करीब दो हजार साल पहले का कलाभ्र किसान विद्रोह, जिसे दी गई ‘अंधकारमयी युग’ की संज्ञा

दक्षिण भारत के लिए ब्राह्मण बाहरी थे। उन्हें इतना महत्व दिए जाने से सामान्य कामगारों, किसानों, मजदूरों, चरवाहों और आदिवासियों में आक्रोश पनपने लगा था। यही आक्रोश कलाभ्र विद्रोह का कारण बना था। नतीजा यह हुआ कि तमिल मूल के किसान, मजदूर, चरवाहे तथा आदिवासी राजा-महाराजाओं तथा ब्राह्मण जमीदारों के विरुद्ध एकजुट होने लगे। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

दक्षिण भारत के बहुजन इतिहास का लुप्तप्राय : पन्ना

उनका शासनकाल 300 वर्ष से लंबा था। एक समय था जब आधुनिक कर्नाटक से लेकर दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा उनके अधिकार में आ चुका था। तीसरी शताब्दी, संगम काल की समाप्ति के दौर में, उन्होंने चोल, चेर और पांड्य राजाओं के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंका था। वे कौन थे? कहां से आए थे? उनकी भाषा, संस्कृति और साहित्य के बारे में भारतीय मनीषा मौन है। बस थोड़ी-बहुत जानकारी जैन, बौद्ध और संगम साहित्य से प्राप्त होती है। तथाकथित मुख्यधारा के इतिहासकार उनके शासनकाल को, दक्षिण भारत के इतिहास की ‘अंधकारमयी लंबी रात्रि’ कहकर उपेक्षित करते रहे। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उन्होंने दक्षिण भारत में बौद्ध एवं जैन धर्म-दर्शन को पुनर्जीवित किया था? उन पांड्यों और पल्लवों को हराया था, जो आगे चलकर, सातवीं-आठवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के ‘हिंदुत्वीकरण’ का कारण बने थे? यहां हम इतिहास में उपेक्षित ‘कलाभ्र’ शासकों की बात कर रहे हैं। ‘कलाभ्र’ सामान्य किसान, ग्वाले और कामगार वर्ग के लोग थे, जिन्हें हिंदू वर्ण-व्यवस्था शूद्र मानती आई है। परिस्थितिजन्य आक्रोश ने उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरित किया था। हम उन्हें देश के प्रथम, सफल किसान-मजदूर विद्रोह के महानायक भी कह सकते हैं।

बुद्ध से पहले धर्म-दर्शन की दृष्टि से पूरा भारत दो हिस्सों में बंटा था। पहला समूह आजीवकों का था, जो श्रमण परंपरा का प्रतिनिधित्व करते थे। दूसरे था ब्राह्मण समूह जो वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। वैदिक परंपरा के ऋषिगण खुद को दूसरों से अलग और श्रेष्ठ समझते थे। आवश्यकता पड़ने पर किसी भी राजा के पास जाकर, कभी धर्म की दुहाई देकर तो कभी देवताओं के नाम पर डरा-धमकाकर यज्ञादि हेतु वांछित सामग्री जुटा लेते थे। दूसरा वर्ग उन लोगों का था जो परिश्रम में विश्वास करते थे। मेहनत करते थे। खेती के अलावा संगठन बनाकर देश-देशांतर के लोगों के साथ व्यापार करते थे। यदि ब्राह्मण उन्हें अपने यज्ञादि कर्मकांडों से दूर रहने को कहते, तो उन्हें भी ब्राह्मणों की कोई परवाह नहीं थी। वे कौत्स, मक्खलि गोशाल, पूरण कस्सप की भौतिकवादी दर्शन परपंरा के लोग थे। उनका अपना स्वतंत्र धर्म-दर्शन और कार्य-संस्कृति थी। लोग उन्हें आजीवक, लोकायत, वैनायिक, चार्वाक आदि कहते थे।

