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काशीप्रसाद जायसवाल को जैसा मैंने पढ़ा (पहला भाग)

इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल हिन्दू-मुस्लिम-एकता को जरूरी समझते थे। उनका मत था कि ताली एक हाथ से नहीं, बल्कि दोनों हाथ से बजती है। क्योंकि अधिकांश हिन्दू साहित्यकार अपने उपन्यासों में मुसलमानों को अत्याचारी और हिन्दुओं को सदाचारी के रूप में चित्रित कर रहे थे, इसलिए जायसवालजी इस कृत्य को राष्ट्रीय एकता में बाधक के रूप में देख रहे थे। बता रहे हैं कंवल भारती

मैंने पहली बार, संभवतः 1972 में, राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘जिनका मैं कृतज्ञ’ में काशीप्रसाद जायसवाल के बारे में, उनका संस्मरण पढ़ा था, जिसमें उन्होंने लिखा था, ‘जायसवालजी को ऑक्सफोर्ड में पढ़ते समय साम्यवाद की हवा लगी थी। उस समय वह इतने खतरनाक समझे गए थे और विश्वास नहीं था कि हिन्दुस्तान में स्वतन्त्रतापूर्वक रह सकेंगे। उन्होंने ‘माडर्न रिव्यू’ और एकाध और पत्रों में कुछ लेख लिखे, जिनमें बतलाया, कि अब पुरानी दुनिया नहीं रहेगी, युगों से शोषित-पीड़ित मूक जनता अंगड़ाई ले रही है। उनमें जमींदारों के खिलाफ भी लिखा गया था। बिहार में जमींदारों का बहुत जोर था।’[1] उस संस्मरण लेख को पढ़कर जायसवालजी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा बढ़ी। पर उस समय उनकी कोई जीवनी तक उपलब्ध् नहीं थी। उसी दौरान मैं अपनी एक कविता पुस्तक के प्रकाशन के संबंध में लखनऊ जाकर गुरुदेव चन्दिकाप्रसाद जिज्ञासु से मिला। वहां मुझे जिज्ञासुजी ने 1970 में रांची में दिए गए अपने व्याख्यान ‘हैहय वंश की श्रेष्ठता’ की एक मुद्रित प्रति दी। उस व्याख्यान में मैंने काशीप्रसाद जायसवाल के बारे में यह पढ़ा-

‘सन् 1927 की जबलपुर महासभा में, जो विद्यामहोदधि डा. काशीप्रसाद जायसवाल एम.ए. बैरिस्टर पटना हाई कोर्टकोर्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के चीनी भाषा के पंडित, कलकत्ता विश्वविद्यालय के टैगोर, कानून प्रोफेसर तथा बिहार-उड़ीसा अनुसंधान समिति के मासिक पत्र के संपादक की अध्यक्षता में हुई थी और जिसके स्वागताध्यक्ष सुप्रसिद्ध विद्वान रायबहादुर डा. हीरालालजी रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर थे, हमारी जातीय महासभा का ‘हैहय क्षत्रिय’ नामकरण हुआ। बाद में डॉ. जायसवाल महोदय से मैंने जब पूछा कि ‘आपने जाति का सम्बन्ध हैहय वंश से जोड़ दिया। हैहयों के साथ तो भृगुओं का भयानक संघर्ष रहा है और पुराणों से विदित है कि भार्गव परशुराम ने 21 बार हैहय क्षत्रियों का संहार किया।’ इसके उत्तर में डॉ. जायसवाल महोदय ने कहा था – ‘हैहय-वंश के समान तेजस्वी और ज्ञानी इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रियों के अतिरिक्त कोई क्षत्रिय वंश नहीं हुआ। पुराणों से सिद्ध है कि हम लोग इसी हैहय-वंश के उत्तराधिकारी हैं। हैहय-वंश की महिमा यदि हमारी जाति आज नहीं समझती, तो दस, बीस वर्ष या पचास वर्ष में समझेगी।’[2]

