रेणु के साहित्य में जाति, जमात और समाज

रेणु के साहित्य में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, लैंगिक न्याय, क्षेत्रीय न्याय और जातीय, वर्गीय तथा क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल मुखर हुए हैं। मसलन, ‘मैला आँचल’ की कथा जनेऊ आन्दोलन, चंपारण आन्दोलन, छोटानागपुर आन्दोलन, किसान आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन, समाजवादी आन्दोलन, पूर्णिया का संथाल आन्दोलन, त्रिवेणी संघ का आन्दोलन, पिछड़ा वर्ग आन्दोलन, बंगाल के भू-श्रमिक आन्दोलन आदि की सामूहिक अभिव्यक्ति है। बता रहे हैं युवा समालोचक अनंत

हिंदी साहित्य में दलित-बहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को द्विज साहित्यकारों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। इस कड़ी में पढ़ें अनंत का यह दूसरा लेख

फणीश्वरनाथ रेणु जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष 

हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु का एक ऐसा नाम है जिन्होंने स्थानीयता और यथार्थवाद को स्थापित किया। काल, स्थान और परिस्थितियों के हिसाब से ऐसी रचनाएं रचीं कि ये साहित्य से अधिक समय से संवाद करते दस्तावेज बन गए। वैसे स्थानीयता और यथार्थवाद यूरोपीय साहित्य की देन है। यूरोपीय साहित्य में भी आंचलिक साहित्यकारों की लंबी फेहरिस्त है। सोवियत रूस के लेखक मिखाइल शोलोखोव की कृति “वर्जिन ऑफ सायल अपटर्न्ड” में दन अंचल के ग्रेमियाची लंग कागासी गाँव का चित्रण है। नार्वे के उपन्यासकार हैमसुन की रचना “ग्रोथ ऑफ सायल” में नार्वे के उत्तरांचल के एक खंड का चित्रण है। नोबेल पुरस्कार विजेता (1949) विलियम फकनर के उपन्यासों का कथांचल संयुक्त राज्य अमेरिका का दक्षिणांचल है। नोबेल विजेता युगोस्लावी लेखक ईवो आन्द्रिच ने द्रिना नदी के कगार पर बसे प्रांत के हर्जेगोविना और बोस्निया अंचल का चित्रण किया है। तुर्की लेखक स्वात दरवेश का उपन्यास “अंकारा का बंदी” जैसी कृति को रेणु ने स्वयं आंचलिक उपन्यास माना है (रेणु रचनावली V:-281-282)। थॉमस हार्डी ने अपने उपन्यासों के लिए शाश्वत क्षेत्र “वेस्सेक्स” की रचना की है। हार्डी का वेस्सेक्स खुद में एक किरदार बन गया। ठीक रेणु के “मैला आँचल” के “मेरीगंज” और “परती परिकथा” के “परानपुर” की तरह। 

दरअसल विश्व के रचनाकारों के अंचल की तरह ही रेणु का भी अंचल है। अब प्रश्न उठता है कि मेरीगंज और परानपुर अंचल के कथानक को केन्द्र में रखकर रची गयी रचनाओं के कथ्य की दृष्टि, राष्ट्रीय नीति और वैश्विक प्रगतियों के परिप्रेक्ष्य में है या अंचल के संकुचित दायरे में क्यों कैद है।

बतौर उदाहरण 1954 में प्रकाशित “मैला आँचल” को ही लेते हैं जिसमें मेरीगंज अंचल पर चित्रित कथा है। मेरीगंज हिन्दी साहित्य में देशज दुनिया का पहला अंचल है। रेणु ने मेरीगंज को भारतीय गांवों का प्रतीक माना है। या यूँ कहें कि मेरीगंज-रूपी रूपक में रेणु ने इंसान की आजादी, न्याय और अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल एवं विवेचना कथात्मक शैली में की है। गांधी की हत्या के पूर्व और उसके बाद के कालखंड में समाज में उपजे सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोध का यथार्थ चित्रण है। 1946 से 1948 के तात्कालिक परिवेश में आजादी पाने की कशमकश करती जनता की मानसिक स्थितियों का आईना है “मैला आँचल”। 

