दलित नेतृत्व का संकट

राजस्थान के इस एक उदाहरण से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि दलित नेतृत्व का संकट वस्तुत: इस कारण नहीं है कि दलित नेता अयोग्य हैं या दलितों के प्रति उदासीन हैं, बल्कि सच यह है कि हिंदू नेता अपने पूर्वाग्रहों से उनकी उपेक्षा करते हैं और उन्हें अयोग्य दिखाने का षड्यंत्र रचते हैं। कंवल भारती की समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

प्रोफ़ेसर श्याम लाल चार दशकों से भी अधिक समय से दलित मुद्दों पर लगातार लिख रहे हैं। विभिन्न दलित जातियों पर उनकी अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल में उनकी नई पुस्तक दलित-नेतृत्व के संकट पर ‘क्राइसिस ऑफ दलित लीडरशिप’ आई है, जो संभवत: अंग्रेजी में भी इस विषय की पहली किताब है। हालांकि अंग्रेजी में आनंद तेलतुमड़े ने दलित राजनीति पर धारदार लेखन किया है।

 

लेकिन यह किताब अपने विषय में इसलिए भी अनूठी है कि इसमें लेखक ने ज्वलंत दलित मुद्दों पर दलित जनता के देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों पर विहंगम दृष्टिपात किया है। इस किताब के परिचय में प्रोफ़ेसर श्याम लाल लिखते हैं, ‘1956 में डॉ. आंबेडकर की मृत्यु के बाद भारत में कोई सर्वमान्य दलित नेता नहीं हुआ। हालांकि नब्बे के दशक में दलितों को कांशीराम का नेतृत्व और मार्गदर्शन मिला, और उन्होंने आंबेडकर के बाद दलित इतिहास में अपना स्थान भी बनाया, परन्तु उनके भी निधन के बाद एक प्रतिबद्ध नेतृत्व का अभाव फिर से पैदा हो गया। यह अभाव अभी तक बना हुआ है, और यह एक बड़ा संकट है।

इस पुस्तक में ‘परिचय’ सहित 13 अध्याय हैं। पहले अध्याय में, जो कि दूसरा अध्याय है, लेखक ने 1948 से वर्तमान तक राजस्थान राज्य के राजनीतिक इतिहास की चर्चा की है। इसमें राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया के नेतृत्व पर लेखक ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। लेखक के अनुसार राजस्थान में 17 फरवरी 1980 से 5 जून 1980 तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसी बीच मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस के नेता रामकिशोर व्यास चुनाव हार गए। इसके साथ ही उन्होंने राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का अवसर खो दिया था। कुछ दिनों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर उनके पुत्र संजय गाँधी की उपस्थिति में जगन्नाथ पहाड़िया को सदन का नेता चुना गया। तुरंत ही कांग्रेस के अपर कास्ट नेताओं का विरोध शुरू हो गया। पहाड़िया के मनोनयन पर विरोधियों ने राजस्थान की राजनीति में जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, और हरिदेव जोशी जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विरोध में खड़े हो गए।