जैन और बौद्ध धर्म ने अपने समय की इन्हीं दो परस्पर विषमध्रुवी विचारधाराओं के बीच जगह बनाने की कोशिश की थी। यज्ञ और बलिप्रथा से उकताए जनसमाज को बौद्ध और जैन दर्शन का मध्यम-मार्ग पसंद आया। लोग उनसे जुड़ने लगे। फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया। लेकिन अशोक के बाद बौद्ध धर्म कमजोर पड़ने लगा था। इससे ब्राह्मण धर्मों को नए सिरे से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का अवसर मिला। उस समय तक वे समाज से कटकर रहने का नुकसान समझ चुके थे। जनसाधारण को भरमाने के लिए पुराणों और स्मृतियों की रचना की जाने लगी। शासक वर्ग को लुभाने के लिए वे उनकी वंशावलियों को किसी न किसी देवता से जोड़ रहे थे। धीरे-धीरे लोग उनके प्रभाव में आने लगे।

कलाभ्र विद्रोह की पृष्ठभूमि

ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में ब्राह्मण दक्षिण भारत में पहुंचे थे। उनका उद्देश्य ब्राह्मण धर्म एवं संस्कृति का प्रसार करना था। उन दिनों दक्षिण भारतीय समाज शैव, जैन एवं बौद्ध मतावलंबियों में बंटा था। उनके अलावा कुछ आदिवासी थे, जिनके अपने-अपने धर्म और संस्कृतियां थीं। ब्राह्मणों ने राजदरबारों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया। वे अपने साथ हिंदू वर्ण-व्यवस्था और शासन-प्रणाली भी लेकर गए थे, जो मजबूत केंद्र की समर्थक थी; तथा राजाओं को असीमित अधिकार देती थी। प्रजा से उम्मीद करती थी कि वह स्वामीभक्त रहे, राज्यादेशों को माने, समय पर करों का भुगतान करे तथा आवश्यकता पड़ने पर राज्य की सुरक्षा में अपना सहयोग दे। राजाओं ने उसे देखते ही देखते अपना लिया। ब्राह्मणों को प्रसन्न रखने, मंदिर निर्माण तथा उनकी देखभाल के नाम पर उन्हें गांव के गांव दान किए जाने लगे। ब्राह्मणों को नदी तट की, नहरों, तालाबों और कुओं से अभिसिंचित और तैयार भूमि दान में दी जाती थी। गांव के गांव दान किए जाने से वलेला, कलवार आदि किसान जातियों, मजदूरों और आदिवासियों के सम्मुख आजीविका का संकट गहराने लगा, जिन्होंने उस जमीन को अपना पसीना बहाकर तैयार किया था। जीविकोपार्जन के लिए उनके पास, सिवाय ब्राह्मण-सामंतों के खेतों में मजदूरी करने के, दूसरा कोई उपाय नहीं था।

कलाभ्र शासकों का प्रभाव क्षेत्र

दक्षिण भारत के लिए ब्राह्मण बाहरी थे। उन्हें इतना महत्व दिए जाने से सामान्य कामगारों, किसानों, मजदूरों, चरवाहों और आदिवासियों में आक्रोश पनपने लगा था। यही आक्रोश कलाभ्र विद्रोह का कारण बना था। नतीजा यह हुआ कि तमिल मूल के किसान, मजदूर, चरवाहे तथा आदिवासी राजा-महाराजाओं तथा ब्राह्मण जमीदारों के विरुद्ध एकजुट होने लगे। 250 ईस्वी में कलाभ्र विद्रोह की शुरुआत हुई। वह एक तरह से जनविद्रोह था, जिसके आगे बड़े-बड़े ‘अधिराजाओं’ को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। उसके फलस्वरूप दक्षिण भारत का बड़ा भूभाग कलाभ्रों के अधिकार में आ गया। विजित प्रदेशों में उन्होंने दक्षिण भारत की पुरानी विकेंद्रीकृत शासन-प्रणाली लागू की। उनके द्वारा स्थापित राज्य बुद्धकालीन नगर-राज्यों जैसे थे। जिनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन कार्य किया जाता था।

कलाभ्र कौन थे?