आंचलिकता के गहरे रंगों में रंगे “मैला आँचल” में समय का बोध और राष्ट्रीय जीवन से लोकजीवन का एकीकरण तथा वैश्विक वैज्ञानिक प्रगतियों के लोकसंस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों का पक्का सबूत भी है। जन-जीवन के सवाल पर अंचल में धड़कते जीवन के दबाव में मानव मुक्ति संग्राम की कथा है। अंचल और आन्दोलनों के इतिहास से हाशिये के समाज के बनते-बिगड़ते रिश्ते के बीच रेणु ने बुर्जुआ, पेटी बुर्जुआ, पूंजीवाद, पूंजीपति, जालिम जमींदार, मार्क्सवाद, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, कमाने वाला खायेगा, राम राज्य जैसे वैचारिक नारों को परिभाषित किया है। विश्व साहित्य के इतिहास से प्रेरित स्थानीयता और यथार्थवाद की कसौटी पर रेणु की आंचलिकता हिन्दी कथा साहित्य की टटका प्रवृत्ति है और “मैला आँचल” मानवीय संवेदना की धरातल पर खड़ा शब्द शिल्प हिन्दी का पहला आधुनिक औपन्यासिक शीशमहल, जिसकी दरो-दीवारों में नवसृजित लोकतंत्र में समाजवाद की परिकल्पनाओं की इबारत लिखी है।  

फणीश्वरनाथ रेणु के बाद की पीढ़ी के वरिष्ठ कथाकार चन्द्रमोहन प्रधान द्वारा युवा दिनों में बनाया और रेणु द्वारा हस्ताक्षरित उन्हीं का स्केच (साभार : मैला आंचल, फेसबुक ग्रुप)

रेणु कभी भी समाज में व्याप्त जातिवाद और वर्ण व्यवस्था को ढंकने की कोशिश नहीं करते। यह कहना अधिक तर्कसंगत है कि उन्होंने इन सभी को समाज के समक्ष बेपर्दा कर दिया। जैसे उनका मेरीगंज का देशज समाज जातीय टोलों में बंटा है। यहां बारहों बरन के लोग रहते हैं। कायस्थ टोली के मुखिया विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक एक हजार बिगहा के काश्तकार और तहसीलदार हैं। राजपूत टोली के मुखिया रामकिरपाल सिंह साढ़े तीन सौ बिगहा के जोतदार हैं। यादव टोली के मुखिया रामखेलावन यादव दूध-घी बेचकर डेढ़ सौ बिगहा के जोतदार बने हैं। अन्य ग्रामीण गरीबी और जहालत में फंसे हैं। कायस्थ टोली को मेरीगंज के लोग मालिक टोला कहते हैं। राजपूत लोग कायस्थ टोली को “कैथ टोली” कहते हैं। राजपूत टोला को कायस्थ लोग “सिपैहिया टोला” और यादव टोला को “गुअर टोली” कहते हैं। व्यंग्य की यह भाषा मनुवादी संस्कृति से उत्पन्न श्रेष्ठताबोध की प्रवृत्ति का ऐतिहासिक नमूना है। यादव बहुल मेरीगंज में यादव ही हाशिये पर हैं। यादव जनेऊ धारण करते हैं तो ब्राह्मणों ने कहा- “जब-जब धर्म की हानि हुई है राजपूतों ने ही उनकी रक्षा की है” (रेणु रचनावली, II:29)। 

राजपूतों और यादवों में धर्मयुद्ध की स्थिति पैदा होती है। कायस्थ टोली के मुखिया यादवों को मदद करने का भरोसा देते हैं। यादवों के शक्ति प्रदर्शन से सिर्फ धर्मयुद्ध ही नहीं टला, बल्कि श्रेष्ठजन यादव टोला को “गुअर टोली” कहने से भी डरने लगे।

फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की दुर्लभ तस्वीर। इस तस्वीर में दोनों धान के पौधे बो रहे हैं। ((साभार : मैला आंचल, फेसबुक ग्रुप))

इस प्रकार रेणु ने वर्णाश्रम व्यवस्था में व्याप्त श्रेष्ठता-बोध और वर्चस्ववादी प्रवृत्ति का सूक्ष्म विश्लेषण कर शूद्रों, अतिशूद्रों में विकसित हो रही चेतना और अस्मिता को रेखांकित किया है। पिछड़ी जातियों में विकसित अस्मिता और चेतना ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों का ही शूद्रीकरण हैं। कई मायने में यह नव ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का जन्म भी है। ब्राह्मण टोली के ज्योतिषी जी कहते हैं- “यह राजपूतों के चुप रहने का फल है कि आज चारों ओर हर जाति के लोग गले में जनेऊ लटकाये फिर रहे हैं” (रेणु रचनावली II:29)। इस बयान से स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद के लठैत राजपूत रहे हैं। यादवी शक्ति से भयभीत राजपूत चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन जनेऊ पहनने से यादवों को क्षत्रिय का दर्जा नहीं मिलता है। यादवी अस्मिता जागृत होने से यादवों को समानता के अधिकार की जगह यादवी वर्चस्व को स्वीकृति मिलती है। यहां सम्मान और समानता की जगह भय से प्रीत और वर्चस्व की प्रवृत्ति पनपती हुई दिखाई पड़ती है।

रेणु ने मैला आंचल में तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्यों और संभावनाओं पर विस्तार से अपने पात्रों के जरिए लिखा है। ऐसा करते समय वे न केवल उस समय जो कि 1950 का दशक है, की राजनीति को सामने लाते हैं बल्कि आने वाले युग की राजनीतिक भविष्यवाणी भी करते हैं। मसलन, 1990 में मंडल कमीशन के लागू होने के बाद देश में पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी की झलक भी उनकी रचनाओं में अनायास देखी जा सकती है। इसी प्रकार वे उस समय बीज से पौधा बने वामपंथ को बढ़ते हुए देखते हैं तो इसके अंतर्विरोधों को भी सामने लाते हैं। जैसे बालदेव, चुन्नी गोंसाई और बावनदास सुराजी आन्दोलन के दौर के कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। बालदेव की संगत में कालीचरण और बासुदेव ने राजनीति शुरू की। कालीचरण और बासुदेव, पार्टी के कामरेड बन जाते हैं। हरगौरी सिंह जनसंघ का झंडा उठा लेता है। चरित्तर कर्मकार कम्युनिस्ट पार्टी का पताका लेकर मेरीगंज की राजनीति में सक्रिय हैं। कांग्रेस, सुशलिंग, कम्युनिस्ट और जनसंघ जैसे प्रमुख राष्ट्रीय दलों के कार्यकर्ताओं की सक्रियता मेरीगंज के समाज में व्याप्त सामाजिक द्वंद्व और अन्तर्विरोध का प्रमाण है। 

यह आईना है पराधीन भारत में 24 अगस्त 1946 को बनी कांग्रेस की पहली अंतरिम सरकार के वक्त की सामाजिक गतिशीलता का; जिसमें भारतीय लोकतंत्र के रूप-स्वरूप और उसकी दिशा एवं दशा प्रदर्शित होती है। मेरीगंज जैसे गतिशील कथानक में लेखक की अनुभूति भी निहित है। स्वतंत्रता आन्दोलन, किसान आन्दोलन, समाजवादी आन्दोलन, और नेपाल की क्रांति में सक्रिय रहे रेणु ने राजनीतिक अनुभूतियों को पिरोकर “मैला आँचल” के कथानक को रचा है। अंचल विशेष के कथानक पर केन्द्रित कथा में राष्ट्रीय नीति-राजनीति और वैश्विक-वैज्ञानिक प्रगतियों का भी पर्यवेक्षण और मूल्यांकन निहित है। ग्लोबलाइजेशन के दौर में मेरीगंज के लिए “अंचल” के बजाय “ग्लोबल रीजन” कहना उपयुक्त है। 