समीक्षित पुस्तक ‘क्राइसिस ऑफ दलित लीडरशिप’ का कवर पृष्ठ

पहाड़िया दलित जाति से थे, और उनकी राजनीतिक भूमिका भी किसी तरह से अपर कास्ट हिंदुओं के हितों के विरुद्ध नहीं थी। वह गांधी परिवार के साथ-साथ उच्च हिंदुओं के प्रति भी निष्ठावान थे। लेखक के अनुसार जब 6 जून 1980 को पहाड़िया ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो उन्होंने राजस्थान की 17.04 प्रतिशत दलित आबादी को एक आवाज़ दी थी। किन्तु तुरंत ही कांग्रेस की ब्राह्मण लाबी ने पहाड़िया के मार्ग में समस्याएं खड़ी करनी शुरू कर दीं। न केवल उन्होंने पहाड़िया के मंत्रीमंडल में शामिल होने से इनकार कर दिया, बल्कि पहाड़िया को राजस्थान का सबसे कमजोर मुख्यमंत्री प्रचारित करने की योजना पर भी काम करना शुरू कर दिया था। इस लाॅबी के निर्देश पर स्थानीय नेताओं के कहने पर जयपुर नगर निगम के सफाई कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। पहाड़िया ने कर्मचारियों से बात करने के लिए उपमंत्री मांगीलाल आर्य को नियुक्त किया, किन्तु मेहतर नेताओं ने आर्य से बात ही नहीं की। दूसरी तरफ, ब्राह्मण लाबी यह अफवाह फ़ैलाने में सफल हो गई कि पहाड़िया सफाई कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त कराने में विफल रहे। पहाड़िया ने एक निजी मुलाकात में लेखक को बताया कि उच्च हिंदुओं का व्यवहार न सिर्फ उनकी सरकार, बल्कि दलितों के प्रति भी पूर्वाग्रह और पक्षपातपूर्ण था। उन्होंने कभी उनकी सरकार का सहयोग नहीं किया। लेखक के अनुसार कांग्रेसियों ने पहाड़िया की योग्यता के विरुद्ध अनेक ज्ञापन प्रधानमंत्री और कांग्रेस-अध्यक्ष इंदिरा गाँधी को उन्हें हटाने के लिए भेजे। परिणामत: इंदिरा गाँधी के निर्देश पर पहाड़िया ने इस्तीफ़ा दे दिया और उनके स्थान पर शिव चरण माथुर ने 14 जुलाई 1981 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

राजस्थान के इस एक उदाहरण से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि दलित नेतृत्व का संकट वस्तुत: इस कारण नहीं है कि दलित नेता अयोग्य हैं या दलितों के प्रति उदासीन हैं, बल्कि सच यह है कि हिंदू नेता अपने पूर्वाग्रहों से उनकी उपेक्षा करते हैं और उन्हें अयोग्य दिखाने का षड्यंत्र रचते हैं। वे नहीं चाहते कि दलित नेता दलितों के उत्थान के लिए कार्य करें, और उनकी समस्याओं को प्राथमिकता दें। राजनीतिक दल आरक्षण के कारण दलितों को टिकट तो देते हैं, पर उनके जीतने के बाद उन्हें कमजोर करके रखते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दलित नेतृत्व का संकट वास्तव में शासक जातियों का उत्पाद है।

आगे लेखक ने एक ही बहुत महत्वपूर्ण बात कही है कि लगभग सभी पार्टियों में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी, मुख्य रूप से दो गुट हैं, पहला ब्राह्मणों का, और दूसरा ओबीसी की उच्च जातियों का, जिनमें जाट, गुज्जर आदि जातियां आती हैं। राजनीति में ये दोनों गुट एक दूसरे के विरोधी हैं, पर दिलचस्प यह है कि दलित जातियों को सत्ता से बाहर रखने के मामले में दोनों एक हैं।

