हमारी मेहनत, हमारा पैसा, हमारी शिक्षा और मिड डे मील

यह समझा जाता है कि शिक्षा शेरनी का दूध है और जो पिएगा वह दहाड़ेगा लेकिन नए हालात में क्या हो रहा है? वास्तविकता तो यह है कि इस शेरनी को ही पूंजीपतियों ने पालतू बना लिया है और इसके दूध को मनमाने दाम पर बेच रहे हैं। वे नहीं चाहते कि यह दूध किसी को मुफ्त मिले। रामजी यादव का विश्लेषण

बहस-तलब

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की एक खबर यह थी कि स्कूलों की खाली ज़मीन पर खेती और बागवानी की जाएगी और पैदावार का उपयोग मिड डे मील में किया जाएगा। झारखंड से एक प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक ने बताया कि चुनाव के मद्देनजर उनकी ड्यूटी वाहनों की चेकिंग में लगा दी गई है। छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों को छोड़कर बाकी के सारे स्कूल अर्द्धसैनिक बलों की छावनी बन चुके हैं। मध्य प्रदेश के हजारों प्राथमिक विद्यालय बंद कर दिए गए और हजारों ऐसे हैं जो पेड़ के नीचे चलते हैं। बहुत से विद्यालय अध्यापकविहीन हैं तो बहुत से छतविहीन। महाराष्ट्र में काम कर रहे पत्रकार शिरीष खरे ने अपनी बहुचर्चित किताब ‘उम्मीद की पाठशाला’ में दर्जनों ऐसे विद्यालयों की कहानियाँ लिखी हैं जो जर्जर और मृतप्राय थे, लेकिन अध्यापकों, अभिभावकों और बच्चों के सम्मिलित प्रयासों ने उन्हें न केवल फिर से बेहतर बनाया बल्कि अच्छे विद्यालयों का उदाहरण भी बना दिया। मुझे लगता है जिन राज्यों का मैं नाम नहीं ले पा रहा हूं उनमें भी हालात इससे बेहतर नहीं बल्कि बदतर ही होंगे। इन तथ्यों से यह अच्छी तरह मालूम होता है कि राज्य अपने भावी नागरिकों के प्रति क्या रवैया रखता है? 

यानि पहली नज़र में यह समझ में आने लगता है की पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनिक संसार लगातार विद्रूपताओं का शिकार होता गया है। यह संसार लगातार सरकारों की बदनीयती और उपेक्षा का शिकार रहा है और आज हालात ये हैं कि उनको लगातार निजी हाथों में दे देने की कोशिशें हो रही हैं। यह अंदाजा लगाना बिलकुल ही कठिन नहीं है कि इस प्रकार लाखों एकड़ क़ीमती ज़मीनों में बने और विद्यालय भवन जैसे बुनियादी संसाधनों से सम्पन्न एक विशाल विद्यालय शृंखला किस प्रकार एक दिन निजी संपत्ति में बदल जाएंगे और वहां से सबसे पहले वे बच्चे बहिष्कृत किए जाएंगे जो गरीब होंगे और इनमें भी अधिकांश दलित-बहुजन होंगे। उनकी आर्थिक स्थितियों के आधार पर एक झटके में तय कर दिया जाएगा कि एक देश के नागरिक के रूप में उन्हें पढ़ने-लिखने की जरूरत नहीं है। वे जन्मजात मजदूर ही रहेंगे। उन्हें किसी प्रकार के सपने देखने और भविष्य की कल्पनाएं करने का कोई अधिकार नहीं है। चाहे आप कितना ही ढुलमुल रहें चाहे हालात के बेहतर बनने की खुशफहमियां पालें, लेकिन जब तक चेतना आएगी तब तक क्रूर पूंजी सबकुछ निगल चुकी होगी और बेहया, लालची और अपराधी मानसिकता के लोगों का एक वर्चस्व-समूह बन चुका होगा जो न केवल इन सबकी जोरदार वकालत करेगा बल्कि इसके खिलाफ बोलनेवालों को आसानी से अलग-थलग भी कर देगा। 

