिए। इस इच्छा को रेणु ने जितेंद्र मिश्र के रूप में व्यक्त किया है। जब समाज गणतंत्रवादी हो जाएगा तभी निम्न वर्ग के लोगों को न्याय एवं भूमिकाएं मिलेंगी। उसकी योग्यता को सम्मान और स्वीकार्यता मिलेगी। रेणु ने अपने उपन्यास “परती परिकथा” में इन बातों को चरितार्थ होते हुए भी प्रदर्शित किया है। जब “पंचचक्र” नाटक का आयोजन होता है। उसमें कोस्का महारानी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नाटिन कुल में पैदा हुई ताजमनी को दी जाती है। वह कोई राजपूत, भूमिहार या ब्राह्मण के घर पैदा नहीं हुई है। दुलारी दाई (दूसरे नंबर की महत्वपूर्ण भूमिका) की भूमिका मलारी अदा करती है। जितेंद्र मिश्र सर्वांगतः गणतांत्रिक हैं, इसलिए वह जातिवाद से प्रभावित नहीं है। अगर वे जातिवाद से प्रभावित होते तो गांव की एक लड़की है- लीला। वह मनमोहन बाबू (भूमिहार जाति) की बहन है। पटना में रहकर पढ़ती है। वह जींस पैंट पहनती है, साइकिल पर चढ़ती है, हिप्पी कट बाल कटाती है। जितेंद्र मिश्र लीला को ये भूमिकाएं दे सकते थे। जितेंद्र मिश्र ने ऐसा नहीं किया। क्योंकि लीला का व्यक्तित्व डाक्टरनी की भूमिका के लिए मुफीद है। उसी “पंचचक्र” नाटक में जब एक प्रहसन  आता है, जिसमें एक डाक्टरनी और रोगी का प्रसंग है। लीला को डाक्टरनी की भूमिका दी जाती है। लीला में ग्रामीण महिला भूमिका निभाने के लिए ग्रेस नहीं है। कोस्का महारानी दुलारी दाई कैसे होगी! वह भूमिका हिप्पी कट बाल वाली, जिंस पैंट पहनने वाली लड़की अभिनीत नहीं कर सकती है। अगर भूमिकाओं के मांग के हिसाब से ताजमनी और मलारी फिट है, तो केवल जाति के आधार पर इन्हें अस्वीकृत नहीं किया जा सकता है। ऐसा गणतंत्र के कारण है।

फणीश्वरनाथ रेणु ने भारत की सामाजिक समस्याओं के अंत के लिए जातिगत आधार पर सामंती लोगों का गणतांत्रिक होना अपरिहार्य शर्त माना है। वास्तविकता में आज भी भारत का समाज पूर्णतया गणतांत्रिक नहीं हुआ है। अगर भारत गणतांत्रिक हो गया होता तो आरक्षण की क्या जरूरत थी! आरक्षण बेईमान लोगों के विरुद्ध सुरक्षा कवच अथवा एक अस्त्र की तरह है। अगर न्यायपूर्ण ढंग से योग्यता के हिसाब से सभी को भूमिकाएं मिल जाए तो आरक्षण की क्या जरूरत है? लेकिन वास्तविकता यह है कि यही कार्य नहीं हो रहा है। इसीलिए आरक्षण की जरूरत पड़ी है। अगर रेणु गणतांत्रिक के रूप में जितेंद्र मिश्र को प्रस्तुत करते हैं तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वह ब्राह्मण को श्रेष्ठ मानते हैं, बल्कि यह समाज की जरूरत है कि उनको गणतांत्रिक होना चाहिए। हम दूसरे लेखकों की रचनाओं में सामंती मानसिकता के पात्र पाते हैं। अभी बिड़ला पुरस्कार से पुरस्कृत रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी में ‘सदियों का पड़ाव’ में एक डाक्टर है। वह गांव के एक हेल्थ सेंटर में बहाल हुआ है। वह स्वीपर के पद पर भी ब्राह्मण को ही बहाल करता है। स्वीपर का काम ब्राह्मण करेगा ही नहीं, वेतन भले ही स्वीपर का ले लेगा। वह वेतनभोगी बनकर रहेगा। भारतीय समाज में ब्राह्मण स्वीपर का काम नहीं करते हैं। वह 10-20 रुपए देकर मेहतर से साफ-सफाई एवं झाड़ू लगवाता है एवं अपने को छिपाए रखता है कि वह स्वीपर के पद पर बहाल है। इस प्रकार योग्यता और न्याय पर आधारित नियुक्तियां एवं बहालियां होने लगें तो बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। आज भी हम देखते हैं, ऊंची जाति के कम योग्यता वाले ऊंचे पदों पर विराजमान हैं।

