आदिवासी हम सभी से अधिक चिंतनशील और प्रकृति के करीब हैं : रणेंद्र

श्रीलाल शुक्ल सम्मान-2020 से सम्मानित साहित्यकार और झारखंड के वरिष्ठ नौकरशाह रणेंद्र के मुताबिक, बॉक्साइट माइंस अगर असुरों के लिए खतरा बनी हुई हैं तो रियल एस्टेट का धंधा मुंडा आदिवासियों को तबाह कर रहा है। आदिवासी जमीनों के लिए आदिवासियों को गायब किया जा रहा है। उनकी जमीन पर कंक्रीट के जंगल खड़े किये जा रहे हैं

साक्षात्कार 

[अविभाजित बिहार में जन्मे और अब झारखंड में रच-बस चुके रणेंद्र किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन्हें इस साल के श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ्को साहित्य सम्मान के लिए चुना गया है। आगामी 31 जनवरी को उन्हें यह सम्मान दिया जाने वाला है। वे झारखंड के ऐसे पहले साहित्यकार हैं, जिन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया। साहित्य से इतर उनका एक परिचय यह भी है कि वे झारखंड कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। वे इन दिनों रांची में स्थित डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के प्रमुख का दायित्व निभा रहे हैं। इससे पहले राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के बतौर वे बिहार और झारखंड के कई छोटे-छोटे कस्बों में काम कर चुके हैं। इस दौरान भोगे यथार्थ का अक्स उनके साहित्य में नजर आता है। वे मूलतः उपन्यासकार हैं। यही वजह है कि वे अपनी कहानियां भी उपन्यासों की तरह लिखते हैं। उनका पहला उपन्यास ग्लोबल गांवों का देवता झारखंड में विलुप्तप्राय असुर आदिवासियों पर केंद्रित था। दूसरा उपन्यास ‘गायब होता देस’ के बहाने उन्होंने मुंडाओं की पीड़ा और आदिवासी इलाकों में कारपोरेट की दखल की कहानी कही। उनके दो कहानी संग्रह ‘छप्पन छूरी बहत्तर पेंच’ और ‘रात बाकी’ भी चर्चा में रहे। रणेंद्र जी से वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रकाश ने  विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है संपादित अंश :]

सबसे पहले तो बधाई। आपको यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। 

जोहार और आभार। श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ्को सम्मान मिलना एक सुखद परिघटना है। एक वजह तो यही कि श्रीलाल शुक्ल हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद, फिर रेणु की पंरपरा के साहित्यकार रहे हैं। उनकी रचना ‘राग दरबारी’ एक कालजयी है। मैं मानता हूं कि इस तरह के सम्मान से लेखकों व साहित्यकारों का हौसला बढ़ता है और एक तरह से साहित्य की यह परंपरा आगे बढ़ती है। दूसरा सुखद संयोग यह कि श्रीलाल शुक्ल भी पीसीएस थे। पीसीएस से आईएएस हुए थे। तो यह भी एक संयोग मेरे साथ मिल रहा है। इसकी चयन समिति के जो वरिष्ठतम समालोचक साहित्यकार थे, चाहे वो आदरणीय नित्यानंद तिवारी जी हों, मुरली मनोहर सिंह जी हों, आदरणीय चंद्रकांता जी हों, विष्णु नागर जी हों, दिनेश कुमार शुक्ल हों, डा रविभूषण जी हों, सबके प्रति मैं आभार व्यक्त करना चाहता हूं। इस पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारों की सूची मैं देख रहा था। 2011 से इस पुरस्कार की शुरुआत हुई है, तो मैंने देखा कि यह सम्मान अधिकतर उन लोगों को मिला जो 75 साल से अधिक उम्र के रहे। चाहे वे संजीव जी हों, विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी हों। मुझे आश्चर्य हुआ कि मैं कैसे नजर में आया। क्योंकि मेरी उम्र तो अभी 75 नहीं हुई है। लेकिन, सब लोगों ने सर्वसम्मति से मुझे अपना आशीर्वाद दिया। मैं उनके प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं।

