लक्ष्मीबाई नहीं, सावित्रीबाई फुले हैं आधुनिक भारत की महानायिका

भारतीय द्विज इतिहासकार लक्ष्मीबाई को स्वतंत्रता संग्राम की महानायिका बताते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि स्त्रियों की स्वतंत्रता की जो लड़ाई सावित्रीबाई फुले ने लड़ी, वह उन्हें लक्ष्मीबाई से अधिक प्रभावकारी महानायिका बनाती है। ऐसी महानायिका जिसने भारत की तमाम महिलाओं को गुलामी से आजाद होने का मार्ग प्रशस्त किया। स्मरण कर रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी, 1831 – 10 मार्च, 1897) पर विशेष

भारत की प्रथम शिक्षिका के बारे में पूछने पर लोगों की जुबान पर एक ही नाम आएगा— सावित्रीबाई फुले। ऐसे दौर में जब शूद्र-अतिशूद्र वर्ग के लड़कों को पढ़ाना-लिखाना गैरजरूरी समझा जाता था, उन्होंने घर-घर जाकर लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। चौतरफा विरोध के बावजूद वे डटी रहीं। इस तरह एक बड़े और युगांतरकारी आंदोलन की शुरूआत करने में पति जोतीराव फुले का साथ दिया था। लेकिन भारतीय समाज, खासकर महिलाओं के उत्थान की दिशा में सावित्रीबाई फुले का योगदान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं था। स्कूलों के संचालन के अलावा जोतीराव फुले ने प्रसूति गृह, विधवा आश्रम, अनाथ बच्चों के लिए शिशु सदन जैसी संस्थाओं का निर्माण और संचालन भी किया था, जिसमें सावित्रीबाई फुले का अन्यतम योगदान था। प्लेग जैसी घातक महामारी के दौरान, अपने प्राणों की चिंता न करते हुए भी वे मरीजों की सेवा में डटी रहीं और उससे जूझते हुए ही अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

उन दिनों बड़ी समस्या विवाहेत्तर संबंधों से जन्मी संतान की भी थी। लोकलाज या समाज के भय से प्रायः ऐसे शिशुओं को असमय ही मार दिया जाता था। काशीबाई नाम की एक विधवा स्त्री जोतीराव फुले के मित्र और शुभचिंतक सदाशिव गोवड़े के यहां खाना बनाने का काम करती थी। एक धूर्त्त ब्राह्मण ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाया, जिससे वह गर्भवती हो गई। काशीबाई ने बच्चे के पिता से उसकी जिम्मेदारी उठाने का आग्रह किया, मगर उसने साफ इन्कार कर दिया। समाज के डर के कारण काशीबाई ने शिशु की हत्या कर दी। इस अपराध के लिए काशीबाई को उम्रकैद  की सजा सुनाई गई। वह 1863 की घटना थी। पहला अवसर था जब किसी महिला को इतनी गंभीर सजा दी गई थी। उसे ऐसे अपराध के लिए दंडित किया गया था जिसके लिए वह पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थी।

1868 की एक और घटना है। सावित्रीबाई अस्वस्थ थीं और अपने मायके नायगांव, खंडाला आई हुई थीं। वहां रहते हुए उन्होंने जोतीराव फुले को 29 अगस्त को एक पत्र लिखा, जिसमें इसी तरह की एक और घटना का उल्लेख है—‘एक ब्राह्मण युवक गणेश था। वह पूजा-पाठ के माध्यम से अपनी आजीविका चलाता था। उसी क्रम में उसका महार लड़की शारजा से मिलना हुआ, जिससे वह गर्भवती हो गई। गांव वालों को पता चला तो वे उन दोनों को मारने पर उतारू हो गए। सावित्रीबाई ने जब उनके बारे में सुना तो बीमारी की अवस्था में भी तत्काल गांव के लोगों से मिलने पहुंचीं। उन्हें समझाया कि यदि वे प्रेमी युगल को मारने का अपराध करते हैं तो सरकारी कानून के अनुसार उन्हें मौत की सजा सुनाई जा सकती है। अंततः गांव छोड़ने की शर्त पर प्रेमी युगल को छोड़ दिया गया। सावित्रीबाई की पहल के कारण दो लोगों की जान बच गई।’ 

जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की कर्मस्थली पुणे के फुलेवाड़ा के संग्रहालय में रखी एक पेंटिंग जिसमें स्कूल जाते समय सावित्रीबाई फुले पर रूढिवादी गोबर और पत्थर फेंक रहे हैं (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2017)

पत्र के माध्यम से जोतीराव फुले को जब इस घटना का पता चला तो वे स्तब्ध रह गए। उन्होंने तत्क्षण फैसला करते हुए अपने आवास—395 गंज पेठ, पुणे में ‘मातृसदन’ बनाने की घोषणा कर दी। वह मातृसदन विशेषरूप से व्याभिचार की शिकार ब्राह्मण स्त्रियों के लिए था। काशीबाई को कालापानी की सजा पुणे में चर्चा का विषय थी। लोग उससे सहमे हुए थे। मातृसदन की स्थापना के बाद फुले ने महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों और तीर्थस्थानों में एक इश्तेहार जारी किया। उसमें लिखा था कि कालापानी की सजा से बचने के लिए मातृसदन की सुविधा का उपयोग किया जाए। विज्ञापन का अनुकूल असर हुआ। 1884 तक उस मातृसदन में 35 ब्राह्मण विधवाएं प्रसव के लिए पहुंच चुकी थीं। 1874 में ऐसी ही एक उत्पीड़ित विधवा मातृसदन पहुंची। फुले दंपति ने उसके बच्चे को गोद ले लिया। उसका नाम यशवंतराव रखा गया। दोनों ने उस बच्चे को प्यार से पाल-पोसकर बड़ा किया। पढ़ा-लिखाकर डाक्टर बनाया। 

कन्याओं की भ्रूण हत्या रोकने के लिए 10 जुलाई 1887 को फुले दंपति ने एक वसीयतनामा पंजीकृत कराया। उसमें घोषणा की गई थी कि सावित्रीबाई मातृसदन में पल रही बच्चियों की अपनी बेटियों की तरह देखभाल करेंगी। एक क्रांति दूसरी क्रांति को सहज ही जन्म दे देती है। विवाहेत्तर संबंधों से जन्मे बच्चों की भ्रूण हत्या रोकने के लिए सावित्रीबाई ने जो क्रांतिकारी कदम उठाए थे। उनका असर महाराष्ट्र के दूसरे समाजसेवियों पर भी पड़ा। नारायण मेघजी लोखंडे ‘दीनबंधु’ के संपादक थे। वे बड़े मजदूर नेता और समाज सुधारक थे। उन दिनों तक सती प्रथा पर कानूनन रोक लगाई जा चुकी थी। मगर पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री का जीवन नारकीय बन जाता था। वह न तो अच्छा खा-पी सकती थी, न ही मनचाहा पहन-ओढ़ सकती थी। मेले-त्योहारों में हिस्सा लेने, घूमने-फिरने पर भी प्रतिबंध लागू थे। पति की मृत्यु के तुरंत बाद उसकी विधवा स्त्री के बाल काट दिए जाते थे। सावित्रीबाई की प्रेरणा से लोखंडे ने विधवाओं के मुंडन के विरोध में आंदोलन की शुरुआत की। उनके प्रभाव में शहर-भर के नाइयों ने विधवाओं का मुंडन करने से इन्कार कर दिया। दबाव डाला गया तो उन्होंने हड़ताल कर दी। हड़ताल को सफल बनाने के लिए सवित्रीबाई फुले ने भी बढ़-चढ़कर सहयोग किया। ‘नाइयों की हड़ताल’ की चर्चा दुनिया-भर में हुई। अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दि टाइम’ ने उस हड़ताल की खबर अपने 9 अप्रैल 1890 के अंक में प्रकाशित की। उसे पढ़ने के बाद इंग्लैंड की महिलाओं ने लोखंडे को प्रशंसा-भरे पत्र लिखे।