क्या यह सब कोई साधारण प्रक्रिया है? हो सकता है कि आप भ्रमित हों और यह साधारण प्रक्रिया लगे लेकिन जब आप नींद से जागेंगे तब समझ में आएगा कि यह कतई साधारण प्रक्रिया नहीं है। एक एक तरफ उस राज्य को कमजोर करने का षड्यंत्र है जो अपने देश की जनता के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय देने का उत्तरदायी है और जिसे बनाने में जनता का खून-पसीना बिना मोल लिया गया है और दूसरी तरफ यह मुनाफाखोर पूंजीपतियों के कब्जे में सभी सार्वजनिक भौतिक सम्पदा को दे देने की मिलीभगत है। एक तरफ राज्य कमजोर हो जाएगा तो आपके दुखों को कोई सुननेवाला नहीं होगा और दूसरी ओर पूंजीपति अकूत सम्पदा के मालिक होंगे तो हर चीज को वे अपने हिसाब से चलाएंगे और उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। ये दो ध्रुव हैं जहां शिक्षा-व्यवस्था घूम रही है। कोई भी कमजोर राज्य किसी भी कल्याणकारी परियोजना को नहीं चला सकता। उसके स्कूल जर्जर होंगे। उसके अस्पताल मौत के ठिकाने होंगे। उसके न्यायालय पूर्वाग्रहग्रस्त अन्यायालय होंगे। वह अपनी जनता को रोजगार नहीं दे सकता। उसकी संसद बिकाऊ होगी। उसकी कार्यपालिका के तमाम सारे अंग जनविरोधी होंगे। और पूंजीपति जितना मजबूत होगा उतना ही निजी हित में इन तमाम ताकतों का उपयोग करेगा। आज सारी लड़ाई राज्य और पूंजी का है। राज्य जिनके हाथों में है वे उसे पूंजीपतियों की ताकत मजबूत करने में लगा रहे हैं। शिक्षा का निजीकरण दरअसल राज्य की ताकत को निजी हाथों में देने का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। और इस षड्यंत्र को ऐसे तमाम सारे आदेशों में हमें देखना चाहिए जो शासन की निर्योग्यताओं का एक मात्र इलाज सार्वजनिक संस्थाओं के निजीकरण के विचार से प्रेरित हो रहा है। 

सोचने की बात है कि चौबीस घंटे में एक बार गरीब बच्चों को मिलनेवाला भोजन भी खाते-पीते और अमीर लोगों की आंख का कांटा बन गया

बेशक इसके अनेक ऐसे आयाम भी हैं जिनपर अलग-अलग रूपों में हमारा ध्यान जाता होगा लेकिन समग्र रूप में उस पर विचार करने का मौका कम आ पाता है। एक निम्नपूंजीजीविता और असंबद्ध उपभोक्तावाद की मानसिकता ने समग्रता में सोचने के विवेक को क्षतिग्रस्त कर दिया है। बड़े मुद्दे पर हमारी समझदारी इसलिए काम करना बंद कर चुकी है क्योंकि हमने मान लिया है कि सार्वजनिक नैतिकता के बिना भी हमारा काम आराम से चलता रहेगा। निजी संपत्ति और बीमा की रकम हमें उन बुराइयों से बचा लेगी जिसके शिकार प्रायः वे लोग होते हैं जिनके पास ये दोनों नहीं होते। यह सोच धीरे-धीरे हमको आह और अफसोस लायक बनाकर छोड़ देती है। सक्रिय रूप से तो कुछ होता नहीं सिवाय इसके कि बड़े सहज भाव से हम सोच लेते हैं कि जो सबके साथ होगा वह हमारे साथ भी होगा ही। किया ही क्या जा सकता है। 