राहुलजी ने, जायसवालजी को साम्यवाद की हवा लग गई थी, यह बताया, किन्तु जिज्ञासुजी के अनुसार, उन्होंने अपनी जाति (कलवार) का ‘हैहयवंशीय’ क्षत्रिय नामकरण किया था, यह पता चला। ये दोनों बातें विरोधाभासी थीं। मन में विचार आया, जो वर्णभेद में विश्वास करेगा, वह साम्यवादी नहीं हो सकता। किन्तु, वास्तविकता जानने के लिए, हिन्दी में ऐसी कोई अन्य पुस्तक मुझे नहीं मिली, जिससे जायसवालजी के लेखन से सीधे मुठभेड़ होती। ऐसा नहीं है कि उनकी रचनाएं नहीं थीं, पर वे अप्राप्य थीं। इसका कारण था कि उनकी दूसरी पीढ़ी ने उनको भुला दिया और संस्थाओं ने उनपर कोई काम नहीं किया। किन्तु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रतनलाल के वर्षों के अनुसंधान से उनकी हिन्दी रचनाओं के तीन खंड प्रकाशित हो गए हैं, तथा एक खंड उनके व्यक्तित्व पर उनके समकालीन विद्वानों के लेखों का भी उन्होंने संकलन कर दिया है। यह सारी महत्वपूर्ण सामग्री उनकी मृत्यु के 80 साल बाद 2018 में प्रकाश में आईं, जिससे अब उन पर शोध और आलोचना का कार्य आसानी से हो सकेगा।

संक्षिप्त परिचय

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, काशीप्रसाद जायसवाल का जन्म मिर्जापुर में 1880 ई. के आसपास (अन्य स्रोतों में 1881) हुआ था। उनके पिता बाबू महादेव प्रसाद अभी चपड़े (लाख/लाह) के लखपति व्यापारी नहीं हुए थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे काशीप्रसाद को उसकी मां के साथ ससुराल में उपेक्षित छोड़ दिया था। ननिहाल बहुत गरीब था। लड़कों की देखा-देखी वह भी मिठाई मांगते। उन्हें चने के सत्तू में गुड़ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लड्डू के नाम से देते। मैट्रिक पास करने के बाद जायसवाल ने पढ़ाई छोड़ दी। तबतक पिता का चपड़े का व्यापार चमका हुआ था, लाखों की आमदनी थी। मिर्जापुर के चपड़ा व्यापारियों की एक बैठक में जायसवालजी को अधिक बहस करते देखकर किसी ने ताना मारा- बड़े बैरिस्टर बने हुए हैं। बात लग गई। अब मुझे बैरिस्टर बनना होगा। पिता ने पुत्र की इच्छा पूर्ण करनी चाही, लेकिन विलायत में जाकर वह खाने-पीने में छुआछूत कैसे निवाहेंगे, उनके साथ ब्राह्मण रसोइया कर दिया गया। खाने की बहुत सी चीजें दाल-चावल, मसाला आदि घर से भेजी जातीं। जायसवालजी चाहते, बैरिस्टरी पासकर लौट आते, पर उनमें ज्ञान की पिपासा थी। वह ऑक्सफोर्ड में भर्ती हुए। एम. ए. किया। बैरिस्टरी पास की। इतिहास के अतिरिक्त उन्होंने चीनी भाषा जैसे कठिन विषय को चुना था, जिससे मालूम होगा, कि वह सस्ती डिग्री लेकर आने के लिए तैयार नहीं थे। वहां उनका सम्पर्क लाला हरदयाल और दूसरे भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ हुआ। वह भी उसी रंग में रंग गए। वहां से हिन्दी पत्रों में गर्मागर्म लेख भेजते, जिसे अंग्रेजों की खुफिया पुलिस देखा करती। उनको और उनके परिजनों को डर था, कि भारत लौटने पर पकड़ लिए जायेंगे। थाह लगाने के लिए वह लंका आए। मालूम हुआ कि कोई वैसी बात नहीं, फिर भारत आए। पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रेक्टिस करने लगे, वहीं उन्होंने मनु और याज्ञवल्क्य पर यूनिवर्सिर्टी में व्याख्यान दिया, जो पीछे पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ और उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली। हिन्दू राजनीति ने उनकी ऐतिहासिक विद्वता की धाक विद्वानों के उपर जमायी। वर्ष 1912 में बिहार बंगाल से अलग हो गया और पटना में हाईकोर्ट स्थापित हुआ। अब वह यहां चले आए। बिहार-उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी और उसके जर्नल के वह संस्थापक और प्राण थे। इस शोध पत्रिका में उनके लेख बराबर निकला करते थे, जिसके कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय जगत में प्रसिद्ध हो गई।[3] 56 वर्ष की अल्पायु में, 4 अगस्त 1937 को उनकी मृत्यु हुई।