जब भी साहित्य की चर्चा होती है या मीडिया की बात हम करते हैं, तो यह जो आदिवासी समाज है या तो कैलेंडर के तौर पर आता है। किसी खास दिवस पर हम उसकी चर्चा कर लेते हैं या फिर सेमिनारों में उनकी चर्चा करने के बाद उन्हें भूल जाते हैं। आपका पहला ही उपन्यास ‘ग्लोबल गांव का देवता’ जो है, उसमें आपने असुरों की कहानी बतायी। वे असुर, जिनकी चर्चा नेतरहाट से निकलकर रांची तक भी नहीं पहुंच पाती है। क्या वजह है जो आपने ‘ग्लोबल गांवों का देवता’ के लिए आदिवासियों को चुना, उनमें भी असुरों को, जिनकी चर्चा अब कोई नहीं करना चाहता।

बहुत ही सुंदर बात आपने कही है। दरअसल, जो मैंने कहा कि मैं भी राज्य प्रशासनिक सेवा संवर्ग का अधिकारी था। मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा पदस्थापना उन्हीं इलाकों में हुआ। मैं 1995 से 98 तक गुमला के बिशुनपुर प्रखंड में था। मेरी पहली पोस्टिंग 1989 में रोहतास (बिहार) के चेनारी में थी। चेनारी भी कैमूर की पहाड़ियों और जंगलों के बीच की जगह है। वहां दुर्गावती जलाशय परियोजना के डूब क्षेत्र में चेरो आदिवासियों का गांव आ रहा था। तो उसको ध्यान में रखकर 2005 में मैंने कथादेश में एक कहानी लिखी थी – ‘रात बाकी’। तो यह पहली कहानी थी। उस साल उस कहानी को सर्वश्रेष्ठ कहानी के तौर पर प्रतिष्ठा मिली। जो चीजें मैंने वहां अंचल अधिकारी के तौर पर देखी-समझी, प्रशासनिक व्यवस्था के अंदर की चीजों को देखा और उनके संघर्ष को देखा। डाक्टर विनयन वहां डूबे क्षेत्र के विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहे थे। तो, यह सौभाग्य हमारी नौकरी ने दिया कि आप ग्रासरुट पर जाकर चीजों को देख पाते हैं। और केवल देखते नहीं हैं बल्कि उनकी लड़ाईयों में, उनके दुख में, उनके सुख में शामिल भी होते हैं। मैं जाता था वहां पाट क्षेत्र में। नेतरहाट के इलाके में, जहां उनकी बसाहट है। जिसकी आपने चर्चा की है। उस समय 9000 की जनसंख्या उनकी बची थी। वे (असुर) लोहा गलाने के आविष्कारक के तौर पर प्रतिष्ठित हैं। सर्दियों के मौसम में जब मैं वहां ठहरता था, तो नीचे पुआल बिचाकर उस पर सोता था। ऊपर से कंबल ओढना और उसके ऊपर फिर से पुआल डाल लेना। तो यह वहां का जीवन है। लेकिन ऐसा नहीं था जो हम शहर में बैठकर सोचते या किताबों में पढ़ते हैं। शास्त्रीय एंथ्रोपोलाजी की किताबों में या पौराणिक कथाओं में कि वे 12 फीट के होंगे। या लंबे-लंबे दांत वाले होंगे। जिसकी मैंने चर्चा की है। जब मैं गया तो जिन लोगों से मेरी दोस्ती हुई। एक रुमझुम असुर हमारे यहां आते हैं, संस्कृत में आनर्स हैं। जोभीपाट में मेरे एक मित्र थे। वे आवासीय हाईस्कूल के प्रिंसिपल थे। वे असुर थे। उन्होंने बीएड किया था और कल्याण विभाग के आवासीय विद्यालय में काम कर रहे थे। इंटर पास लोगों की काफी संख्या थी। आवासीय विद्यालय वहां 30-40 साल पहले से थे। जैसे ही आप किसी भी चीज की अवधारणा केवल सुनकर बनाते हैं, नजदीक जाकर वे चीजें आपको बदली हुई मिलती हैं। ठीक है लड़ाईयां थीं। लड़ाईयां सबके जीवन में हैं। किसी कम्युनिटी की लड़ाई क्यों हैं, हम इससे परिचित हैं। दुर्भाग्य है कि जहां उन्हें ठेलकर पहुंचाया गया है बाक्साइट माइंस से। यह 30-40 साल से चल रहा है। लीगल भी और इलीगल भी। उनके पैरों के नीचे से जमीन छीनी जा रही है। सारी बात मेरे उपन्यास में आई है। जो कुछ भी हम एक स्थानीय सरकारी मुलाजिम होने के कारण कर सकते थे, उसे करने की कोशिश की। जो नहीं कर सका, जो मन में कचोटता रहा वो जाकर 2007-08 में ‘ग्लोबल गांव के देवता’ में आया था। ऐसा किसी मानवशास्त्र के शोधकर्ता के तौर पर नहीं किया। मेरा पदस्थापन था और मेरी ईमानदारी यह कहती है थी कि जो काम आपको दिया गया है, उसको शत-प्रतिशत कीजिए। तो वो करने के लिए मैंने अपनी कार्यशैली बनानी थी कि गांव में ही चलिए। वही संचिकाएं ले जाइए ताकि लोगों को दौड़ना नहीं पड़े। मेरी लालच रहती थी कि वहां रात में रहेंगे तो कुछ कहानियां सुनने को मिलेंगी। जो नहीं सुन पाते हैं शहरों में। पटना या रांची में। चीजें अवचेतन में बैठती गईं। मैंने कोई नोट्स नहीं लिए। मैं वहां शोधार्थी के तौर पर गया ही नहीं था। काम करने गया था और 15-15 दिन लगातार गांवों में रहता था। लेकिन, जो आत्मीयता विकसित हुई। जब दिल से दिल का मिलन हुआ, उसने इस किताब को बनाया। यह किताब कोई एंथ्रोपोलोजी की किताब पढ़कर नहीं लिखी जा सकती थी। उनके संघर्ष में जब तक आप शामिल नहीं होंगे, उन्हें सहयोग नहीं करेंगे। आप ऐसी रचना नहीं लिख सकते। मैं उनके लिए जो नहीं कर सका, जो मन में कचोटता रहा, वह इस रचना के तौर पर सामने आया। मेरा सौभाग्य है कि वे चीजें क्लिक कर गईं और हिन्दी साहित्य में आदिवासी विमर्श को देखने का एक नया नजरिया लोगों को मिला। दरअसल हिन्दी के जो प्राध्यापक या साहित्यकार उनकी चीजों को बाहर से बैठकर लिख रहे थे, उससे मेरा उपन्यास अलग था। वह वहीं रहकर लिखा गया था। उनके नजरिये से लिखा गया था। उस समुदाय की आवाज बनकर कहानी कही गई थी। उनके भीतक की कहानी थी। उस कहानी ने लोगों को आदिवासी समाज के बारे में अंदर से जानने का मौका दिया। वह आदिवासी विमर्श में एक हस्तक्षेप था। शायद इसलिए लोगों को पसंद आया।