कलाभ्रों के बारे अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन इतना सभी मानते हैं कि उनमें द्रविड़ मूल के किसान, मजदूर और पशुपालक समाज के लोग शामिल थे। इतिहासकार बर्टन स्टीन के अनुसार कलाभ्र विद्रोह गैर-कृषक जातियों (आदिवासियों) के आक्रोश का परिणाम था। उन्हें जैन एवं बौद्ध जैसे अवैदिक धार्मिक समुदायों का समर्थन भी प्राप्त था।[1] इतिहासकार डॉ. रामशरण शर्मा उन्हें साधारण किसान मानते हैं। उनके शब्दों में, ‘कलाभ्र विद्रोह ब्राह्मण जमींदारों के विरुद्ध शक्तिशाली किसान विद्रोह था … उन्होंने ‘ब्रह्मादेय’ अधिकारों को, जिनके द्वारा ब्राह्मणों को गांव के गांव दान कर दिए जाते थे━पूरी तरह समाप्त कर दिया था।’[2] एक मत के अनुसार कलाभ्र गैर-ब्राह्मण बौद्ध परंपरा के लोग थे। जो तिरुपति के आसपास शासन करते थे। जब सातवाहन राजाओं ने उनपर हमला किया तो वे पूरे तमिल-प्रदेश में यहां-वहां बिखर गए। लेकिन अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं को बरकरार रखा।

बौद्ध ग्रंथों में अच्युतविक्कांत नामक एक कलाभ्र सम्राट का उल्लेख है, जिसके शासनकाल में बौद्ध मठों को फलने-फूलने के प्रचुर अवसर प्राप्त थे। दसवीं शताब्दी के एक जैन व्याकरणविद् ने अच्युतविक्कांत की कविताएं उद्धृत की हैं।[3] पाँचवीं सदी के कुछ पालि ग्रंथों में उन्हें पूर्वी-दक्षिणी तमिल क्षेत्र में रहने वाली शासक जातियों से संबंधित माना है। ‘पेरियापुराणम्’ नामक तमिल महापुराण, जिसके लेखक सेक्किझार हैं, में 63 शैव संतों के जीवन और साहित्य का विवरण है। इसमें कलाभ्रों को कर्नाटक की ‘वेदुगा-कर्णादार’ नामक जनजाति से संबंधित बताया गया है━

‘जिन दिनों शैवभक्त आनंदमग्न थे, और शिव उनके हृदय के बेहद करीब थे, कर्नाटक के वेदुगा-कर्नादाथ्थवरं ने उनपर हमला किया और उनका सेनापति पेंडीनाडु का सम्राट बन गया। अपनी अपार शक्ति के बल पर उन्होंने जैन धर्म को स्थापित किया। उसके बाद शैव मतावलंबियों के लिए संकट का दौर आरंभ हो गया … अपने आपराधिक कार्यों द्वारा उसने शैव-भक्तों को चंदन के पेड़ों तथा उनकी जमीन से अलग कर दिया।’[4]