भाषा, साहित्य और राष्ट्रीयता

डॉ. रतनलाल ने लिखा है, ‘जिस अवधि में जायसवाल ने लिखना शुरू किया, उसे ‘हिन्दी नवजागरण’ के नाम से जाना जाता है, जब भारतेंदु हरिश्चन्द्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट के नेतृत्व में हिन्दी भाषा और नागरी लिपि को आधिकारिक मान्यता दिलाने का आन्दोलन चल रहा था। यह काल हिन्दी और उर्दू भाषा के सांप्रदायीकरण का भी काल था, जिसमें नागरी प्रचारिणी सभा और बाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अगुआई में एक नई संस्कृतनिष् हिन्दी को बढ़ावा देने और हिन्दी से उर्दू और फारसी शब्दों को बाहर धकेलने का प्रयास चल रहा था।[4] नवजागरण काल में यह प्रश्न महत्वपूर्ण था कि हिन्दी साहित्य की भाषा कैसी होनी चाहिए? वह संस्कृतनिष् होनी चाहिए अथवा फारसी-मिश्रित? 19वीं सदी के अन्तिम दशक में पंडित बालकृष्ण भट्ट ‘हिन्दी प्रदीप’ के मंच से ‘सर्वसाधारण की शिक्षा हिन्दी में होनी चाहिए’ आन्दोलन चला रहे थे। इसके पीछे कारण यह था कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और राजा शिवप्रसाद की भाषा नीति में अन्तर था, क्योंकि उनमें सामंजस्य का अभाव था। राजा शिवप्रसाद फारसी आदि मिश्रित खिचड़ी हिन्दी चलाना चाहते थे, जबकि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शुद्ध हिन्दी के समर्थक थे। जायसवालजी बोलचाल की आम भाषा के पक्ष में थे और फारसी और संस्कृत मिश्रित भाषा के विरोध में। उन्होंने भाषा के भी दो भेद किए थे- ‘साधु’ और ‘प्रचलित’ भाषा और कहा था कि उपन्यास, जीवनचरित्रा और दर्शन विषयक साहित्य की भाषा ‘साधु’ होनी चाहिए तथा समाचार पत्र इत्यादि के लिए ‘प्रचलित’ भाषा उपयुक्त होगी।

काशीप्रसाद जायसवाल की तस्वीर

‘नवजागरण काल में दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय एकता का था। जायसवालजी का मत था कि राष्ट्रीय एकता भाषाई एकता के बिना नहीं हो सकती। भारत में भिन्न-भिन्न भाषाएं थीं, पर राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी ही उनको एक सूत्र में बांध सकती थी। जायसवालजी ने इस विषय पर ‘सरस्वती’ (जून 1903) में ‘भाषा का महत्व’ शीर्षक से एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख लिखा। उसमें उन्होंने बात पर जोर देते हुए कि भाषा देवकृत नहीं, बल्कि मानवकृत[5] है, भाषा के संबंध को खून के संबंध से भी प्रबल बताया। उन्होंने उदाहरण दिया : ‘यदि आप चीन में जाएं, जहां लम्बी-लम्बी चोटी वाले पीले मनुष्य की किड़विड़ावट में एक आपका बांध्व मिले, जो चीन ही में पला हो और चीनी ही बोलता हो। और एक दूसरा चीनी ही हो, जो टूटी-फूटी भी आपकी भाषा बोल लेता हो और समझ सकता हो, तो बतलाइए, आपका मन किसकी ओर झुकेगा? रुधिर की एकता, भाषा की एकता के बिना, व्यर्थ है और भाषा की एकता रुधिर की विभिन्नता रहते भी एकता संपादन करने वाली है। हमारे प्रभु अंग्रेजों की यह उन्नति कदापि नहीं हो सकती थी, यदि उन सभी की भाषा एक न होती। जर्मनी से छिन्न-भिन्न देश भाषा के एकतासूत्र में गठित होकर राष्ट्र को दृढ़ करता है। भाषा की एकता सब एकताओं की जननी है।’[6]

