मेडिकल में ओबीसी आरक्षण पर डाका, क्यों खामोश हैं झंडाबरदार?

राज्याधीन मेडिकल कालेजों में ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी रिजर्वेशन लागू न होने से अब तक कम से कम 10 हजार सीटें सवर्ण अभ्यर्थियों के पाले में जा चुकी हैं। इन पर ओबीसी युवाओं का हक था। लेकिन सब जानते हुए भी हिंदी प्रदेशों के ओबीसी नेतागण किस तरह खामोश रहे हैं, बता रहे हैं दीपक के. मंडल

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘शंतरज के खिलाड़ी’ पर वर्ष 1977 में बनी सत्यजीत राय की फिल्म याद होगी आपको। फिल्म में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीर अपना कामकाज छोड़ कर शतरंज खेलने में व्यस्त रहते हैं और अंग्रेज राजधानी लखनऊ पर कब्जा कर लेते हैं। यह काहिली की इंतिहा थी। नवाब को गद्दी से उतारकर कलकत्ता भेज दिया जाता और इस तरह अवध की किस्मत का सितारा हमेशा के लिए डूब जाता है। वास्तव में यह 1856 का वक्त था।

नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियां लगातार इस देश के बहुजनों-पिछड़ों को हाशिये पर धकेलती जा रही है लेकिन देश की बहुसंख्यक पिछड़ी और दलित आबादी की नुमाइंदगी का दम भरने वाले ओबीसी क्षत्रपों और राजनीतिक नेताओं के बीच खामोशी का आलम है। ऐसे लगता है पिछड़ों का हक छिनने का उन्हें कोई मलाल नहीं है। अपना कारवां लुटता देख कर भी उनमें नाखुशी की कोई निशानी नहीं दिख रही है। बहुजनों के लंबे संघर्ष के बाद संविधान से मिला ओबीसी आरक्षण बड़े ही सुनियोजित तरीके से खत्म किया जा रहा है। लेकिन लेकिन हिंदी पट्टी के ओबीसी मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक नेताओं के बीच कोई हलचल नहीं है।

मद्रास हाई कोर्ट की मंजूरी के बावजूद आरक्षण पर लगा है ताला 

हाल में नीट परीक्षाओं का एक और दौर खत्म हो गया। स्नातक (यूजी) और परास्नातक (पीजी) कोर्स में एडमिशन शुरू हो गए। लेकिन राज्यों की ओर से केंद्र को दी जाने वाली मेडिकल की ऑल इंडिया सीटों (15 फीसदी)  पर ओबीसी आरक्षण का मामला लटका हुआ है। मद्रास हाई कोर्ट ने इन सीटों पर ओबीसी आरक्षण सुनिश्चित करने के पक्ष में फैसला देते हुए कमेटी बनाई थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी, लेकिन पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

11 मई, 2020 को ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ ओबीसी एम्पलॉयज वेलफेयर एसोसिएशन ने ऑल इंडिया कोटे की सीटों में ओबीसी आरक्षण न लागू होने पर राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग में शिकायत दर्ज करते हुए दावा किया था कि इससे ओबीसी उम्मीदवारों की दस हजार सीटें उनसे छिन गई हैं। ये सीटें सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों (सवर्णों) के पास चली गई हैं। इस तरह देश के संविधान के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हनन हुआ है। लेकिन ओबीसी समुदाय से आने वाले हिंदी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों और राजनीतिक नेताओं की आंख नहीं खुल रही है। वे इतने कंफर्ट जोन में चले गए हैं कि अपनी आंख के सामने  छिन रहे हक की हिफाजत के लिए भी संघर्ष करने को तैयार नहीं हैं।

दक्षिण के ओबीसी नेता सजग लेकिन हिंदी पट्टी के पिछड़े नेता बेसुध

मद्रास हाई कोर्ट ने नीट के तहत मेडिकल में प्रवेश के लिए ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी आरक्षण का फैसला डीएमके, एआईडीएमके, कम्यूनिस्ट पार्टी समेत दक्षिण भारत के 13 राजनीतिक दलों की याचिका पर दिया। याचिका में तमिलनाडु की ओर से सेंट्रल पूल के लिए दी गई ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण का मामला ही प्रमुखता से उठाया गया था। लेकिन हिंदी पट्टी के राज्यों के किसी मुख्यमंत्री ने यह आवाज नहीं उठाई। छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान में पिछड़े मुख्यमंत्री हैं लेकिन नीट में ऑल इंडिया कोटे के तहत भरी जाने वाली सीटों पर ओबीसी आरक्षण उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। सबके आंखों पर मानो पट्टी बंधी हुई है।

मेडिकल में ऑल इंडिया कोटे की सीटें सुप्रीम कोर्ट के 1984 के आदेश के बाद निर्धारित की गई हैं। इसके तहत हर राज्य को अपने यहां की 15 फीसदी यूजी मेडिकल-डेंटल सीटें और 50 फीसदी पीजी सीटें ‘सेंट्रल पूल’ को सरेंडर करनी पड़ती हैं। सेंट्रल पूल की यही सीटें ऑल इंडिया कोटे की सीटें हैं, जिनमें पूरे देश के किसी भी राज्य के अभ्यर्थी को दाखिला मिल सकता है। 

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वहीं वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि आरक्षण राज्यों के साथ ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर भी लागू होगा। इस आदेश के बाद ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर आरक्षण लागू हुआ। अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी और अनसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी। लेकिन 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण कोई जिक्र नहीं था। 