रेणु ने 1972 में जब चुनाव लड़ा था, उसका कारण भी न्याय और योग्यता के आधार पर नियुक्तियां का न होना था। एक युवक पटना निवास पर उपस्थित हुआ। वह गुस्से से तमतमाया हुआ था। रेणु ने उस युवक से पूछा कि तुम इतने गुस्से में क्यों हो? वह युवक रेणु के गांव के नजदीक का था। रेणु उससे पहले से परिचित थे। उस युवक ने बताया- मैं तो स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक कभी द्वितीय नहीं आया। सभी क्लासों में वह फर्स्ट डिवीजन आया। तब उसको नौकरी नहीं मिलती थी, जो दूसरे-तीसरे नंबर का अभ्यर्थी होता था, उसकी नियुक्ति हो जाती थी और वह इसी बात से परेशान था। रेणु ने उससे पूछा- क्या तुम अपने क्षेत्र के विधायक और सांसद से नहीं मिले? वह इस बात पर और भी आक्रोशित हो उठा, उसने कहा- आप किसकी बात करते हैं। उस समय सांसद-विधायक ऊंची जाति के हुआ करते थे। किसी ने उस युवक की मदद नहीं की। वे निम्न वर्ग के लोगों की मदद नहीं किया किया करते थे। उस क्षेत्र के विधायक ने उसकी मदद नहीं की। यह भारतीय समाज का यथार्थ है। रेणु इसलिए यह कहते हैं- जब ऊंजी जाति के लोग गणतांत्रिक होंगे तभी निम्न वर्ग को न्याय मिल पाएगा अन्यथा नहीं मिलेगा। निम्न वर्ग के गणतांत्रिक होने न होने से समाज पर कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। नियोक्ता की भूमिका में आज भी निम्न वर्ग नहीं है, जो भी नियुक्तियां होती हैं, सभी कमीशन के चेयरमैन ऊंची जाति के लोग होते हैं।

इसलिए रेणु का विजन था- उच्च जाति के लोग गणतांत्रिक हो जाएं। वे लुत्तो की तरह प्रतिक्रियावादी न होकर कालीचरण की तरह रचनात्मक हों। जैसा कि उपरोक्त में मैंने बताया था- ज्योतिषी जी गुस्से से भर गए। जब कालीचरन ने अपने अधिकार की मांग की कि मैं भी इस गांव का हूं, मैं पंच क्यों नहीं हो सकता? ज्योतिषी ने कहा- पहले तुम अपनी मां से जाकर पूछो, तुम किसके बेटे हो? उसके मां के चरित्र पर लांछन लगाया गया यानी वह अपने पिता की संतान न हो, उसका जन्म  मां के भ्रष्ट आचरण से हुआ हो। लेकिन कालीचरण इस प्रश्न पर प्रतिक्रियावादी नहीं होता। वह हिंसात्मक आचरण नहीं करता है। वह विषपायी होता है। जिस तरह शंकर जगत के कल्याण के लिए सारा विष पी लेते हैं, उसी तरह कालीचरण उस विष को पी लेता है, और बहुत ही शांत ढंग से जवाब देता है- ज्योतिषी काका, मुझे अपने बाप के बारे में मालूम है। इतना ही वह कहता है। अगर वह रचनात्मकता से अलग हट जाता, ज्योतिषी से झगड़ा करता। जो काम उस पंचायत के माध्यम से होने वाला था, वह नहीं हो पाता। फुलिया को न्याय नहीं मिल पाता। जिस प्रकार शिव जी के सभी गण शिव जी की तरह तो शालीन नहीं होते, उसी तरह कालीचरण के सभी शागिर्द उतने शालीन नहीं हैं। उन लोगों ने प्रश्न उठा दिया कि पहले वे अपने स्त्री से जाकर पूछें कि उसके पेट में किसका बच्चा पल रहा है।