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इस कथा में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, लैंगिक न्याय, क्षेत्रीय न्याय और जातीय, वर्गीय तथा क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल मुखर हुए हैं। “मैला आँचल” की कथा जनेऊ आन्दोलन, चंपारण आन्दोलन, छोटानागपुर आन्दोलन, किसान आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन, समाजवादी आन्दोलन, पूर्णिया का संथाल आन्दोलन, त्रिवेणी संघ का आन्दोलन, पिछड़ा वर्ग आन्दोलन, बंगाल के भू-श्रमिक आन्दोलन आदि की सामूहिक अभिव्यक्ति है। “मैला आँचल” में वर्णित सुशलिंग पार्टी, कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी का विस्तार और वैचारिक अन्तर्वस्तु में त्रिवेणी संघ व पिछड़ा वर्ग आन्दोलन की ध्वनियां मुखरित होती हैं। आन्दोलनों के इतिहास के सूत्रों को समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए शूद्रों, अतिशूद्रों में जागृत अस्मिता को रेणु ने दर्शाया है। 

रेणु के “मैला आंचल” में सामाजिक सवाल भी खुलकर सामने आते हैं। खासकर मेरीगंज जो कि बंगाल की सीमा पर अवस्थित है, वहां  बंगाल में हुए पुनर्जागरण का ज्यादा प्रभाव दिखता है। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों में मराठा नायक जोतीराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और दक्षिण भारत के विचारक पेरियार का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखता है। समाज के जिन यथार्थों को रेणु ने डंके की चोट पर उठाया, उसे हिन्दी साहित्य के पूर्ववर्ती रचनाकारों ने कभी तव्वजो नहीं दिया। सुशलिंग पार्टी द्वारा कामरेड गंगा प्रसाद सिंह यादव को मेरीगंज भेजना राजनीति में जातीय संभावनाओं की तलाश है। मेरीगंज का सुशलिंग कार्यकर्ता कालीचरण भी यादव है। कालीचरण मेरीगंज के गरीबों के हित में भूमि के सवाल को मुद्दा बनाता है। मेरीगंज में अस्पताल खुलने से ही सभी टोलों में हलचल मच गयी। 

रेणु के साहित्य सृजन की परिधि से कोई बहिष्कृत नहीं है। वह संथाल आदिवासियों के सवालों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। वह भी तब जब हिंदी साहित्य की मुख्य धारा उनके विषयों को अपना विषय ही नहीं मानता। मसलन, वह कहते हैं कि  “जमीन जोतने वाले की” यह नारा सुशलिंग (सोशलिस्ट) पार्टी का है। संथाल समुदाय को इस नारे में अपनी पहचान, अस्मिता और अस्तित्व दिखाई देता है। नयी चेतना से लैस बिरसा मांझी का बेटा मंगला मांझी कहता है- “जोहिरे जोतिबे, सोहिरे बोयबे” (रेणु रचनावली II:109)। इस जनगीत से जनक्रांति की आत्मा के जीवित होने का संकेत मिलता है। मांदर की मंद आवाज रिंग-रिंग-ता-धिन-ता; डा-डिग्गा-डिग्गा की अटूट ताल में संथालों की अस्मिता का स्वर मुखरित होता है। अस्मिता की जंग में जुटे संथालों की कथा तीसरी दुनिया की कथा है। संथाल परगना से आये संथालों के पुरखों ने जंगल के सरकारी जमीन को उर्वर बनाया था। आज जिस जमीन पर उनके झोपड़े हैं, वह भी उनके नहीं हैं। भूमि पर हक के लिए संथालों का संघर्ष जमींदार वर्ग से है। राजपूत और भूमिहार जाति के लोग जमींदार भी हैं और कांग्रेस पार्टी के नेता व कार्यकर्ता भी। लाल झंडे वाली सुशलिंग पार्टी में गरीबों-मजलूमों को आफताब की लाली दिखती है। 

फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में महिला किरदारों पर केंद्रित एक पेंटिंग (चित्रकार : डॉ. सुनीता, साभार मैला आंचल, फेसबुक ग्रुप

गांधीवादी बालदेव भूमि के सवाल पर मौन रहता है। मेरीगंज के मठ विवाद प्रकरण में भी गांधीवादी बालदेव  मौन-व्रत धारण कर लेता है। गांधीवाद और कांग्रेस मेरीगंज में गरीबों और कमजोर तबके के सवाल को नजरंदाज करती है। कांग्रेसी ही गांधीवाद को कठघरे में खड़ा करते हैं। सुशलिंग कार्यकर्ता कालीचरण मठ विवाद में लक्ष्मी दासिन के साथ दलित युवती फुलिया को न्याय दिलाता है। फुलिया के शोषक सहदेव मिसिर को बचाने के लिए ब्राह्मणों ने कहा: अगर राजपूतों ने साथ नहीं दिया तो यादवों को क्षत्रिय मान लेंगे (रेणु रचनावली II:118)। 

राजपूत टोला जनसंघ के प्रभाव में है। सभी जनसंघी व्याभिचारी ब्राह्मण के लिए लठैती करते हैं। निहितार्थ यह है कि सामंती ब्राह्मणवादी सत्ता में गरीब-दलित-पिछड़ों की इस्मत और अस्मिता सुरक्षित नहीं है। यह तथ्य वर्तमान भारत की भी सच्चाई है। हिन्दू रूढ़िवाद और हिन्दू सांप्रदायिकता पर भी रेणु की पैनी नजर है। जनसंघ का उद्देश्य शुद्ध हिन्दू राष्ट्र और द्विजों का कर्मकांडी शासन स्थापित करना है। मैला आँचल में काली टोपी वालों के संयोजक जी बौद्धिक क्लास में सिखाते हैं- “इस आर्यावर्त में केवल आर्य अर्थात शुद्ध हिन्दू ही रह सकते हैं” (रेणु रचनावली II:127)। रेणु जनसंघ के उभार पर अत्यंत ही गंभीर सवाल उठाते हैं। मेरीगंज में तो एक भी घर मुसलमान नहीं है? दरअसल मेरीगंज में जनसंघ की स्थापना यादवी वर्चस्व और दलित पिछड़ी जातियों के खिलाफ है।

भूमि संघर्ष के सूत्रापात से समाज अमीर और गरीब में बंट जाते हैं। कालीचरण कहता है- “खेलावन यादव को देखा यादवों की ही जमीन हड़प रहा है।… देख लो आंख खोलकर गाँव में सिरिफ दो जात हैं। अमीर-गरीब” (रेणु रचनावली II:176)। जमीन से जुड़े आर्थिक सवाल पर जातीय समाज में वर्गीय चेतना विकसित होती है। जाति की संरचना ठोस व स्थूल नहीं बल्कि गतिशील है। जातीय बुनावट में द्वन्द्व की पड़ताल करते हुए रेणु ने लिखा है- “सिर्फ हिन्दू कह देने से ही पिंड नहीं छूट सकता।  ब्राह्मण हैं? कौन ब्राह्मण। गोत्रा क्या है? मूल क्या है?” (रेणु रचनावली II:60)। जाति के अंदर मूल और गोत्रा का विभाजन जन्मगत असमानता का प्रतीक है। 

