क्या आप चुहाड़ विद्रोह और इसके नायक रघुनाथ महतो को जानते हैं?

सन् 1769 में छोटानागपुर के इलाके में एक विद्रोह हुआ। यह विद्रोह अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जल, जंगल और जमीन के लिए किया गया सबसे पहला विद्रोह था। हालांकि इस विद्रोह के दौरान रघुनाथ महतो एवं उनके अनेक साथी शहीद हो गए। परंतु, इस विद्रोह की अनुगूंज बाद के विद्रोहों में साफ सुनाई दी। बता रहे हैं विशद कुमार

उत्तर भारत में कई शब्दों का उपयोग अपशब्द के रूप में किया जाता है। इनमें एक शब्द है चुहाड़। यह एक जातिसूचक शब्द भी है जिसका उपयोग सफाईकर्मी जाति के लोगों के लिए किया जाता है। सामान्य अर्थों में इसका उपयोग चोरी करनेवाले के संबंध में भी लोग करते हैं। जबकि इस शब्द का संबंध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे पहले आंदोलन से है जो कि वर्ष 1769 में हुआ। इस आंदोलन के प्रणेता थे रघुनाथ महतो। उनका जन्म 21 मार्च 1738 को तत्कालीन बंगाल (वर्तमान में झारखंड) के छोटानागपुर के जंगलमहल (मानभूम) जिला अंतर्गत नीमडीह प्रखंड के एक छोटे से गाव घुंटियाडीह में हुआ था।

दरअसल, जब अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत की चर्चा होती है तो द्विज इतिहासकार 1857 में हुए सैनिक विद्रोह को प्रथम संघर्ष के रूप में रेखांकित करते हैं। जबकि वर्ष 1771 में तिलका मांझी के नेतृत्व में हुआ हूल विद्रोह और इससे पहले वर्ष 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में हुए चुहाड़ विद्रोह का जिक्र करना भी आवश्यक नहीं समझते। यहां तक कि वे 1820-21 में पोटो हो के नेतृत्व में हुए हो विद्रोह, वर्ष 1831-32 में बुधु भगत, जोआ भगत और मदारा महतो के नेतृत्व में कोल विद्रोह, वर्ष 1855 में सिदो-कान्हू के नेतृत्व में हुए संताल विद्रोह और वर्ष 1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए उलगुलान को भी महत्व नहीं देते। इन सभी विद्रोहों ने अंग्रजों को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया था। 

झारखंड के मानभूम) जिला अंतर्गत नीमडीह प्रखंड के रघुनाथपुर गांव में चुहाड़ आंदोलन के प्रणेता रघुनाथ महतो की प्रतिमा

बता दें कि वर्ष 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंगल, जमीन की रक्षा एवं शोषण से मुक्ति के लिए विद्रोह किया। इसे चुहाड़ विद्रोह कहा गया। चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है। यह विद्रोह 1769 से 1805 तक चला।

दरअसल, स्थानीय आदिवासी लोगों को उत्पाती या लुटेरा के अर्थ में सामूहिक रूप से ब्रिटिशों द्वारा चुहाड़ कहकर बुलाया गया। हाल के कुछ आंदोलनों में इसे आपत्तिजनक मानते हुए इस घटना को चुहाड़ विद्रोह की बजाय जंगलमहल स्वतंत्रता आंदोलन के नाम से बुलाए जाने का प्रस्ताव भी किया गया है। 