भाषाई एकता के समर्थक जायसवालजी, खेद है, भारतीयों की आदिम भाषा संस्कृत मानते थे, जबकि संस्कृत भारत के किसी भी प्रान्त की मातृभाषा नहीं थी।

नवजागरण काल की तीसरी बड़ी समस्या हिन्दू-मुस्लिम-एकता की थी। हिन्दू-मुस्लिम एकता के बिना न भारत एक राष्ट्र हो सकता था, और न राष्ट्रीय एकता कायम हो सकती थी। इसलिए जायसवालजी हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे। किन्तु नवजागरण काल का यह नग्न सत्य था कि साहित्य का नेतृत्व हिन्दुओं, खासतौर से ब्राह्मणों के हाथों में था, जिनकी आस्था हिन्दूधर्म के पुनरुत्थान में थी। वे वर्णाश्रम को श्रेष्ठ व्यवस्था मानते थे, और सुधार को पसन्द नहीं करते थे। वे ईसाइयों और मुसलमानों तथा शूद्रों के प्रति भी पूर्वाग्रही थे। जायसवालजी हिन्दू-मुस्लिम-एकता को जरूरी समझते थे। उनका मत था कि ताली एक हाथ से नहीं, बल्कि दोनों हाथ से बजती है। क्योंकि अधिकांश हिन्दू साहित्यकार अपने उपन्यासों में मुसलमानों को अत्याचारी और हिन्दुओं को सदाचारी के रूप में चित्रित कर रहे थे, इसलिए जायसवालजी इस कृत्य को राष्ट्रीय एकता में बाधक के रूप में देख रहे थे।

यह भी पढें – बहस तलब : कपट साहित्य बनाम बहुजन साहित्य

इस सन्दर्भ में जायसवालजी ने ‘हिन्दी उपन्यास लेखकों को उलाहना’ शीर्षक से एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख जनवरी 1899 के ‘हिन्दी प्रदीप’ में लिखा था। इस लेख में उन्होंने लिखा कि संप्रति हिन्दी भाषा में जो उपन्यास लिखे जा रहे हैं, उनमें कुछ तो इतने घिनौने हैं, कि उनको गंगाजी में प्रवाह कर देना ही श्रेयस्कर है।[7] जायसवालजी की दृष्टि में, उन उपन्यासों में, ‘मुसलमानों के चरित्र का ऐसा चित्र खींचना कि जिससे यह भाव होने लगे कि संसार की मनुष्य-जाति भर में सबसे नीच, दुष्ट, अत्याचारी, विश्वासघाती ये ही होते हैं, एक महादोष था। उन्होंने सवाल किया, क्या पृथ्वी तल पर किसी विशेष जाति व संप्रदाय के जनमात्र दुष्ट या पापी नहीं हो सकते?[8] उस काल में बंग भाषा का घोर सांप्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी उपन्यास ‘आनन्द मठ’ था, जो 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास की सम्पूर्ण कहानी का तानाबाना यह था कि किस प्रकार मुसलमानों को मारा जाए, उनकी मस्जिदों को नेस्तनाबूद किया जाए और उनके घरों में आग लगाई जाए। उपन्यास में, मुसलमानों का विनाश वैष्णवी सन्तान किस तरह करते हैं, इसका वर्णन इस प्रकार है, ‘गांवों में उन्होंने अपने चर भेजना शुरु किया। वे गांवों में जाते। हिन्दुओं से कहते, विष्णु-पूजा करोगे? और कुछ लोगों को इकट्ठा करके मुसलमानों के घरों में आग लगा देते। वे बेचारे जान बचाने की फिक्र में लग जाते, इधर संतान-गण उनका सब कुछ लूटकर नए विष्णु-भक्तों को बांट देते।’[9] उसमें एक पात्र कहता है, ‘वह भी दिन आएगा कि मस्जिद तोड़कर राधा-माधव का मन्दिर बनाएंगे।’[10]