इसलिए इस बात पर हमारा प्रायः कोई मत नहीं होता कि हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा किस तरह चल रही है। इससे पैदा होनेवाली इस देश की पीढ़ियां कैसी बन रही हैं? इसलिए सरकार भी नहीं जानती कि अपने देश में प्राथमिक शिक्षा के लिए किस प्रकार की नीतियां और व्यवहार जरूरी हैं। समय-समय पर नौकरशाही के आदेश आते हैं और कुछ फेरबदल के बाद फिर वही ढाक के तीन पात रह जाते हैं। प्रायः इसी बात के लिए लंबी-लंबी बहसें चलती रहती हैं कि मिड डे मील जारी रखा जाय या बंद किया जाय। मिड डे मील की शुरुआत 1995 में उन गरीब बच्चों के लिए की गई थी जिनको अपने अभिभावकों की गरीबी के कारण पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता था। इस प्रकार यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए एक अनिवार्य व्यवस्था बनाई गई कि उन्हें स्कूल में दोपहर का भोजन दिया जाय। इस योजना के तहत केंद्र सरकार को साठ फीसदी और राज्य सरकारों को चालीस फीसदी खर्च उठाना तय हुआ। माना गया था कि इस बहाने स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ेगी लेकिन ऐसा प्रायः नहीं हुआ। ऊपर से यह हुआ कि खाते-पीते लोगों ने यह व्यंग्य करना शुरू किया कि बच्चे खाने की लालच में स्कूल आते हैं। सोचने की बात है कि चौबीस घंटे में एक बार गरीब बच्चों को मिलनेवाला भोजन भी खाते-पीते और अमीर लोगों की आंख का कांटा बन गया। यह उसी प्रवृत्ति का प्रतिबिंब था जैसे किसी जमाने में दलितों को छात्रवृत्ति मिलने पर लोग उन्हें सरकारी दामाद कहकर अपमानित करते थे। ठीक उसी तरह अब मिड डे मील पानेवाले बच्चों के लिए कहा जा रहा है । कहनेवाले किस जात-जमात के हैं और सुननेवाले कौन हैं यह बहुत अनजाना तथ्य नहीं है। लेकिन मजे की बात यह है कि चालीस फीसदी खर्च उठानेवाली उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट रही है और यह आदेश जारी कर रही है कि स्कूलों की खाली जगह पर बच्चों द्वारा साग-सब्जियां उगाई जाएंगी जिनका इस्तेमाल मिड डे मील में किया जाएगा।

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सिर्फ यही नहीं, बल्कि इन साग-सब्जियों को उगाने में अध्यापकों को भी लगाने की योजना है। अध्यापकों के सामने वैसे भी कम बवाल नहीं हैं। उन्हें प्रायः दस वर्ष में जनगणना का काम अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। पांच साल में कम से कम तीन चुनाव आते ही हैं जिनके पहले उन्हें मतदाता सूची में संशोधन का काम तो करना ही पड़ता है। हर बार सरकारी अधिकारी कुछ प्रतिशत लोगों के नाम अनिवार्यतः निकाल देते हैं ताकि पहले से चला आ रहा समीकरण गड़बड़ न हो। ऐसे में अचेत मतदाता तो कुछ खास कर नहीं पाते लेकिन सचेत मतदाता अपने नाम फिर से सूचीबद्ध कराते हैं जिनके सर्वेक्षण का काम भी अक्सर प्राथमिक शाला के अध्यापकों को ही करना पड़ता है। उसके बाद चुनाव कराने और मतगणना का काम भी अध्यापकों के जिम्मे होता है। ढेरों अध्यापकों को न्याय पंचायत कार्यालयों की मासिक बैठकों में भी शामिल होना पड़ता है और दिन-दो दिन का समय खराब करना पड़ता है। अमूमन अध्यापक को ही मिड डे मील अभिलेखों को ऑडिट कराना पड़ता है। मिड डे मील की तैयारी और वितरण में भी उसकी उपस्थिति जरूरी होती है। पढ़ाई के अतिरिक्त किए जाने वाले इन कामों के अलावा प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापक को शिक्षा विभाग के भ्रष्ट अफसरों के खौफ में रहना पड़ता है। अनेक दबंग और नेता टाइप के लोगों की धौंस के साथ-साथ मिड डे मील में हेरफेर करके प्रधानाध्यापक, मिड डे मील सामग्री के सप्लायर दुकानदार और ग्राम प्रधान जैसे घटकों की कमीशनखोरी की ज़मीन को चौरस और भुरभुरी बनाने का दायित्व भी अध्यापकों का ही होता है, जिसमें किसी किस्म की हीलाहवाली उसके भीतर लाल स्याही का डर पैदा करती है। अब इतने कामों से पहले से ही घिरे अध्यापकों से साग-सब्जी उगाने का काम लेने पर बच्चों की पढ़ाई कहां जाएगी इसके बारे में गंभीरता से सोचकर देखिए। 