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1877 में महाराष्ट्र को अकाल ने घेर लिया। हजारों लोग उससे प्रभावित थे। उनके लिए सहायता-सामग्री जुटाने के लिए फुले दंपति ने लोगों से सहायता की फरियाद की। मदद जुटाने के लिए उन्होंने गांव-गांव की यात्राएं कीं। डॉ. शिवप्पा जैसे मित्रों की सहायता से उन्होंने धानकवाड़ी में ‘विक्टोरिया बालाश्रम’ की स्थापना की। आश्रम के माध्यम से प्रतिदिन एक हजार गरीबों और जरूरतमंदों को भोजनादि की सुविधा मिलने लगी। बालाश्रम के संचालन में भी सावित्रीबाई का योगदान बढ़-चढ़कर था सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं को लेकर वे अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में भी गईं। अप्रैल 1877 में वे पश्चिमी महाराष्ट्र के जुनेर परिक्षेत्र में थीं। वहां से उन्होंने 20 अप्रैल को जोतीराव फुले के लिए एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अकाल का करुण चित्रण किया था—

वर्ष 1876 बीत चुका है। लेकिन अकाल नहीं गया। इस क्षेत्र में वह भीषण विभीषिका के रूप में ठहरा हुआ है। लोग भूख से मर रहे हैं। जानवर जमीन पर गिरकर दम तोड़ रहे हैं। यहां भोजन का बेहद अभाव है। जानवरों के लिए चारा नहीं है। लोग अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को, अपनी जवान लड़कियों को बेचकर गांव छोड़कर जा रहे हैं। नदी-नाले और तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं। पीने के लिए पानी नहीं है। पेड़ सूखते जा रहे हैं, उनके पत्ते झर चुके हैं….भूख से व्याकुल लोग जहरीले फल खाने को मजबूर हैं। बच्चे-बड़े भोजन-पानी के लिए हा-हाकार करते हुए दम तोड़ रहे हैं।’ 

एक बार सावित्रीबाई अपने सहयोगियों आर. बी. कृष्णजी पंत तथा लक्ष्मण शास्त्री के साथ अकाल-पीड़ित क्षेत्र का दौरा करने निकली हुई थीं। उन्होंने उस घटना का विवरण भी अपने पत्र में दिया है—

साहूकार लोग निर्दयतापूर्वक लोगों का शोषण कर रहे हैं। अकाल के कारण अनेक बुरी घटनाएं हो रही हैं। दंगे शुरू हो चुके हैं। कलेक्टर ने जब इस बारे में सुना तो वह हालात संभालने के लिए वहां पहुंचा। उसने अंग्रेज सिपाहियों को ड्यूटी पर लगाकर दंगों पर काबू पाने की कोशिश की। सिपाहियों ने 50 सत्यशोधक कार्यकर्ताओं को भी अपने घेरे में ले लिया। उसके बाद कलेक्टर ने मुझे बुलाया। मैंने उनसे पूछा कि भले स्वयंसेवकों को किसलिए गिरफ्तार किया गया है? क्यों उनपर झूठे आरोप लगाए गए हैं? मैंने उससे उन्हें तत्काल बरी कर देने को कहा। कलेक्टर भला और निष्पक्ष इंसान था। वह अपने सिपाहियों पर चिल्लाया—‘क्या उन्होंने पाटिल किसानों को लूटा है? उन्हें तत्काल बरी किया जाए।’ कलेक्टर लोगों को दयनीय अवस्था में देखकर विचलित था। उसने उसी क्षण चार गाड़ी ज्वार का इंतजाम किया।’’

