श्री नारायण गुरु स्वामी : समतावादी आधुनिक केरल के प्रथम वास्तुकार

श्री नारायण गुरु स्वामी को उनकी जयंती के मौके पर याद कर रहे हैं सिद्धार्थ। उनके मुताबिक, श्री नारायण गुरु ने आधुनिक केरल के निर्माण की नींव रखी, जिसे अन्य अनेक व्यक्तित्वों, संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों ने आगे बढ़ाया

श्री नारायण गुरू स्वामी (20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928) पर विशेष

‘यह है एक आदर्श निवास,
रहते हैं जहां मनुष्य बंधुवत्,
मुक्त हो धार्मिक द्वेषभाव और
जातिगत संकीर्णताओं से’

– श्री नारायण गुरु

आज से करीब सौ वर्ष से अधिक पहले श्री नारायण गुरु स्वामी ने धर्म और जाति की संकीर्णता से मुक्त एक आदर्श निवास की चाहत प्रकट की थी और वे उसके लिए आजीवन कार्य भी करते रहे। भले ही उनके आदर्श समाज की  कसौटी पर आज का केरल पूरी तरह खरा न उतरता हो, लेकिन वह काफी हद तक उनके आदर्श के करीब है।

इसके प्रमाण हैं आज केरल के बारे में कुछ खास तथ्य। मसलन, केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जो मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर दुनिया के शीर्ष देशों की बराबरी करता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा वर्ष 2020 में जारी सूची में मानव विकास सूचकांक में दुनिया के 189 देशों में भारत 129 वें स्थान पर है, लेकिन केरल दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है और भारत के राज्यों में वह पहले स्थान पर है। केरल मॉडल दुनिया भर में विभिन्न समयों पर सुर्खियों बटोरता रहा है। अभी हाल में कोविड-19 संकट से निपटने के मामले में केरल मॉडल की दुनिया भर में चर्चा हुई। कोविड़-19 महामारी से बेहतर तरीके निपटने के मामले में केरल  की तुलना दक्षिण कोरिया व न्यूजीलैंड जैसे उन चंद देशों से की जाने लगी, जो इस वैश्विक महामारी से सबसे बेहतर तरीके से निपट रहे हैं।

महामारी के दौरान और इसके पहले भी आरएसएस व भाजपा द्वारा वहां मजहबी फसाद फैलाने व धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिशें की गयीं लेकिन केरल में उन्हें नाकामी मिली। यह इसके बावजूद कि 2011 की जनगणना के मुताबिक केरल में मुसलमानों की आबादी 26.56 प्रतिशत और ईसाईयों की 18 प्रतिशत है। यानि गैर-हिंदू करीब 45 प्रतिशत हैं। यदि सांप्रदायिक ताकतें असफल रहीं तो जाहिर तौर पर इसकी ठोस वजहें हैं। जब-जब केरल मॉडल और केरल की मानवीय उपलब्धियों का जिक्र आता है तो स्वाभाविक तौर पर केरल के बाहर के लोगों के मन में यह प्रश्न उभरता है कि आखिर ऐसे केरल का निर्माण कैसे हुआ?

श्रीनारायणगुरु स्वामी (20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928)

यह सर्वविदित है कि जब किसी देश या प्रदेश के समाज में एक गहरी उथल-पुथल मचती है और वह अपने मध्यकालीन जड़ विचारों से मुक्त होता है तथा आधुनिक बौद्धिक, तार्किक एवं विवेकसंगत विचारों को अपनाता है, तभी वह एक आधुनिक देश या प्रदेश बनता है। किसी देश-प्रदेश के आधुनिक उन्नत एवं समृद्ध देश-प्रदेश में तब्दील होने के लिए वहां के लोगों के मन-मस्तिष्क में बुनियादी बदलाव और उनके सोचने-देखने के तरीके का मानवीय एवं वैज्ञानिक होना जरूरी होता है। यानि उनकी विश्व-दृष्टि बदलनी चाहिए। इसके साथ ही वहां के सामाजिक-आर्थिक संबंधों में परिवर्तन आना चाहिए, जिसके अनुसार ही अक्सर वहां की राजनीति अपना आकार ग्रहण करती है। यह सब कुछ मिलकर एक ऐसे नागरिक समाज का निर्माण करते हैं, जिसे आधुनिक समाज कहा जा सकता है। भारत में केरल एक ऐसा ही प्रदेश है। इस संबंध में सारे उपलब्ध तथ्य इसके साक्षी हैं।