नौकरी के लिहाज से मास्टरी पढे-लिखे लोगों के लिए हारे को हरिनाम की भांति होती है। यह उसके पंखों को कतर देने की तरह होता है। जिन अध्यापकों ने एम ए, एम फिल या पीएचडी आदि की होती है स्कूल उनकी महत्वाकांक्षाओं के लिए उपयुक्त मंच नहीं होते। वे बिलकुल गलत जगह पर होने की तकलीफ महसूस करते हैं और हरसंभव वहां से निकल भागने को तत्पर रहते हैं। ऐसे में वे क्यों अपनी ऊर्जा को गलत जगह पर बर्बाद करें। वे करते भी नहीं। किसी प्रकार वे नौकरी बजा लेते हैं। बेशक इससे वे शिक्षा देने के कौशल से अधिक विद्यालय तंत्र से सांठ-गांठ कायम रखना बेहतर समझते हैं। अधिकतर प्राथमिक अध्यापक विद्यार्थियों के प्रति अमूमन लापरवाह होते हैं। गांवों में तैनात अध्यापक भी प्रायः शहर में रहते हैं और उनके भी बच्चे हैसियत के अनुसार अच्छे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। ऐसे में इन अध्यापकों को लगता है कि नौकरी सलामत रहे तो बाकी काम तनख्वाह के भरोसे किए जा सकते हैं। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई के अलावा बाकी सब कुछ होता है। ऐसा इसलिए भी सत्य है कि अच्छी तनख्वाह और स्थायी नौकरी पाने के बावजूद पूरे देश के एक प्रतिशत अध्यापक भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं भेजते। क्योंकि वे जानते हैं कि वहाँ उनके बच्चों के लिए शिक्षा का कोई बेहतर बंदोबस्त और पर्यावरण नहीं है। यह सोचने की बात है कि ऊपर से नीचे तक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की गति क्या है और ऐसे में उसका भविष्य क्या संकेत कर रहा है? क्या ऐसे में एक विशाल तंत्र, उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर, उसकी अत्यंत कीमती ज़मीनों और विद्यालय भवनों आदि का कोई बेहतर इस्तेमाल हो रहा है? सरकार अब प्राथमिक शिक्षा पर जरूरी खर्चों में लगातार कटौती कर रही है। इसीलिए न उसके पास कोई ठोस योजना है और ना ही उसे अच्छा बनाने की कोई प्रेरणा ही है। वह धीरे-धीरे इसको पूरी तरह सड़ा देना चाहती है जिससे उसे अपनी नाकामी को ऊब में ढालने में आसानी हो। इस प्रकार एक दिन वह निजीकरण के अपने दीर्घकालीन षड्यंत्र को अपने आत्मसमर्पण से ढंक ले और सरेआम उसे पूंजीपतियों को सौंप दे। 

किसी जमाने में जब इस देश में बुनियादी शिक्षा की नींव रखी गई होगी तो उसकी पृष्ठभूमि में क्या सोच रही होगी ? अब इस बात पर कोई पर्दा नहीं रह गया है कि भारत में शिक्षा कुछ खास लोगों, जातियों और वर्णों तक सीमित थी और उसका अंतिम उद्देश्य विशाल आबादी की श्रमशक्ति और उत्पादन को नियंत्रित करना और हड़पना था। इन सबको सामाजिक विभाजन के माध्यम से एक सहज प्रक्रिया बना दिया गया था। यही भारतीय संस्कृति थी । भारतीय शिक्षा में विज्ञान, शोध और आविष्कार जैसी चीजें गायब थीं । ईमानदार विद्वान लोग कहते हैं कि भारत में कोई आविष्कार नहीं हुआ। बेशक इसके पीछे एक बड़ा कारण जाति-व्यवस्था के चक्के से बहुसंख्यक आबादी का अंतहीन शोषण और दमन था। भारतीय शासक वर्ग और उनके पिट्ठू समुदाय का पेट इतना अधिक भरा हुआ था कि उनमें किसी तरह की भूख बाकी ही नहीं थी। पशुपालन, कृषि, और बागवानी व्यवस्था कितनी भी पिछड़ी क्यों न हो उनके लिए न अन्न की कमी थी, न साग-सब्जी या फल की और ना ही उन्हें दूध के लिए तरसना पड़ता था। विज्ञान चाहे जैसा ही रहा हो लेकिन उन्हें बीमारी का कोई डर था ही नहीं। इसीलिए इस देश में मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाओं के बड़े-बड़े वैद्य-कविराज आदि होते थे लेकिन कटे-पिटे का इलाज बड़ी हिकारत से होता था। पुरानी लोककथाओं में यह तथ्य बहुत आम है कि चोट लगने पर आदमी को मौत के हवाले छोड़ दिया जाता था। जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके शीर्ष पर विराजमान व्यक्ति की सेवा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रतिभा खर्च हो जाती थी। लोककथाओं में यह आम कथानक होता था कि बीमार राजा या रानी या राजकुमार या राजकुमारी की दवा लाने के लिए सबसे सुगठित और मेधावी युवा को बड़ी दुर्गम यात्राएं करनी पड़ती थी। बड़े-बड़े युवकों के जीवन का यह सबसे महान ध्येय हुआ करता था। क्या ऐसे में किसी आविष्कार की कल्पना की जा सकती थी। ऐसे हालात में भारत में किसी जेम्स वॉट या थामस एल्वा एडिसन के बारे में सोचा जा सकता है? 