रेणु के पात्र जाति को लेकर किसी भ्रम, मोह या दबाव में नहीं है। वे सही प्रश्न उठाते हैं एवं सही मार्ग-निर्देश भी करते हैं। यह सच्चाई भी है, अगर हम प्रतिक्रियावादी हो जाएं, जाति को लेकर सबसे उलझते रहें तो हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। इसका उदाहरण मलारी है। मलारी जाति की चमारिन है। उसकी मां प्रसव कराने का काम करती है।  लेकिन मलारी अब मां की तरह प्रसव कराने नहीं जाती है। ऐसा इसलिए संभव हुआ कि वह गांव की कन्या पाठशाला में पढ़-लिखकर मास्टरनी हो गई है। वह सिर्फ मास्टरनी ही नहीं है, अब उसकी नजर हेड मिस्ट्रेस पर है। हेड मिस्ट्रेस बनने के लिए आवश्यक है कि वह ट्रेनिंग करें। वह लोगों को सुनाती है- उसे ट्रेनिंग करने मुजफ्फरपुर जाना है। लेकिन लोग उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं एवं आक्षेप कर रहे हैं। मगर वह पलटकर उसका जवाब नहीं देती। किसी से उलझती नहीं है। उसकी नजर हमेशा अपने भवितव्य एवं उद्देश्य पर है। उसे हेड मिस्ट्रेस बनना है, इसलिए वह ट्रेनिंग करने मुजफ्फरपुर जाती है। वह इतनी चैतन्य है कि फरवरी 1956 में भारत में एलआईसी लांच हुआ था। 1957 में यह उपन्यास प्रकाशित है, जिसमें एक दलित स्त्री जीवन बीमा कराती है। इस घटना के माध्यम से रेणु निम्न वर्ग को संदेश देते हैं- अगर प्रगति करनी है तो अपने समय की नवीनतम अवधारणाओं से जुड़ो। उस समय की नवीनतम अवधारणा हेड मिस्ट्रेस की ट्रेनिंग थी, एलआईसी थी। मलारी उस अवधारणा से जुड़ती है। वर्तमान में नवीनतम अवधारणा इंटरनेट, मोबाइल, लैपटाप और कंप्यूटर है। इससे जुड़े बिना निम्न वर्ग की प्रगति संभव नहीं है।  

रेणु मलारी और कालीचरण जैसे पात्रों के माध्यम से हमें संदेश देते हैं कि निम्न वर्ग के लोगों को प्रतिक्रियावादी होकर अपनी ऊर्जा बेमतलब की लड़ाई-झगड़े में खर्च न करके आगे बढ़ने की दिशा में खर्च करना चाहिए। निम्न वर्ग को नवीनतम अवधारणाओं से जुड़ना चाहिए। तभी इस वर्ग की तरक्की एवं प्रगति होगी।

न. कि. कु. : असगर वजाहत ने एक साक्षात्कार में कहा है- प्रेमचंद के पात्रों में सामूहिकता का बोध होता है जबकि रेणु की रचनाओं में उस स्तर का सामूहिकता का बोध नहीं है जितना कि प्रेमचंद में?

सु ना या : असगर वजाहत जी बताएं कि प्रेमचंद के महान उपन्यास ‘गोदान’ के नायक होरी को दंडित किया जा रहा था तब होरी के समाज से कितने लोग उसके साथ खड़े हुए थे। कोई उदाहरण है क्या? जबकि रेणु में हम पाते हैं, जब कालीचरण को अपमानित किया जाता है तो पूरी हसेड़ी उसके साथ खड़ी होती है। 115 लोग कालीचरन के पक्ष में हाथ उठाते हैं। असगर वजाहत को कैसे लगता है कि प्रेमचंद के पात्रों में सामूहिकता है और रेणु के पात्र अकेले-अकेल रहते हैं। ये बिल्कुल उल्टी बात है।

