सहोदरन अय्यप्पन, जिन्होंने नकारा ‘रामराज्य’ और केरल में डाली संस्कृति-समाज के प्रजातांत्रिकरण की बुनियाद

श्री नारायण गुरु स्वामी के शिष्य सहोदरन, केरलवासियों के उस सांस्कृतिक प्रतिरोध की परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समावेशिता और बहुवाद की पैरोकार और वर्चस्ववाद की विरोधी थी। वे केरल की अपेक्षाकृत छोटी परन्तु महत्वपूर्ण भाषाई संस्कृति और नागरिक समाज के विकास के प्रेरणास्त्रोत रहे। केरलवासियों को एक रचनात्मक, संवेदनशील व संघर्षशील समुदाय के रूप में विकसित करने में उनका अहम योगदान था, बता रहें हैं अजय एस. शेखर

सहोदरन के. अय्यप्पन (21 अगस्त, 1889 – 6 मार्च, 1968)  पर विशेष

कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं और कोई ईश्वर नहीं। केवल आचरण, आचरण और आचरण – उपयुक्त और यथोचितसहोदरन अय्यप्पन

यह सन् 1920 के उत्तरार्द्ध की बात है। केरल के कोट्टयम जिले के थिरुनाक्कारा में श्री नारायण गुरु स्वामी के आन्दोलन की बैठक चल रही थी। उस बैठक में हिन्दू महासभा के संस्थापक मदनमोहन मालवीय भी मौजूद थे। उन्होंने बैठक में “जय श्री राम” का नारा लगाया। यह सुनते ही युवा नेता और गुरु के अग्रणी शिष्य के. अय्यप्पन और उनके साथियों ने वहीं उनका विरोध किया। उन्होंने कहा कि शूद्र ऋषि शंबूक को मारने वाले राम न तो उनके नायक हो सकते हैं और ना ही भगवान। उनके प्रख्यात गुरु, जो कि स्वयं एक अवर्ण संत थे, ने 1914 में कहा था कि यदि वे राम के युग में होते तो “मेरा वही हश्र होता जो शंबूक का हुआ था क्योंकि हिन्दू शासन व्यवस्था स्मृतियों पर आधारित है। अंग्रेजों ने हमें (अवर्णों या दलित-बहुजनों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं) शिक्षा प्राप्त करने और आध्यात्मिक ज्ञान पाने  का अधिकार दिया।” श्री नारायण गुरु स्वामी (20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928) ने यह भी कहा था कि ब्रिटिश शासन से वे आमजन लाभान्वित हुए थे जिन्हें जाति प्रथा के चलते अलग-थलग रखा जाता था और प्रताड़ना दी जाती थी। उन्होंने लोगों से यह अपील की कि वे आधुनिकता और अंग्रेजी भाषा को अपनाएं (इसके विपरीत हाल में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने के नाम पर अंग्रेजी की कीमत पर संस्कृत और हिंदी को बढ़ावा देती है)।

      

श्री नारायण गुरु और के. अय्यप्पन ने 20वीं सदी की शुरुआत में ही रक्त पिपासु हिन्दू देवताओं के बारे में हमें चेताया था। जीवाकारुण्य पंचकम (जीवों के प्रति दया व करुणा पर पांच छंद) में गुरु ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कोई हत्यारा, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली और कार्यकुशल क्यों न हो, कभी सद्गुणी नहीं हो सकता। उन्होंने बिना किसी लागलपेट के कहा था कि हत्यारा मनुष्य किसी भी मांसाहारी जानवर से कहीं अधिक क्रूर होता है। 

वरकला में गुरु से मुलाकात के बाद गांधी का कोच्चि के नज़दीक पल्लुरुटी में सम्मान किया गया। वहां के. अय्यप्पन ने कृष्ण के बारे में गांधी से प्रश्न किया। उन्होंने पूछा कि एक सीरियल किलर, जिसने अपने मामा और अपने अनेक विरोधियों को दानव ठहरा कर मार डाला हो, वह भगवान कैसे हो सकता है। गांधी ने इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया।   

सहोदरन अय्यप्पन (21 अगस्त, 1889 – 6 मार्च, 1968)

आज जब पूरे देश में सामाजिक न्याय और नैतिकता खतरे में है और केरल में एक बार फिर से जाति की दीवारें खडीं हो रहीं हैं और जातिगत हिंसा उभर रही है तब हमें सहोदरन के. अय्यप्पन और उनके गुरु श्री नारायण गुरु स्वामी की याद आना स्वाभाविक है, जिन्होंने एक सदी पहले सामाजिक जीवन का प्रजातांत्रिकरण और मानवीयकरण किया था। “सहोदरन” का मतलब होता है भाई। बीसवीं सदी के केरल के महानतम समाज सुधारकों में से एक को यह उपाधि दी गयी थी, जिन्होंने इस राज्य की आधुनिकता को आकार दिया। यह उपाधि उस बंधुत्व भाव और समतावादी विश्वदृष्टि को रेखांकित करती है जिसे के. अय्यप्पन ने अपने जीवन और अपने कार्यों से बढ़ावा दिया। “इजावा” समुदाय से आने वाले के. अय्यप्पन ने चेरई में 1917 में अपने दलित सहोदरों के साथ भोजन कर जातिगत शुद्धता और प्रदूषण की अवधारणाओं का ध्वंस किया।