इस बीच साल दर साल ऑल इंडिया लेवल पर प्रवेश हेतु परीक्षाएं होती रहीं और ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी अभ्यर्थियों के हक मारे जाते रहे। वर्ष 2017 में पहली बार व्यवस्थित तौर पर नीट की परीक्षा हुई। इसमें ऑल इंडिया कोटे की जो सीटें हैं वे अखिल भारतीय स्तर पर कट-ऑफ के आधार पर भरी जा रही हैं। ओबीसी के लिए आरक्षण सिरे से नदारद है। 

ओबीसी आरक्षण का हाल 

सबसे अहम बात यह है कि संविधान में ओबीसी आरक्षण के प्रावधान के बावजूद ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर आज तक यह रिजर्वेशन लागू ही नहीं किया गया। मद्रास हाई कोर्ट में दायर 13 याचिकाओं में से एक में कहा गया है कि केंद्र सरकार अपने पूरे होशो-हवास में मेडिकल कॉलेजों के लिए निर्धारित ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी आरक्षण लागू नहीं कर रही है। ऐसा पहले से हो रहा था और खुद को पिछड़ी जाति का बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले सात साल के शासन में भी यही होता आ रहा है। केंद्र सरकार पर काबिज सवर्ण ताकतें इस मुद्दे को लगातार उलझा कर रखी हुई हैं और सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के ओबीसी नेता बेसुध हैं। 

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अक्टूबर की सुनवाई में नीट के जरिए भरी जाने वाली मेडिकल यूजी कोर्सों में ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर 50 फीसदी आरक्षण लागू करने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रोक दिया। तमिलनाडु सरकार इन सीटों पर 50 फीसदी आरक्षण इसी साल ( 2020) से देना चाहती थी। 

लेकिन नेशनल मेडिकल काउंसिल, भारत के स्वास्थ्य महानिदेशालय (डीजीएचएस) और खुद केंद्र सरकार में बैठे सवर्ण मंत्रियों की तिकड़मी चालों और टालमटोल की नीति ने ओबीसी आरक्षण को रोका हुआ है। डीजीएचएस का साफ कहना है कि आरक्षण नीतिगत मामला है. इसमें अंतिम फैसला संसद या सुप्रीम कोर्ट ही ले सकता है. और दिलचस्प यह है कि ओबीसी कोटे पर आरक्षण से जुड़ा डॉ. सलोनी कुमार बनाम डीजीएचएस का मामला 2015 से ही सुप्रीम कोर्ट में लटका हुआ है। वहीं नेशनल मेडिकल काउंसिल ने कहा है कि अब इस साल से ओबीसी कोटा लागू नहीं किया जा सकता. कुल मिलाकर स्थिति यह बन रही है कि ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर एक और साल एडमिशन बगैर ओबीसी आरक्षण के पूरे हो गए और पत्ता तक नहीं खड़का।

मद्रास हाई कोर्ट में इस मामले में बहस करते हुए डीएमके के वकील पी. विल्सन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सलोनी कुमार बनाम डीजीएचएस मामले के लंबित होना ओबीसी आरक्षण रोकने का आधार नहीं हो सकता। यह केस आरक्षण के खिलाफ नहीं बल्कि आरक्षण के लिए है। इतने अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतरिम फैसला नहीं दिया है। 

यह बेहद दिलचस्प है कि ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी आरक्षण के हक में मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला दिया। फैसले को लागू करने की लिए कमेटी बनाई गई। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को समर्पित कर दिया है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक केस की आड़ लेकर मेडिकल की ऑल इंडिया कोटे की सीटों पर ओबीसी आरक्षण एक बार फिर लटका दिया गया। 

अब जरा इसकी तुलना दस फीसदी सवर्ण आरक्षण से कीजिये। जिस तरह से आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर इसे लागू किया, वह संविधान का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन था। आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन है लेकिन इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ा दी गईं और पिछड़ी अस्मिता का झंडाबरदार होने का दावा करने वाले ओबीसी नेता देखते रहे।

काहिली का यह आलम है तो वजूद मिटने में कितनी देर

शासन-प्रशासन में फैसले लेने वाले ऊंचे पदों पर ओबीसी प्रतिनिधित्व का जो आलम है वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बावजूद ओबीसी नेता इस हकीकत से आंखें मूंदे हुए हैं. लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के आंकड़ों  के मुताबिक 2019 में मोदी सरकार के 89 सचिवों में से एक भी ओबीसी समुदाय का एक नहीं था। एससी कैटेगरी का सिर्फ एक और एसटी कैटेगरी के सिर्फ तीन सचिव थे। 

सरकार के 275 संयुक्त सचिवों में ओबीसी समुदाय से संबंध रखने वाले सिर्फ 19 थे। अनुसूचित जाति के 13 और अनुसूचित जनजाति के 19 संयुक्त सचिव थे। 

सच का सामना कराने वाले ऐसे आंकड़ों से लगता है कि अब हमारे ओबीसी नेताओं का कोई सरोकार नहीं रह गया है। लगता है वे संस्कृतिकरण के शिकार (एम एन श्रीनिवास को वह बहुचर्चित थ्योरी, जिसके तहत पिछड़ी जाति के लोग अगड़ी जातियों की रीति-नीतियों को अपनाने लगते हैं अपने समुदाय से जुड़े उनके सरोकार पीछे छूट जाते हैं।

बहरहाल, ओबीसी नेताओं और समुदाय के लिए यह सचेत होने का वक्त है। मेडिकल में ऑल इंडिया कोटे की सीटें उनके राजनीतिक हक का बड़ा सवाल है। ऐसे सवालों की अनदेखी आने वाले वक्त में उन्हें और हाशिए की ओर धकेल देगी। अगर अभी नहीं जागे तो ओबीसी समुदाय की नई पीढ़ी इस चुप्पी का सलीब सदियों तक ढोती रहेगी। 

(संपादन : नवल)


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