रणेंद्र, श्रीलाल शुक्ल सम्मान से सम्मानित साहित्यकार

अपने दूसरे उपन्यास ‘गायब होता देस’ में आपने मुंडा आदिवासियों की कहानी कही। जब आपने मुंडाओं को अपनी कहानी के लिए चुना, तो मन में क्या था? क्योंकि एक तरफ आपने असुरों की कहानी तही थी, जो विलुप्रप्राय हैं। फिर आपने मुंडाओं को चुना, जो राजा थे। जिनका समृद्ध इतिहास है। तो इतना कंट्रास्ट क्यों? मुंडाओं में क्या खास दिखा, जो वे आपके दूसरे उपन्यास का कथाविंदु बन गए?

रवि जी, आप लेखन की प्रक्रिया से सुपरिचित हैं। जो आप देखते हैं वही तो रचनाओं में होता है। एक अलग धारा के रुप मे चिन्हित होता है। मैं 1998 के बाद रांची आ गया। उसके बाद से मै रांची में हूं। उससे पहले मैं अनगड़ा में था 1991-92 में। वर्ष 1994 में के. बी. सक्सेना की एक जांच हुई थी आदिवासी जमीनों के संदर्भ में। उस रिपोर्ट में उन्होंने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धज्जियां उड़ाते हुए जिस ढंग से आदिवासी जमीनो की लूट हुई है, का वर्णन किया था। बड़ी गहरी टिप्पणी उन्होंने की थी। बहुत सारे उपायुक्तों को उन्होंने सूचीबद्ध किया था। लेकिन चीजें कुछ बदली नहीं। 1999 में मैं आया और 2000 में झारखंड नया राज्य बन गया। उसके बाद पता लग रहा था कि जहां कल तक बस्ती थी, रातोंरात उन लोगों को कहीं और पहुंचा दिया गया। वहां किसी रियल एस्टेट की कंपनी का साइनबोर्ड टांगकर उनकी जमीन को कंटीले तारों से घेर दिय गया। ‘गायब होता देस’ में मैंने उसी कहानी को कहने की कोशिश की। वर्ष 2008 में हर सेक्टर में मंदी आई, लेकिन रियल एस्सेट में मंदी नहीं आई। तो यह जो खेल है, जो जमीनों की लूट है, वह बड़ी निर्लज्जतापूर्वक तरीके से यहां की जा रही है। आप भी इस चीज को महसूस कर रहे हैं। एक खास रोड में एक पान वाले ने 35 शादियां की। उन घरों में जहां कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था। इस कारण जो जमीनें उसके हाथ में आईं उसकी प्लाटिंग करके उसने बेचा। यह अतिरेक का एक उदाहरण हो सकता है, लेकिन इस ढंग की चीजें थीं और हैं भी। आदिवासी जमीन की लूट के जितने भी तरीके अपनाए जा सकते थे, वे अपनाए गए या आज भी अपनाए जा रहे हैं। उसमें सिस्टम के सारे माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है। इस संगठित अपराध में। ‘गायब होता देस’ में ये सारी बातें आई हैं। बॉक्साइट माइंस अगर असुरों के लिए खतरा बनी हुई हैं तो रियल एस्टेट का धंधा मुंडा आदिवासियों को तबाह कर रहा है। आदिवासी जमीनों के लिए आदिवासियों को गायब किया जा रहा है। उनकी जमीन पर कंक्रीट का जंगल खड़ा किया जा रहा है। उनकी बिक्री में कोई कमी नहीं आ रही है। कितने भी फ्लैट बन जाएं, उनकी बिक्री में कोई कमी नहीं आ रही है। लोगों के लालच में कोई कमी नहीं आ रही है। कोई एक फ्लैट से संतुष्ट नहीं है। उसे कई फ्लैट्स चाहिए। वे निवेश कर रहे हैं उसमें। हर अपार्टमेंट में आपको कुछ वैसे फ्लैट मिल जाएंगे, जिनमें ताले लगे हैं। उसके मालिक ने निवेश किया है। उसे रहने के लिए घर नहीं लेना था। निवेश के लिए लेना था। ब्लैक मनी के लिए फ्लैट खरीदे जा रहे हैं। उसके लिए जो लूट हो रही है, वह ‘गायब होता देस’ में आई है।

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चाहे ‘ग्लोबल गांवों का देवता’ हो या फिर ‘गायब होता देस’, दोनों उपन्यासों में आपने आदिवासी समाज की बात की। जब कहानियों की रचना आप करते हैं, तो आपके मन में क्या ख्याल उठता है? आप लिखते वक्त अपने पात्रों को कहां से उठाते हैं? 