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जिसका काफी हद तक आधुनिकीकरण हुआ है और वहां एक आधुनिक नागरिक समाज का निर्माण हुआ है।  वहीं यह भी सच है कि वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृसत्ता के बहुत सारे अवशेष आज भी शेष भारत की तरह केरल में भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। इसके बावजूद भी केरल भारत का सबसे आधुनिकीकृत प्रदेश है और शीर्ष आधुनिक देशों से बहुत सारे मामलों में बराबरी करता है।

क्या केरल हमेशा से ऐसा ही रहा है? क्या केरल भारत को एक बीमार समाज बनाने वाली वर्ण-जाति, पितृसत्ता और धार्मिक घृणा (सांप्रदायिकता) की बीमारी से ग्रसित नहीं रहा है? अगर ग्रसित रहा तो वह उनसे मुक्त कैसे हुआ? वे कौन थे जिन्होंने आगे बढ़कर वर्ण-जाति, पितृसत्ता एवं धार्मिक घृणा की घातक बीमारियों से केरल को मुक्त किया और आधुनिक केरल की नींव डाली?

ऐसे व्यक्तियों में पहला नाम श्री नाराणय गुरु स्वामी का है। वे इजावा समुदाय से थे.  उनके व्यक्तित्व और आधुनिक केरल के निर्माण में उनकी भूमिका को जी. अलोसिएस (2005:16) इन शब्दों में रेखांकित करते हैं- “केरल के सबसे निर्णायक ऐतिहासिक काल में एक सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक सुधारक के रूप में उन्होंने करीब चार दशकों तक अपनी भूमिका निभाई। किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में, अपने व्यक्तित्व एवं कार्यों से एक नृजातीय समूह (मलयाली) को आधुनिक समूह में रूपान्तरित करने वाले व्यक्ति के श्री नारायण गुरु स्वामी मूर्त प्रतीक हैं। राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा उन्हें एक जाति विशेष के क्षेत्रीय नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया और तो दूसरी ओर ‘निम्न जातीय’ लेखकों द्वारा उन्हें एक इजावा धार्मिक सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया गया। दोनों धारणाएं गंभीर रूप से त्रुट्टिपूर्ण हैं। पहली और सबसे प्रमुख बात यह है कि वे आधुनिक केरल के पहले वास्तुकार थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक उन्नत बुद्धिजीवी और योग्य संगठनकर्ता थे। एक सुगठित समाज के रूप में केरल की सचेतन दावेदारी और उसके निर्माण में नारायण गुरु की अथक गतिविधियों और बहुत सारी संस्थाओं के निर्माण ने अहम भूमिका निभाई। इसने केरल के बहुस्तरीय विकास एवं राजनीतिकरण की जमीन तैयार की।” 

श्री नाराणय गुरु के जन्म के समय केरल भी उसी तरह आकंठ जातिवाद के जहर में डूबा हुआ था, जैसा कि शेष भारत। पूरा समाज ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण की अल्लंघ दीवार से बंटा हुआ था। गैर-ब्राह्मणों के बीच भी बहुस्तरीय श्रेणीगत बंटवारा था। पवित्र-अपवित्र और सछूत-अछूत की ऐसी रेखाएं खींची हुई थीं, जिन्हें कोई पार नहीं कर सकता था। सारे अधिकार एवं कर्तव्य इन्हीं रेखाओं से तय होते थे, जो कि इन रेखाओं का उल्लंघन करने की कोशिश करता, शंबूक की तरह उसका वध कर दिया जाता। करीब 1803-04 में इजावा समुदाय के कुछ लोगों ने वायकम मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की। लेकिन उनका निर्ममता से वध कर दिया गया और मंदिर के उत्तर पूर्वी कोने में एक तालाब में दफना दिया गया। इस तालाब को आज “दलवा कुलम” के नाम से जाना जाता है और दफनाए गए लोगों को आधुनिक नागरिक समाज के निर्माण के पहले शहीद एवं संस्थापक के रूप में कृतज्ञतापूर्वक याद किया जाता है।

ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के शीर्ष पर विराजमान और सब कुछ तय करने वाले नंबूदरी ब्राह्मणों ने यह भी तय कर रखा था कि किस गैर-ब्राह्मण को उनसे कितनी फीट की दूरी पर रहना है। इजावा लोगों को नंबूदरी ब्राह्मणों से कम से कम 20 से 36 फीट की दूरी पर, चेरूमन और पुलाया लोगों को 64 फीट की दूरी पर और नायडी लोगों को 72 फीट की दूरी पर रहना था। इससे कम दूरी होने पर नंबूदरी अपवित्र हो जाते थे। कुछ जनजातियां ऐसी थीं, जिनके देखने मात्र से नंबूदरी ब्राह्मण अपवित्र हो जाते थे। सिर्फ नायर ऐसे गैर-ब्राह्मण थे, जिनके छूने पर ही ब्राह्मण अपवित्र होते थे। 