‘पेरियापुराणम्’ बारहवीं शताब्दी की रचना है। उस समय तक कलाभ्रों के शासन का अंत हुए लगभग पांच शताब्दियां गुजर चुकी थीं। इस पुराण में कलाभ्रों के बारे में जो लिखा है, उससे आधुनिक विद्वान सहमत नहीं हैं। तमिल शब्द ‘वेदुगा’ का अर्थ ‘उत्तर के सीमांत प्रदेश के वासियों’ से है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस शब्द का प्रयोग कृष्णा नदी के दक्षिण तथा तुंगभद्रा के उत्तर में स्थित परिक्षेत्र के लिए किया जाता है। उसमें गुंटुर, कुरनूल, कोप्पल, रायचुर, होसपेट तथा पेंजिम (गोवा) का क्षेत्र भी शामिल है। पेंजिम को छोड़कर, बाकी सारे प्रदेशवासियों और चेर राजाओं के बीच संघर्ष चलता ही रहता था। यह क्षेत्र उन आदिवासियों के कारण भी जाना जाता था, जो अपनी आजीविका के लिए शिकार पर निर्भर थे। वे बहादुर थे, मगर कलाभ्रों की तरह उन्होंने कभी भी स्वतंत्र राज्य की स्थापना नहीं की थी।[5] ‘करुनाडु’ (कर्नाटक) और कुछ न होकर इरुमैयूर नामक तमिल प्रदेश का दूसरा नाम है, जिसका आधुनिक नाम मैसूर है।

कुछ कलाभ्र नायकों के नाम संगम साहित्य में प्राप्त होते हैं। तदनुसार कलाभ्र विद्रोह का नेतृत्व थीराइयन, पुल्ली, कझाइमलाइयन, इदाकेली, मिलात्तुमालियान, इलांकुमानन, आई वियानकोई आदि नायकों ने किया था।[6] कुछ विद्वान कलाभ्र, कलाभरा, कलावरा, कलाप्पलार, कलवार, कल्लार आदि को एक ही मानते हैं। कलवार, कल्लार दक्षिण भारत की शूद्र जातियां हैं, जिनका मुख्य पेशा खेती करना है। तीसरी शताब्दी में उनके लोग तिरुपति के आसपास बसते थे। वे गैर-ब्राह्मण परंपराओं में विश्वास रखने वाले, बौद्ध तथा जैन धर्मावलंबी थे।

वेलविकुदी दानपत्र

कलाभ्र शासकों के बारे में महत्वपूर्ण प्रमाण, मदुरै के पास मेदाकुलम से प्राप्त 10 ताम्रलेख हैं। 27.5 गुणा 8 सेंटीमीटर की तामपट्टिकाओं पर लिखे ये आलेख आठवीं शताब्दी के पांड्य सम्राट ‘परांतक नेदुचेलियन’ के शासनकाल के हैं। उनपर किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं। ताम्रलेखों में राजा नेदुचेलियन वारागुण वर्मन प्रथम द्वारा वेलविकुदी गांव को, नए सिरे से ब्राह्मण को दान में दिए जाने का उल्लेख है। यही इनके नामकरण का आधार भी है। ताम्रलेख द्विभाषी हैं। उनमें संस्कृत तथा तमिल भाषा का प्रयोग किया गया है। दोनों के लिए प्राचीन ‘ग्रंथ लिपि’ का इस्तेमाल किया गया है।

संस्कृत वाला हिस्सा शिव के मंगलाचरण के साथ आरंभ होता। आगे संस्कृत में पांड्य राजाओं की वंशावलि का संक्षिप्त वर्णन है। अगस्त्य मुनि को उनका गुरु बताया गया है। राजाओं को अपने प्रभाव में लेने के लिए ब्राह्मणों की नीति थी━उनका देवताकरण (अवतारीकरण) करना; और इस तरह उनके हाथों में असीमित अधिकार सौंप देना। वेलविकुदी ताम्रलेखों में पांड्य राजाओं को चंद्रमा का पुत्र बताया गया है। इन ताम्रलेखों की तिथि को लेकर कुछ विवाद हैं, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार वह संभवतः 769-70 की घटना है।[7]

ताम्रलेखों के तमिल हिस्से में ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण है। उसके अनुसार कोर्कई गांव के मुखिया, नारकोरन नामक ब्राह्मण ने वेलविकुदी गांव में यज्ञ संपन्न किया था। उसके लिए यजमान की भूमिका पांड्य राजा पाल्यिागा मुदुकुदमि पेरुवरुदि ने निभाई थी। कोर्कई तथा वेलविकुदी दोनों ही गांव उपजाऊ जमीन पर बसे थे। ताम्रलेख में राजा द्वारा वेलविकुदी गांव नारकोरन को दान में देने का उल्लेख है। उसके बाद राज्य पर दुश्मनों (कलाभ्रों) के कब्जे तथा उनसे मुक्ति के बारे में बताया गया है। कहा गया है कि अनेक युद्धों के बाद राजा परांतक नेदुंजैदियन शांति की पुनर्स्थापना में सफल रहे थे। एक ताम्रलेख के अनुसार━