और यह तथ्य भी अब किसी से छिपा नहीं है कि थामस बैबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में गठित आयोग (1834) ने ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में शिक्षा को धर्म और जाति से ऊपर एक महत्वपूर्ण गतिविधि के तौर पर लागू करने की सिफारिश की जिस पर आगे तेजी से काम हुआ। मैकाले के आलोचक मानते हैं कि उन्होने भारतीय शिक्षा पद्धति को तहस-नहस कर दिया लेकिन वे लाख कुतर्कों के बावजूद भारतीय शिक्षा पद्धति की महत्ता को स्थापित नहीं कर पाय। सच तो यह है कि भारतीय शासकवर्ग मसालों की खोज और उपनिवेशों की स्थापना की चाहत में आए डचों, पुर्तगालियों, फ़्रांसीसियों और अंग्रेजों से हार गए थे और उनकी शासन प्रणाली और उसके सभी घटक क्षत-विक्षत हो रहे थे। अब उनमें यह दम ही नहीं था कि वे अपने को फिर से संयोजित करते और अपनी बहिष्कृत और बकवास कर दी गई पद्धतियों को पुनर्जीवित करते। इसलिए उन्होंने सम्झौता करना और पिछलग्गू होना सहजता से स्वीकार किया। इस बात पर आश्चर्य नहीं किया जा सकता कि यहां के शासकवर्ग ने जाति-व्यवस्था को जस का तस बनाए रखने के लिए अपनी वफादारी और भी बेहतर बनाई होगी। उनके इस सहयोग की कीमत पर अंग्रेजों ने जाति-व्यवस्था में अधिक छेड़छाड़ करने की बजाय उसका फाइदा उठाना शुरू किया हो। महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे के संस्कृत विद्यालयों को दिये जाने वाले अनुदान की कड़ी आलोचना किए जाने वाले तथ्य से पता चलता है कि ऐसा ही था। इसका ही एक पहलू यह है कि उन्होंने पेशवाओं के खिलाफ महार सैनिकों का इस्तेमाल किया जिसका परिणाम भीमा-कोरेगांव के रूप में सामने है जो आज तक प्रतिगामी ताकतों के दिल-दिमाग का सबसे बड़ा घाव है। इन घटनाओं से एक सबक साफ मिलता है कि अंग्रेजों ने जिस चतुराई से जाति-व्यवस्था का इस्तेमाल किया उसने भारतीय राजनीति में कई सकारात्मक फलों के बीज बोए जो आगे चलकर भारतीय लोकतंत्र को आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे। 