अ. ना. : आपका वक्तव्य ज्यादातर रेणु की एकाध रचनाओं पर ही केंद्रित रहा है। हमारी जिज्ञासा है कि आप यह बताएं कि रेणु जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से हिंदी कहानी का कितना विस्तार किया है। वे कहां चूकते हैं, इसके बारे में विस्तार से रोशनी डालें। (बीच में नवल जी) नई कहानी के दौर के दृष्टिकोण के हिसाब से देखें तो रेणु की रचनाओं में हम क्या पाते हैं?  

सु. ना. या. : रेणु जी की एक कहानी ‘आत्मसाक्षी’ है। उसमें एक पात्र ‘गणपत’ कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता है। वह निचले स्तर का एक वालंटियर है। जब जर्मन के विद्वान लोथार लुत्से ने यह कहानी पढ़ी तो उन्हें जर्मनी का विभाजन का कारण नजर आया। उन्होंने रेणु की कहानी को सर्वश्रेष्ठ बतलाया। वे उनसे प्रभावित हुए कि वे उनका इंटरव्यू लेने भारत आ गए। यह दिसंबर 1971 के आसपास की घटना है। उन्होंने केवल रेणु से ही मुलाकात नहीं की बल्कि हिंदी के दूसरे कथाकारों से भी मुलाकात की। उन्होंने रेणु को बताया- कुछ लोग आपसे ईर्ष्या भी करते हैं, नाम उन्होंने नहीं लिया। यह सभ्यता का तकाजा है। लेकिन यह सच्चाई है कि कुछ लोग आपसे ईर्ष्या भी करते हैं। उन लोगों की नजर में आप ग्रामोद्योग मनोवृत्ति के लेखक हैं। रेणु ने कहा- ग्रामोद्योगी मनोवृति की कहानियां लिखना क्या सही बात नहीं है? क्या शहरी जीवन पर लिखी गई कहानी ही कहानी है? क्या शहरी जीवन पर लिखा गया साहित्य ही साहित्य है? तब तो प्रेमचंद के साहित्य को भी खारिज कर देना पड़ेगा। रेणु पर बहुत सारे आक्षेप हुए हैं। ऐसे आक्षेपों से प्रभावित होने के बजाए हमारा मूल्यांकन विवेक पर आधारित होना चाहिए। 

वर्तमान में डॉ. शीतांशु पांडे ने मेरी किताब पर एक महत्वपूर्ण वाक्य लिखा है- हिंदी में कथा-समीक्षा का अभी विकास नहीं हुआ है। यानी भारत में तार्किक, सुविचारित और गंभीर कथा साहित्य की रचना नहीं हो रही है। कहानियों में सतहीपन एवं हल्की-फुल्की टिप्पणियां ही देखने को मिलती है। जहां तक रेणु की कहानियों का सवाल है, मैंने अपनी पुस्तक में ‘कहानियों में रेणु’ अध्याय लिखा है, पाठकों को जरूर पढ़ना चाहिए। उस पुस्तक में मैंने रेणु की बहुत सारी कहानियों के अर्थ का खुलासा किया है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने शहर पर कहानी नहीं लिखी है- उनकी कहानी है ‘टेबुल’। ‘अगिनखोर’ अंग्रेजी जेनरेशन पर है। उन्होंने शहरों एवं गांवों दोनों पर कहानियां लिखी हैं। जो घटनाएं इनके दिल को छूती थी, जिसको वे कहानी के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे, उन्होंने किया है। यह सभी आक्षेप निराधार एवं गलत हैं।

रेणु को लेकर साहित्य एवं वैचारिक जगत में छाए धुंध को छंटना चाहिए। वे राष्ट्र के लिए बहुत उपयोगी लेखक हैं। उन्होंने हमारे समाज के लिए बहुत कीमती विचार दिए हैं। अगर उनके विचारों को हम अपने आचरण में उतारें तो हमारा देश और समाज बहुत आगे तक जाएगा।

(संपादन : इमानुद्दीन/अमरीश)


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