‘‘राजा परांतक के शासनकाल के तीसरे वर्ष में चौड़ी सड़कों और ऊंची, विशाल अट्टालिकाओं वाले शहर कुदई (मदुरै) में एक आदमी को फरियाद करते हुए सुना गया। राजा ने तत्काल उसे बुलवाया और पूछा━‘तुम्हारी शिकायत क्या है?’

उस आदमी ने बताया कि━‘हे, शक्तिशाली सैन्य बल के स्वामी चक्रवर्ती सम्राट, न्याय और धर्म के पथ पर चलते हुए आपके पूर्वजों ने, वेलविकुदी गांव मेरे पूर्वजों को दान किया था … अब कलाभ्रों की समुद्र जैसी विशाल सेना को पराजित करने के बाद उस गांव को वापस ले लिया गया है। तथापि वह उसके सही हकदारों को नहीं लौटाया गया है।’ उसकी बात सुनकर राजा मुस्कराया। बोला━

‘बहुत अच्छे! तुम उस गांव पर अपना अधिकार सिद्ध करो और वापस ले लो।’ उस आदमी अपनी बात को सिद्ध कर दिया। उसके बाद शक्तिशाली सम्राट ने अपने धनुष को छूते हुए ऐलान किया━‘मेरे पूर्वजों ने जो भी दान किया था, वह हमारे द्वारा भी दान में दी हुई वस्तु माना जाएगा।’ राजा की घोषणा के बाद वेलविकुदी गांव को कोर्कई के मुखिया को लौटा दिया गया।’’[8]

प्रसिद्ध इतिहासकार गेल ऑम्वेट संगम काल के बाद के राजाओं (जिनमें कलाभ्र भी शामिल हैं) को सत्यनिष्ठ तथा आत्मबलिदानी मानती हैं। वे लिखती हैं━‘तमिलनाडु में सत्यनिष्ठ तथा आत्मबलिदानी राजाओं की परंपरा संगम काल से आरंभ होती है। बौद्ध जातक कथाओं में राजा शिवि की कथा उल्लेखनीय है। इसका मूल भी दक्षिण रहा होगा।’[9] लेकिन ऑम्वेट संगम काल के बाद के राजाओं को चाहे जो विशेषण दें, नीलकंठ शास्त्री जैसे कथित राष्ट्रवादी इतिहासकार उन्हें माफ नहीं कर पाते। हालांकि कलाभ्रों की आलोचना करते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से वे उनकी उपलब्धियों का उल्लेख भी कर जाते हैं━

‘हम देखते हैं कि छठी शताब्दी की समाप्ति के निकट सभ्यता के रहस्यमयी और सर्वव्यापी शत्रु, दुष्ट शासक जिन्हें कलाभ्र कहा जाता था, आए तथा उन्होंने स्थापित शासन-व्यवस्था को उखाड़ फेंका … किसी भी तर्क से कलाभ्रों को दुष्ट राजा (कलि-अरॉसा) ही माना गया है, जिन्होंने अनेक अधिराजाओं की सत्ता को उखाड़ फैंका था, और ‘ब्रह्मदेय’ (शासकों द्वारा ब्राह्मणों को दी जाने वाली भूमि) को वापस ले लिया था … कलाभ्रों से मिली पराजय के पश्चात चोल लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुके थे।’[10]