सहोदरन केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है। वह एक आन्दोलन का नाम है जिसने केरल के समाज, राजनीति और संस्कृति और उसकी ज्ञान-मीमांसा पद्धति को हमेशा के लिए बदल दिया। और यह परिवर्तन बेहतरी की दिशा में था। एक व्यापक अर्थ में “सहोदरन” कोई व्यक्ति न होकर दुनिया के इस हिस्से का इतिहास, इसकी विविधता और उसकी संस्कृति है। वह उन सभी परिवर्तनों का वाहक है जो  20वीं सदी के मध्य और शुरुआत में केरल में हुए। सहोदरन, केरल की बौद्धिक, समालोचनात्मक और रचनात्मक चेतना, वहां की नित नवीनीकृत लेती समाज सुधार की ऊर्जा का प्रतीक हैं – उस उर्जा का जिसका स्रोत उनके गुरु थे। वे केरलवासियों के सांस्कृतिक प्रतिरोध की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समावेशिता और बहुवाद की पैरोकार और वर्चस्ववाद की विरोधी थी। वे केरल की अपेक्षाकृत छोटी परन्तु महत्वपूर्ण भाषाई संस्कृति और नागरिक समाज के विकास के प्रेरणास्रोत थे। केरलवासियों को एक रचनात्मक, संवेदनशील व संघर्षशील समुदाय के रूप में विकसित करने में उनका सबसे बड़ा योगदान था। जब हम सहोदरन की बात करते हैं तो हम केरल की सांस्कृतिक गतिशीलता की बात करते हैं, वहां की प्रजातान्त्रिक और सांस्कृतिक राजनीति की क्रन्तिकारी विरासत की बात करते हैं। जब हम “सहोदरन” कहते हैं तो हम भविष्य के प्रजातंत्र की जयकार करते हैं।

के. अय्यप्पन को आधुनिक केरल के प्रमुख निर्माताओं में गिना जाता है। वे एक गतिशील और सक्रिय बुद्धिजीवी थे, जिन्होंनें अपनी चारित्रिक ईमानदारी और बहुवाद में अपनी निष्ठा को अमली जामा पहनाकर केरल की संस्कृति, राजनीति और समाज पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे एक कवि थे, निबंधकार थे, पत्रकार थे, सामाजिक चिन्तक थे, वक्ता थे, सामुदायिक नेता थे, प्रतिबद्ध राजनेता थे और जाति प्रथा व अन्य सामाजिक बुराईयों के विरुद्ध लड़ने वाले अथक योद्धा थे। भारत के स्वतंत्र होने के पहले वह कोच्चि राज्य परिषद तथा स्वतंत्रता के बाद त्रावणकोर-कोच्चि राज्य विधानसभा दोनों के सदस्य व मंत्री रहे। प्रतिनिधित्व और भागीदारी पर आधारित प्रजातंत्र, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक राजनीति के क्षेत्रों में उनके महती योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। 

श्री नारायण गुरु के साथ युवा सहोदरन अय्यप्पन

के. अय्यप्पन ने 1917 में सहोदर संघम की स्थापना की, जो भ्रातृत्व की क्रन्तिकारी अवधारणा पर आधारित संगठन था। इस संगठन ने जातिगत सीमाओं के परे जाकर मानवीयता और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों के लिए काम किया। अय्यप्पन ने इस संस्था की पत्रिका “सहोदरन” की शुरुआत की और उसका संपादन किया। वर्ष 1935 में केरल के तर्किक्तावादियों की पहली संस्था “युक्तिवदा संघम्” की स्थापना में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।    

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इसके पहले वर्ष 1929 में सहोदरन ने “युक्तिवादी”  पत्रिका का संपादन शुरू किया। उनके सम्पादकीय, लेख और कविताएं अपने-अपने क्षेत्रों की असाधारण रचनायें हैं। उन्होंने मलयालम गद्य लेखन और पत्रकारिता के मानक और शैली स्थापित की। साथ ही, उन्होंने आधुनिक, प्रजातान्त्रिक काल के अनुरूप  मलयालम में युक्तिसंगत गद्य और बोधगम्य व संवेदनशील पद्य लेखन की शुरुआत की।   

उनका लेखन, पूर्व के पतनोन्मुख, संस्कृतनिष्ठ सवर्ण साहित्य से एकदम भिन्न था। उनकी स्पष्ट और साधारण भाषा, प्रजातान्त्रिक, मानवीय और गतिशील युग के अनुरूप थी। उनका लेखन, उनके संदेश और उनकी विषयवस्तु आज भी प्रासंगिक हैं। आज भी उनके पाठकों की संख्या बढ़ ही रही है। चाहे वह संघर्षरत आम आदमी हो या विचारशील बुद्धिजीवी – सभी उनकी रचनाओं को पढ़ रहे हैं और उनकी व्याख्या कर रहे हैं। 

वर्तमान में केरल के सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्रों में उनकी विरासत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। हाशियाकृत और अपवर्जित तबके, जिनमें महिलाएं, दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और और अन्य छोटे समूह शामिल हैं, सांस्कृतिक राजनीति में लगातार सक्रिय हस्तक्षेप कर रहे हैं। हिन्दुत्ववादी फासीवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हमले से हमें सहोदरवाद की जाति-विरोधी, धर्मनिरपेक्ष और प्रजातान्त्रिक विरासात बचा सकती है। सहोदरन ने केरल को लोगों को आंबेडकर के सामाजिक प्रजातंत्र और रूस की अक्टूबर क्रांति से परिचित करवाया। वे हमेशा सामाजिक न्याय और सत्य के पक्षधर बने रहे। आज हमारे देश और हमारे संविधान को बचाने के लिए हमें इन्हीं दोनों की ज़रुरत है। 

(संपादन : नवल/गोल्डी)


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