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मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली ने भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण में एक लचीलापन और गुंजाइशवाद पैदा किया। इसने एक ऐसी व्यवस्था में लोगों के घुसने का रास्ता साफ किया जो वस्तुतः इस देश की मुख्यधारा थी और यहां आकर जाति-व्यवस्था के पदानुक्रम को आसानी से छोड़ने और नए स्टेटस को पाने की सहूलियत थी क्योंकि यहां स्थानीयता के प्रति नहीं बल्कि केन्द्रीयता के प्रति जवाबदेही थी। इसके महत्व को फुले दंपत्ति की उस बेचैनी और साहस में देखा जा सकता है जो उन्होंने सैकड़ों दिक्कतों और दुरूहताओं के बावजूद न केवल बनाए रखा बल्कि आगे चलकर वह भारत के बहुसंख्यक समाज का गौरव और सर्वाधिक महान ऐतिहासिक और समकालीन उपलब्धि भी बना। इसे डॉ. आंबेडकर के उस उद्बोधन में देखा जा सकता है जब वे कहते हैं कि शिक्षा शेरनी का दूध है। इसे रामासामी पेरियार के उस कृतित्व में देखा जा सकता है जहां वे एक ही हास्टल में दो रसोई होने के खिलाफ आंदोलन करते हैं। इसे दिमागी गुलामी और ब्राह्मणवाद के खिलाफ ललई सिंह यादव उन संघर्षों में देखा जा सकता है जिसके लिए उन्होंने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। फेहरिस्त बहुत लंबी है। काम भी बहुत बड़े और महान हैं। इसके साथ ही इतिहास की उस गति और राजनीतिक दुरभिसंधियों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा क्योंकि समय केवल सीधी रेखा में नहीं चला है बल्कि भटका है। वे सवाल जो इस देश की बड़ी आबादी के घोषणापत्र की तरह अनिवार्य होने चाहिए थे वे बिसरते चले गए और प्रतिगामी ताकतों ने सारी जगहें घेर लीं। इसके एक परिणाम के रूप में ही मिड डे मील के लिए स्वयं बच्चों और अध्यापकों को साग-सब्जी उगाने के आदेश को देखा जाना चाहिए। और इसके पीछे के काले सच के उस जखीरे को भी जिसपर नज़र दौड़ने की ज़हमत नहीं उठाई जाती। 

इतिहास उठाकर हम यह देख सकते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन में जाति और वर्ण व्यवस्था को यथास्थिति में बनाए रखनेवाले नेताओं ने भी मैकाले की शिक्षा प्रणाली से कोई वैर न किया क्योंकि एक देश की राजनीतिक ताकत को हस्तगत कर लेने के बावजूद शिक्षा जैसे बुनियादी घटक की नई नींव रखना उनके बूते की बात नहीं थी। दूसरे यह कि हाशियाई समाजों की लड़ाई लड़नेवाले जानते थे कि मैकाले की ही शिक्षा प्रणाली एकमात्र आधुनिक शिक्षा का गेटवे है। इसलिए तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद उसके ढांचे को छेड़े बगैर उसमें जरूरी विशेषताओं का समावेश किया गया। लेकिन अनुभवों, आत्मकथाओं और अनेक साहित्यिक कहानियों के हवाले से हम जानते हैं कि तमाम समावेशी प्रेरणाओं के बावजूद यह सब व्यापक समाजों के लिए कितना दुर्लभ और कष्टकारी रहा है। दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों और पसमांदा अल्पसंख्यकों को शिक्षा प्राप्त करने की कोशिश में कितने अपमान झेलने पड़े इसका कोई हिसाब नहीं। एक बार देहात में कहीं जाते हुये मेरे एक मित्र ने एक जगह सड़क के समानान्तर चलते नाले में हरे-भरे बेहया की झाड़ियां देखी तो उन्होंने कार रोक ली और उतर पड़े। बहुत देर तक भावुक होकर उसे निहारते रहे और बताया कि कैसे उनके सवर्ण गुरुजी उनको और उनके जैसे बच्चों को बेहया के मोटे डंडे से चमड़ी उधेड़ देने की हद तक पीटा करते थे। वे चाहते थे कि पिटाई से डरकर वे लोग स्कूल आना छोड़ दें। अध्यापक दलित-पिछड़े बच्चों से अक्सर यह कहते थे कि स्कूल आ रहे हो तो भैंस कौन चराएगा। खेत में काम कौन करेगा? श्योराज सिंह बेचैन, तुलसीराम, ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे लेखकों की आत्मकथाओं के उन हृदयविदारक दृश्यों को कौन भूल सकता है जहां उत्पीड़न और बहिष्करण की हर कोशिश की पृष्ठभूमि में महज जाति है। पत्रकार उर्मिलेश की उस तकलीफ और निर्योग्यता के पीछे महज जाति है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्याओं की जिम्मेदार जाति ही है। हिन्दी कथाकार मार्कन्डेय की कभी न भुलाई जा सकने वाली कहानी ‘हलयोग’ के मास्टर के उत्पीड़न और हलयोग की पृष्ठभूमि केवल जाति है। जाति और शिक्षा के अंतर्संबंधों और अंतर्विरोधों की एक ऐतिहासिक यात्रा है जिसका असर आज के हर विचार और आदेश पर लाजिम है। 