लेखक ने एक उदाहरण गैर-ब्राह्मण गुट की मानसिकता का भी दिया है। वर्ष 2003 में कांग्रेस आला कमान के निर्देश पर राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दलित नेता बनवारी लाल बैरवा को उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया। किन्तु राज्य के दलित वर्गों को उनके उपमुख्यमंत्री बनने का कोई लाभ नहीं मिला। इसका कारण यह था कि वह उपमुख्यमंत्री तो थे, पर उनके पास अधिकार कुछ भी नहीं था। प्रोफ़ेसर लाल लिखते हैं कि राजस्थान में कुछ न कुछ दलित नेता कांग्रेस के मंत्रिमंडल में हमेशा रहे हैं, पर वे गैर-दलित नेताओं की दलित-विरोधी मानसिकता के कारण दलित जातियों के लिए काम नहीं कर सके। लेखक ने गैर-ब्राह्मण गुट की मानसिकता का एक और उदाहरण दिया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 2019 में बसपा के छ: विधायकों को कांग्रेस में शामिल कराने के कुछ समय बाद अपने सभी मंत्रियों का इस्तीफ़ा मांग लिया। लेकिन गहलोत ने केवल दलित मंत्री भंवरलाल मेघवाल का इस्तीफा स्वीकार किया, शेष किसी मंत्री का इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया। गहलोत ने केवल दलित मंत्री को हटाने के लिए सभी से इस्तीफे मांगे थे। लेखक के अनुसार मेघवाल राजस्थान के शक्तिशाली दलित नेता हैं, जिसे मुख्यमंत्री कभी पसंद नहीं करते। इसका कारण यह है कि मेघवाल ने शिक्षा मंत्री के रूप में शिक्षा-व्यवस्था में व्यापक सुधार किए थे और बड़े पैमाने पर शिक्षकों के स्थानान्तरण किए थे। लेखक लिखता है कि मेघवाल के इस कार्य नाराज होकर हिंदू शिक्षकों ने मेघवाल को हटाने के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया। चूँकि इस आन्दोलन को ब्राह्मण गुट का भी समर्थन प्राप्त था, इसलिए गहलोत ने मेघवाल को मंत्रिमंडल से हटाने का निर्णय लिया। लेखक ने यह भी रहस्योद्घाटन किया है कि मेघवाल के बढ़ते कद से अशोक गहलोत को यह डर पैदा हो गया था कि वह उनके नेतृत्व के लिए खतरा बन सकते हैं। कहना न होगा कि ब्राह्मण गुट ही नहीं, बल्कि गैर-ब्राह्मण गुट भी उभरते हुए सशक्त दलित नेता को अपने लिए खतरा समझता है।

तीसरे अध्याय में लेखक ने कोरेगांव-भीमा, पुणे में महारों और पेशवाओं के बीच हुए संघर्ष की पृष्ठभूमि को रेखांकित किया है। किन्तु चौथे अध्याय में भारत में दलित-नेतृत्व पर विचार करते हुए इस प्रश्न पर विमर्श किया है कि दलित नेतृत्व विफल कैसे हुआ? यह सबसे महत्वपूर्ण और पठनीय अध्याय है। लेखक ने लिखा है कि वोट के अधिकार के कारण दलित हिंदुओं की राजनीतिक आवश्यकता जरूत हैं, परन्तु ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण गुट दलित जातियों को उनके अधिकारों का उपभोग नहीं करने देते। दलित नेताओं को खुश करने के लिए, बल्कि उनका मुंह बंद रखने के लिए उन्हें कुछ बोर्ड और आयोगों में अध्यक्ष बना दिया जाता है। पर ये बोर्ड और आयोग आधे-अधूरे होते हैं, कहीं आफिस नहीं होता, कहीं स्टाफ नहीं होता, तो कहीं बजट तक नहीं होता है। परिणाम यह होता है कि उनके पास योजनाएं होती हैं, पर उनको पूरा करने के लिए शक्तियां नहीं होतीं।

लेखक ने एक उदाहरण मांगीलाल आर्य का दिया है। वह 1994 में राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष थे, बाद में 2003 में राजस्थान राज्य के सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष बने। उन्होंने आयोग को वैधानिक शक्तियां दिए जाने के लिए अनेक बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ध्यान आकर्षित किया, आयोग के अन्य सदस्यों ने भी अनुरोध किया, परन्तु गहलोत सरकार ने सफाई कर्मचारी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की मांग पर कोई विचार नहीं किया। ऐसी स्थिति में वह वैधानिक शक्तियों से रहित अध्यक्ष के रूप में क्या कर सकते थे?