हिन्दू-मुस्लिम समस्या को सुलझाने से ज्यादा बढ़ाने वाले लोग साहित्य में ज्यादा थे। जायसवाल इस बात से खफा थे कि साहित्य के द्वारा हिन्दू-मुसलमानों में परस्पर घृणा और द्वेष फैलाया जा रहा था। उनके अनुसार, इस तरह का साहित्य देश का केवल अहित ही करता है। उन्होंने लिखा कि अगर ऐसे लेखक यह समझते हैं कि वे मुसलमानों को नीच दिखाकर बुझे हुए हिन्दुओं में जोश डालने का उपकार करते हैं, तो वे गलत सोचते हैं। उन्होंने लिखा कि ऐसा साहित्य हिन्दुओं का भला नहीं, बल्कि उनका नुकसान करता है। उनका मत था, ‘यदि एक दल के लोग अपने दूसरे दल के प्रति घृणा करने की बुरी प्रकृति को छोड़ दें, तो कुछ दिनों में दूसरे दल वाले भी उनकी तरफ स्वच्छ हृदय हो जाएं।’ उन्होंने बड़ी सही बात लिखी कि ‘एक हाथ से ताली नहीं बजती।’

1889 में हिन्दी में राधाकृष्ण दास (1865-1907) का उपन्यास ‘निस्सहाय हिन्दू’ प्रकाशित हुआ। राधाकृष्ण दास भारतेन्दु हरि}चन्द्र कें फुफेरे भाई थे। यह उपन्यास उन्होंने 15-16 वर्ष की अवस्था में लिखा था। जायसवालजी इस उपन्यास से प्रभावित हुए।  उसमें मुस्लिम चरित्र वैसा नहीं था, जैसा अन्य उपन्यासों में दिखाया गया था – नीच और अत्याचारी का। उन्होंने ‘निस्सहाय हिन्दू’ के लेखक की प्रशंसा की। उन्होंने लिखा कि इसके लेखक ने एक ऐसा उत्कृष्ट पात्र मुसलमान का रखा, जिसके सहृदयता, सौजन्य, सदगुण और हिन्दू मित्र पर प्रेम का वृतान्त पढ़कर अश्रुधारा नहीं रुक सकती।’

इससे जायसवालजी की साहित्य-चेतना को समझा जा सकता है। उपन्यास को साहित्य की सशक्त विधा मानते थे। उनका मत था कि उपन्यास का व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए ऐसे उपन्यास लिखे जाने चाहिए, जिन्हें पढ़कर पापी व्यक्ति भी देवता में परिणत हो जाए। उन्होंने उपन्यासकारों से कहा कि वे अपनी लेखनी से हिन्दू-मुसलमान दोनों को मिलाने का काम करें, उन्हें एक-दूसरे से लड़ाने का नहीं।

संदर्भ :

[1] जिनका मैं कृतज्ञ, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ 151

[2] चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रंथावली, खंड 4, पृष्ठ 103

[3] जिनका मैं कृतज्ञ, पृष्ठ 156-157

[4] काशीप्रसाद जायसवाल संचयन, खंड 1, पृष्ठ 14

[5] वही पृष्ठ 43

[6] वही पृष्ठ 44

[7] वही पृष्ठ 37

[8] वही पृष्ठ 37-38

[9] आनंद मठ, बंकिम चंद, अनुवादक हंसराज तिवारी, संस्करण 1983, पृष्ठ 77

[10] वही पृष्ठ 96

(संपादन : नवल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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