एक लंबी और ऐतिहासिक यात्रा से गुजरती हुई जो शिक्षा व्यापक भारतीय समाज के लिए बेहतर भविष्य की सीढ़ी बन रही थी उसमें आज़ादी के बाद कई ग्रहण लगे। उसमें ब्राह्मणवाद, वर्णवाद, जातिवाद, सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के अनेक पिस्सू लगते रहे हैं और इन परजीवियों ने इसका जमकर खून चूसा है। उसी खून के बल पर उन्होने अपने को और अधिक खूंख्वार बनाया है। और एक दिन वे इतने ताकतवर, हिंस्र और षड्यंत्रकारी बन बैठे कि उन्होंने इसका पूरी तरह अपहरण करने की योजना बना डाली। इस क्रम में उन्होंने एक ऐसा तंत्र विकसित कर लिया जो इस व्यवस्था को अधिक लचर, अधिक लाचार, अधिक गरीबविरोधी और अधिकाधिक अप्रासंगिक बनाने के लिए दिन रात काम करता रहा है। उसने पूरी तरह से इसको बदनाम करने का अभियान छेड़ा और उसमें काफी हद तक सफल रहा है। यही वह वर्ग है जिसने मिड डे मील जैसी मामूली पोषण-योजना का न केवल मज़ाक उड़ाया बल्कि कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों को कलंकित भी किया। उनके प्रति हिकारत की भावना दर्शायी और अवसर मिलने पर मिड डे मील के राशन पर हाथ भी साफ किया। यही वह वर्ग है जिसने शिक्षा से अधिक मिड डे मील को तूल दिया और कमजोर वर्गों के इस मौलिक अधिकार को क्षति पहुंचाई। इस वर्ग ने एक विशाल भारतीय समुदाय को शिक्षित बनाने के राज्य के जरूरी दायित्व को कमजोर बनाया। इस वर्ग ने शिक्षा को एक बिकाऊ माल की तरह देखा और वास्तव में इसके लिए यह बात पचा पाना असंभव थी कि राज्य अपने नागरिकों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुफ्त दे। 

इसके बरक्स इस वर्ग ने निजी स्कूलों की लगातार वकालत की और मेधा के अपने मानक सेट किए। निजी स्कूल चलाने वाले अनेक घराने अस्तित्व में आए और उन्होंने बाकायदा माफिया शैली में शिक्षा का व्यापार शुरू किया। जनसेवा के नाम पर ट्रस्ट बनाकर अच्छे-अच्छे लोकेशन पर बड़े-बड़े भूखंडों को सेंत के भाव हासिल करने वाले और अनेक प्रकार के दिखावे के आधार पर मध्यवर्ग को दूह लेने वाले निजी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली और रट्टामार पढ़ाई पर न कभी सवाल उठाए जाते हैं और न ही उनकी आलोचना की जाती है। अजब विडम्बना है कि प्रशिक्षित शिक्षकों की उपस्थिति के बावजूद सार्वजनिक स्कूलों की पढ़ाई पर लगातार कटाक्ष किए जाते हैं लेकिन निजी स्कूल इससे बाहर रहते हैं। क्या इसका मतलब है अभिभावक निजी स्कूलों से संतुष्ट हैं? या फिर वे किसी बाजारू सम्मोहन के वशीभूत हैं। अक्सर देखने में आता है कि मध्यवर्गीय अभिभावक निजी स्कूलों की महंगी फीस के अलावा ट्यूशन-कोचिंग की भी लंबी-चौड़ी फीस भरते हैं लेकिन निजी स्कूलों की पढ़ाई को लेकर कोई सवाल नहीं उठाते। वे अपने गदाई और फिसड्डी बच्चे की पढ़ाई का रोना भी रोते हैं लेकिन पढ़ाई की पद्धति को लेकर उनके मन में कोई संभवतः ऐसा इसलिए है कि वे महंगी शिक्षा के सिंड्रोम से बहुत गंभीत रूप से प्रभावित हैं। 