दरअसल मेरी लंबी कहानियों को भी लोगों ने कहा कि ये उपन्यासों की तरह हैं। लाइफ का एक स्लाइस होती हैं कहानियां। मेरी कहानियां लंबी हैं। केवल क्षण का कौंध नहीं है। उसमें जीवन का बड़ा हिस्सा है। काम के दौरान मैं काफी बातों को जान पाया, कहानियों में वही लिखा है। जैसे एक आदिवासी युवती मजदूर थी। उसके पति की हत्या नक्सलियों ने कर दी है। अनुकंपा में उसे नौकरी मिलनी है। कुछ राशि मिलनी है। अब पति जो हैं, वे झा जी (गैर आदिवासी) थे। उनके परिजन उस नौकरी और पैसे के लिए जितना तिकड़म कर सकते हैं, कर रहे हैं क्योंकि वे ज्यादा सशक्त लोग थे। उसमें फंसी हुई है। वह महिला रोज आकर समाहरणालय के बरामदे में बैठी रहती थी। यह ठीक है कि उसका समाधान हो गया। वो अलग है कि तब वहां की उपायुक्त महोदया सहृदय थीं लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा हो नहीं पाता है। इतनी ज्यादा वो राजकीय चिन्ह वाली चिट्ठियां आने लगती हैं कि सारा समीकरण गड़बड़ा जाता है। तो उस कहानी को मैंने ‘वो मजदूर थी’ में लिखा। फिर आपके यहां जो चीजे होती रहती हैं नक्सलियों के नाम पर। एक बार में पूरी बारात उड़ा दी गई और एफआईआर में सात साल के बच्चे को भी नक्सली करार दे दिया गया। खादगढ़ा में एक कोचिंग स्कूल से एक रजिस्टर उठाइए, जो दारोगा की कोचिंग कर रहे थे। सबको सरेंडर दिखा कर झूठमूठ के कृत्रिम जेल में रखिए। उनकी जमीनें बिचवा कर पैसे भी ले लीजिए। ‘सरेंडर जतरा’ में मैंने यह कहानी बतायी। जो चीजें आपके यहां घटती रहती हैं, वही कहानियों में आती हैं। जैसे मनरेगा का बकाया है और उनके खाते में उनके नाम के ही किसी शिक्षक का पैसा आया। जब निकालने गए तो पैसा वापस हो चुका था। उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ हो गया। बाद में लोगों के चढ़ाने पर उसने आत्मदाह कर लिया। अब मजदूरी के बदले में आत्मदाह कर रहा हो संताल किसान, जो शासक रहा हो उस इलाके में। क्या त्रासदी है। किस ढ़ंग से हम लोगों ने विकास के मानदंड तय किए हैं। जो शासक था वो मजदूरी के लिए बिलख रहा है। आत्मदाह कर रहा है। ‘बाबा’, ‘कौवे’ और ‘काली राग’ में आत्मदाह की उस पीड़ा का बयान है। वह राग वहां से उठते हुए हमारे दिलोदिमाग में छा जाती है। जो आपके आसपास रोज घटित हो रहा है, वही कहानियों में आता है। हमने विकास का जो मानदंड तय किया है वह यूरोपीय मानदंड या अमेरिकी मानदंड है। मानदंड ही हम लोगों ने उल्टा-पुल्टा तय कर लिया है जो कि सारी प्रकृति के विनाश की ओर ले जा रहा है। क्योंकि हम आत्मुग्ध लोग हैं। हमे समझ में नहीं आ रहा है कि एयरकंडीशन, रेफ्रिजरेटर, मोटरसाइकिल, कारें हमें आज ही के दिन क्यों चाहिए। दरअसल वैज्ञानिक विकास और तकनीक में हम फर्क करना भूल गए हैं। हम उपभोक्तावादी संस्कृति में अनिवार्यता को भूल गए हैं। केवल सुविधाएं कुछ प्रतिशत लोगों के लिए ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध हो सकें, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा जंगल काटें। सारी माइनिंग आज ही कर लें। भले ही कोविड-19 आए। उसके बाद भी कोई रोग आए। उससे पहले भी रोग हुए थे। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि जंगलों के कटने का संबंध बीमारियों से है। या फिर 66 प्रतिशत आक्सीजन समुद्र के नीचे की वनस्पतियों से आती है, उन वनस्पतियों को भी हम नष्ट कर रहे हैं। लगातार उसमें कचरा फेंक रहे हैं। कहीं भी हम कल के लिए चिंतित नहीं हैं। और जो आदिवासी संस्कृति है या पूरी पूर्वी सभ्यताएं न्यूनतम में संतुष्ट होने वाली थीं। न्यूनतम उपभोग और अधिकतम संतुष्टि। सारी पूर्वी सभ्यताओं की यह खासियत थी। लेकिन, आधुनिकता के नाम पर पश्चिमीकरण की कोलोनियल लिगेसी को अपने दिमाग से हम नहीं उतार सके। लेकिन, पूर्वी सभ्यताओं का वह संतुलन आज भी आदिवासी समाज के पास बचा है। वे न्यूनतम में संतुष्ट रहते हैं। वे प्रकृति के साथ हैं। उनके दर्शन में एक समानता है। जबकि गैर आदिवासी दर्शन मे वह समानता नहीं है। आपमें श्रेष्ठताबोध है। जबकि आदिवासी दर्शन में मानव प्रकृति की दूसरी चीजों की तरह एक इकाई है। एक किताब मुझे मिली जिसमें मैंने पढ़ा कि पेड़ों की भी एक जीवनशैली है। उनके यहां भी कम्यूनिकेशन का एक सिस्टम है। नए वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि वुड्सवाइड वेव भी है। यानी जंगल मे जड़ों में फंगस का एक वेव। वे सिर्फ सूचनाओं का ही प्रेषण नहीं करते हैं बल्कि एक-दूसरे की मदद का उपाय भी करते हैं। अगर किसी पेड़ में पोषक तत्व की कमी हो रही हो तो उस केबल से वे पोषक तत्व भी पहुंचाते हैं। यह अदभुत है। आज हम इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन, हम केवल सूचनाओं का प्रेषण कर रहे हैं। हम उससे दवा या पोषक तत्व नहीं भेज रहे हैं लेकिन पेड़ ऐसा कर रहे हैं। हम स्वयं कह रहे हैं कि मानव सबसे चिंतनशील प्राणी है। तो वृक्ष क्यों नही चिंतनशील हैं। आदिवासी दर्शन में तो हम मान रहे हैं कि मानव श्रेष्ठतम नहीं है बल्कि एक इकाई है। उसी तरह पशुओं के कम्यूनिकेशन पर किताबें आ रही हैं। यानी चिंतन का ठेका कोई मानव ने नहीं ले रखा है। आदिवासी दर्शन यही कहता है। वे सिर्फ अपना नहीं सोचते, पूरी सृष्टि के कल्याण की बात करते हैं। उनके गीतों में यहीं बातें हैं। वे हमसे ज्यादा सभ्य हैं। हमने अपना इंडेक्स खराब कर रखा है, जो उन्हें पिछड़ा मानते हैं। वे दरअसल हमसे ज्यादा समझदार हैं। उनके दर्शन, उनकी आर्थिकी, उनके इतिहास को समझने की आवश्यकता है। तभी हम ‘वी द पीपल ऑफ़ इंडिया’ की अवधारणा को चरितार्थ कर पाएंगे। अपनी रचनाओं में मैंने इन्हीं बातों को समझने की कोशिश की है।