इस बारे में गेल ऑम्वेट की टिप्पणी दृष्टव्य है━‘‘हालांकि इतिहास का यह ‘अंधकार काल’ केवल 19 वीं या 20वीं शताब्दी के इतिहासकारों को ही जान पड़ता है, जिन्होंने उनके इतिहास को रचा और परिभाषित किया … ब्रिटिश काल के ‘राष्ट्रवादी’ शासकों ने इसे अंधकारमय युग की संज्ञा दी, क्योंकि शासक गैर-ब्राह्मण धर्मों के समर्थक थे। यह काल अपने आपमें महान साहित्य का वाहक रहा … 7वीं सदी में पल्लवों के अधीन, ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान के बाद ही तमिलनाडु का ‘हिंदुस्तानीकरण’ आरंभ हुआ था।’’[11]

कलाभ्र शासन का पराभव

कलाभ्र शासक चेर, चोल तथा पल्लव शासकों पर हमले करते रहते थे। उनके आक्रमणों से खिन्न होकर दक्षिण तमिल परिक्षेत्र के ये तीनों शासक-वर्ग एकजुट होकर कलाभ्रों पर टूट पड़े। कलाभ्र उनके संयुक्त अभियान का सामना करने में नाकाम रहे। विजय का श्रेय पल्लव राजा सिंहवर्मन द्वितीय के पुत्र सिंहविष्णु को मिला। कलाभ्रों के ऊपर उनकी विजय को ब्राह्मणवाद की जीत के रूप में भी देखा जाता है।

कलाभ्र शासकों द्वारा चलाए गए सिक्के

कलाभ्र धर्म और संस्कृति

कलाभ्र सनातनी हिंदुओं (ब्राह्मणों) के लिए भले ही शत्रुसम हों, किंतु स्थानीय जनता के लिए, उन लोगों के लिए जिनकी जमीन छीनकर ब्राह्मणों को दान कर दी जाती थी, वे भरोसेमंद मित्र और संरक्षक थे। उनकी भाषा तमिल और प्राकृत थी। वेलविकुदी ताम्रलेखों के आधार पर प्रोफेसर रामासामी अय्यंगर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि तेजस्वी कलाभ्र राजा जैन धर्म के अनुयायी थे। उनके शासनकाल में इस धर्म को फलने-फूलने के सारे अवसर प्राप्त थे।

कलाभ्र शासकों की धार्मिक मान्यताओं पर एस. आर. रामानुजन की टिप्पणी भी दृष्टव्य है━

‘कलाभ्र शासकों ने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता के विचार को चुनौती दी थी, तथा उसके विरुद्ध उन्होंने संघर्ष भी किया था। इसलिए शासनकाल समाप्त होने के बाद वे ब्राह्मण लेखकों के षड्यंत्र का शिकार भी हुए। जिस तरह से उन्होंने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ाई छेड़ी थी, उसने ब्राह्मणों को काफी पीछे ढकेल दिया था। उन्होंने धार्मिक संस्थानों को बंद करने, मूर्तियों को उखाड़ फैंकने तथा पुजारी वर्ग की जमीनों को वापस लेने का अभियान शुरू किया था। वैदिक धर्म-दर्शन उन्हें स्वीकार नहीं था। सनातन धर्म के प्रति अपनी घृणा को वे उनके पूजा स्थलों को रोंदने तथा मूर्तियों को तोड़ने के लिए करते रहते थे।’[12]

लेकिन रामानुजन की बात पूरी तरह से सत्य नहीं है। यह ठीक है कि उन्हें वैदिक परंपराओं में विश्वास नहीं था, लेकिन छठी-सातवीं शताब्दी में उनके द्वारा चलाए गए सिक्कों पर हिंदू देवी-देवताओं के चित्र दर्शाते हैं कि बाद के वर्षों में उन्होंने धर्म प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाना शुरू कर दिया था।