यह बहुत साफ देखा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा इस देश में रचनात्मक विकास नहीं बल्कि वर्गभेद पैदा करने का माध्यम है। यह वर्गभेद पहली ही कक्षा से शुरू होता है और आगे बढ़ते-बढ़ते एक भयावह खाई में तब्दील हो जाता है। एक तरफ टाटविहीन स्कूल जहां बच्चे अपने घर से बोरा लेकर जाते हैं तो दूसरी ओर नफ़ासत से चमकती दीवारों के भीतर कुर्सी-मेज और पंखे तथा एसी से निर्मित सुखकारी वातावरण में रंग-बिरंगे बस्तों को लादकर पहुंचते बच्चे जिन्हें इस बात का गर्व होता है कि वे इस देश के खास विद्यार्थी हैं। धीरे-धीरे वे समझने लगते हैं कि वे ही, सिर्फ वे ही सबसे योग्य विद्यार्थी हैं। यह समझ एक समय इतनी रूढ़ हो जाती है कि गरीब और गंदे सरकारी स्कूलों से निकले ‘कोटेवाले घोंचुओं’ से वे केवल नफरत ही कर सकते हैं। दूसरी तरफ घर से बिछाने के लिए बोरा लेकर जानेवाले विद्यार्थी लगातार और हर स्तर पर चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसी चुनौतियां अधिकांश के लिए बहुत खतरनाक हो जाती हैं। उनका मनोबल तोड़ने से शुरू हुई कहानी एक दिन ड्रॉप आउट पर जाकर खत्म हो जाती है। फिर भी प्रतिभा के मामले में लाखों विद्यार्थी बड़े-बड़े निजी स्कूलों के बच्चों के सामने चुनौती बने हुय हैं। थोड़ी गहराई से देखिये तो समाज में हर कहीं मौजूद वर्ग-संघर्ष के ये हिरावल दस्ते हैं। वे एक बेहतर भविष्य के निर्माता बनें उससे पहले ही मुनाफाखोर पिस्सुओं ने उन्हें नेस्तनाबूद करने की ठान ली है। इसका अंतिम लक्ष्य पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था को मुनाफाखोर कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में देना है। क्या आप समझते हैं कि शिक्षा का निजीकरण इसकी गुणवत्ता को बहुत ऊपर उठा देगी?

यह समझा जाता है कि शिक्षा शेरनी का दूध है और जो पिएगा वह दहाड़ेगा लेकिन नए हालात में क्या हो रहा है? वास्तविकता तो यह है कि इस शेरनी को ही पूंजीपतियों ने पालतू बना लिया है और इसके दूध को मनमाने दाम पर बेच रहे हैं। वे नहीं चाहते कि यह दूध किसी को मुफ्त मिले। उनका मुख्य उद्देश्य उस आखिरी उपभोक्ता तक पहुंचना है जो उनके इस माल को खरीद सके और जो लोग दाम देकर इसे खरीद नहीं सकते उनकी कोई परवाह उसे नहीं है। उद्देश्य तो उनका यह है कि जो उनका उपभोक्ता नहीं है उसका जितनी जल्दी से जल्दी हो सके बहिष्कार करना चाहिए। ऐसे लाचारों की संततियां अगर पढ़-लिख नहीं पाएंगी तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा। पूंजीवाद के लंबे जीवन के लिए जरूरी है कि उसे अत्यंत सस्ती उत्पादक-शक्तियां और उसके उत्पादों को खरीद सकने वालों की लंबी कतार मिले। और वह दोनों इसी समाज से मिलते हैं। बिना कौड़ी खर्च किए श्रम-शक्ति और मनमाना खर्च करने वाले उपभोक्ता दोनों। और हम देख सकते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था बड़ी तेजी से इन दोनों को पैदा करने में सफल होती जा रही है। अपने इस अभियान में उसकी निगाह उस विशाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को हड़प लेने पर लगी हुई है जो जनता का है लेकिन राज्य की नाकामी और बदनामी से सहज ही उसके हाथ में आ जाने वाली है। पढ़ाई की गुणवत्ता पर मिड डे मील के लिए सब्जी उगाने को तरजीह देने की मानसिकता वाले लोगों के राज्य पर काबिज रहते उनकी इस मंशा के फलीभूत होने से कौन रोक सकता है? बक़ौल गालिब ‘यह फ़ितना आदमी की खाना वीरानी को क्या कम है, हुये तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमां क्यों हो!

(संपादन : नवल)


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मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

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