कविताएं भी आपने लिखी। एक कविता संग्रह आपका आया- ‘थोड़ा स्त्री होना चाहता हूं’। तो यह स्त्री विमर्श कहां से आया?

मेरे पिताजी हिन्दी के प्राध्यापक थे। साहित्यकार भी थे। गोष्ठियां उन दिनो घरों में हुआ करती थीं। उसमें लोग अपनी कविताएं ही सुनाया करते थे। मैं भी उन गोष्ठियों में पिताजी के बगल में रहता था हाफ पैंट पहन कर। बच्चा था। आठवीं-नवमी में जब मैं पहुंच गया तब पिताजी ने कहा या उनके मित्रों ने कि रणेंद्र (राजन घर का नाम है) भी कविताएं सुनाएंगे, तो मैंने तभी कविताएं लिखीं। पहले वे कबीर और रहीम की पैरोडी की शक्ल में थी। बाद में जब मैंने ‘रात बाकी’ कहानी लिखी तो मेरे मित्रों या परिवार के लोगों ने स्वीकार कर लिया कि मै कहानीकार हूं। उससे पहले मेरी जिंदगी मे कविताएं ही थीं। मेरा यह मानना है कि स्त्री को हम पुरुषार्थ के नजरिये से देखते हैं। थोडा सा वहां करुणा, ममता और प्रेम आ जाए, तो दुनिया और खूबसूरत हो जाएगी। इसलिए मैंने अपने कविता संग्रह का नाम ‘थोड़ा स्त्री होना चाहता हूं’ रखा। 

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(संपादन : नवल/अमरीश)


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