केरल में गैर-ब्राह्मणों के बड़े हिस्से के लिए छाता, जूता, सोने के आभूषण आदि के इस्तेमाल की सख्त मनाही थी। इसका उल्लंघन करने वालों को सख्त आर्थिक एवं शारीरिक दंड दिया जाता था। गैर-ब्राह्मणों का घर एक मंजिल से अधिक ऊंचा नहीं हो सकता था, वे गाय का दूध नहीं पी सकते थे, महिलाएं स्तन नहीं ढंक सकती थीं, वे ऊंची जाति की महिलाओं की तरह अपने सिर पर पानी का घड़ा नहीं रख सकती थीं। अधिकांश गैर-ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। मंदिरों में प्रवेश की मनाही थी। दलित-आदिवासियों की कौन कहे, शूद्र कही जाने वाली जाति इजावा भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती थी, ऐसा करने की कोशिश करने वालों का वध कर दिया जाता था (अलोसिएस 2005:9)।

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इस प्रकार गैर-ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा बहुत सारी सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल नहीं कर सकता था, इसमें मुख्य रास्ते भी शामिल थे, जिन पर गैर-ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा नहीं चल सकता था। यहां तक कि गैर-ब्राह्मणों की पत्नियों को पहली रात नंबूदरियों के साथ बिताने का प्रावधान भी था।

केरल में चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र- का आदर्श घोषित रूप लागू नहीं था। वहां पूरे समाज का बंटवारा ब्राह्मण-गैर-ब्राह्मण में था। नंबूदरी ब्राह्मणों के पास जमीन का मालिकाना हक था था और वे मंदिर एवं मदिरों की संपत्ति के भी मालिक थे। राज्य और राजाओं पर उनका कड़ा शिंकजा था। वे महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों की तरह ही थे। नायर काश्तकार कहे जाते थे और सैन्य भूमिका का भी निर्वाह करते थे। लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अनुसार वे शूद्र ही थे। वे खेतों के मालिक थे, लेकिन वे उत्तर भारत के ऊंची जाति के लोगों की ही तरह खेतों में काम नहीं करते थे। उनके खेतों में सारा काम अन्य गैर-ब्राह्मण-विशेषकर दलित करते थे। बीच का एक स्तर था, जिसमें इजावा भी शामिल थे, जिन्हें एक निश्चित समय  के लिए लगान पर खेती करने को मिलती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी। कुछ दलित और आदिवासी इससे भी वंचित थे, जिन्हें अछूतों में भी अछूत का दर्जा प्राप्त था। इन दलितों को कुरावा, पुलाया और परिया आदि के रूप में जाना जाता था। इसके साथ आदिवासी भी थे, जिन्हें दलितों से भी बदतर दर्जा नंबूदरी ब्राह्मणों ने दे रखा था।

उत्तर भारत के विपरीत केरल में ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य तीनों तथाकथित उच्च वर्णों का विशेषाधिकार नंबूदरी ब्राह्मणों ने अपने हाथ में ले रखा था। फिर भी समझने की आसानी के लिए कहा जा सकता है कि विभिन्न समुदायों  द्वारा संपन्न किए जाने वाले कार्यों और आर्थिक हैसियत के आधार पर देखें तो नायरों की स्थिति उत्तर भारत के क्षत्रियों जैसी थी, लेकिन शास्त्रीय एवं सामाजिक हैसियत शूद्र जैसी। इजावा जाति को आर्थिक हैसियत और सामाजिक बंटवारे के श्रेणीक्रम के आधार पर उत्तर भारत की अन्य पिछड़ी वर्ग या ओबीसी की तरह देख सकते हैं, लेकिन बहुत सारे मामलों में उनकी हैसियत भी दलितों के जैसी थी, जैसे मंदिर प्रवेश एवं सरकारी नौकरी में निषेध आदि। ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण के बंटवारे के हिसाब से ही सारे अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित होते थे। इस तरह केरल में अपने शास्त्रीय आदर्श (मनु संहिता) के अनुरूप ब्राह्मण ही भू-देवता था।

इस पूरी स्थिति को बदलने और मानवीय समता, न्याय एवं बंधुता आधारित समाज बनाने के लिए श्री नाराणय गुरु स्वामी ने खुद को समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्होंने ईश्वर एवं धर्म का भी सहारा लिया, क्योंकि मुट्ठी भर नंबूदरी ब्राह्मणों ने बहुसंख्य गैर-ब्राह्मणों पर वर्चस्व कायम करने के लिए धर्म की वैचारिकी का ही इस्तेमाल किया था। 