दूर-दराज के रहने वाले विद्यार्थियों के लिए फुले दंपति की ओर से छात्रावास भी बनाया हुआ था। अलग से जगह की व्यवस्था न होने के कारण वह उनके घर से ही संचालित था। उसकी देखभाल भी सावित्रीबाई फुले के अधीन थी। छात्रावास में रहने वाला एक विद्यार्थी लक्ष्मण कराडी मुंबई से पढ़ने पहुंचा था। उसने सावित्रीबाई की प्रशंसा करते हुए लिखा है—‘मैंने सावित्रीबाई जितना प्यार करने वाली दूसरी औरत नहीं देखी। उन्होंने मुझे मेरी मां से भी ज्यादा प्यार दिया था।’ एक और विद्यार्थी ने सावित्रीबाई के स्वभाव और जीवनशैली के बारे में संवेदनपरक टिप्पणी की थी। एक विद्यार्थी ने लिखा है कि—‘सावित्रीबाई बहुत ही विनम्र और ममतामयी स्त्री थीं। उनके दिल में दूसरों के प्रति अगाध प्रेम था। गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए वे सदैव आगे रहती थीं। वे उन्हें भोजन और जरूरत की दूसरी चीजें बांटती रहती थीं। यदि किसी स्त्री की देह पर फटे-चिथड़े वस्त्र देखतीं तो तत्काल अपनी साड़ी निकालकर उसे भेंट कर देती थीं। इस कारण उनका खर्च बढ़ जाता था। तात्या (जोतीराव) उनसे कभी-कभी कहते—‘किसी को इतना खर्च नहीं करना चाहिए।’ इसपर वे मुस्कराकर कहतीं—‘क्या हमें यह मरने के बाद अपने साथ ले जाना है।’ तात्या सोच में पड़ जाते। उनके पास उसका कोई जवाब नहीं होता था। पति-पत्नी दोनों के बीच अगाध प्रेम था।

1896 में महाराष्ट्र को फिर अकाल ने घेर लिया। सावित्रीबाई अपने कार्यकर्ताओं के साथ गरीबों और जरूरतमंदों की मदद में जुट गईं। लेकिन इस बार अकाल अकेला नहीं था। वह प्लेग की विभीषिका भी साथ लाया था। प्रतिदिन सैकड़ों लोग प्लेग के शिकार हो रहे थे। यशवंत पढ़-लिख कर डाक्टर बन चुका था और सेना में नौकरी कर रहा था। ऐसे में जब लोग अपने परिजनों को दूर, सुरक्षित स्थानों पर भेज रहे थे, सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र को भी रोगियों की देखभाल के लिए बुला लिया। यह जानते हुए भी कि प्लेग महामारी है सावित्रीबाई जी-जान से मरीजों की देखभाल में जुटी थीं। वे मरीजों को उनके घर से स्वयं अस्पताल तक लाती थीं। इसी बीच उन्हें पता चला कि मुंधावा गांव के बाहर महार बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकबाड़ का बेटा भी महामारी से ग्रस्त है। सावित्रीबाई उनके घर पहुंच गईं। लेकिन छूत के भय से कोई भी बीमार बालक के करीब जाने को तैयार न था। तब वे उस बालक को अपनी पीठ पर लादकर अस्पताल तक ले गईं। प्लेग के मरीजों के निरंतर संपर्क में रहने का दुष्प्रभाव तो उनके शरीर पर भी पड़ना ही था। अंततः 10 मार्च 1897 को जानलेवा प्लेग ने उस क्रांतिमयी, कर्मशील, ममतामयी स्त्री को हमसे छीन लिया। 

मराठी समाचारपत्र ‘दीनबंधु’ ने इस साहसी कदम के कारण उनकी तुलना लक्ष्मीबाई से की गई थी। सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ता नारायण महादेव उर्फ मामा परमानंद ने 31 जुलाई 1890 को सावित्रीबाई के बारे में लिखा था—

जोतीराव से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं। हम उनकी जितनी भी प्रशंसा करें, वह कम है। कोई कैसे उस महान व्यक्तित्व का वर्णन कर सकता है! उन्होंने पूरी तरह से अपने पति का साथ दिया, उनकी राह में आने वाली प्रत्येक मुश्किल और झंझावात का सामना किया। उच्च शिक्षित सवर्णों में भी ऐसी त्यागमयी स्त्री का मिलना असंभव है। उस दंपति ने अपना सारा समय परोपकार करते हुए बिताया था।’