इस आंदोलन की शुरुआत तब हुई जब वर्ष 1765 ई. में जब ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल जिला में मालगुजारी वसूलना शुरू किया गया। तब अंग्रेजों के इस शोषण का विरोध शुरू हुआ क्योंकि लोगों को लगा कि अंग्रेजों द्वारा उनकी स्वतंत्रता, उनके जल, जंगल और जमीन को हड़पने तैयारी है। अत: 1769 ई. में कुरमी समाज के लोगों द्वारा रघुनाथ महतो के नेतृत्व में सबसे पहला विरोध किया गया और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका गया। अंग्रेजों को इसका अंदेशा भी नहीं था। उन्होंने अपने जमींदारों) से पूछा कि ये लोग कौन हैं? तब जमींदारों ने विद्रोहियों को नीचा दिखाने के लिए उन्हें ‘चुहाड़’ कहकर संबोधित किया। तभी से उनका विद्रोह ‘चुहाड़ विद्रोह’ हो गया। यह विद्रोह इसलिए भी खास था क्योंकि इसमें केवल आदिवासी नहीं थे और ना ही कोई जाति विशेष के लोग। इसमें मांझी, कुरमी, संथाल, भूमिज, मुंडा, भुंईया आदि सभी समुदाय के लोग शामिल थे।

बता दें कि 1764 में बक्सर युद्ध की जीत के बाद अंग्रेजों का मनोबल बढ़ गया था। अंग्रेज कारीगरों के साथ किसानों को भी अपना शिकार बनाने लगे। वहीं 12 अगस्त, 1765 को शाह आलम द्वितीय से अंगरेजों को बंगाल, बिहार, उड़ीसा व छोटानागपुर की दीवानी मिल गई। उसके बाद अंग्रेजों ने किसानों से लगान वसूलना शुरू कर दिया। वर्ष 1766 में अंग्रेजों ने राजस्व के लिए जमींदारों पर दबाव बनाया, लेकिन कुछ जमींदारों ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की। वहीं कुछ अपनी शर्तों पर उनसे जा मिले। नतीजा यह हुआ कि किसान अंग्रेजी जुल्म के शिकार होने लगे। स्थिति अनियंत्रित होने लगी, तब चुहाड़ आंदोलन की स्थिति बनी।

रघुनाथ महतो बचपन से ही क्रांतिकारी स्वभाव के थे। उन्होंने वर्ष 1769 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन उन्होंने नीमडीह गांव के एक मैदान में सभा की। यही स्थान रघुनाथपुर के नाम से जाना गया। रघुनाथ महतो के समर्थक 1773 तक सभी इलाके में फैल चुके थे। चुहाड़ आंदोलन का फैलाव नीमडीह, पातकुम, बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर, किंचुग परगना (वर्तमान सरायकेला खरसांवा) राजनगर, गम्हरिया आदि तक हो गया। उन्होंने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था। वर्ष 1774 में विद्रोहियों ने किंचुग परगना के मुख्यालय में पुलिस फोर्स को घेरकर मार डाला।

इस घटना के बाद अंग्रेजों ने किंचुग परगना पर अधिकार करने का विचार छोड़ दिया। 10 अप्रैल, 1774 को सिडनी स्मिथ ने बंगाल के रेजीमेंट को विद्रोहियों के खिलाफ फौजी कार्रवाई करने का आदेश दे दिया। वर्ष 1776 में आंदोलन का केंद्र रांची जिले का सिल्ली बना। 5 अप्रैल, 1778 को जब रघुनाथ महतो जंगलों में अपने साथियों के साथ सभा कर रहे थे। सिल्ली प्रखंड के लोटा पहाड़ किनारे अंग्रेजों की रामगढ़ छावनी से हथियार लूटने की योजना को लेकर बैठक चल रही थी। इसी बीच गुप्त सूचना पर अंग्रेजी सेना ने रघुनाथ महतो एवं उनके सहयोगियों को चारों ओर से घेर लिया। दोनों तरफ से हमले होने लगे। इस क्रम में रघुनाथ महतो को भी गोली लगी और वे शहीद हो गए। सैकड़ों समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ध्यातव्य है कि चुहाड़ विद्रोह का प्रथम इतिहास जे. सी. प्राइस ने “दि चुहाड़ रेबेलियन ऑफ़ 1799” शीर्षक से लिखा। जबकि परवर्ती इतिहासकारों में ए. गुहा और उनके हवाले से एडवर्ड सईद का नाम आता है।

(संपादन : नवल)


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