श्री नारायण गुरू ने  “ओरु जाति, ओरु मदम्, ओरु दैवम् मनुष्यन्” का नारा दिया, जिसका अर्थ है- “एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर मनुष्य।” यह नारा ईश्वर और धर्म को नंबूदरी ब्राह्मणों के चंगुल से निकालने का नारा बना। इसने केरल के पूरे समाज के एक सूत्र में जोड़ने की जमीन तैयार की। इसे स्वामी जी ने सर्वप्रथम 1914 अपनी रचना “जातिनिर्णयम्” में शामिल किया और बाद में 1920 में गुरु ने इसे अपने जन्मदिन के संदेश के रूप में घोषित किया। यहां जाति शब्द का अलग अर्थ है। यहां इसका मतलब हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था नहीं, बल्कि संसार के सारे मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के एक प्रजाति के रूप में देखने की बात है। इस नारे का दूसरा हिस्सा भी है जो मनु संहिता पर आधारित वर्ण-जाति व्यवस्था की बुनियाद को ही चुनौती देता है। “ओरु योनि, ओरु आकारम् ओरु भेदावुम् इल्ला इतिल्” यानि सारे इंसान योनि (कोख) से पैदा होते हैं, मनुष्य के आकार भी एक समान है, इसमें कोई भी भेद नहीं है। तो फिर जाति के आधार पर भेद क्यों? 

आधुनिक केरल के निर्माण के संगठित आंदोलन की शुरूआत 1903 में श्री नारायण गुरु स्वामी ने “श्री नारायण धर्म प्रतिपालन योगम्” (एस.एन.डी.पी.) की स्थापना के साथ की। इस कार्य में महाकवि कुमारन आशान और डॉ. पाल्पू की भी अहम भूमिका थी। एक तरह से आधुनिक केरल की बुनियाद रखने वाली यही त्रयी थी। 

श्री नारायण गुरु स्वामी के बचपन का नाम नाणु था। उनके पिता मदन अशान उनके पहले शिक्षक थे। उनके पिता मलयालम और तमिल के साथ पाली भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। ये तीनों भाषाएं नाणु को विरासत में मिली थीं। बाद में श्रीनारायण गुरु संस्कृत एवं अंग्रेजी में भी महारत हासिल की। बचपन से नाणु के भीतर प्रखर जिज्ञासा भाव और गहरी संवेदनशीलता थी। प्रकृति के विविध रूप उन्हें अपनी ओर खींचते थे। जीवन के करीब 35 वर्ष उन्होंने प्रकृति के सान्निध्य में घने जंगलों, नदियों और समुद्र के किनारे विचरण करते हुए बिताए। उन्होंने बुद्ध की तरह ज्ञान की साधना भी की। धर्म का आध्यात्मिक तत्व उनमें गहरे पैठा हुआ था। वे किसी भी ऐसे धर्म और ईश्वर को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे जो मानव के बीच भेद करता हो और उनमें बंधुता का भाव न भरता हो। मंदिर उनके लिए प्रेम, बंधुता, करूणा और सामाजिक भाईचारा विकसित करने के केंद्र थे। वे अक्सर कहा करते थे कि  भगवान और इंसान दोनों उनके गुरु हैं। वे विभिन्न धर्मों की वैश्विक एकता में विश्वास करते थे। वे पूरी मानव जाति को एक मानते थे । उन्होंने 1921 में विश्व भाईचारा सम्मेलन आयोजित किया। इसके लिए उन्होंने जो संदेश लिखा उसका निहितार्थ यह था कि मनुष्यों में संप्रदाय, पहनावा, भाषा आदि के अंतर के बाद भी वे सब एक ही सृष्टि के हैं। सबका सबके साथ खान-पान और वैवाहिक संबंध होने चाहिए। उनका कहना था कि मनुष्य की एक जाति है, और वह है- मानव जाति।

श्री नारायण गुरु स्वामी ने मानव जाति को मानवता के सूत्र में बांधने के लिए जीवन भर प्रयास किया। वे भले ही पूरी मानव जाति को बंधुता के सूत्र में न बांध पाएं हों, लेकिन वे आधुनिक केरल के पहले व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने बंधुता आधारित आधुनिक केरल की नींव डाली, जिसे बहुत सारे अन्य व्यक्तित्वों, संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों ने आगे बढ़ाया। 

संदर्भ :

  1. अलोयसिएस, जी. (2005). इंटरप्रेटिंग केरला सोशल डवलपमेंट. नई दिल्ली: क्रिटिकल क्वेस्ट. 

(संपादन : नवल/गोल्डी/अमरीश)


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