सावित्रीबाई फुले अच्छी कवि, लेखक, वक्ता और संपादक थीं। उनका कविता संग्रह ‘काव्यफुले’ 1854 में ही प्रकाशित हो चुका था। संकलन में 41 कविताएं थीं। ‘काव्यफुले’ मराठी में प्रकाशित किसी भारतीय महिला का संभवतः सबसे पहला कविता संग्रह था। जिन दिनों भारतीयता की खोज के नाम पर अधिकांश भारतीय लेखक किसी न किसी रूप में संस्कृत ग्रंथों की टीकाएं, उनके अनुवाद अथवा किसी न किसी रूप में उनका पुनःप्रस्तुतीकरण कर रहे थे— सावित्रीबाई फुले भारत की जनता के दुःख-दर्द को अभिव्यक्ति दे रहीं थीं। कविताओं के अलावा उनके पत्र भी ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। सावित्रीबाई फुले ने अपने पति जोतीराव फुले को तीन पत्र लिखे थे। एक पत्र में उन्होंने अपने परिजनों की जोतीराव के प्रति नाराजगी का वर्णन किया था। जोतीराव ब्राह्मण ग्रंथों पर उंगली उठाते थे। पूजा-पाठ, यज्ञ-कीर्तन आदि को आडंबर बताते थे। ऐसे में उनसे केवल ब्राह्मण और सवर्ण ही नहीं, उनके अपने लोग भी नाराज रहते थे। ऐसे ही लोगों में सावित्रीबाई के मायके वाले भी थे। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है। कहता है कि फुले जो काम कर रहे हैं, वह अछूतों का है। इसीलिए समाज ने उनका बहिष्कार किया है। पत्र में सावित्रीबाई अपने भाई पर टिप्पणी करती हैं कि उसकी मति खराब हो चुकी है। भाई के नाम की चिट्ठी में वे लिखती हैं—‘आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार है। उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी कारण आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है….’ पत्र में वे अपने जोतीराव की जमकर प्रशंसा करती हैं। 

सात्रिवीबाई कुशल वक्ता थीं। जोतीराव फुले की तरह उन्होंने भी देशी-विदेशी साहित्य का खूब अध्ययन किया था। लोग उनकी बात को ध्यान लगाकर सुनते थे। आरंभ में सावित्रीबाई पर ताना कसने वाली, राह चलते समय उनपर कीचड़ और गालियों मी बौछार करने वाली स्त्रियां, बाद में उनकी प्रशंसा करने लगी थीं। उनका मानना था कि बगैर सम्मानजनक रोजगार के शिक्षा की कोई उपयोगिता नहीं हैं। भूमि रोजगार सृजन का बड़ा साधन है। लेकिन उसपर ब्राह्मणों और सवर्ण सामंतों का कब्जा है। शूद्र और अतिशूद्र उनके यहां काम करते हैं। यह भी उनकी दासता की वजह है। वे चाहती थीं कि शूद्र और अतिशूद्र उद्यमों में रुचि लें। अपने भाषण में भी सावित्रीबाई लोगों को श्रम और सामूहिकता का अर्थ समझाती थीं। —

आलस्य ही गरीबी का पर्याय—ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन है। आलसी आदमी को कभी धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता। लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच के बल पर ही सफलता प्राप्त होगी। निश्चित रूप से प्राप्त होगी। ऐसा मेरा विश्वास है।’

काव्य फुले’ के बाद सावित्रीबाई फुले का ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। इन पुस्तकों के अलावा उन्होंने ‘ज्योतिबा के भाषण’ नामक  पुस्तक भी संपादित की। सावित्रीबाई फुले के अपने भाषणों और गीतों का संग्रह ‘सावित्रीबाई फुले के भाषण और गीत’ शीर्षक संग्रह से उपलब्ध है। वे भारत में स्त्री-शक्ति का प्रतीक हैं। द्विज समाज लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों के साथ संघर्ष के लिए भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की महानायिका मानता है। लेकिन बिना सामाजिक स्वतंत्रता के राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी और महत्वहीन होती है। इसलिए स्त्री स्वातंत्र्य की दृष्टि से इस देश को बनाने में सावित्रीबाई का जो योगदान रहा, उसके कारण वे लक्ष्मीबाई को पीछे छोड़ देती हैं। 

(संपादन : नवल)


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