जातीय व्यवस्था में अन्तर्निहित विषमता का दूसरा पहलू आर्थिक भी है। यहां अर्थशास्त्रा का संबंध सिर्फ श्रम से नहीं, बल्कि शोषण से भी है। रेणु की नजर में यह विषय भी शामिल है। जातीय व्यवस्था में जाति के अंदर और बाहर दोहरे स्तर पर आत्मसंघर्ष जारी रहता है। जमीन विवाद से निबटने के लिए कांग्रेस दफा 40 का कानून लाती है। सुशलिंग पार्टी से जुड़े गरीब नाई ने हजामत बनाना और चमार ने मरे हुए जानवर उठाना बंद कर दिया। मेरीगंज में त्राहिमाम की स्थिति पैदा हो गयी। समस्या समाधान के लिए पंचायत बैठी। पंचायत में बाभन, राजपूत, यादव, चमार, नाई, रजक सभी जाति के पंच एक ही आसन पर बैठते हैं। कांग्रेस, सोशलिस्ट और जनसंघ के नेताओं की उपस्थिति में मेरीगंज के ग्रामीण एकजुट होने पर सहमत होते हैं। महज साथ बैठने से जातीय विभेद समाप्त नहीं होता है। फिर भी गरीब आन्दोलन समाप्त कर देते हैं। 

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मेरीगंज में अंचल की अस्मिता विकसित होते ही संथाल अलग-थलग पड़ जाते हैं। कांग्रेस से जुड़े विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक और जनसंघ से जुड़े हरगौरी सिंह का उद्देश्य भी यही था। संथाल जब जमींदारों का बीहन लूटते हैं तब कांग्रेसी और जनसंघी जमींदार के लठैतों का साथ गरीब ग्रामीण भी देते हैं। हिंसा का विरोध करने वाला बालदेव चुप्पी साध लेता है। सुशलिंग कार्यकर्ता कालीचरण भी प्रतिरोध नहीं करता है। हँसेड़ी में दो दर्जन संथाल और डेढ़ दर्जन संथालिनें जमींदारों के दो सौ लठैतों से बहादुरी से लड़ते हैं। तीर-धनुष के बल पर संथालों ने लठैतों को पास फटकने नहीं दिया। तीर खत्म होने के बाद ही लठैत संथालों के विद्रोह को कुचल पाये। यह परिघटना एक राजनीतिक त्रासदी का प्रतीक है। इस त्रासदी की मूल वजह संस्कृतियों का टकराव है। 

मेरीगंज के दलित-पिछड़े श्रम संस्कृति के वंशज हैं। जनेऊ के जरिये समानता और श्रेष्ठता की होड़ में शामिल होकर इन लोगों ने ब्राह्मणवादी-सामंतवादी दुर्गुणों का भी वरण किया। श्रम संस्कृति के वारिसों को द्विज का दर्जा भले ही न मिला हो, लेकिन संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में नव सामंती मनोवृत्ति से ग्रसित हो गये। संथाल मेरीगंज के बाशिंदे होते हुए भी वहां लोकाचार और संस्कृति से दूर रहे। मेरीगंज के गरीबों के लिए समानता से अधिक श्रेष्ठता का महत्व है। जबकि संथालों के लिए महत्वपूर्ण है अपना हक और हिस्सेदारी। सत्तर के दशक में बिहार में शुरू हुए नक्सलवादी आन्दोलन में भी विसंगतियां देखने को मिलती हैं। नक्सलियों का टकराव अमीर और बड़े जमींदार से कम, जाति से ही ज्यादा हुआ। फलतः बिहार में जातीय संरक्षित निजी सेनाओं का उदय हुआ। आखिर यह दोष किसका है? वर्गीय विचार का या जातीय संरचना और उसकी अस्मिता के विकास की संस्कृति का? 