हिन्दुत्ववादी राजनीति के साथ दलित नेतृत्व के सहयोग पर लेखक की टिप्पणी काबिलेगौर है। वह प्रश्न करते हैं : क्या दलित नेतृत्व की आकांक्षा दलित समुदाय को मोदी से जोड़कर जाति के बन्धनों से भागने की है? या फिर हिंदुत्व के खिलाफ लड़ाई की आंबेडकरवादी विरासत से दलितों को संघ परिवार के जाल से बाहर रखेने की है? वह लिखते हैं कि अतीत में मायावती ने जिस तरह भाजपा से गठबंधन करके दलितों की सांस्कृतिक मुक्ति के आन्दोलन का बलिदान किया उससे उन्होंने नाराज युवा दलितों का विश्वास खो दिया? लेखक का मत है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दलितों को नौकरियों, कालेजों में दाखिलों और साम्प्रदायिक दंगों के दौरान भेदभाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन दलित नेता दलितों जिस तरह अलगाव और उत्पीडन की ओर धकेल रहे हैं, वह और भी गलत है। लेखक का यह प्रश्न वाजिब है कि आज अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत दलित नेता नहीं है, जो आने वाले चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों पर प्रभाव डाल सकता हो। अत: वह जोर देकर कहते हैं कि हमें दलित समस्या को उठाने वाला और दलित-हितों के विस्तार पर विमर्श करने वाला मजबूत नेता चाहिए। हालाँकि काफी कुछ हुआ है, पर अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

दलित समुदाय का नेतृत्व कहां विफल रहा? उन्होंने छठे अध्याय में इस पर विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने, 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी / एसटी अत्याचार अधिनियम को कमजोर किए जाने के मुद्दे के संदर्भ में देशव्यापी जनांदोलनों का उल्लेख किया है और 2 अप्रैल को दलित संगठनों द्वारा किए गए भारत बंद के दौरान पुलिस और सवर्ण गुंडों की हिंसा में 13 दलितों की मौत पर भाजपा और कांग्रेस के दलित राजनेताओं की उपेक्षा को रेखांकित किया है। उन्होंने भारत बंद को भारत की ‘पहली दलित क्रान्ति’ कहा, जो दलित संगठनों और बुद्धिजीवियों की सक्रियता से सफल हुई थी, जबकि मायावती और अन्य दलित नेता केवल बयानबाजी तक सीमित रहे थे। इस जनांदोलन ने भाजपा सरकार को दलित जनता के भाजपा के खिलाफ जाने का अफ़सोस करा दिया था, क्योंकि इसके कारण भाजपा को उपचुनावों में लोकसभा की दो और राज्यों में विधान सभा की 9 सीटें खो दी थीं। इसी का परिणाम हुआ कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी और सुप्रीम कोर्ट को अपना पिछला निर्णय वापिस लेना पड़ा।

लेखक ने राज्यों में दलितों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध में भी दलित नेताओं की भूमिका और सरकार की उपेक्षा पर विस्तार से चर्चा की है। संक्षेप में दलित नेतृत्व की विफलता का एक बड़ा कारण यह भी है कि सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में दलितों की विजय गैर-दलित वोटों पर निर्भर करती है। इन क्षेत्रों में दलित इतने अल्पसंख्यक हैं कि उनके बल पर कोई भी दलित प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सकता। उन्हें अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए गैर-दलितों के वोटों की दरकार होती है, जिनमें बड़ी संख्या सवर्णों की होती है। ऐसी स्थिति में किसी भी दलित विधायक या सांसद का दलितों के अधिकारों की बात करना और उत्पीडन की घटनाओं में दलितों के प्रति झुकाव रखना उसके राजनीतिक भविष्य के लिए घातक हो सकता है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने इसी खतरे से बचने के लिए दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की थी, जो हिंदुओं के दबाव के कारण पूरी नहीं हुई। पूना-पैक्ट ने ऐसे ही दलित नेता पैदा किए, जो उतना ही चल सकता है, जितना सरकार चला सकती है।

समीक्षित पुस्तक : क्राइसिस ऑफ दलित लीडरशिप

लेखक : प्रो. श्यामलाल

प्रकाशक : रावत पब्लिकेशंस

मूल्य : 1295 रुपए (सजिल्द)

(संपादन : नवल)


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