कथित राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने कलाभ्र शासकों के शासनकाल को भले ही ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी हो, लेकिन अब उनके बारे में नए सिरे से शोध किया जा रहा है। 1986 में अमरावती नदी के किनारे, करूर से तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। आर. कृष्णमूर्ति उन्हें कलाभ्रों के शासनकाल का बताते हैं। सिक्कों पर हाथी, चीता, मछली, घोड़ा आदि के चिन्ह मिले हैं। चौकोर आकार के कुछ सिक्कों पर अंकित चित्रलिपि को अभी तक पढ़ा नहीं गया है। लेकिन कृष्णामूर्ति उसे सिंधु लिपि से भी जोड़कर देखते हैं। कन्नड़ भाषा में ‘कराभ’ का अर्थ ऊंट, हाथी आदि से भी है। सिक्कों पर अंकित हाथी का चित्र दर्शाता है कि कराभ्र शासकों के लिए हाथी अवश्य ही महत्वपूर्ण जानवर रहा होगा। एक सिक्के पर स्वास्तिक का चिन्ह भी दिखाई पड़ता है, जो जैन दर्शन का प्रतीक चिन्ह भी है। कुछ सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में तत्कालीन कलाभ्र शासक अच्युतविक्कांत का नाम अंकित है।[13]

कलाभ्रों के शासनकाल में साहित्य-रचना में भी खूब तरक्की हुई थी। बौद्ध ग्रंथ मणिमेखलाई, जैन ग्रंथ जीवक चिंतामणि (जैन ग्रंथ), पातिनेन केल्कनकु (तमिल काव्य) जैसे ग्रंथ उन्हीं के शासनकाल में लिखे गए। पातिनेन केल्कनकु में 18 कवियों की रचनाएं हैं। उनमें नालैदियार को सबसे पहले रखा गया है, जिन्हें तमिल साहित्य में तिरुक्कुल जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।


[1] बर्टल स्टीन, पीजेंट स्टेट एंड सोसाइटी इन मेडीवल साउथ इंडिया, आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ-76

[2] डॉ. रामशरण शर्मा, एन्शिएंट इंडिया, एनसीईआरटी, पृष्ठ 167

[3] हरमन कुल्के और डाइटमर रदरमंड, ए हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, तीसरा संस्करण, राउटलेज, लंदन, पृष्ठ 99

[4] पेरिया पुराणम्, सेक्किझार, अंग्रेजी अनुवादक, जी. वन्मीकांतन, रामकृष्ण मठ, मद्रास, पृष्ठ 469

[5] दि ग्लोरियस तमिल कलाभ्राज एंड दि फर्स्ट रिपब्लिक इन एन्शिएंट इंडिया, एन्शिएंट तमिल किंगलाइंस

[6] वही

[7] इंडियन चार्टर ऑन कॉपर प्लेट्स, अर्बटाइन गौर, ब्रिटिश लायब्रेरी, ब्रिटिश म्यूजियम पब्लिकेशन लिमिटेड, 1971, पृष्ठ 2-3

[8] इंडियन चार्टर ऑन कॉपर प्लेट्स, अर्बटाइन गौर, ब्रिटिश लायब्रेरी, ब्रिटिश म्यूजियम पब्लिकेशन लिमिटेड, 1971, पृष्ठ 2-3

[9] गेल ऑम्वेट, भारत में बौद्ध धर्म : ब्राह्मणवाद और जातिवाद को चुनौती, अनुवाद, पृष्ठ 122

[10] ए हिस्ट्री ऑफ़ साउथ इंडिया, के. ए. नीलकंठ शास्त्री, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1958, 139

[11] गेल ऑम्वेट, भारत में बौद्ध धर्म, पृष्ठ 123

[12] दि लार्ड ऑफ़ वेंगाडम, एस. आर. रामानुजन, पैट्रिग पब्लिशिंग, 2014

[13] ए डीप लाइट ऑन दि डार्क एज ऑफ़ कलाभ्राज, हर्षद सुंदर, तमिलनाडु नेशनल लॉ स्कूल, 2017

(संपादन : नवल)


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