आत्मसंघर्ष को अपने आंचल में बांधे अस्मिता और आंचलिकता के विमर्शकारों और संघर्ष के जरिये सामाजिक क्रांति की मंशा पालने वालों के लिए रेणु सबसे महत्वपूर्ण लेखक हैं, क्योंकि भारतीय समाज अस्मितावादी है। आंचलिकता के संबंध में “बाजार दर” नामक टिप्पणी में रेणु ने लिखा है- “उपभोक्ताओं को पता नहीं – इस आंचलिक नामक माल का आफटर इफेक्ट क्या होगा। इस नयी चीज में विष की मात्रा कितनी है, किसी को नहीं मालूम” ( रेणु रचनावली V:470)। संथाल विद्रोह के आफ्टर इफेक्ट के रूप में दो अति महत्वपूर्ण बिम्ब दिखाई देते हैं। राम खेलावन यादव का फिर से चरवाही करना और पुलिस से भाग रहे कालीचरण को पनाह न मिलना। मैला आँचल में जमींदार द्वारा भूमिहीनों में जमीन बांटना मुनीम मानसिकता के जमींदार का व्यापारिक फैसला है। रेणु रचनावली में प्रकाशित “रेणु के साथ बातचीत” नामक साक्षात्कार में रेणु ने स्पष्टतः से कहा है- “यह आदर्शभाव परिस्थिति के प्रभाव से सर्वत्रा स्वाभाविक हो उठा है” (रेणु रचनावली भाग IV:389)।

रेणु ने नेताओं के नैतिक पतन और राजनीतिक दलों के कथनी और करनी में अंतर की व्याख्या गहराई से की है। पूर्णिया जिला कांग्रेस सभापति के चुनाव का नजारा देख बावनदास मन ही मन सोचता है- “अब लोगों को चाहिए कि अपनी-अपनी टोपी पर लिखवा लें- भूमिहार, राजपूत, कायस्थ, हरिजन।” (रेणु रचनावली II:177) 

कटिहार कॉटन मिल के सेठ भूमिहारों और फारबिसगंज जूट मिल के सेठ राजपूतों के साथ हैं। पूंजी से प्रभावित राजनीति, जाति में सिमटता जनतंत्रा और राजनीति का अपराधीकरण तथा अंग्रेजों के दलालों का आजादी के बाद कांग्रेसीकरण का चित्रांकन रेणु ने किया है। विलायती कपड़े की पिकेटिंग के समय कांग्रेसी स्वयंसेवकों को पीटने वाले, स्वंयसेवकों को जेल में रखने के लिए सरकार को खर्च देने वाले सागरमल को कांग्रेस ने नरपत नगर थाना का सभापति बना दिया। “जुआ-कम्पनी” चलाने वाले, नेपाली लड़कियों की तस्करी करने वाले दुलारचंद कापरा को कटहा थाना कांग्रेस कमेटी का सेक्रटरी बना दिया गया। मेरीगंज के जमींदार विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक कांग्रेस पार्टी में शामिल होते ही बालदेव का पद पा लेता है। जमींदार को परमिट का पुर्जा काटने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। बावनदास कहता है- “भारतमाता जार बेजार रो रही है” (रेणु रचनावली II:142)। सुशलिंग पार्टी में सोनमा डकैत को शामिल करने की योजना बनती है। कांग्रेस में पनपती नैतिकहीनता गांधी के अप्रासंगिक होने का प्रमाण है। संभवतः इसका अहसास भी गांधी को था। गांधी आजादी के जश्न से दूर दंगा पीड़ितों के बीच आम आदमी के लिए आजादी के मायने परख रहे थे। मेरीगंज में भी आजादी का जश्न मनाया गया। आजादी का जुलूस जब मेरीगंज जनपथ पर निकला तो औराही हिंगना से आवाज आयी – “यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है।” औराही हिंगना से आयी आवाज रेणु की थी। गांधी आजादी, न्याय और अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल दंगा पीड़ितों के बीच कर रहे थे तो रेणु सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाके में। बदलते राजनीतिक हालात के बीच 1942 का सिपाही बालदेव मेरीगंज के मठ में शरण ले लेता है। चुन्नी गोंसाई पार्टी छोड़ देता है। कालीचरण की नजर में बालदेव बुर्जुआ हो जाता है।

सन्दर्भ

  • रेणु, फणीश्वरनाथ. (1954). मैला आँचल. पटना: समता प्रकाशन.
  • रेणु, फणीश्वरनाथ. (1957). परती परिकथा. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन
  • रेणु, फणीश्वरनाथ. (2007). रेणु रचनावली. खंड I-V नई दिल्ली: राजकमल.

(संपादन: गोल्डी/नवल/अनिल)

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